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Friday, September 24, 2021

नहीं रहे आकाशवाणी के समाचार सुनाने वाले रामनुज प्रसाद सिंह

 दशकों तक जुड़े रहे रेडियो से रामानुज प्रसाद सिंह  

रेडियो की दुनिया//सोशल मीडिया : 23 सितंबर 2021: (मीडिया स्क्रीन ऑनलाइन ब्यूरो)::


ये आकाशवाणी है! अब आप रामानुज प्रसाद सिंह से समाचार सुनिए! दशकों तक रेडियो समाचार के माध्यम से श्रोताओं को मुग्ध करने वाली ये दमदार, गहरी और ठहरी हुई आवाज़ आज थम गई। 

आकाशवाणी में समाचार वाचक कैडर के आखिरी स्तंभ और महाकवि रामधारी सिंह दिनकर के भतीजे रामानुज प्रसाद सिंह ने 86 साल की उम्र में आज यानी 22 सितंबर 21के दिन इस दुनिया को अलविदा कह दिया। 

आकाशवाणी में समाचार वाचक कैडर की आखिरी चौकड़ी देवकी नंदन पांडेय, विनोद कश्यप, अशोक वाजपेयी और रामानुज प्रसाद सिंह की ही रही. इसके बाद ये कैडर समाप्त हो गया और बाद के समाचार वाचक अनुवादक सह समाचार वाचक की श्रेणी में ही आए. यह जानकारी मीडिया और साहित्य की दुनिया से जुडी शख्सियत मनविंदर भिंबर ने कल अर्थात 22 सितंबर 2021 की रात को 11:02 बजे दी। उन्होंने वाया राजेश चड्ढ़ा यह जानकारी दी। 

रेडियो की यादें दिमाग में आते ही याद आ जाती है रामनुज प्रसाद सिंह जी की याद। बहुत ही अच्छा बोलते थे। उन्हें नमन। बहुत ही दमदार आवाज़ थी। भावों से भरी हुई प्रभावशाली आवाज़। समाचार सुनने को उत्सुक करती हु आवाज़। नींद से जगाती हुई आवाज़। हालात के चक्र की की दस्तक देती हुई आवाज़। आज तक ज़हन में सुनाई देती है। उनका जाना--एक युग का चले जाना है। उनका अतीत हो जाना सचमुच पीड़ादायिक है। रामानुज प्रसाद सिंह जी को श्रद्धासुमन अर्पित हैं। दिल भरा हुआ है। ऑंखें भीगी हुई हैं। अंतर्मन में रेडियो से जुडी यादों का बवंडर सा है। उन्हें एक बार फिर से नमन। काश जाने वालों से कभी दोबारा भेंट का कोई सुअवसर मिला करता। काश वहां भी आकाशवाणी होती और हम सुन पाते उनकी आवाज़ में वहां के समाचार। उनके जाने से जो सदमा हम कुछ लोग महसूस कर रहे हैं उस  महसूस करते हुए हमें मिलजुल कर एक प्रयास करना होगा। रेडियो की दुनिया से जुड़े जो लोग अभी भी हमारे दरम्यान हैं। उन्हें संभालना होगा। उनकी आवाज़ें, उनके अनुभव, उनके ख्याल, उनकी रचनाएं, उनकी तस्वीरें बहुत कुछः सहेजने वाला है। आवाज़ की दुनिया से जुड़े उनके गुर भी उनसे पूछने होंगें तांकि रेडियो की दुनिया अमीर बनी रहे। निश्चिन्त रहिए ,रेडियो समाप्त नहीं होगा हैं तकनीकी रूप चाहे बदलता रहे। रेडियो का जादू कुछ कम हुआ अवश्य लगता है लेकिन जल्द ही लौटेगा रेडियो का करिश्मा। लोग टीवी से अब ऊबने लगे हैं। आओ सुनते हैं ज़रा ध्यान दीजिए। आवाज़ आ रही है---ये आकाशवाणी है! अब आप रामानुज प्रसाद सिंह से समाचार सुनिए......!!!                     ---रेक्टर कथूरिया


Saturday, January 2, 2021

नहीं रहे रेडियो प्लेबैक वाले सक्रिय पत्रकार कृष्णमोहन मिश्रा

 टैक्स्ट के साथ आवाज़ और शब्दों के प्रयोग में भी बहुत ही कुशल थे 

लखनऊ//इंटरनेट: 2 जनवरी 2020: (मीडिया स्क्रीन ऑनलाइन डेस्क):: 

देश के हालात की मायूसी और उदासी के इस माहौल में एक और उदास  खबर आई है राजू मिश्र की एक पोस्ट के रूप में। इसमें एक बहुत अच्छे पत्रकार के बिछुड़ जाने की सूचना है। यह खबर सोशल मीडिया पर सामने आई। उदास कर देने वाली यह पोस्ट है लखनऊ के एक  ऐसे कर्मयोगी पत्रकार के निधन से सबंधित जिन्होने टैक्स्ट के साथ साथ आवाज़ के जादू को भी ब्लॉग मीडिआ के तौर पर सक्रिय हो कर इस्तेमाल किया। उनके प्रयोग बेहद सफल रहे और ने टैक्स्ट और आवाज़ के समन्वय को बहुत ही खूबसूरती के साथ प्रस्तुत किया। रेडियो प्लेबैक उनका बहुत ही ज़बरदस्त प्रयोग रहा जो निकट भविष्य में ही हमें नए नए आर जे भी दिया करेगा। शब्दों और आवाज़ का संमिश्रण  जादू बिखेरता। एक पूरी टीम इस सारे प्रयोग पर नज़र रखती। रेडियो ब्लॉग की दुनिया में यह बहुत  लोकप्रिय हुआ।  Krishnamohan Mishra जी की पोस्टें हमें उनकी याद दिलाती  रहेंगी। राजनीतिक विचारों के भेदभाव से ऊपर उठ कर केवल समाज और विशुद्ध पत्रकारिता के धर्म को निभाते हुए हम उन्हें याद रखें  तो यही बात हमें आगे बढ़ने की शक्ति भी देगी।  

उनके मित्र  राजू मिश्रा बताते हैं-वरिष्ठ पत्रकार कृष्णमोहन मिश्र का गुरुवार की रात लखनऊ में हृदयाघात से निधन हो गया। वे लगभग 70 वर्ष के थे। श्री मिश्र ने अपने पीछे पत्नी और दो पुत्रियों को छोड़ा है। अपरान्ह दो बजे भैंसाकुंड स्थित श्मसान घाट पर उनकी अन्त्येष्टि हुई। श्री मिश्र को उनकी बेटी ने मुखाग्नि दी।कृष्ण मोहन जी का जन्म वाराणसी में हुआ था। उनकी शिक्षा दीक्षा वाराणसी में ही हुई। उन्होंने मिर्जापुर के पालिटेक्निक से शिक्षा ग्रहण की थी। इसके बाद लखनऊ के बांस मंडी स्थित आईटीआई में प्रशिक्षक रहे। यहीं से करीब दस वर्ष पूर्व वे सेवानिवृत्त हुए। श्री मिश्र सांस्कृतिक पत्रकार भी थे। सेवा में रहते हुए उन्होंने सांस्कृतिक पत्रकारिता की। वे दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान में सांस्कृतिक संवाददाता भी रहे। इसके साथ ही वे संस्कृति और संगीत पर लगातार लेखन करते थे। सोशल मीडिया में वे लगातार संगीत और गायन की विभिन्न विधाओं पर लेखन कर रहे थे। वे उ.प्र. जर्नलिस्ट्स एसोशिएशन की पत्रिका उपजा न्यूज और संस्कार भारती की पत्रिका कला कुंज भारती के भी संपादक रहे। आजकल वे राजधानी में जानकीपुरम् क्षेत्र की इकाई के अध्यक्ष थे। गोमती नगर निवासी श्री मिश्र को बीती रात करीब नौ बजे हृदयाघात हुआ। परिवार के लोग उन्हें तत्काल डा. राम मनोहर लोहिया चिकित्सालय ले गए जहां डाक्टरों ने बताया कि तीव्र हृदयाघात से उनका निधन हो चुका है। विनम्र श्रद्धांजलि।

उनके एक और गहरे मित्र सुजॉय चटर्जी उन्हें बहुत ही स्नेह और सम्मान के स्मरण करते हुए कहते हैं-ख़ामोश हुआ "स्वरगोष्ठी" का स्वर, नहीं रहे कृष्णमोहन मिश्र जी। इस गहरे सदमे को उनके मित्र किस मुश्किल से सहन कर पा रहे हैं इसे बताना मुश्किल है। 

श्री चटर्जी कहते हैं: कृष्णमोहन जी लखनऊ के प्रसिद्ध एवम् वरिष्ठ सांस्कृतिक पत्रकार/ सम्पादक होने के साथ-साथ शास्त्रीय एवम् लोक-संगीत के विशिष्ट जानकार, विश्लेषक, समीक्षक, लेखक, जानेमाने मंच संचालक, साक्षात्कारकर्ता और ब्लॉगर भी थे। हमारे ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ नामक ब्लॉग में वे शास्त्रीय एवम् लोकसंगीत पर आधारित स्तम्भ ’स्वरगोष्ठी’ का पिछले दस वर्षों से निरन्तर संचालन करते चले आ रहे थे। इन्टरनेट पर शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक, सुगम और फिल्म संगीत विषयक चर्चा का सम्भवतः यह एकमात्र नियमित साप्ताहिक स्तम्भ है, जो विगत दस वर्षों से निरन्तरता बनाए हुए है। आज उनके चले जाने से यह स्तम्भ अनाथ हो गया।

अपनी मित्रता और उनके साथ मीडिया और जीवन से जुड़े अनुभवों के आदान प्रदान का ज़िक्र करते हुए वह भरे मन से कहते हैं-मेरा कृष्णमोहन जी से पहला परिचय वर्ष 2011 में हुआ था। उन दिनों सेवानिवृत्ति के बाद वे इन्टरनेट पर सक्रिय हो रहे थे। उन्हीं दिनों शास्त्रीय संगीत पर आधारित एक स्तम्भ हमने शुरू किया था ’सुर संगम’, पर शास्त्रीय संगीत के जानकार न होने की वजह से हमारे लिए इसे लम्बे समय तक चला पाना मुश्किल हो रहा था। मेरे मित्र Sumit Chakravarty ने भी कुछ समय तक इसे आगे बढ़ाया। उन दिनों कृष्णमोहन जी इस स्तम्भ के पाठक हुआ करते थे। उनकी नियमित टिप्पणियों को पढ़ कर मुझे और सुमित को यह आभास हो गया था कि अगर कोई इस स्तम्भ को सही तरीके से आगे बढ़ा सकते हैं तो वो कृष्णमोहन जी ही हैं। उन्हें यह प्रस्ताव देते ही वे फ़ौरन राज़ी हो गए। और उस दिन से लेकर आज तक, उन्होंने ही इस साप्ताहिक स्तम्भ का संचालन किया ’स्वरगोष्ठी’ शीर्षक से और एक भी सप्ताह ऐसा नहीं बीता कि जब ’स्वरगोष्ठी’ का अंक प्रकाशित ना हुआ हो। आज इसके 495 अंक प्रकाशित हो चुके हैं। शास्त्रीय एवम् लोक संगीत के लेखों से सुसज्जित ये 495 अंक हिन्दी ब्लॉग जगत में किसी अनमोल ख़ज़ाने से कम नहीं है। इस धरोहर को हमें सहेज कर रखना है।

श्री चटर्जी बताते हैं कि कृष्णमोहन जी से मैंने बहुत कुछ सीखा है। लेखन शैली और प्रकाशनयोग्य formatting के बारे में उन्होंने तो बहुत कुछ बताया ही था, पर केवल उनको देख कर भी कई चीज़ें सीखने को मिली। वे पूरे perfection के साथ लेख लिखते थे, उनके लिखे पोस्ट्स पर किसी भी तरह की ग़लती ढूंढ पाना असम्भव सा था। वे कभी जल्दबाज़ी और shortcut में नहीं जाते थे, अगर समय ना हो तो साफ़ मना कर देते थे, पर quality के साथ कभी समझौता नहीं करते थे। वे इतने ईमानदार थे कि उनके लेखों के लिए जो भी कोई छोटी से छोटी जानकारी भी उन्हें देता था, वे उनका नाम लेख में उल्लेख करना कभी नहीं भूलते थे। ’स्वरगोष्ठी’ में जब भी कभी उन्हें किसी फ़िल्मी गीत से सम्बन्धित कोई रोचक जानकारी की आवश्यकता पड़ती थी तो वे मुझसे सलाह करते थे, और अगर मैं उन्हें कोई जानकारी उपलब्ध करवाता तो वे मेरा नाम लेख में “जानेमाने फ़िल्म इतिहासकार” के रूप में लिखते थे जिसे पढ़ कर मुझ हँसी आ जाती थी और embarrassment भी होता था क्योंकि मैं कोई फ़िल्म इतिहासकार नहीं हूँ। यह उनका बड़प्पन ही था बस! वे इतने विनयी थे कि जब भी कभी मैं उनसे कहता कि मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा है तो फ़ौरन उनका जवाब होता था कि उन्होंने भी मुझसे बहुत कुछ सीखा है। प्रसिद्ध अभिनेता Pranay Dixit जी के मौसा जी लगते थे कृष्णमोहन जी। जब वर्ष 2013 में प्रणय जी की पहली फ़िल्म ’Roar’ रिलीज़ होने जा रही थी, तब कृष्णमोहन जी के ज़रिये मुझे प्रणय जी का साक्षात्कार लेने का मौका मिला। उन्होंने यह दायित्व मुझे सौंप कर मेरा सम्मान बढ़ाया था।

हालांकि दोनों मित्रों में उम्र  का अंतर भी काफी था। चटर्जी साहिब बताते हैं उम्र में मैं कृष्णमोहन जी से करीब 30 साल छोटा हूँ, पर उनसे बात करते समय कभी इसका अहसास नहीं हुआ। हमेशा ऐसा ही लगा कि जैसे हम हम-उम्र हों। वे ऐसे बात करते थे कि जैसे अपने किसी हम-उम्र दोस्त के साथ बतिया रहे हों। उन्हें जब भी कभी मेरे द्वारा लिखा कोई पोस्ट पसन्द आता था तो फ़ोन करके बधाई देते थे। मुझे याद है एक बार मैंने जब अपने किसी लेख में “साज़िन्दों” की जगह “वाद्य-वृन्द” शब्द का प्रयोग किया था, उन्हे यह इतना अच्छा लगा कि केवल यही बताने के लिए उन्होंने मुझे फ़ोन किया। वे कभी फ़ोन पर व्यक्तिगत बात या इधर-उधर की बात नहीं करते थे, सीधे काम की बात करते थे, professionalism उनमें कूट-कूट कर भरा हुआ था। कुछ वर्ष पूर्व एक बार मैंने उनसे कहा कि मेरा बेटा शास्त्रीय संगीत सीख रहा है पर वो रियाज़ ही नहीं करता। तब कृष्णमोहन जी ने बताया कि दस वर्ष की आयु से पहले बच्चे से ज़्यादा रियाज़ ना करवाऊँ वरना आवाज़ ख़राब हो सकती है। यह बेहद महत्वपूर्ण बात उनसे जानने को मिली थी। एक बार मैंने उनसे कहा कि आपने लम्बे समय से एक ही profile pic लगा रखी है, इसे बदलते क्यों नहीं, तो बोले तो यह उनका प्रिय फ़ोटो है और उनका सबसे अच्छा फ़ोटो है। जितना मुझे याद है यह तसवीर किसी ने संगीत नाटक अकादमी में खींची थी। 

फेसबुक वाली प्रोफ़ाइल तस्वीर की तरह ही उन्होने अपने  मित्र भी नहीं बदले। जिससे मित्रता लगाई उसके साथ आखिर तक निभाया। 

कुछ सप्ताह पूर्व जब आख़िरी बार उनसे बात हुई थी तब वे काफ़ी उत्साहित थे इस बात को लेकर कि ’स्वरगोष्ठी’ के ना केवल दस वर्ष पूरे हो रहे हैं बल्कि इसके 500 अंक भी पूरे हो रहे हैं। और संयोग देखिए कि इसी सप्ताह ’स्वरगोष्ठी’ के दस वर्ष पूरे हो रहे हैं 495-वें अंक के साथ। ब्लॉगर में उन्होने इस सप्ताह का पोस्ट शेड्युल कर रखा है और इस पोस्ट में उन्होंने ’स्वरगोष्ठी’ के दस वर्ष पूर्ति पर इसके प्रथम अंक के लिए मेरे लिखे हुए लेख का एक अंश भी प्रस्तुत किया है, जिसे पढ़ कर निर्वाक् हो गया हूँ। आज कृष्णमोहन जी के इस तरह अचानक चले जाने से ऐसा लग रहा है कि जैसे एक महाशून्य सा उत्पन्न हुआ है। अभी तो उनके साथ बहुत काम करना बाकी था। उनसे बहुत सारी बातें करनी थीं। सब एक ही झटके में समाप्त हो गया। शायद इसी क्षणभंगुरता का नाम जीवन है। कृष्णमोहन जी मुझे हमें हमेशा याद रहेंगे। उनको श्रद्धांजलि स्वरूप और उनके 500-वें अंक के सपने को साकार करने हेतु हमने ’स्वरगोष्ठी’ के अन्तिम पाँच अंकों को लिखने का निर्णय लिया है। यही उनके लिए हमारी श्रद्धांजलि होगी।

Monday, November 16, 2020

'उसने गांधी को क्यों मारा' का लोकार्पण यादगारी रहा

 साज़िशी हवाओं के खिलाफ जनचेतना जगाता एक सार्थक प्रयास  


नई दिल्ली: 5 अक्टूबर 2020: (कार्तिका सिंह//मीडिया स्क्रीन Online)::
महात्मा गांधी के खिलाफ निंदा प्रचार और अन्य साज़िशों का सिलसिला लगातार जारी रहा है। महात्मा गांधी की हत्या को जायज़ ठहराने  अभियान भी चलते रहे।  गांधी को लोगों के दिल दिमाग से निकला नहीं जा सका। गांधी लगातार प्रासंगिक बने रहे। उनकी आत्म कथा-सत्य के साथ मेरे प्रयोग अंग्रेजी में बिकती रही और हिंदी में भी। लोगों ने छह पुस्तकों के सेट की सौगात देना बंद नहीं किया अब गाँधी जी पर नई किताब आई है-"उसने गाँधी को क्यूं मारा।" इस पुस्तक पर एक विशेष चर्चा भी हुई। हम उसका साराँश राजकमल प्रकाशन से साभार यहां भी दे रहे हैं। गांधी पर चर्चा आज के असहनशील युग में फिर एक बहुत बड़ी ज़रूरत भी है। सत्य और सहनशीलता से दूर हो रहे समाज को गांधी एक बार फिर से राह दिखा सकते हैं। गांधी की पुस्तकों को सम्मान सहित पढ़ा जाया या फिर उनके बुतों पर कालख पोती जाए इससे फर्क गांधी को नहीं इस समाज को ही पढ़ने वाला है। गाँधी की शख्सियत इन सभी बातों से बहुत ऊंची उठ चुकी है। गांधी जी की हत्या के बाद उन पर जितने भी हमले हुए हैं उनसे गांधी जी की वैचारिक प्रतिमा और मज़बूत हो कर उभरी है।  प्रस्तुत है उस रिपोर्ट का सारांश:
2 अक्टूबर, 2020 को महात्मा गांधी की 151वीं जयंती के अवसर पर चर्चित कवि-इतिहासकार अशोक कुमार पांडेय की पुस्तक ‘उसने गांधी को क्यों मारा’ का लोकार्पण एवं उस पर बातचीत 'राजकमल' के फ़ेसबुक लाइव कार्यक्रम में हुई। उल्लेखनीय है कि यह कार्यक्रम बहुत रोचक रहा। 

कार्यक्रम में चिन्तक-इतिहासकार सुधीर चन्द्र, इतिहासकार मृदुला मुखर्जी, राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा, हिन्दी के महत्त्वपूर्ण लेखक जयप्रकाश कर्दम और अशोक कुमार पांडेय शामिल रहे। किताब पर बात करते हुए मनोज कुमार झा ने कहा कि हिन्दी पाठक वर्ग के पास एक ऐसी किताब पहुँच रही है जो गांधी जी की प्रतिमा, चश्मा, पहनावे और उनके प्रतीकों से ऊपर उठकर कुछ बुनियादी सवालों पर है। आज के दौर में गांधी की प्रासंगिकता पर बात करते हुए जयप्रकाश कर्दम ने कहा कि गांधी का होना इतिहास की बहुत बड़ी घटना है। वह एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक ऐसा संस्थान हैं जो प्रेम, सद्भाव और अहिंसा के मूल्यों पर खड़ा है। यह प्रेम, सद्भाव और अहिंसा सिर्फ़ मूल्य ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र का आधार हैं।

अशोक कुमार पांडेय ने अपनी किताब के बारे में बताते हुए कहा कि मैंने ऐसे विषय पर किताब लिखी है जिस पर बहुत लोग लिख चुके हैं। मैंने आर्काइव्स, ख़ास तौर पर 'कपूर कमीशन' की रिपोर्ट में गहरे जाकर चीज़ों को सामने लाने की कोशिश की है। बातचीत को आगे बढ़ाते हुए सुधीर चन्द्र ने विचार व्यक्त किया कि आज हमें इस आधुनिक युग के ि‍ख़लाफ़ एक असहयोग आन्दोलन की ज़रूरत है। गांधी ने कहा था 'न' कहना सीखो, आज फिर हमें 'न' कहना सीखना होगा। अगर गांधी का कोई भी महत्त्व है हमारे जीवन में तो हमें यह सोचना होगा कि अगर हम इस महत्त्व की बातें करते रहें तो क्या होना है। अशोक कुमार पांडेय की किताब ‘उसने गांधी को क्यों मारा’ को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की ज़रूरत है और हमें यह सवाल भी उठाना है कि किस-किसने गांधी को मारा? और जब गांधी के मारे जाने की बात होती है, तब हमें यह भी याद रखना होगा कि गांधी किसी के मारे नहीं मरते हैं। गांधी तब तक जीवित रहेंगे जब तक यह सभ्यता है। इस सभ्यता के लिए गांधी के पास एक ऐसा सन्देश है,

जिस पर अमल करके मानव अपने आपको विकसित कर सकता है। कार्यक्रम का संचालन ऐश्वर्या ठाकुर ने किया।

ज्ञात हो कि इसी दिन एक अन्य कार्यक्रम जो ‘कलिंगा लिटरेरी फ़ेस्टिवल’ में आयोजित था, वहाँ भी 'उसने गांधी को क्यों मारा' पुस्तक पर बातचीत का आयोजन किया गया। अशोक कुमार पांडेय के साथ महत्त्वपूर्ण कथाकार वंदना राग ने पुस्तक पर बातचीत की। वंदना राग ने पुस्तक से कुछ अंशों का पाठ भी किया जो काफ़ी प्रभावशाली रहा।   

Tuesday, May 5, 2020

70 वर्षीय चाची को कंधे पर उठा कर पैदल चल पड़ा मज़दूर

 Tuesday: 5th May 2020 at 12:07 PM
 विकास और बुलंदी के दावों को झुठलाती मिड डे की स्टोरी हुयी वायरल 
सोशल मीडिया: 5 मई 2020: (फेसबुक पर बोद्धिसत्व)::
Bodhi Sattva ने एक सच्ची कहानी पोस्ट की। इसे जानमाने अख़बार मिड डे, मुम्बई से साभार लिया गया था। तस्वीर भी और विवरण भी। ह पोस्ट सोशल मीडिया पर बेहद लोकप्रिय हुई क्यूंकि इसमें आज का सच था वह भी बिना किसी सियासत और बिना किसी अन्य आडम्बर के। इसी पोस्ट को उनके कुछ अन्य नए पुराने मित्रों ने भी शेयर किया। किसी ने कुछ शब्द घटा दिए और किसी ने कुछ शब्द जोड़ दिए। इस सब के बावजूद इसका सच लोगों के दिलों को झंकझौरता रहा। कोरोना के शोर में दब रहे अन्य समस्यायों के दर्द जिस तरह नज़रंदाज़ किया जा रहा है उस तरह इस दर्द को न छुपाया जा सका न ही दबाया जा सका। सोशल मीडिया पर मिली लोकप्रियता ने इसे नज़रंदाज़ होने से भी बचा लिया। इसे शेयर करने वाले मित्रों ने पूछा:
इस प्यार को क्या नाम और मान दिया जाए? 
यही कह सकता हूं कि हर चाची को ऐसा भतीजा मिले। हर मां को ऐसा बेटा मिले!
ये विश्वनाथ शिंदे हैं। उम्र चालीस साल। मुम्बई में कंस्ट्रक्शन वर्कर हैं। 
वही मज़दूर। घर जा रहा मज़दूर।
उनकी गोद में उनकी चाची वचेलाबाई हैं। चाची 70 साल की हैं और उनका अब विश्वनाथ के अलावा कोई नहीं। विश्वनाथ अपनी चाची को नवी मुंबई से अकोला ले जा रहे हैं।
भतीजा चाची के लिए पिता हो गया है। चाची बेटी हो गई है। यह मनुष्यता की सबसे बड़ी उपलब्धि है। साथ और स्नेह का बंधन!
इस प्यार और मार्मिक अपनापे भरी कठिन यात्रा पर किसी सरकार की नज़र क्यों न पड़ी?
मीडिया का बहुत बड़ा हिस्सा ऐसी हकीकतों को जानबूझ कर नज़र अंदाज़ कर रहा है। मिड डे ने इसे जगह दी इसलिए मिड डे, मुम्बई को सलाम।  
*तस्वीर और जानकारी मिड-डे, मुम्बई से साभार

Friday, April 24, 2020

Media: जोड़तोड़-तिकड़म-जुगाड़ और चैनल

पर्दे के पीछे होते तिकड़मी खेलों की एक झलक 
सोशल मीडिया: 24 अप्रैल 2020: (मीडिया स्क्रीन Online)::
आज के दौर में जोड़तोड़, तिकड़म और जुगाड़ के बिना मीडिया चलाना नामुमकिन सा हो गया है। कुछ प्रभावशाली लोग चाहें तो नया चैनल भी चल सकता है और बुरा मान जाएँ तो चला चलाया चैनल बंद भी हो सकता है। इन तिकड़मों की एक झलक श्याम मीरा सिंह की नई पोस्ट में भी मिलती है। बस कुछ मिंट ही लगेंगे लेकिन पढ़िए ज़रूर और अंत तक पढिये। पर्दे के पीछे होते कई खेल नज़र आने लगेंगे।-रेक्टर कथूरिया 
अर्नब गोस्वामी और रिपब्लिक चैनल//श्याम मीरा सिंह 
6 मई 2017 के दिन पत्रकारिता के बाजार में एक नए मदारी की एंट्री होती है। मदारी अर्नब, दुकान का नाम 'रिपब्लिक'। आप रिपब्लिक टीवी के बारे में कुछ याद कीजिए-
*पहले दिन - लालू प्रसाद यादव और शहाबुद्दीन की बातचीत की स्टोरी ब्रेक की जाती है।
*दूसरे दिन - आम आदमी पार्टी के पूर्व विधायक कपिल मिश्रा को लांच किया जाता है जो आम आदमी पार्टी में स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन पर 2 करोड़ की घूसखोरी का सनसनीखेज आरोप लगाता है।
- तीसरे दिन शशि थरूर और सुनंदा पुष्कर के पुराने मामले को निकाला जाता है।
शशि थरूर के मामले में कुछ भी नया नहीं घटा था, लेकिन अर्नब इसे कई दिन तक अपने प्राइम टाइम की डिबेट में जगह देते हैं। इस बात को थोड़ा ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे को कुछ देर के लिए यहीं छोड़िए। उससे पहले एक मामला बताता हूँ। टीवीस्क्रीन पर नीचे ब्रेकिंग न्यूज में जो लिखकर आता है, पत्रकारिता की भाषा में उसे "टिकर" कहा जाता है। एक कर्मचारी केवल टिकर का काम देखने के लिए ही रखा जाता है ताकि जैसे ही कोई खबर ब्रेक हो तुरंत टीवी की हेडलाइन्स में उसे नीचे लिख दिया जाए।
ऐसे ही सितंबर महीने की बात है, माया कोडनानी मामले में अमित शाह गुजरात कोर्ट में पेशी के लिए पहुंचे। ऐसा माना जाता है कि दर्जनों मुस्लिमों की हत्या के मामले में अमित शाह की भूमिका भी थी। रिपब्लिक चैनल के टिकर कर्मचारी ने इस खबर को हेडलाइन पर लगा दिया। जैसे ही खबर टीवी पर लगी, निरंजन नारायणस्वामी ने तुरंत उस कर्मचारी को फटकार लगाते हुए कहा "Let's not touch This". निरंजन नारायणस्वामी रिपब्लिक चैनल की एडिटोरियल डेस्क के हेड थे। एडिटोरियल डेस्क से अर्थ होता है कि ऐसी समिति जो ये तय करे कि अमुक टीवी में किस तरह की खबरें चलेंगी, किस तरह की नहीं। ये पूरी खबर आपको caravan मैगज़ीन की डिटेल्ड स्टोरी "No Land's Man" में मिल जाएगी।
क्या आपने कभी सोचा? कि वो इंसान जो लालू प्रसाद यादव, केजरीवाल से लेकर शशि थरूर को तीन दिन के अंदर लाइन में लगा देता है वह अमित शाह का नाम आते ही शंट कैसे हो जाता है?
इस सवाल का जबाव आपको रिपब्लिक चैनल के जन्म लेने की कहानी में मिलेगा। राजीव चंद्रशेखर नाम से एक बड़े उद्योगपति हैं, आपने टीवी, फ्रिज बनाने की कम्पनी BPL का नाम सुना है? सुना ही होगा खैर, इसी कंपनी ने 1995 के दौर में मोबाइल बनाने का काम शुरू किया था। इस पूरे प्रोजेक्ट को बनाने वाले आदमी का नाम था राजीव चंद्रशेखर। बाद में राजीव चंद्रशेखर कर्नाटक से दो बार राज्यसभा सांसद बने हैं, लेकिन इंडिपेंडेंट। देश में भाजपा सरकार आने के बाद ही राजीव चन्द्रशेखर की कोशिश थी कि कैसे भी मोदी सरकार की कैबिनेट में जगह मिल जाए। चूंकि सांगठनिक रूप से चंद्रशेखर कुछ भी नहीं थे, कोई अनुभव नहीं था। इसलिए उन्होंने दिल्ली मीडिया में इन्वेस्टमेंट के लिए प्लान बनाया। इसके लिए उन्होंने न्यूजएक्स से लेकर एनडीटीवी तक में बात की। लेकिन बात नहीं बनी। उन्हीं दिनों अर्नब गोस्वामी ने टाइम्स नाउ से इस्तीफा दिया था। अर्नब अपने लिए इन्वेस्टर ढूंढ रहे थे। राजीव अपने लिए एक बाजीगर ढूंढ रहे थे। बस इसी मोड़ पर दोनों का मिलन होता है।
रिपब्लिक टीवी चैनल को AGR Outlier Media Private Limited कंपनी के अंतर्गत शुरू किया जाता है। इसमें 26 करोड़ रुपए अर्नब गोस्वामी और उनकी पत्नी सम्यब्रत रे गोस्वामी और 30 करोड़ रुपए अकेले राजीव चंद्रशेखर के होते हैं। ये 30 करोड़ रुपए राजीव ने "जुपिटर कैपिटल" नाम की एक कम्पनी के माध्यम से इन्वेस्ट किए। इस कम्पनी का नाम याद कर लीजिए। आगे का पूरा खेल समझने में यही नाम आपके काम आने वाला है।
साल 2016 में राजीव चंद्रशेखर को केरल में भाजपा गठबंधन (NDA) का उपाध्यक्ष बनाया गया। साल 2014 में भी चंद्रशेखर केरल की तिरुवनंतपुरम सीट से टिकट लेना चाहते थे। तब नहीं मिली तो उनकी नजर साल 2019 के चुनावों में तिरुवनंतपुरम से लोकसभा सीट लेने पर हो गई। ये वही सीट है जहां से शशि थरूर सांसद हैं।
अब समझ आया? अर्नब गोस्वामी ने अपने चैनल के तीसरे तीन ही शशि थरूर और उनकी पत्नी के एक पुराने मामले को ब्रेकिंग न्यूज क्यों बना दिया था? राजीव चंद्रशेखर को तिरुवनंतपुरम में मजबूत करने के लिए।
इसके अलावा याद होगा किस तरह अर्नब गोस्वामी ने एक संघ कार्यकर्ता की मौत के लिए सीपीआई वर्कर्स को जिम्मेदार ठहराते हुए ये पूरा झूठ दिनभर टीवी पर बेचा था कि सीपीआई कार्यकर्ता तिरुवनंतपुरम में आरएसएस कार्यकर्ताओं की हत्या करते हैं। इसके पीछे एक ही कारण था चंद्रशेखर के लिए तिरुवनंतपुरम के मैदान को साफ करना।
साल 2014 में चन्द्रशेखर को भाजपा ने संसद की डिफेंस स्टैंडिंग कमिटी का सदस्य बना दिया। इस कमिटी का काम सरकार द्वारा डिफेंस सेक्टर में की गई खरीद फरोख्त पर नजर रखना। साल 2016 की बात है। एक कम्पनी थी Axiscades Aerospace & Technologies नाम से। इसका शार्ट नाम है ACAT. साल 2016 में सरकार ने इसे 88 aircraft-recognition training systems सप्लाई करने का एक कॉन्ट्रैक्ट दिया। तब से लेकर ऐसे अनगिनत कॉन्ट्रैक्ट इस कम्पनी को दिए गए। क्या आप जानते हैं इस ACAT कम्पनी में किसका पैसा लगा हुआ है?
मैं बताता हूँ, साल 2015 तक इस कम्पनी में 75 प्रतिशत शेयर जुपिटर कैपिटल के थे। वही जुपिटर कैपिटल जिसके मालिक चंद्रशेखर हैं। देखिए ये कितना बड़ा घपला है कि सरकार जिस कम्पनी को कॉन्ट्रैक्ट दे रही थी उस कम्पनी का मालिक "डिफेंस स्टैंडिंग कमिटी" का मेम्बर था। ये कितना बड़ा "कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट" है? मतलब जिस आदमी को कॉन्ट्रैक्ट बांटने का जिम्मा सौंपा गया है वही कॉन्ट्रैक्ट ले ले रहा है। ये ऐसा भ्रस्टाचार है जो सीधे सीधे भ्रस्टाचार के रूप में नहीं पकड़ा जा सकता। इस पूरे मसले पर "द वायर" ने एक डिटेल्ड रिपोर्ट की थी, उस खबर के बाद ही राजीव चन्द्रशेखर ने द वायर पर डिफेमेशन का केस कर दिया था।
ऐसा बताया जाता है कि प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से राजीव चंद्रशेखर के पास 7500 करोड़ की संपत्ति है। राजीव के पास 120 करोड़ रुपए का एक प्रायवेट जेट भी है। और उसका खिलौना अर्नब आज इतने बड़े चैनल का मालिक बन चुका है। दोनों शान से रहते हैं। ऐश की जिंदगी जीते हैं। नई खबरों के अनुसार आज रिपब्लिक न्यूज चैनल में अर्नब गोस्वामी और उनकी पत्नी के शेयर सबसे अधिक हो गए हैं। इसलिए किस दिन टीवी पर कौन सा एजेंडा चलाना है उसका निर्णय फिलहाल वे खुद ले सकते हैं। अर्नब, केंद्र सरकार और उसके समर्थकों की ताकत से भलीभांति परिचित हैं, इसलिए इस समय उनकी भाषा किसी सरकारी भौंपू से भी निचले स्तर पर आ गिरी है।
चैनल के पिछले मालिक यानी राजीव और नए मालिक यानी अर्नब दोनों करोड़पति हैं, दोनों को सरकार से फायदा होता है, दोनों सरकार का फायदा करते हैं। दोनों लग्जीरियस लाइफ जीते हैं। लेकिन इससे आपको क्या मिला? अर्नब ने आपकी रोजी रोटी के कितने सवाल सरकार से पूछे? महामारी के कारण आपके रोजगार बन्द हैं, आपकी दुकाने बन्द हैं, आपके ठेले बन्द हैं। आपकी भूख, और रोटी के सवाल न पूछकर अर्नब अभी भी हिन्दू-मुसलमान में आपको उलझाए हुए है! आखिर क्यों? आप क्यों इस बात को नहीं समझते, आप सिर्फ यूज किए जा रहे हैं।
इस पूरे खेल को समझना उतना भी मुश्किल नहीं है। आप सच में इसे समझने के लिए गंभीर हैं तो आप आराम से समझ सकते हैं कि सरकार ने चंद्रशेखर को डिफेंस स्टैंडिंग कमिटी का सदस्य क्यों बनाया? और राजीव ने अर्नब के चैनल में पैसा क्यों लगाया।
अब समझ आया? जो आदमी पूरे दिन सोनिया, सोनिया, राहुल राहुल, लालू, लालू कर सकता है वह अमित शाह का नाम लिखने से पहले ही ये क्यों कह देता है कि "Let's not touch This"
 फेसबुक पर श्याम मीरा सिंह इ प्रोफाईल-वाल से साभार 

Wednesday, February 12, 2020

आज का मीडिया किसके दम पर ऐसा कर जाता है

एक जरूरी बात बता रहे हैं श्याम मीरा सिंह 
दिल्ली की जनता को कोसने वाले
जानेमाने एंकर सुधीर चौधरी 
लेखक श्याम मीरा सिंह 
जी न्यूज का एंकर दिल्ली की पूरी जनता को नल्ला कह रहा है, क्योंकि उसके मालिक को जनता ने वोट नहीं किया। मीडिया के एक एंकर को ये ताकत कहां से मिलती है? नेता से?? नहीं... बिल्कुल नहीं, केवल नेता से नहीं मिलती, बल्कि बाकी देश की जनता जो दिल्ली में वोट नहीं कर सकती, उससे भी मिलती है। वह विशेष जनता, इस एंकर को अपने नायक की तरह देखती है। उन्हें पत्रकार नहीं चाहिए, उन्हें उनके अंदर के जहर के लिए एक कुशल प्रवक्ता चाहिए, जो सुधीर चौधरी अपने आप में है। सुधीर चौधरी वही कर रहा है, जो बाकी देश की जनता सुनना चाहती है। यही वो बैटल फील्ड है जो आप और हम हार चुके हैं। मीडिया की बराबरी हम नहीं कर सकते।  मीडिया के द्धारा तैयार उस "विशेष जनता" को समझाना आसान नहीं है। हम इतने कमजोर हैं कि समानांतर मीडिया खड़े करने की स्थिति में भी नहीं हैं। 
इसलिए ये वक्त, स्वमैथुन की मारी लेखनी के दम्भ और मठाधीशी को छोड़ने का वक्त है। मेरी, आपकी लिस्ट में ऐसे बहुत से लोग हैं जो बेहद प्रभावी लिखते हैं, अच्छा लिखते हैं। सबसे पहले इन सबका आपस में जुड़ना बेहद जरूरी है। फिलहाल इन्हें पढ़ने वाले बस पांच सौ से हजार के बीच में लोग होते हैं। ये संख्या बढ़ानी है, ताकि टीवी के ज़हर को सोशल मीडिया के माध्यम से हर रोज न्यूट्रलाइज़ किया जा सके। 
इसलिए हमें अपनी मठाधीशियां त्यागनी होगीं, अपनी आत्ममुग्धता थोड़ी ढीली करनी होगी, ताकि अन्य राइटर्स, स्टूडेंट्स, पोएट्स, एक्टिविस्ट, आर्टिस्ट को भी लोग, आपके-हमारे जरिए जान सकें। इत्तेफाक से मुझे यहां ऐसे अच्छे लोग मिलें हैं जिनकी मदद से मेरी पोस्ट लोगों तक पहुंच सकीं। मुझसे भी अच्छे बहुत से ऐसे नए नए लड़के-लड़कियां हैं जिनकी समझ व्यापक है, प्रगतिशील है। जिनका कंटेंट लोगों तक पहुंचना चाहिए। उन्हें प्रोत्साहित करने की जरूरत है, अपने से आगे करने का वक्त है। 

आज से मैं अपनी वॉल पर हर रोज किसी अन्य राइटर, पोएट, एक्टिविस्ट, खासकर नए स्टूडेंट्स की पोस्ट शेयर किया करूँगा जो अभी अभी सोशल मीडिया पर नए हैं ताकि उनकी पहुंच कुछ बढ़ सके। जिससे कि एक हद तक टीवी के प्रभाव को न्यूनतम किया जा सके.. टीवी के अलावा भी लोगों के पास अन्य विचार पहुंच सकें। 
आपकी प्रतिक्रिया क्या है? ---श्याम मीरा सिंह 

Wednesday, January 29, 2020

तब आपका एंकर, अपने स्टूडियो में क्या कर रहा था?

Posted on 29th January 2020 at 10:51 AM 
जब आप अपनी रोजी-रोटी छोड़कर,सड़कों पर लड़ रहे थे
जब आप अपनी रोजी-रोटी छोड़कर, सड़कों पर लड़ रहे थे, तब आपका एंकर, अपने स्टूडियो में क्या कर रहा था-
●मुद्दा- तमिलनाडु के किसानों का पानी और सूखे के मुद्दे पर प्रदर्शन।  
एंकर-किसानों के लिए इतने दिनों तक खाने-पीने के पैसे कहाँ से आ रहे हैं? ग्रीनपीस और विदेशी NGO फंडिंग कर रहे हैं। 
●मुद्दा- SSC परीक्षा में घपलों के खिलाफ आम छात्रों का प्रदर्शन
एंकर- कांग्रेस पार्टी छात्रों को सरकार के खिलाफ भड़का रही है.
● मुद्दा- SC-ST Act में छेड़छाड़ के खिलाफ दलितों का भारत बन्द
एंकर- कुछ नेता राजनीतिक रोटियां सेंकना चाहते हैं, राजनीतिक फायदे के लिए देश को जला रहे हैं।
●मुद्दा- MSP को लेकर महाराष्ट्र के किसानों का दिल्ली की तरफ पैदल मार्च
एंकर- इनकी लाल टोपियों, पानी के बोतलों की फंडिंग कहां से हो रही है?
●मुद्दा- 8 साल की बच्ची आसिफा के साथ हुए रेप के खिलाफ देश भर में नागरिकों के प्रदर्शन 
एंकर- जब हिन्दू लड़कियों का रेप होता है तब कोई कैंडल मार्च क्यों नहीं करता?
●मुद्दा- JNU में अप्रत्याशित फीस वृद्धि के खिलाफ छात्रों का प्रदर्शन.
एंकर- जेनएयू में भारत के टुकड़े टुकड़े गैंग के लोग पढ़ते हैं
●मुद्दा- NRC-CAA के खिलाफ मुसलमानों, प्रगतिशील नागरिकों का देशभर में प्रदर्शन
एंकर- शाहीनबाग की औरतों को 500-500 रूपये प्रतिदिन मिल रहे हैं.

आप सड़क पर भूखे-प्यासे लड़ते हैं। काम छोड़ते हैं, तख्तियों पर अपनी समस्याएं लिखते हैं, नारे लगाते हैं, आपकी पूरी मेहनत को शाम होते-होते ही आपका एंकर न्यूट्रलाइज कर देता है। न्यूट्रलाइज ही नहीं करता बल्कि नेगेटिव कर देता है। आपको दंगाई की तरह पेश करेगा। आरोप लगाएगा, आपका चरित्र-चित्रण करेगा, अंततः आपको देशद्रोहियों की तरह पेश करेगा। 

आपकी चीखें, आपके नारे, आपके एंकर की तेज़ आवाज़ में कहीं दबकर रह जाते हैं। आप दिल्ली में लड़ते हैं, एंकर टीवी पर। आपके नारे एक गली से दूसरी गली नहीं पहुंच पाते, एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले नहीं पहुंच पाते लेकिन आपका एंकर उड़ीसा के कालाहांडी के सबसे दूर गांव तक पहुंचा हुआ है। 

आपका एंकर आपके बैडरूम तक पहुंचा हुआ है। मोबाइल और इंटरनेट के थ्रू आपके घर की संडास, रसोई, मंदिर, मस्जिद, स्कूल, कॉलेज, बस, दुकान, शोरूम, हर जगह पहुंचा हुआ है। हर रोज वह आपके लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचल रहा है। हर रोज वह आपकी नागरिकता को खत्म कर रहा है। हर रोज वह आपके पिता, आपके चाचा, भाई, रिश्तेदारों को मिसइन्फॉर्म कर रहा है, दूसरे मजहबों के प्रति उनमें घृणा भर रहा है। एंकर जो क्षति पहुंचा रहा है, वह इतनी स्थायी है कि इस देश में वर्षों तक पुनर्जागरण काल रहे तब भी इस क्षति को भरा नहीं जा सकता। ये नागरिकों की बर्बादी है। लोकतंत्र की बर्बादी है, एक पूरे देश की बर्बादी है। 

ऐसा करने के लिए ज़िम्मेदार एंकरों का प्रतिकार क्यों न किया जाना चाहिए? ऐसे न्यूज चैनलों के मालिकों का विरोध क्यों न किया जाना चाहिए?

क्या आप अपने मुल्क, अपने देश के नागरिकों, अपने परिवारों को बर्बाद होते हुए, सिर्फ देखते ही रहेंगे?

क्योंकि चुप रहना है हमारी सभ्यता है, चुप रहना ही हमारा सहूर है।  आपके देश को मूर्ख बनाने वालों से से, एक अदब सवाल भी न किया जाए?

मैं सच बता रहा हूँ असली बैटल यूनिवर्सिटीयों में नहीं है, दिल्ली में नहीं है, पीएमओ में नहीं है, पुलिस कार्यालय में नहीं है, सच कहूं तो आपके गांव में भी नहीं है, क्योंकि गांव गांव पहुंचने के लिए आपके पास संसाधन नहीं हैं। 

असली बैटल आपके घर की टीवी में है। असली बैटल नोएडा फ़िल्म सिटी के दफ्तरों में है जहां से ये एंकर आपके घरों में जहर सींचते हैं। 

आपके घरों, आपके मुल्क को बर्बाद करने वाले के प्रति, बिल्कुल भी लिहाज करने की जरूरत नहीं है, बिल्कुल भी सभ्य बने रहने की आवश्यकता नहीं है, ऐसे एंकरों का नाम न ले लेकर दलाल कहिए, इनके नाम लीजिए, उसके नीचे लानते लिखिए, शेम कहिए, जहां मिलें उन्हें अहसास कराइए कि वो इस देश के नागरिकों के साथ क्या कर रहे हैं।  --Shyam Meera Singh
श्याम मीरा सिंह की फेसबुक प्रोफ़ाइल से साभार 

Monday, April 14, 2014

ये बता आज कौन सा प्रेस वाला बिना पैसे लिए खबर छापता है...?

लागा चुनरी पे दाग छुपायुं कैसे----------
आज़मगढ़ के अवनीश राय आजकल दिल्ली में बसे हुए हैं। पेशे से पत्रकार है और हर तरह से सैटल भी।  अच्छा चैनल--अच्छी ज़िंदगी लेकिन सक बोलना--दलील से बात करना---जैसा सोचना वैसा करना---बहुत सी "बुरी आदतें" हैं।  कुछ रोको तोको तो हंस कर ताल देते हैं। उनकी नयी पोस्ट फिर कि लिहाज़ वह अपने पेशे से जुड़े बहिचारे का भी नहीं करते। पूरा माजरा क्या है---आप खुद ही पढ़ लीजिये। स्थान दिल्ली का है और पोस्ट करने का समय 14 अप्रैल 2014 सोमवार को सांय 4:28 पर लेकिन इस हकीकत को आप कहीं भी देख सकते है---महसूस कर सकते हैं। आपके विचारों की इंतज़ार रहेगी ही। -रेक्टर कथूरिया 
आज सुबह भाई को स्टेशन से लेने पुरानी दिल्ली पहुंचा। अंदर घुस ही रहा था कि सीढियों के पास खड़े टीटी पर नजर पड़ी। वे दो थे और एक सूटेड-बूटेड शख्स से बहस कर रहे थे। हालांकि बिना टिकट यात्रियों या पहली बार दिल्ली आने वाले यूपी बिहार के लोगों के झोरा - झंपट पकड़कर उनसे वसूली के लिए कुख्यात इन टीटियों की टें-पें से तो अब खूब वाकिफ हो चुके हैं लेकिन ये बहस कुछ अलग थी। मैं भी थोड़ा रूक गया।
शख्स - सर मैं भी स्टाफ हूं। प्रेस से हूं। 
टीटी - ना भाई...255 रूपये तो देने ही होंगे।
शख्स - सर, मैं प्रेस से हूं
टीटी - कौन से प्रेस से...
शख्स - इलेक्ट्रानिक मीडिया से हूं सर..
टीटी - तो क्या हुआ भाईइइइ...पैसे तो देने ही पड़ेंगे...
शख्स - सर, प्रेस....
टीटी - भाईइइ..ये बता आज कौन सा प्रेस वाला बिना पैसे लिए खबर छापता है...तू भी तो पैसे लेता होगा...क्यों?
शख्स - क्या बात करते हैं सर..हम पैसे नहीं लेते..
टीटी - ना भाईइइ...आज तो कोई प्रेस वाला ना है..जो बिना पैसे के खबर छापता हो
शख्स - अरेsss सर...
दूसरा टीटी - जा भाई...पर आज के बाद ना जाने दूंगा ऐसे...

Sunday, February 16, 2014

पेंगुइन को एक वाजिब व जिम्मेदाराना फटकार...जरुर पढ़ें...

पेंगुइन तुम इतना डर किस बात से गए?  --अरुंधति रॉय
सुनीता भास्कर shared a link on Facebook on Yesterday (Saturday 15 Feb 2014 को बजे 
अमेरिकी लेखक वेंडी डॉनिगर की `द हिन्दू: एन ऑलटरनेटिव हिस्ट्री` को पेंगुइन ने एक अनजान से कट्टर हिंदू संगठन के दबाव में `भारत` के अपने ठिकानों से हटाने का फैसला किया है। मशहूर लेखिका-एक्टिविस्ट अरुंधति रॉय जिनकी खुद की किताबें भी इस प्रकाशन से ही आई हैं, ने पेंगुइन को यह कड़ा पत्र लिखा है जो Times of India में छपा है।पत्र का हिंदी अनुवाद:
सुनीता भास्कर 
तुम्हारी इस कारगुजारी से हर कोई स्तब्ध है। तुमने एक अनजान हिंदू कट्टरवादी संस्था से अदालत के बाहर समझौता कर लिया है और तुम वेंडी डॉनिगर की `द हिन्दू: एन ऑलटरनेटिव हिस्ट्री` को भारत के अपने किताबघरों से हटाकर इसकी लुगदी बनाने पर राजी हो गए हो। कोई शक नहीं कि प्रदर्शनकारी तुम्हारे दफ्तर के बाहर इकट्ठा होकर अपनी निराशा का इजहार करेंगे। 

कृपया हमें यह बताओ कि तुम इतना डर किस बात से गए? तुम भूल गए कि तुम कौन हो? तुम दुनिया के सबसे पुराने और सबसे शानदार प्रकाशकों में से हो। तुम प्रकाशन के व्यवसाय में बदल जाने से पहले और किताबों के मॉस्किटो रेपेलेंट और खुशबुदार साबुन जैसे बाज़ार के दूसरे खाक़ हो जाने वाले उत्पादनों जैसा हो जाने से पहले से (प्रकाशन में) मौज़ूद हो। तुमने इतिहास के कुछ महानतम लेखकों को प्रकाशित किया है। तुम उनके साथ खड़े रहे हो जैसा कि प्रकाशकों को रहना चाहिए। तुम अभिव्यक्ति की आजादी के लिए सबसे हिंसक और भयावह मुश्किलों के खिलाफ लड़ चुके हो। और अब जबकि न कोई फतवा था, न पाबंदी और न कोई अदालती हुक्म तो तुम न केवल गुफा में जा बैठे, तुमने एक अविश्वसनीय संस्था के साथ समझौते पर दस्तखत करके खुद को दीनतापूर्ण ढंग से नीचा दिखाया है। आखिर क्यों? कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए जरूरी हो सकने वाले सारे संसाधन तुम्हारे पास है। अगर तुम अपनी ज़मीन पर खड़े रह पाते तो तुम्हारे साथ प्रबुद्ध जनता की राय और सारे न सही पर तुम्हारे अधिकांश लेखकों का समर्थन भी होता। तुम्हें हमें बताना चाहिए कि आखिर हुआ क्या। आखिर वह क्या है, जिसने तुम्हें आतंकित किया? तुम्हें अपने लेखकों को कम से कम स्पष्टीकरण देना तो बनता ही है।
चुनाव में अभी भी कुछ महीने बाकी हैं। फासिस्ट् अभी दूर हैं, सिर्फ अभियान में मुब्तिला हैं। हां, ये भी खराब लग रहा है पर फिर भी वे अभी ताकत में नहीं हैं। अभी तक नहीं। और तुमने पहले ही दम तोड़ दिया।

हम इससे क्या समझें? क्या अब हमें सिर्फ हिन्दुत्व समर्थक किताबें लिखनी चाहिए। या `भारत` के किताबघरों से बाहर फेंक दिए जाने (जैसा कि तुम्हारा समझौता कहता है) और लुगदी बना दिए जाने का खतरा उठाएं? शायद पेंगुइन से छपने वाले लेखकों के लिए कुछ एडिटोरियल गाइडलाइन्स होंगी? क्या कोई नीतिगत बयान है?
साफ कहूं, मुझे यकीन नहीं होता, यह हुआ है। हमें बताओ कि यह प्रतिद्वंद्वी पब्लिशिंग हाउस का प्रोपेगंडा भर है। या अप्रैल फूल दिवस का मज़ाक था जो पहले ही लीक हो गया। कृपया, कुछ कहिए। हमें बताइए कि यह सच नहीं है।
अभी तक मैं से पेंगुइन छपने पर बहुत खुश होती थी। लेकिन अब?
तुमने जो किया है, हम सबके दिल पर लगा है।                       -अरुंधति रॉय

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ब्लूस्टार को जनरल शाहबेग का "महंगा बदला" बताया इण्डिया टुडे ने


Tuesday, February 11, 2014

भाषा के सवाल पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करती किताब-"भाषा का सच"

अपने हिंदी भाषी होने पर अफसोस आखिर क्यूँ ?
अगर लोकतंत्र में काबलियत की बजाये आंकड़ा तंत्र छाता जा रहा है, सियासत में सत्ता लोलुपता बढ़ रही है तो हालत मीडिया की भी अच्छी नहीं रही। अगर कोई वेश्या किसी मजबूरी के कारण अपना  जिस्म बेचती है तो हमारे आज के बहुत से कलमकार अपनी दिमागी और जिस्मानी मेहनत के साथ साथ अपनी सोच भी बेच रहे हैं--अपने ख्यालात भी बेच रहे हैं और जनता के सामने लगातार वही सच सामने ला रहे हैं जिसे उनके मालिक लोग देखना चाहते हैं। पेड न्यूज़ का सबसे अधिक दुष्प्रभाव पड़ने वाला है आम आदमी पर। सच को दबाने  बदलने की जितनी साज़िशें आज हो रही हैं पहले शायद कभी नहीं थीं। कुछ महीने पूर्व जब अनिल चमड़िया लुधियाना के एक गांव की सभा में आये थे तो उन्होंने बहुत सी सच्चाईयों से आम जनता को वाकिफ करवाया था। तब से एक उम्मीद बंधी थी कि सच की मशाल को थामने वाले अभी भी हैं। एक बार फिर यह विश्वास हुआ कि सच की आवाज़ फिर बुलंद होगी। चमक दमक के इस दौर में हकीकत अपने असली रूप में सबके सामने आकर रहेगी। "भाषा का सच" के बारे में जान कर यह उम्मीद और मज़बूत हुई। 
फेसबुक पर जारी हुईं अवनीश राय की पोस्टों के  मुताबिक "भाषा का सच" भाषा के सवाल पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करती किताब है। यह उन नीतियों को भी विस्तार से रखती है जिनसे मातृभाषाओं को धीरे-धीरे खत्म किया जा रहा है। मातृभाषा के खिलाफ और अंग्रेजी के पक्ष में फैलाई गई बहुत सी धारणाओं को भी यह किताब तमाम शोधों के माध्यम से दूर करती है। जाहिर है इंसाफ का सवाल भी इससे अलग नहीं है। यह किताब Media Studies Groupedia Studies Group ने प्रकाशित की है। इसके बारे में ज्यादा जानकारी भाषा का सच पर जाकर देखा जा सकता है।
हम अपने हिंदी भाषी होने पर अफसोस करते रहते है और अंग्रेजी सीखने के लिए दिन-रात लगे रहते है। यह भी जानने की कोशिश नहीं करते है कि जब तक हम अपनी ही भाषा को ठीक से नहीं समझेंगे, तब तक अन्य भाषाओं को कैसे समझ पाएंगे। अपनी भाषा के साथ अन्य भाषाओं को सीखने में भी आसानी होती है, यह बात विदेशों में भी मानी गई। और यूनेस्को के सर्वेक्षणों में यह बात साबित हुई है।
इससे कोई इँकार नहीं कर सकता कि सही समझ और बेहतर संचार के लिए मातृभाषा का बहुत महत्व है। इस किताब में इसी विषय को लेकर शोधपरक लेख सम्मिलित किए गए हैं। साथ ही इस विषय पर भी गंभीर चर्चा है कि किस तरह कुछ एक भाषाएं बाकी भाषाओं पर कब्जा कर रही हैं। यह किताब आपको विश्व पुस्तक मेले में Media Studies Group के स्टैंड पर मिलेगी।
हम अपने हिंदी भाषी होने पर अफसोस करते रहते है और अंग्रेजी सीखने के लिए दिन-रात लगे रहते है। यह भी जानने की कोशिश नहीं करते है कि जब तक हम अपनी ही भाषा को ठीक से नहीं समझेंगे, तब तक अन्य भाषाओं को कैसे समझ पाएंगे। अपनी भाषा के साथ अन्य भाषाओं को सीखने में भी आसानी होती है, यह बात विदेशों में भी मानी गई। और यूनेस्को के सर्वेक्षणों में यह बात साबित हुई है।

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9968771426
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ब्लूस्टार को जनरल शाहबेग का "महंगा बदला" बताया इण्डिया टुडे ने