Friday, December 25, 2020

प्रेस आज़ादी पहले से कहीं ज़्यादा अहम,

  59 मीडियाकर्मियों की हत्याओं की निन्दा 

Unsplash/Jovaughn Stephens//एक प्रेस गतिविधि को कवर करते हुए एक वीडियो पत्रकार

23 दिसम्बर 2020//कानून और अपराध की रोकथाम

संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक संगठन (UNESCO) ने बताया है कि वर्ष 2020 के दौरान, अभी तक कम से कम 59 मीडियाकर्मी मारे गए हैं, जिनमें चार महिलाएँ भी हैं. संगठन ने बुधवार को ये आँकड़े जारी करते हुए, सूचना प्राप्ति और तथ्यात्मक पत्रकारिता को एक सार्वजनिक अच्छाई के रूप में क़ायम रखने के समर्थन में खड़े होने की पुकार भी लगाई.

यूनेस्को ने बुधवार को जारी एक वक्तव्य में कहा कि पिछले एक दशक के दौरान, औसतन, हर चार दिन में एक पत्रकार को अपनी ज़िन्दगी गँवानी पड़ी है. 

यूनेस्को की महानिदेशक ऑड्री अज़ूले ने कहा है कि अलबत्ता, वर्ष 2020 में, पत्रकारों की मौतों की संख्या तुलनात्मक रूप में सबसे कम रही है.

लेकिन ये भी सच है कि लोकतंत्र और मानवाधिकारों की हिफ़ाज़त के लिये, शायद ही पत्रकारिता की इतनी अहमियत रही हो, क्योंकि दुनिया, कोरोनावायरस और उसके आसपास मौजूद दुष्प्रचार व ग़लत जानकारी के फैलाव के वायरस से भी जूझ रही है.

सत्य की सुरक्षा

ऑड्री अज़ूले ने कहा है कि कोरोनावायरस महामारी, एक ऐसा सटीक तूफ़ान साबित हुई है जिसने दुनिया भर में प्रेस स्वतंत्रता को प्रभावित किया है.

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि पत्रकारिता की सुरक्षा करना, दरअसल सत्य की हिफ़ाज़त करना है.

यूनेस्को की रिपोर्ट में कहा गया है कि लातीनी अमेरिका और कैरीबियाई क्षेत्रों में 22 – 22 पत्रकारों की हत्याएँ हुईं और इन क्षेत्रों को एशिया और प्रशान्त क्षेत्र के साथ मिलाकर कहा जाए तो, पत्रकारों की सबसे ज़्यादा हत्याएँ हुई हैं. 

इसके बाद अरब क्षेत्र में 9 और अफ्रीका में 6 पत्रकारों की हत्याएँ हुईं.

यूनेस्को का कहना है कि पत्रकारों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों में, औसतन 10 में से 9 मामलों में, दंडमुक्ति यानि न्यायिक प्रक्रिया का अभाव दिखा है, हालाँकि वर्ष 2020 में कुछ बेहतरी देखने को मिली है.

वर्ष 2020 में पत्रकारों की सुरक्षा पर यूनेस्को महानिदेशक की ये रिपोर्ट, पत्रकारों के ख़िलाफ़ अपराधों में न्याय के अभाव को ख़त्म करने के अन्तरराष्ट्रीय दिवस के आसपास ही प्रकाशित ही है.

इस दिवस के अवसर पर उपलब्ध आँकड़ों में पिछले दो वर्षों के दौरान पत्रकारों की हत्याओं के तरीक़ों की गहराई से जानकारी मुहैया कराई गई है.

यूनेस्को की ये ताज़ा रिपोर्ट जारी किये जाने के अवसर पर ही, संगठन ने वैश्विक स्तर पर एक जागरूकता अभियान भी शुरू किया है जिसका नाम है – Protect Journalists. Protect the Truth – पत्रकारों की हिफ़ाज़त करें. सत्य को बचाएँ.

यूनेस्को का कहना है, “अब भी बहुत सी हत्याएँ होती हैं और कम घातक हमले व प्रताड़ना और परेशान किये जाने के मामले अब भी बढ़ रहे हैं."

"वर्ष 2020 में, पत्रकारों के सामने दरपेश ख़तरे और भी उजागर हुए हैं. मसलन, दुनिया भर में, ब्लैक लाइव्स मैटर - Black Lives Matter जैसे और इसी तरह के अन्य प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग करते हुए उन्हें ज़्यादा ख़तरों का सामना करना पड़ा.”

प्रदर्शन ख़तरे

यूनेस्को ने वर्ष 2020 के आरम्भ में 65 देशों में हुए ऐसे 125 प्रदर्शनों की पहचान की थी  जिनमें पत्रकारों पर या तो हमले किये गए, या उन्हें गिरफ़्तार किया गया, और ये प्रदर्शन 1 जनवरी 2015 से लेकर 30 जून 2020 के बीच हुए.

इनमें से 21 प्रदर्शन वर्ष 2020 की पहली छमाही के दौरान हुए, लेकिन वर्ष 2020 के दूसरे हिस्से के दौरान पत्रकारों को गिरफ़्तार किये जाने या उन्हें हमलों का निशाना बनाए जाने की घटनाओं में बढ़ोत्तरी देखी गई है.

यूनेस्को का कहना है कि इनके अतिरिक्त, महिला पत्रकारों की सुरक्षा का मुद्दा अब भी चिन्ता का एक बड़ा कारण है. “महिला पत्रकारों को, पत्रकारिता के उनके पेशे और लिंग के लिये हमलों का निशाना बनाया जाता है और महिला पत्ररकार, ख़ासतौर से लिंग आधारित प्रताड़ना और हिंसा का भी सामना करती हैं.”

Link

Unsplash/Jovaughn Stephens//एक प्रेस गतिविधि को कवर करते हुए एक वीडियो पत्रकार

Saturday, December 12, 2020

पूरा देश किसानों के पीछे एकजुट है

  राष्ट्र को सावधानी, लोगों को चेतावनी  

यह कुछ भी नहीं था कि मोदी सरकार ने योजना आयोग को खत्म कर दिया। उनके लिए जवाहरलाल नेहरू से जुड़ी हर चीज एक अभिशाप थी। नीति आयोग आरएसएस नियन्त्रित भाजपा की देन था जो योजना आयोग के विकल्प की अवधारणा के रूप में आया है। क्योंकि उन्हें लगता था कि योजना शब्द ही समाजवाद की ओर एक कदम था। 

नीति आयोग एक चमचमाती हुई प्रोफाइल का प्रतिनिधित्व करता है- ‘नेशनल इंस्टीट्यूट फाॅर ट्रांसफार्मिंग इंडिया‘। कुछ ही समय में यह संस्थान मोदी सरकार के विचारों और कामों का आईना बन गया। कई बार नीति आयोग मोदी सरकार की नीतिगत दिशाओं का एक सिद्ध अग्रदूत था। आज वे जिसकी चर्चा करते हैं कल वह एक विचार के रूप में सरकार का मार्गदर्शक सिद्धांत बन जाएगा। वास्तव में यही कारण है कि देश ने हाल ही में नीति आयोग के सीईओ द्वारा दिए गए बयान का बैचेनी के साथ संज्ञान लिया। वह स्वराज पत्रिका द्वारा आयोजित एक वेबिनार, ‘द रोड टू आत्मनिर्भर भारत‘ को संबोधित कर रहे थे। उनके अनुसार ‘बहुत अधिक लोकतंत्र भारत की प्रगति के लिए मुख्य बाधा है‘। यह एक दर्शन का रहस्योद्घाटन था जो लोकतंत्र को आत्मनिर्भर भारत के लिए एक काउंटर करंट के रूप में रेखांकित करता है। जबकि पूरा देश उन किसानों के पीछे एकजुट है जो कृषि में न तथाकथित सुधारों के खिलाफलड़ रहे हैं। तो नीति अयोग प्रमुख रोना रो रहे हैं कि भारत में कठिन सुधार मुश्किल हैं। उन्होंने अपनी सरकार की प्रशंसा में कोई शब्द नहीं कहे जिसने सभी क्षेत्रों कोयला, श्रम, कृषि में सुधार लाने में हठपूर्ण कुशलता दिखाई है। भारत में हर राष्ट्र को सावधानी, लोगों को चेतावनी कोई जानता है कि देश में सुधार के नाम पर क्या हो रहा है। जीवन के सभी क्षेत्रों में एफडीआई सरकार के लिए मुक्ति मंत्र बन गया है। उनकी आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना स्वयं ही विदेशी पंूजी के पास गिरवी है। लगभग सभी सुधार जिनकों उन्होंने बढाया है लोकतंत्र की नींव पर चोट हैं। भारत में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक लोकतंत्र लगातर इन हठी सुधारों को शुरू करने वालों से खतरे में है। संगठित होने, मतान्तर रखने और विरोध करने के बुनियादी अधिकारों का दमन किया जा रहा है। राष्ट्रीय राजधानी की सीमा पर दस्तक दे रहे देश के अन्नदाताओं को लोतंत्र के उस दुर्ग में प्रवेश से रोक दिया गया है जहां चुनी हुई सरकारें बैठती हैं। भारत में लोकतंत्र के बारे में बोलने के सामने सीमेंट की बाधाएं, कंटीली तारें, पानी की बौछारें और आंसू गैस के गोले हजारो अर्धसैनिक बलों के साथ तैनात कर दिये गये हैं। नीति आयोग उस राह को समझता होगा जिससे धारा 370 को खत्म किया गया है, सीएए, एनआरसी सुधार लागू किये गये, और देश में श्रम सुधार थोपे गये। उन्हें संविधान के अनुच्छेद 14, 29 और 21 में समाहित अधिकारों की बुनियादी समझ होगी। किसान, मजदूर, छात्र, दलितों और समाज के दूसरे वंचित तबको को इन हठी सुधारों पर सवाल करने के अधिकार हैं। यह सुधार एक लोकतान्त्रिक देश में गरिमापूर्ण जीवने जीने के उनके अविच्छेद अधिकारों को प्रभावित करते हैं। बहस करने, असहमति रखने और विरोध कराने का अधिकार इसका हिस्सा है। नीति आयोग को भारतीय जनता के बीच चल रहे असंतोष को समझना चाहिए। इसके पीछे का कारण लोकतंत्र की प्रचुरता नहीं है बल्कि धन और जीवन की बढ़ती विषमता है। महामारी के दिनों में प्रोत्साहन पैकेज ने गरीबों के लिए कोई न्याय नहीं किया था। प्रवासी मजदूर, घरेलू सहायक और सफाई मजदूरों को भूला दिया गया था। यह तुच्छ लाभ जिन्हें दिये गये उनमें से अधिकांश तक नहीं पहुंचे। अर्थव्यवस्था का संकट ‘ईश्वर के कृत्य के कारण‘ या बहुत अधिक लोकतंत्र के कारण नहीं था। नीति अयोग द्वारा विकसित की गई नीतियां और सरकार द्वारा कार्यान्वित भारत के गहरे संकट के पीछे का कारण है। सत्तारूढ़ हलकों का इरादा विलफुल डिफाल्टर्स और विदेशी पूंजी को रियायतें प्रदान करके इसे हल करना है। हर जगह एक और एकसमान ही सवाल है कि मुनाफा अथवा जनता? यहां नीति आयोग दूरगामी प्रभाव वाले खतरनाक प्रस्तावों के साथ आ रहा है। यह सरकार का मागदर्शन अधिक से अधिक भयावह कानून अपनाने के लिए कर रहा है। यह लोगों के प्रतिरोध का गला घोंटने के लिए हैं ताकि बडों के लिए पूंजी की मस्ती बिना रूकावट के चलती रहे। सीईओ ने अपने भाषण में भारी मात्रा में राजनीतिक दृढ़ संकल्प के लिए आग्रह किया। यह सरकार से अधिक से अधिक दमनकारी कानूनों के साथ आगे बढ़ने का आह्वान है। राष्ट्र के लिए सावधानी और लोगों को चेतावनी। 

मुक्ति संघर्ष के तारीख  13 से  19 दिसंबर 2002 अंक में से साभार 

किसानों  पर आरोप लगाने वालों को खुद किसान  ही दे रहे हैं जवाब 

श्याम मीरा सिंह की तरफ से किसान धरने के दौरान क्लिक की गई एक तस्वीर
जिस पर अलग से भी एक विशेष पोस्ट दी जा रही है--रेक्टर कथूरिया 


Sunday, November 22, 2020

भाजपा महिला मोर्चा लुधियाना देगा सीपी को ज्ञापन

 जिला अध्यक्ष मनिंदर कौर घुम्मन करेंगी अगवानी 

प्रिय  बन्धुवर,

                                सभी मीडिया साथियों को नमस्कार !

       भाजपा महिला मोर्चा लुधियाना की जिला अध्यक्ष मनिंदर कौर घुम्मन के नेतृत्व में  एक मांग-पत्र लुधियाना के सी.पी.साहब को 23 नवम्बर 2020 दिन सोमवार दोपहर 12  बजे दिया जायेगा ! 

आप सब मीडिया साथियो से अनुरोध है की इस कार्यक्रम को कवरेज करने की कृपा करें।

          धन्यवाद ! 

                                                                                              दिनांक:-- 23 नवम्बर 2020 , समय :--दोपहर 12  बजे                                                            स्थान :-- सी पी दफ्तर ,फ़िरोज़पुर रोड,लुधियाना 

 * डॉ.सतीश कुमार  dr.skumar30@rediffmail.com 

 ☎ 9815413363 ,9815999909

Tuesday, November 17, 2020

जंग के खिलाफ अभियान की कहानी बता रहे हैं डा.अरुण मित्रा

 जंग की भयानक तस्वीर को साहिर साहिब ने भी दिखाया 

लुधियाना
: 17 नवंबर 2020: (कार्तिका सिंह//मीडिया स्क्रीन ऑनलाइन)::
साहिर लुधियानवी साहिब अपनी लम्बी और संगीतमय काव्य रचना "परछाइयां" में युद्ध के पागलपन का ऐसा भयावह चित्र खींचते हैं की पढ़ते पढ़ते आँखों में आंसू आ जाते हैं। वह कहते हैं:
उस शाम मुझे मालूम हुआ, जब भाई जंग में काम आये
सरमाए के कहबाख़ाने में बहनों की जवानी बिकती है
सूरज के लहू में लिथड़ी हुई वह शाम है अब तक याद मुझे
चाहत के सुनहरे ख्वाबों का अंजाम है अब तक याद मुझे

इस  नज़्म के आखिर  साहिब कहते हैं:
हमारा खून अमानत है नस्ले-नौ के लिए,
हमारे खून पे लश्कर न पल सकेंगे कभी॥

कहो कि आज भी हम सब अगर खामोश रहे,
तो इस दमकते हुए खाकदाँ की खैर नहीं।

जुनूँ की ढाली हुई ऐटमी बलाओं से,
ज़मीं की खैर नहीं आसमाँ की खैर नहीं॥

गुज़श्ता जंग में घर ही जले मगर इस बार,
अजब नहीं कि ये तनहाइयाँ भी जल जायें।

गुज़श्ता जंग में पैकर जले मगर इस बार,
अजब नहीं कि ये परछाइयाँ भी जल जायें॥

डाक्टर अरुण मित्रा और उनके सक्रिय सहयोगी साथी इस नज़्म के मकसद को बहुत पहले ही अपना चुके थे। जवानी की उम्र में जब लोग मस्ती करते हैं उस उम्र में यह लोग जंग के खिलाफ जन चेतना जगाने लगे थे। जब देश और दुनिया के बड़े बड़े असरदायिक लोग जंग का जनून भड़काने में लगे हों और जंग की ही सियासत हो रही हो उस समय जंग के खिलाफ बात करना आंधियों में दिया जलाने जैसा ही होता है लेकिन इन लोगों ने बहुत बार ऐसी कोशिशें की। अब उन कोशिशों का सुखद परिणाम सामने आ रहा है। उसी परिणाम की चर्चा करती है यह वीडियो जो डाक्टर अरुण मित्रा से हुई एक भेंट पर आधारित है। डाक्टर अरुण मित्रा से इस भेंट की प्रेरणा देने वाले वाम पत्रकार और कहानीकार एम् एस भाटिया डाक्टर मित्रा की ऐसी कोशिशों पर एक पुस्तक भी तैयार करवा रहे हैं। आप इस वीडियो को देखिये और इस पर अपने विचार भी बताएं। यह वीडियो Dr Arun Mitra on War and Nuclear Treaty इस नाम से यूट्यूब पर भी उपलब्ध है। --कार्तिका सिंह 

Monday, November 16, 2020

'उसने गांधी को क्यों मारा' का लोकार्पण यादगारी रहा

 साज़िशी हवाओं के खिलाफ जनचेतना जगाता एक सार्थक प्रयास  


नई दिल्ली: 5 अक्टूबर 2020: (कार्तिका सिंह//मीडिया स्क्रीन Online)::
महात्मा गांधी के खिलाफ निंदा प्रचार और अन्य साज़िशों का सिलसिला लगातार जारी रहा है। महात्मा गांधी की हत्या को जायज़ ठहराने  अभियान भी चलते रहे।  गांधी को लोगों के दिल दिमाग से निकला नहीं जा सका। गांधी लगातार प्रासंगिक बने रहे। उनकी आत्म कथा-सत्य के साथ मेरे प्रयोग अंग्रेजी में बिकती रही और हिंदी में भी। लोगों ने छह पुस्तकों के सेट की सौगात देना बंद नहीं किया अब गाँधी जी पर नई किताब आई है-"उसने गाँधी को क्यूं मारा।" इस पुस्तक पर एक विशेष चर्चा भी हुई। हम उसका साराँश राजकमल प्रकाशन से साभार यहां भी दे रहे हैं। गांधी पर चर्चा आज के असहनशील युग में फिर एक बहुत बड़ी ज़रूरत भी है। सत्य और सहनशीलता से दूर हो रहे समाज को गांधी एक बार फिर से राह दिखा सकते हैं। गांधी की पुस्तकों को सम्मान सहित पढ़ा जाया या फिर उनके बुतों पर कालख पोती जाए इससे फर्क गांधी को नहीं इस समाज को ही पढ़ने वाला है। गाँधी की शख्सियत इन सभी बातों से बहुत ऊंची उठ चुकी है। गांधी जी की हत्या के बाद उन पर जितने भी हमले हुए हैं उनसे गांधी जी की वैचारिक प्रतिमा और मज़बूत हो कर उभरी है।  प्रस्तुत है उस रिपोर्ट का सारांश:
2 अक्टूबर, 2020 को महात्मा गांधी की 151वीं जयंती के अवसर पर चर्चित कवि-इतिहासकार अशोक कुमार पांडेय की पुस्तक ‘उसने गांधी को क्यों मारा’ का लोकार्पण एवं उस पर बातचीत 'राजकमल' के फ़ेसबुक लाइव कार्यक्रम में हुई। उल्लेखनीय है कि यह कार्यक्रम बहुत रोचक रहा। 

कार्यक्रम में चिन्तक-इतिहासकार सुधीर चन्द्र, इतिहासकार मृदुला मुखर्जी, राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा, हिन्दी के महत्त्वपूर्ण लेखक जयप्रकाश कर्दम और अशोक कुमार पांडेय शामिल रहे। किताब पर बात करते हुए मनोज कुमार झा ने कहा कि हिन्दी पाठक वर्ग के पास एक ऐसी किताब पहुँच रही है जो गांधी जी की प्रतिमा, चश्मा, पहनावे और उनके प्रतीकों से ऊपर उठकर कुछ बुनियादी सवालों पर है। आज के दौर में गांधी की प्रासंगिकता पर बात करते हुए जयप्रकाश कर्दम ने कहा कि गांधी का होना इतिहास की बहुत बड़ी घटना है। वह एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक ऐसा संस्थान हैं जो प्रेम, सद्भाव और अहिंसा के मूल्यों पर खड़ा है। यह प्रेम, सद्भाव और अहिंसा सिर्फ़ मूल्य ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र का आधार हैं।

अशोक कुमार पांडेय ने अपनी किताब के बारे में बताते हुए कहा कि मैंने ऐसे विषय पर किताब लिखी है जिस पर बहुत लोग लिख चुके हैं। मैंने आर्काइव्स, ख़ास तौर पर 'कपूर कमीशन' की रिपोर्ट में गहरे जाकर चीज़ों को सामने लाने की कोशिश की है। बातचीत को आगे बढ़ाते हुए सुधीर चन्द्र ने विचार व्यक्त किया कि आज हमें इस आधुनिक युग के ि‍ख़लाफ़ एक असहयोग आन्दोलन की ज़रूरत है। गांधी ने कहा था 'न' कहना सीखो, आज फिर हमें 'न' कहना सीखना होगा। अगर गांधी का कोई भी महत्त्व है हमारे जीवन में तो हमें यह सोचना होगा कि अगर हम इस महत्त्व की बातें करते रहें तो क्या होना है। अशोक कुमार पांडेय की किताब ‘उसने गांधी को क्यों मारा’ को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की ज़रूरत है और हमें यह सवाल भी उठाना है कि किस-किसने गांधी को मारा? और जब गांधी के मारे जाने की बात होती है, तब हमें यह भी याद रखना होगा कि गांधी किसी के मारे नहीं मरते हैं। गांधी तब तक जीवित रहेंगे जब तक यह सभ्यता है। इस सभ्यता के लिए गांधी के पास एक ऐसा सन्देश है,

जिस पर अमल करके मानव अपने आपको विकसित कर सकता है। कार्यक्रम का संचालन ऐश्वर्या ठाकुर ने किया।

ज्ञात हो कि इसी दिन एक अन्य कार्यक्रम जो ‘कलिंगा लिटरेरी फ़ेस्टिवल’ में आयोजित था, वहाँ भी 'उसने गांधी को क्यों मारा' पुस्तक पर बातचीत का आयोजन किया गया। अशोक कुमार पांडेय के साथ महत्त्वपूर्ण कथाकार वंदना राग ने पुस्तक पर बातचीत की। वंदना राग ने पुस्तक से कुछ अंशों का पाठ भी किया जो काफ़ी प्रभावशाली रहा।   

Sunday, November 15, 2020

केबीसी में मनुस्मृति दहन पर प्रश्न से मचा बवाल

15th November 2020 at 9:20 AM

 राम पुनियानी कर रहे हैं उस दिन के बवाल की चर्चा 

‘कौन बनेगा करोड़पति’ (केबीसी) सबसे लोकप्रिय टीवी कार्यक्रमों में से एक है।  इसमें भाग लेने वालों को भारी भरकम धनराशि पुरस्कार के रूप में प्राप्त होती है। हाल में कार्यक्रम के ‘कर्मवीर’ नामक एक विशेष एपीसोड में अमिताभ बच्चन ने पहले से तैयार स्क्रिप्ट के आधार पर यह प्रश्न पूछा कि उस पुस्तक का क्या नाम है जिसे डॉ अम्बेडकर ने जलाया था। सही उत्तर था ‘मनुस्मृति।’   उस दिन के कार्यक्रम के अतिथि थे वेजवाड़ा विल्सन। जो जानेमाने जाति-विरोधी कार्यकर्ता हैं और लंबे समय से हाथ से मैला साफ करने की घृणित प्रथा के विरूद्ध आंदोलनरत हैं। 

इस प्रश्न पर दर्शकों के एक हिस्से की त्वरित प्रतिक्रिया हुई। कुछ लोगों ने प्रसन्नता जाहिर की कि इस प्रश्न से उन्हें उस पुस्तक के बारे में जानकारी मिली जो भयावह जाति व्यवस्था को औचित्यपूर्ण ठहराती है। परंतु अनेक लोग इस प्रश्न से आक्रोशित हो गए। इन लोगों ने इसे हिन्दू धर्म का अपमान और हिन्दू समुदाय को विभाजित करने का प्रयास निरूपित किया। यह ट्वीट उनके विचारों को सारगर्भित ढ़ंग से प्रतिबिंबित करती है “ऐसा लगता है कि ये लोग किसी भी तरह बीआर अम्बेडकर को हिन्दू विरोधी बताना चाहते हैं जबकि यह सही नहीं है। ये लोग हिन्दू समाज को जाति के आधार पर विभाजित करने पर उतारू हैं....‘‘

लेखक डा. राम पुनियानी 
केबीसी के मेजबान और कार्यक्रम से जुड़े अन्य व्यक्तियों के विरूद्ध हिन्दुओं की भावनाएं आहत करने का आरोप लगाते हुए एक एफआईआर दर्ज करवाई गई है। हिन्दू राष्ट्रवादी विमर्श यह साबित करना चाहता है कि अम्बेडकर के विचार उससे मिलते हैं। ये लोग एक ओर अम्बेडकर का महिमामंडन करते हैं तो दूसरी ओर दलितों की समानता के लिए उनके संघर्ष और उनके विचारों को नकारना चाहते हैं। आरएसएस और उसके संगी-साथी बड़े पैमाने पर अंबेडकर जयंती मनाते हैं। सन् 2016 में ऐसे ही एक कार्यक्रम में बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि वे अंबेडकर भक्त हैं। उन्होंने अंबेडकर की तुलना मार्टिन लूथर किंग जूनियर से की थी। इन्हीं मोदीजी ने एक पुस्तक लिखी थी जिसका शीर्षक था ‘कर्मयोग’. इस पुस्तक में कहा गया था कि वाल्मिीकियों द्वारा हाथ से मैला साफ करना, उनके (वाल्मिीकियों) लिए एक आध्यात्मिक अनुभव है। यह दिलचस्प है कि इस कार्यक्रम के अतिथि डॉ बेजवाड़ा विल्सन, हाथ से मैला साफ करने की अमानवीय प्रथा के विरूद्ध कई दशकों से संघर्ष कर रहे हैं।

यह भी दिलचस्प है कि जो लोग मनुस्मृति दहन की चर्चा मात्र को हिन्दू भावनाओं को ठेस पहुंचाना निरूपित करते हैं वे ही पैगम्बर मोहम्मद का अपमान करने वाले कार्टूनों के प्रकाशन को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बताते हैं। इन कार्टूनों के प्रकाशन के बाद हुए त्रासद घटनाक्रम में फ्रांस में चार लोगों की जान चली गई।  इन लोगों की हत्या करने वाले इसलिए उद्धेलित थे क्योंकि कार्टूनों के प्रकाशन से उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची थी। 

अंबेडकर एक अत्यंत प्रतिभाशाली और उच्च दर्जे के बुद्धिजीवी थे। उन्होंने पूरे देश में जाति और अछूत प्रथा के खिलाफ लंबा संघर्ष किया और हिन्दू धर्म की खुलकर आलोचना की. वे हिन्दू धर्म की ब्राम्हणवादी व्याख्या के कड़े विरोधी थे। वे कबीर को अपना गुरू मानते थे। उनके जीवन और लेखन से हमें पता चलता है कि वे भक्ति परंपरा के पैरोकार थे परंतु उनका मानना था कि हिन्दू धर्म, ब्राम्हणवाद के चंगुल में फंसा हुआ है। वे हिन्दू धर्म को ब्राम्हणवादी धर्मशास्त्र कहते थे। उन्होंने दलितों को पीने के पानी के स्त्रोतों तक पहुंच दिलवाने (चावदार तालाब) और अछूतों को मंदिर में प्रवेष का अधिकार सुलभ करवाने (कालाराम मंदिर) के लिए आंदोलन चलाए थे। वे मनुस्मृति को ब्राम्हणवादी सोच की पैरोकार और प्रतीक मानते थे और इसलिए उन्होंने इस पुस्तक, जिसे हिन्दुओं का एक तबका पवित्र ग्रंथ मानता है, का सार्वजनिक रूप से दहन किया था। आज कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि अब मनुस्मृति की चर्चा व्यर्थ है क्योंकि इस पुस्तक को न तो कोई पढ़ता है और ना ही उसमें कही गई बातों को मानता है। यह सही है कि इस संस्कृत पुस्तक को अब शायद ही कोई पढ़ता हो। परंतु यह भी सही है कि इसमें वर्णित मूल्यों में आज भी हिन्दुओं के एक बड़े तबके की आस्था है। गीता प्रेस पर अपनी पुस्तक में अक्षय मुकुल बताते हैं कि गोरखपुर स्थित इस प्रकाशन का हिन्दू समाज की मानसिकता और दृष्टिकोण गढ़ने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। गीता प्रेस के स्टाल देश के अनेक छोटे-बड़े रेलवे स्टेशनों पर हैं और इनमें इस प्रकाशन की पुस्तकें, जिनकी कीमत बहुत कम होती है, उपलब्ध रहती हैं। गीता प्रेस की पुस्तकें मनुस्मृति के मूल्यों का ही प्रसार करती हैं। महिलाओं के कर्तव्यों पर गीता प्रेस की एक पुस्तक को पढ़कर मुझे बहुत धक्का लगा क्योंकि इसमें मनुस्मृति के मूल्यों को ही आसानी से समझ आने वाली भाषा में वर्णित किया गया था। मुझे यह देखकर और धक्का लगा कि इस पुस्तक का मूल्य मात्र पांच रूपये था और इसकी मुद्रित प्रतियों की संख्या पांच लाख से अधिक थी। 

ऐसा दावा किया जाता है कि अंबेडकर हिन्दू-विरोधी थे. इस सिलसिले में हमें उनके स्वयं के शब्दों पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा था “हिन्दू धर्म, जाति की अवधारणा पर केन्द्रित कुछ सतही सामाजिक, राजनैतिक और स्वच्छता संबंधी नियमों के संकलन के अलावा कुछ नहीं है।” अम्बेडकर का यह कथन तो प्रसिद्ध है ही कि “मैं एक हिन्दू पैदा हुआ था परंतु एक हिन्दू के रूप में मरूंगा नहीं।” हिन्दू राष्ट्र, जिसकी स्थापना हमारी वर्तमान सरकार का लक्ष्य है, के बारे में भी अंबेडकर के विचार स्पष्ट थे। देश के विभाजन पर अपनी पुस्तक में उन्होंने लिखा था, “अगर हिन्दू राज वास्तविकता बनता है तो वह इस देश के लिए सबसे बड़ी विपत्ति होगी। हिन्दू चाहे जो कहें, हिन्दू धर्म स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लिए बहुत बड़ा खतरा है और इस कारण वह प्रजातंत्र से असंगत है। हिन्दू राज को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए।”

इन सब मुद्दों पर अंबेडकर के इतने स्पष्ट विचारों के बाद भी नरेन्द्र मोदी और उनके साथी एक ओर अंबेडकर का महिमामंडन कर रहे हैं तो दूसरी ओर उनकी विचारधारा और उनकी सोच को समाज से बहिष्कृत करने के लिए हर संभव यत्न कर रहे हैं। मोदी कैम्प से अक्सर भारतीय संविधान के विरोध में आवाजें उठती रहती हैं। वे चाहते हैं कि इस संविधान के स्थान पर एक नया संविधान बनाया जाए। दलित समुदाय में घुसपैठ करने के लिए वे हर संभव रणनीति अपनाते रहे हैं। जहां अंबेडकर जाति के उन्मूलन के हामी थे वहीं संघ परिवार सामाजिक समरसता मंचों के जरिए यह प्रचार करता है कि जाति व्यवस्था ही हिन्दू धर्म की ताकत है और यह भी कि सभी जातियां बराबर हैं।  दलितों को हिन्दुत्व की विचारधारा से जोड़ने के लिए सोशल इंजीनियरिंग की जा रही है। कई कुटिल तरीकों से दलितों को हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति का प्यादा बना दिया गया है। कुछ दलित नेताओं को सत्ता का लालच देकर हिन्दू राष्ट्रवादी कैम्प में शामिल कर लिया गया है। हाल में चिराग पासवान ने कहा था कि वे मोदी के हनुमान हैं। 

अंबेडकर के वैचारिक और सामाजिक संघर्षों से प्रेरणा लेकर दलित नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक हिस्सा दलितों की गरिमा और उनकी सामाजिक समानता के लिए संघर्ष कर रहा है। समस्या यह है कि ऐसे नेताओं / कार्यकर्ताओं की संख्या बहुत कम है। इसके अतिरिक्त, उनमें परस्पर विवाद और बिखराव हैं। अगर इन समस्याओं पर काबू पाया जा सके तो बाबासाहेब के उन सपनों को साकार करने में हमें मदद मिलेगी जिन्हें साकार करने के लिए उन्होंने मनुस्मृति का दहन किया था।   (11 नवंबर 2020)

(अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं। )

Tuesday, November 3, 2020

4 को अकालीदल करेगा मंत्री भारतभूषण आशु का घेराव

 बिक्रमजीत सिंह मजीठिया के नेतृत्व में होगा घेराव 

लुधियाना: 3 नवंबर 2020: (मीडिया स्क्रीन ऑनलाइन)::

फाईल फोटो 
भाजपा का साथ छोड़ने के  बाद अकालीदल अधिक सक्रिय हो गया है। इसी सक्रियता को जारी रखते हुए अकाली दाल ने कल 4 नवंबर 2020 को सुबह 11:30 बजे पंजाब में कांग्रेस सरकार के सक्रिय मंत्री भारत भूषण आशु के घर का घेराव करना है। यह कदम राशन घोटाले को लेकर उठाया जा रहा है। 

अकाली दल के इस एक्शन की सारी बागडोर वरिष्ठ अकाली नेता गुरदीप सिंह गोशा के हाथ में दी गई है जबकि एक्शन का नेतृत्व करेंगे वरिष्ठ अकाली लीडर बिक्रम सिंह मजीठिया। 

इसी बीच गढ़शंकर में कांग्रेस पार्टी की नेत्री निमिषा मेहता कह चुकी हैं कि यदि अकाली दल सचमुच कृषि बिलों का विरोधी होता तो भाजपा नेताओं का घेराव कर रहा होता। 

इस अकाली घेराव और धरने के संबंध में किसी पत्रकार ने कोई जानकारी लेनी हो तो इस एक्शन के इंचार्ज जत्थेदार गुरदीप सिंह गोशा से ली जा सकती है उनका नंबर है:9646744444

इस धरने के बाद अकालीदल के केडर में नया जोश आने की संभावना बताई जा रही है। इस धरने के बाद स्थिति क्या रुख लेती है इसका सही पता तो वक़्त आने पर ही चलेगा।