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Monday, March 23, 2026

प्रधानमंत्री श्री मोदी ने टीवी 9 नेटवर्क समिट को संबोधित किया

प्रधानमंत्री कार्यालय//प्रविष्टि तिथि: 23 MAR 2026 at  9:28 PM by PIB Delhi//Azadi Ka Amrit Mahotsav

आज, भारत एक नए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है 

भारत अब चुनौतियों से टकाराता है: प्रधानमंत्री

गल्फ से लेकर ग्लोबल वेस्ट तक और ग्लोबल साउथ से लेकर पड़ोसी देशों तक, 

भारत सभी के लिए भरोसेमंद साझेदार है: प्रधानमंत्री

जिसका आकलन किया जाता है, उसमें सुधार भी होता है और अंततः वह परिवर्तित भी होता है : प्रधानमंत्री

यह नया भारत है, यह अपने विकास के लिए कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रहा है: प्रधानमंत्री

नई दिल्ली: 23 मार्च 2026:(PIB Delhi//मीडिया स्क्रीन डेस्क)::


प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने आज ‘इंडिया एंड द वर्ल्ड’ विषय पर
आयोजित टीवी 9 समिट को संबोधित किया। प्रधानमंत्री ने विश्‍व की अभूतपूर्व और गंभीर परिस्थितियों के बीच विचारों के आदान-प्रदान का एक बेहद महत्वपूर्ण मंच बनाने के लिए टीवी 9 नेटवर्क की सराहना की। श्री मोदी ने कहा, “आज, विश्‍व जिन गंभीर परिस्थितियों से गुजर रहा है, वह अभूतपूर्व और बेहद गंभीर हैं, और इन परिस्थितियों के बीच टीवी 9 नेटवर्क ने विचारों का एक बेहद महत्वपूर्ण मंच बनाया है।”

संघर्षों से घिरी दुनिया में भारत की स्थिति के बारे में अपने उद्गार व्‍यक्‍त करते हुए प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से प्रगति कर रही है। 2014 से पहले की परिस्थितियों को पीछे छोड़ते हुए भारत नये आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि कोरोना महामारी के बाद चुनौतियों के बढ़ने के बावजूद, 140 करोड़ देशवासी एकजुट रहे, जिससे भारत ने हर कठिनाई को पार किया। श्री मोदी ने कहा, “28 फरवरी के बाद इन 23 दिनों में भारत ने अपनी संबंध निर्माण क्षमता, निर्णय लेने की क्षमता और संकट प्रबंधन की क्षमता दिखाई है।”

बँटी हुई वैश्विक व्यवस्था के बीच भारत की कूटनीतिक पहुँच के बारे में बोलते हुए प्रधानमंत्री ने इस बात को रेखांकित किया कि भारत ने गल्फ से लेकर ग्‍लोबल वेस्‍ट तक, और ग्‍लोबल साउथ से लेकर पड़ोसी देशों तक अभूतपूर्व संबंध बनाए हैं, और खुद को सभी के लिए भरोसेमंद साझेदार के रूप में स्थापित किया है। भारत किसके साथ है, इस प्रश्‍न का साफ और स्पष्ट जवाब देते हुए श्री मोदी ने कहा, “हम भारत के साथ हैं, भारत के हितों के साथ हैं, शांति के साथ हैं और संवाद के साथ हैं।”

संकट के इस समय में जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएँ डगमगा रही हैं, भारत द्वारा पेश किए गए विविधीकरण और लचीलापन के मॉडल को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि चाहे ऊर्जा हो, उर्वरक हों या आवश्यक वस्तुएँ, यह सुनिश्चित करने के लिए निरंतर प्रयास किए गए हैं कि नागरिकों को कम से कम कठिनाइयों का सामना करना पड़े। श्री मोदी ने कहा, “भारत ने विविधीकरण और लचीलेपन का मॉडल पेश किया है, और यह सुनिश्चित करते हुए कि हमारे नागरिकों को कम से कम कठिनाइयों का सामना करना पड़े, हमने इस संबंध में निरंतर प्रयास किया है।”

पश्चिम एशिया संघर्ष के भारत पर प्रभाव के बारे में बोलते हुए प्रधानमंत्री ने आज लोकसभा में दिए अपने वक्‍तव्‍य का उल्लेख करते हुए कहा कि यद्यपि युद्ध भौगोलिक रूप से भारत की सीमाओं से दूर है, फिर भी आज की परस्‍पर संबद्ध दुनिया में कोई भी देश युद्ध के प्रतिकूल प्रभाव से अछूता नहीं रह सकता। श्री मोदी ने कहा, “यह संयम और संवेदनशीलता का समय है; जब देशवासी एकजुट होकर किसी संकट का सामना करते हैं, तो परिणाम हमेशा सार्थक होते हैं।”

प्रधानमंत्री ने इस बात को रेखांकित करते हुए कि दुनिया की उथल-पुथल के बावजूद भारत ने अपनी प्रगति की गति को बनाए रखा है, 28 फरवरी के बाद के 23 दिनों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने दिल्ली मेट्रो रेल के प्रमुख कॉरिडोर के लोकार्पण, सिलचर हाई-स्पीड कॉरिडोर और नए कोटा हवाई अड्डे के शिलान्‍यास तथा मदुरै हवाई अड्डे को अंतरराष्ट्रीय दर्जा प्रदान किए जाने को रेखांकित किया। उन्होंने 100 प्लग-एंड-प्ले औद्योगिक पार्कों को स्वीकृति दिए जाने, 1,500 मेगावाट नई क्षमता जोड़ने के लिए लघु जल विद्युत विकास योजना को मंजूरी दिए जाने, जल जीवन मिशन का 2028 तक विस्तार करने, पीएम किसान सम्मान निधि के तहत 18,000 करोड़ रुपये से अधिक राशि के सीधे हस्तांतरण और एमएसएमई व निर्यातकों के लिए 500 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा का भी उल्लेख किया। श्री मोदी ने कहा, “ये सभी कदम इस बात का प्रमाण हैं कि विकसित भारत बनाने के लिए देश कितनी तेज गति से काम कर रहा है।”

प्रबंधन के सिद्धांतों का उदाहरण देते हुए प्रधानमंत्री ने प्रसिद्ध कहावत ‘जिसका आकलन किया जाता है, उसे प्रबंधित किया जाता है’ को आगे बढ़ाते हुए कहा कि जिसका आकलन किया जाता है, उसमें सुधार भी होता है और अंततः वह परिवर्तित भी होता है। श्री मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि राजमार्ग निर्माण की गति 11–12 किमी/दिन से बढ़कर लगभग 30 किमी/दिन हो गई है; बंदरगाहों पर जहाजों का टर्नअराउंड समय 5–6 दिन से घटकर 2 दिन से भी कम हो गया है; पंजीकृत स्टार्टअप की संख्या 400–500 से बढ़कर 2 लाख से अधिक हो गई है; एमबीबीएस सीटें 50–55 हजार से बढ़कर 1.25 लाख से अधिक हो गई हैं; बैंक खातों की संख्‍या 25 करोड़ से बढ़कर 80 करोड़ से अधिक हो गई है (जिनमें 55 करोड़ जन धन खाते शामिल हैं); और हवाई अड्डों की संख्या 70 से कम थी, जो बढ़कर 160 से अधिक हो गई है। श्री मोदी ने कहा, “आज, भारत फास्‍ट ट्रैक पर है, आज, संकल्प सिद्धियों में बदल रहे हैं।”

प्रधानमंत्री ने वर्तमान में जारी महत्‍वपूर्ण परिवर्तनों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि जिस असम में कभी गोलियों की आवाज़ सुनाई देती थी, आज वहाँ सेमीकंडक्टर यूनिट बन रही है; ओडिशा में सेमीकंडक्टर से लेकर पेट्रोकेमिकल्स तक अनेक क्षेत्रों का विकास हो रहा है; बिहार में पिछले दशक में 5 से अधिक नए पुलों का निर्माण हुआ है; और उत्तर प्रदेश मोबाइल फोन निर्माण के एक वैश्विक केंद्र में बदल हो चुका है। श्री मोदी ने कहा, “भारत अतीत में उत्‍पन्‍न हुए विकास असंतुलनों को भविष्य के अवसरों में बदल रहा है।”

पश्चिम बंगाल का रुख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि अतीत में यह संस्कृति, शिक्षा, उद्योग और व्यापार का केंद्र हुआ करता था। उन्‍होंने पिछले 11 वर्षों में पश्चिम बंगाल के विकास के लिए केंद्र सरकार के महत्वपूर्ण निवेशों का उल्लेख किया। श्री मोदी ने कहा, “देश हित को दल हित से ऊपर रखना आवश्यक है, क्योंकि राष्‍ट्र और उसका विकास राजनीति से ऊपर होता है।”

आज शहीद दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर शहीद भगत सिंह, शहीद राजगुरु और शहीद सुखदेव ने सर्वोच्च बलिदान दिया था और आज डॉ. राम मनोहर लोहिया की जयंती भी है। इस अवसर पर अपना संबोधन समाप्त करते हुए प्रधानमंत्री ने इन महान हस्तियों से प्रेरणा ली, जिन्होंने हमेशा देश को स्वयं से ऊपर रखा। उन्होंने इस बात पर पूर्ण विश्वास व्यक्त किया कि टीवी 9 समिट भारत के आत्मविश्वास तथा भारतीयों के प्रति दुनिया के भरोसे को और सशक्‍त करेगा। श्री मोदी ने कहा, “देश हित को सबसे ऊपर रखने की यही प्रेरणा भारत को विकसित और आत्मनिर्भर बनाएगी।”

पीके/केसी/आरके//(रिलीज़ आईडी: 2244246) 

Wednesday, September 18, 2024

मीडिया और मनोरंजन क्षेत्र महत्वपूर्ण वृद्धि के लिए तैयार

सूचना और प्रसारण मंत्रालय//Posted On: 18 SEP 2024 3:27 PM by PIB Delhi

राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र (NCOE) की स्थापना को मिली मंजूरी 

*कैबिनेट ने एनीमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग, कॉमिक्स एंड एक्सटेंडेड रियलिटी (एवीजीसी-एक्सआर) के लिए राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र (एनसीओई) की स्थापना को मंजूरी दी

*आर्थिक विकास और रोजगार के अवसर सुनिश्चित करने के लिए सरकार का क्रिएटर्स इकोनॉमी को आगे बढ़ाने की दिशा में प्रयास

*एनसीओई भारत को अत्याधुनिक कॉन्टेंट प्रदान करने के कॉन्टेंट हब के रूप में स्थापित करके भारत की सॉफ्ट पावर को वैश्विक स्तर पर बढ़ाएगा और विदेशी निवेश आकर्षित करेगा  


नई दिल्ली: 18 सितंबर 2024:(पीआईबी//मीडिया स्क्रीन ऑनलाइन डेस्क)::

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कंपनी अधिनियम, 2013 के अधीन  धारा 8 कंपनी के रूप में एनीमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग, कॉमिक्स एंड एक्सटेंडेड रियलिटी (एवीजीसी-एक्सआर) के लिए राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र (एनसीओई) की स्थापना को मंजूरी प्रदान की है, जिसमें फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री और भारतीय उद्योग परिसंघ भारत सरकार के साथ भागीदार के रूप में उद्योग निकायों का प्रतिनिधित्व करेंगे। एनसीओई की स्थापना मुंबई, महाराष्ट्र में की जाएगी और यह देश में एक एवीजीसी कार्य बल की स्थापना के लिए केंद्रीय वित्त एवं कॉर्पोरेट कार्य मंत्री की वर्ष 2022-23 की बजट घोषणा के अनुसरण में है।

एवीजीसी-एक्सआर क्षेत्र आज मीडिया और मनोरंजन के पूरे क्षेत्र में अपरिहार्य भूमिका निभाता है, जिसमें फिल्म निर्माण, ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म, गेमिंग, विज्ञापन तथा  स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य सामाजिक क्षेत्रों सहित कई अन्य क्षेत्र शामिल हैं, इस प्रकार देश की विकास गाथा की समग्र संरचना को समेटे हुए है। तेजी से विकसित हो रही तकनीक और पूरे देश में इंटरनेट की बढ़ती पहुंच के साथ-साथ सबसे सस्ती डेटा दरों सहित, वैश्विक स्तर पर एवीजीसी-एक्सआर का उपयोग तेजी से बढ़ने को तैयार है।

एवीजीसी-एक्सआर क्षेत्र के विकास को बढ़ावा देना

इस तेज़ गति को बनाए रखने के लिए, देश में एवीजीसी-एक्सआर इकोसिस्टम को आगे बढ़ाने के शीर्ष संस्थान के रूप में कार्य करने के लिए राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र की स्थापना की जा रही है। एनसीओई शौकिया और पेशेवर दोनों को अत्याधुनिक एवीजीसी-एक्सआर तकनीकों के नवीनतम कौशलों से लैस करने के लिए विशेष प्रशिक्षण-सह-शिक्षण कार्यक्रम प्रदान करने के साथ-साथ,अनुसंधान एवं विकास को भी बढ़ावा देगा और कंप्यूटर विज्ञान, इंजीनियरिंग, डिजाइन और कला जैसे विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को एक साथ लाएगा जो एवीजीसी-एक्सआर क्षेत्र में बड़ी सफलताओं का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। यह राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र घरेलू उपयोग और वैश्विक आउटरीच दोनों के लिए भारत के आईपी के निर्माण पर भी व्यापक रूप से ध्यान केंद्रित करेगा, जिससे कुल मिलाकर भारत की समृद्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत पर आधारित कॉन्टेंट का सृजन होगा। इसके अलावा, एनसीओई, एवीजीसी-एक्सआर क्षेत्र में स्टार्टअप और शुरुआती अवस्था वाली  कंपनियों को प्रोत्साहन देने के लिए उन्हें संसाधन प्रदान करते हुए एक इनक्यूबेशन सेंटर के रूप में कार्य करेगा। साथ ही, एनसीओई केवल एक अकादमिक उत्प्रेरक के रूप में ही नहीं, बल्कि उत्पादन/उद्योग उत्प्रेरक के रूप में भी काम करेगा।

एनसीओई को एवीजीसी-एक्सआर उद्योग के विकास के लिए प्रेरक शक्ति के रूप में स्थापित किए जाने से यह देश के सभी हिस्सों के युवाओं के लिए रोजगार के सबसे बड़े स्रोतों में से एक के रूप में काम करेगा। इससे रचनात्मक कला और डिजाइन क्षेत्र को बहुत बढ़ावा मिलेगा और आत्मनिर्भर भारत पहल के लक्ष्यों को आगे बढ़ाते हुए भारत को एवीजीसी-एक्सआर गतिविधियों का केंद्र बनाया जा सकेगा।

एवीजीसी-एक्सआर के लिए एनसीओई भारत को अत्याधुनिक कॉन्टेंट उपलब्ध कराने वाले कॉन्टेंट हब के रूप में स्थापित करेगा, जिससे वैश्विक स्तर पर भारत की सॉफ्ट पावर बढ़ेगी और मीडिया एवं मनोरंजन क्षेत्र के प्रति विदेशी निवेश आकर्षित होगा।

***//एमजी /एआर/ आरके/ डीके//(Release ID: 2056033)

Thursday, January 19, 2023

नहीं रहे मित्र कुलदीप सिंह कोकी लेकिन छोड़ गए कई सवाल

Monday:16th January 2023 at 03:47 PM Via Mobile call 

पत्रकारों की आर्थिकता मज़बूत बनाने लिए समाज भी आगे आए   


लुधियाना: 18 जनवरी 2023: (रेक्टर कथूरिया//मीडिया स्क्रीन ऑनलाइन)::

आज बाद दोपहर ही पता चला कि पत्रकार कुलदीप जी नहीं रहे। पुराने मित्र और सुख दुःख के साथी रहे अजय कोहली जी ने उनके देहांत की खबर दी। उन्होंने और कुछ अन्य मित्रों ने बताया कि सुबह तक ठीक लग रहे थे। साढ़े सात बजे तक तो अपनी अख़बार मालवा प्वाइंट के लिंक सोशल मीडिया पर पोस्ट भी करते रहे। इसी बीच सुबह ही 09 और 09:30 के दरम्यान ही अचानक उनकी तबियत बिगड़ी। कहने लगे चक्कर से आ रहे हैं। उन्हें फवारा चौंक वाले न्यूरो अस्पताल पहुँचाया गया लेकिन अस्पताल के अंदर पहुँचने से पहले ही वह इस दुनिया से जा चुके थे। सुबह करीब 11 बजे तक उनके न रहने की खबर सभी मित्रों को मिलनी शुरू हुई। वरिष्ठ पत्रकार मित्र अश्वनी जेतली ने भी बहुत से लोगों को सूचित किया। 

बहुत दुखद है कुलदीप जी का यूं चले जाना। हम सभी मित्र प्यार से उन्हें कोकी कहा करते थे। हर रोज़ अक्सर मिलने मिलाने वाले और उनके ज़्यादा नज़दीक रहने वाले मित्रों ने बताया कि कामकाज को लेकर आजकल बहुत बेहद चिंतित थे। उसी चिंता और टेंशन के चलते शायद दिमाग की नाड़ी फट गई। बाद में उनके बेटे दमनप्रीत  सिंह ने  भी ब्रेन हैमरेज की पुष्टि की।  

अभी शायद उम्र के साठ साल ही मुश्किल से पूरे कर पाए थे कि मौत उन्हें देखते ही देखते हमसे छीन ले गई। हम सभी का स्नेही मित्र हमारे दरम्यान नहीं रहा। आर्थिक तंगियों के बावजूद ज़रूरत  पड़ने पर मित्रों का हर संभव सहायक साबित होना। जेब खाली होने पर भी संकटग्रस्त मित्र के लिए कोई रास्ता सुझा देना। खुद को भी अगर कभी कोई बेबसी जैसी हालत घेर ले तो भी दोस्तों को कठिन घड़ियों में हौंसला देना शायद कुलदीप को ही आता था। कोई खुद को तीसमारखां समझ कर कुछ ज़्यादा ही हवा करने लगे तो उसकी हवा पल भर में निकालना भी कुलदीप के लिए चुटकी का काम रहता। किसी की बात पर आशंका होनी तो झट से मोबाईल निकालना औए बात की पुष्टि कर के हकीकत का पता लगा लेना। 

ज़िंदगी और वक्त ने उन्हें बहुत जाने माने लोगों से मिलवाया और बहुत बड़े बड़े घटनाक्रमों का साक्षी भी बनाया।समाज और सियासत में जिन लोगों ने कई कई बार आंधियों के खिलाफ स्टैंड ले कर दिखाया था उनका साथ भी कुलदीप जी को मिलता रहा। क्लीन शेव्ड रहे लेकिन पंथ और सिख धर्म के हर दर्द से अवगत रहते थे। सिख शहादत पत्रिका पर उनका नाम भी प्रिंट लाईन में छपता रहा। कई कई दुर्लभ किताबों का अनुवाद भी हिंदी और अंग्रेज़ी से किया और करवाया। 

किसी को कोई भी समस्या हो तो उनके कंप्लेंट सैल का दरवाज़ा हमेशां उनके लिए खुला रहता। नैशनल रोड पर स्थित काली सी बिल्डिंग--सूर्य आर्केड की सीढ़ियां चढ़ कर उनका दफ्तर आ जाता था। जेब की हालत कैसी भी हो, माहौल का मिजाज़ कुछ भी हो वह अपने पास आने वाले हर व्यक्ति की आवभगत करते और उसका दुःख दर्द सुनते। कोशिश करते संकट का समाधान भी तुरंत बता सकें। 

घर को चलाने में पिता का साथ देते थे। इसी म्हणत मशक्कत ने उनका बचपन भी उनसे छीन लिया था। उनके बचपन का वह मासूम सा चेहरा भी अब तक याद है मुझे। सर पर जुड़ा और उस पर रबड़ के साथ सफ़ेद रुमाल किसी फूल की तरफ सजा लगता था। जब गली मोहल्ले के अन्य बच्चे खेल रहे होते तब वह पिता की प्रिंटिंग प्रेस पर मेहनत कर रहे होते। कभी कंपोज़िंग, कभी फर्मा बांधना और उठवाना, कभी प्रिंटिंग प्रेस पर काम करना। बस साड़ी उम्र काम में ही निकल गई। 

गौरतलब है कि छोटी सी उम्र में ही पिता के साथ लुधियाना के प्रसिद्ध पुराने इलाके इस्लामगंज//अमरपुरा में प्रिंटिंग प्रेस के ज़रिए मेहनत मुशक्कत करते हुए उनकी शख्सियत का दृश्य रह रह कर आंखों के सामने उभर रहा है। उन दिनों पत्र-पत्रिकाओं की छपाई के लिए एक एक अक्षर--एक एक मात्रा जोड़ कर कोई खबर या रचना तैयार होती थी। फिर उन सभी रचनाओं को जोड़ कर पूरा पेज बांधा जाता था और उसके बाद सभी पेज जोड़ कर कोई अख़बार या किताब छपा करती थी। 

उनके पिता बच्चों से बहुत सख्ती के साथ काम करवाया करते थे। उनके भाई भी पूरा सहयोग देते थे। प्रिंटिंग प्रेस नीचे वाले ग्राउंड फ्लोर पर चला  करती थी ऊपर रिहायश हुआ करती थी। थोड़ी थोड़ी देर बाद ऊपर से चाय बन कर आती रहती।  फिर कोशिश होती चाय भी खाली न हो। साथ बिस्कुट या कुछ और भी रहता। साथ ही उनके पिता बातों बातों में अपने सभी क्लाइंटस को बिठाए रखते। बिजली चली जाती तो सब को  मुसीबत ही लगती। कुछ देर के लिए काम रुक सा जाता। अँधेरे में भी कुलदीप कम्पोजिंग करते रहते। अतीत के वे सभी दृश्य अब इतने सालों बाद ज़हन में घूमने लगे हैं। ऐसा लगता है जैसे कोई फिल्म कल्पना के पर्दे पर चल रही हो। 

सत्तर का दशक शायद उस समय समाप्त हो चुका था। अस्सी का दशक शुरू भी हो चुका था। अस्सी के दशक का यह वही दौर था जब पंजाबी में भी आधुनिक प्रिंटिंग अपना रंग ढंग ज़ोरशोर से दिखाने की दस्तक दे रही थी। कम्प्यूटर के ज़रिए कॉमसेट की आधुनिक कम्पोज़िंग चर्चा का विषय बन गई थी। ऑफसेट की तेज़ रफ़्तार प्रिंटिंग हम सभी को हैरान करने लगी थी। 

छोटी प्रिंटिंग प्रेस बस छोटे छोटे जॉब वर्क तक सिमटने लगी थी। लगता था यह सब जल्द ही अतीत बन जाएगी लेकिन सलेमटाबरी और नाली मोहल्ला में अभी भी उनकी झलक मिल जाती है। उस दौर की कई मशीनें ज़ोर शोर से बहुत से लोगों का रोज़गार बनी हुई हैं। इसके बावजूद इस दौर में कइयों की किस्मत पर मंदहाली ने दस्तक दी। कुलदीप कोकी के पिता की प्रिंटिंग प्रेस पर भी इस का असर पड़ा। लेकिन आर्थिक मंदहालियों से जूझते हुए भी उन्होंने न तो कभी अच्छे साहित्य का अध्यन ही छोड़ा और न ही सृजन का सिलसिला बंद होने दिया। इसके साथ ही नई तकनीक से भी वाकिफ होते रहे। सीमित से संसाधनों के बावजूद वह किसी न किसी बहाने मीडिया में सक्रिय रहे। यह सक्रियता पैसे कमाने के लिए नहीं थी बल्कि एक मिश्र को लेकर थी। वह बड़े बड़े समूहों में रह कर और उनसे दूर हो कर भी इस मिशन को समर्पित रहे। 

आज उनके जाने की खबर सुन कर मन बहुत उदास हो गया है।

फिर बहुत से सवाल उठ रहे हैं क्या यही है ज़िंदगी? कभी भी किसी भी वक्त किसी मित्र से बिछड़ जाना और कुछ न कर पाना!

कितने बेबस से हैं हम लोग हैं।  मित्रों  देखते रहते हैं लेकिन उन्हें बचाने का कोई ठोस कदम नहीं उठा सकते। समाज को राह दिखने वाला मीडिया अभी तक अंधेरे में है। 

जो वास्तविक ज़िंदगी में काम करते हैं लेकिन तिकड़मबाज़ी नहीं करते वे क्यूं इतने गुमनाम रह जाते हैं। क्यूं  उन पर खुशहाली की कृपा नहीं होती? लक्ष्मी क्यूं उन पर मेहरबान नहीं होती? हम दोनों के एक नज़दीकी मित्र बलवीर सिद्धू (पंजाबी अख़बार-जस्टिस न्यूज़ के मालिक,संपादक और प्रकाशक) ने बताया कि बार उन्हें सरकारी कार्डों और फायदों के लिए कहा लेकिन वह हर बार हंसते हुए बात को टाल जाते। यूं लगने लगता जैसे वह उनकी ख़ामोशी और रहस्यमय हंसी में शायद एक पुराना गीत गुनगुना रहे हों--

सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी

सच है दुनिया वालों कि हम हैं अनाड़ी!

अब कुलदीप कोकी जी हमारे दरम्यान नहीं रहे। ज़िंदगी भर संघर्ष करने वाला शख्स अब मौत की आगोश में  चला गया। सब संघर्ष बीच में ही छूट गए। सभी इरादे भी अधर में ही रह गए। लेकिन उनका जाना बहुत से सवाल छोड़ गया है कि क्या यह सब यूं ही चलता रहेगा? मेहनत, मुशक्कत, ईमानदारी और प्रतिबद्धता इसी तरह दम तोड़ती रहेगी। 

सत्ता बदलती रहती है लेकिन सरकारों को चाहिए कि कलमकारों को मान्यता, सहायता और आवश्यक सहयोग देने के लिए नियमों को आसान करे। जान सम्पर्क विभाग की शक्तियों को बढ़ाया जाए। कलमकारों की तलाश के लिए एक विशेष सैल बनाया जाए जो अपने स्तर पर खोज करके सही लोगों को सत्ता की तरफ से बनती सहायता दे सके। कलमकारों के स्वास्थ्य की जाँच और अवस्य्हक उपचार तो हर छह महीने बाद होना ही चाहिए। नियमों की सख्ती की बजाए असली कलमकार बचने की तरफ पहल होनी चाहिए।  

यह सब लिखते हुए मैं उनकी कमज़ोरियों, खामियों और मजबूरियों से भी अवगत हूं लेकिन जब तक समाज कलमकारों के प्रति उदासीन और गैर-ज़िम्मेदार बना रहेगा तब तक यह सब होता रहेगा। हमारे पत्रकार, लेखक, बुद्धिजीव, कलाकार अलप आयु में ही दम तोड़ते रहेंगे। 

जब यह समाज अपनी वाहवाही के  आयोजन करता है तो उस समय आयोजक लोग चाय बनाने वाले को भी पैसे देते हैं, चाय परोसने और ले कर आने वाले  को भी पैसे दिए जाते हैं, दरियां बिछाने और कुर्सियां लाने लेजाने वालों को भी पैसे मिलते हैं लेकिन उसकी कवरेज के लिए दूर दराज से पहुंचे मीडिया वालों कोआयोजक नहीं  पूछते कि उनके वाहन में पैट्रोल है या नहीं? 

अगर कोई मजबूरी वश मांग भी ले तो उसे दे भी देते हैं लेकिन बाद में बदनाम करते हैं।  कोई सरकार से विज्ञापन मांग ले तो उसे सरकारिया कह कर बुरा भला कहते हैं लेकिन स्वयं की ज़िम्मेदारी का अहसास कभी नहीं करते। कवरेज की खबरों के ज़रिए अधिक से अधिक स्पेस और टाइमं बटोरने वाले ये चालाक लोग भी कलमकारों के जल्द देहांत के लिए कम ज़िम्मेदार नहीं हैं। सभी पत्रकार संगठनों को इस तरफ भी ध्यान देना होगा। 

आखिर में गोपाल दास नीरज जी का शेयर याद आ रहा है:

वो और ही थे जिन्हें थी ख़बर सितारों की;

मेरा ये देश तो रोटी की ही ख़बर में रहा - गोपालदास नीरज

स्नेह के साथ// बिछड़े हुए मित्रों की यादों के साथ//बिछड़ने की कगार पर खड़े और बहुत से कलमकारों के जाने के अंदेशे की चिंता के साथ आप सभी का--रेक्टर कथूरिया

Saturday, November 6, 2021

UNO ने भी कहा मीडिया के खिलाफ सभी तरह की हिंसा निंदनीय

पत्रकारों पर हमले के दोषियों को मिले सज़ा:संयुक्त राष्ट्र

Photo Courtesy:UNESCO


नई दिल्ली: 6 नवंबर 2021: (मीडिया स्क्रीन ऑनलाइन)::

मीडिया के खिलाफ हिंसा दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है। इस तरह का निंदनीय रुझान दुनिया के कई हिस्सों में बढ़ रहा है। इसकी गंभीरता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इस तरह के हमलों की सख्त निंदा की है। 

संयुक्त राष्ट्र के एक प्रस्तावित मसौदे में पत्रकारों और मीडियाकर्मियों के खिलाफ सभी तरह के हमलों, प्रतिशोध और हिंसा की निंदा करने और सरकारों से इन अपराधों के दोषियों को दंडित करने के लिए कार्रवाई किये जाने का आग्रह किया गया है। महासभा के इस प्रस्तावित मसौदे में  उन पत्रकारों और मीडियाकर्मियों की तत्काल और बिना शर्त रिहाई का आग्रह किया गया है जिन्हें मनमाने ढंग से गिरफ्तार या हिरासत में लिया गया है या बंधक बना लिया गया है या जिन्हें गायब कर दिया गया है। संयुक्त राष्ट्र के राजनयिकों के अनुसार,  प्रस्ताव यूनान, फ्रांस, ऑस्ट्रिया, कोस्टा रिका और ट्यूनीशिया द्वारा तैयार किया गया है और ब्रिटेन, जर्मनी और कई अन्य यूरोपीय और लैटिन अमेरिकी देशों के साथ-साथ आइवरी कोस्ट और लेबनान सहित 34 सह-प्रायोजकों की सूची में शामिल है। इस दिशा में दुनिया के हर हिस्से से ज़ोरदार आवाज़ उतनी चाहिए। पूरी तरह बुलंद आवाज़। 

आज के मीडिया पर रीतू कलसी की एक काव्य रचना

आज रुपया पत्रकारिता पर भारी पड़ गया क्या?


रीतू कलसी ने मीडिया में कुर्बानी का ज़माना देखा है। त्याग का ज़माना देखा है। साधना का ज़माना देखा है। अपनी कलम और सच के दम पर बड़ों बड़ों से आँख मिला कर बात करने का ज़माना देखा है। अफ़सोस अब वो बातें बहुत कम रह गई हैं। उस दर्द की बात करती है रीतू कलसी की यह रचना। वो दर्द जो हर सच्चे पत्रकार के मन में उठना चाहिए। -रेक्टर कथूरिया


बचपन से सुनते आये थे 

एक पत्रकार कितना महान होता 

रेडियो के स्टूडियो में रीतू कलसी 
कुछ भी हो जाए सच का साथ नहीं छोड़ता 

थैला लटकाये सच को भर उस में 

हर संभव कोशिश करता है हम सभी को बताने की 

गरीबी में जीता है 

मौत से हर समय आँख मिचोली खेलता है 

आज़ादी में भी पत्रकारों का अहम रहा योगदान 

पत्रकार का एक ही धर्म होता कर्म सच का कर्म 

पर अभी जो पत्रकारों को करते देखते हैं 

उनका कहा सुनते हैं क्या यह कर्म है 

सच को झूठ कैसे बनाना क्या यह काम हो गया 

क्या अब पैसा ही पत्रकार का धर्म हो गया।

 

राजनीति किसलिए हावी हो गयी पत्रकारिता पर 

या अब मौत से डर लगने लग गया।


कहाँ गए सीना तान कर चलने वाले 

कब कैसे पार किया रास्ता शालीनता से बतमीज़ी तक का 

चीखना चिलाना कब से हो गयी पत्रकारिता 

देखते ही देखते पत्रकारिता लोगों के लिए कॉमेडी हो गयी 

कैसे भूलें  पंडित जुगल किशोर सुकुल की पत्रकारिता 

 राम मोहन रॉय ने पत्रकारिता से किया कितनी कुरूतियो को दूर 

 बाल विवाह, सती प्रथा, जातिवाद, कर्मकांड, पर्दा प्रथा का किया अंत 

अजीमुल्ला खां ने ली सीधी टककर अंग्रेज़ों से 

हेमंत, शिशिर, वसंत और मोतीलाल ने नया प्रणाली पर उठाये प्रश्न 

भगत सिंह को कौन नहीं जानता 

थे अख़बार प्रताप के तेज़ तरार निर्भीक एवं निष्पक्ष पत्रकार 

जाते थे लगातार अपने असूलों के लिए लगातार जेल 

कहाँ गए आज वह असूल 

आज रुपया पत्रकारिता पर भारी पड़ गया क्या 

क्या बताएं अपने बच्चों को 

कौन से कहानिया सुनाये कैसे समझाये उन्हें यह समय का हेर फेर 

कहाँ अँधेरे की तरफ बढ़ चले हैं हम 

जहाँ अब पत्रकार को इज़्ज़त की नज़र से नहीं देखा जा रहा।

                                  --रीतू कलसी 

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Saturday, July 17, 2021

अब पत्रकार कमेंटेटर बन गए हैं-डा. सिमरन सिद्धू

Saturday 17th July 2021 at 1:57 PM

 जीजीएन खालसा कालेज के वेबिनार में हुई बहुत ही अर्थपूर्ण बातें  

लुधियाना:16 जुलाई 2021: (कार्तिका सिंह//मीडिया स्क्रीन Online)::

इसे बढ़ा कर के देखने के लिए इस पर क्लिक करें 
गुरु नानक खालसा कॉलेज, गुजरांवाला, पत्रकारिता विभाग, लुधियाना ने "भारतीय पत्रकारिता:मुद्दे और चुनौतियां" पर एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया। प्रो. जसमीत कौर, पी.जी. पत्रकारिता विभाग द्वारा वेबिनार शुरू किया गया था और विभाग के समन्वयक डॉ. सुषमिंदरजीत कौर ने इस वेबिनार के विषय और इसके महत्व से दर्शकों को अवगत कराने के लिए अपने दूरदर्शी शब्दों को बहुत ही खूबसूरती से उपयोग किया। 

गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के पूर्व कुलपति डॉ एस. पी. सिंह जो गुजरांवाला खालसा शिक्षा परिषद के अध्यक्ष भी हैं ने विशिष्ट अतिथियों, प्रख्यात वक्ताओं और ज्ञानवर्धक श्रोताओं का स्वागत किया। उन्होंने अपने स्वागत भाषण में महामारी के इस कठिन समय में ऐसे वेबिनार आयोजित करने में विभाग के प्रयासों की सराहना की। अपने बहुमूल्य विचार सभी  सांझे करते हुए उन्होंने कहा कि आज का परिदृश्य ऐसा है कि न केवल भारतीय पत्रकारिता बल्कि दुनिया भर की पत्रकारिता भी विभिन्न मुद्दों और चुनौतियों का सामना कर रही है। 

उन्होंने आगे कहा कि पत्रकारिता का क्षेत्र सूचना को 'संक्रमित' करने के बजाय तथ्यात्मक सूचना के प्रसार के अपने मूल मार्ग से भटक गया है। वेबिनार का नेतृत्व पत्रकारिता और जनसंचार विभाग, दोआबा कॉलेज, जालंधर की प्रमुख डॉ. सिमरन सिद्धू  ने बहुत ही समझदारीऔर दूरदर्शिता पूर्ण बातें कह कर किया और बहुत ही अर्थपूर्ण शब्दों के साथ बहुत ही काम की बातें कहीं।  

उन्होंने कहा कि पत्रकार कमेंटेटर बन गए हैं क्योंकि वे केवल 'दृश्य' की बहुत गहराई से व्याख्या करते हैं।  उसी व्याख्या में डॉ. अ. स. नारंग प्रोफेसर राजनीति विज्ञान और मानवाधिकार शिक्षा के पूर्व समन्वयक, इग्नू ने पत्रकारों के सामान्य दृष्टिकोण पर जोर दिया क्योंकि "पत्रकारों के लिए यह कहना आसान नहीं है कि क्या कहना है और क्या नहीं कहना है।" 

कारोबारी एप्रोच लगातार बढ़ने से सप्लिमेंटों का जो दबाव पत्रकारों और समाज पर बढ़ा है अक्सर उसकी चर्चा कम होती है। सभी अख़बारों को विज्ञापन चाहिएं। कोई भी उनसे नाराज़गी मौल नहीं लेना चाहता। इस लिए अक्सर इस पर ख़ामोशी छ जाती है। लेकिन कटु सत्य है की इसने खबर की निष्पक्षता और तलाश को प्रभावित किया है। किसी भी ऐसे इन्सान का पत्रकार बनना मुश्किल हो गया है जो विज्ञापन नहीं जुटा सकता। ऐसी निराशाजनक स्थिति के बावजूद आशाभरी बातें की मैडम चित्लीन सेठी ने। उन्होंने तकनीकी विकास का फायदा उठाने की सलाह दी। यह बहुत ही नई उम्मीद है। 

श्रीमती चितलीन कौर सेठी, एसोसिएट एडिटर, द प्रिंट ने टिप्पणी की कि जिनके हाथ में मोबाइल फोन है, वे वास्तव में एक संभावित पत्रकार हैं। युवाओं से ऐसी उम्मीद को सुसव्ग्तं कहना बनता है। आम नागरिकों को यह बात एक नहीं हिम्मत देगी। कुर्प्ष्ण के खिलाफ उनका हौंसला बढ़ाएगी। 

इसी बीच मिस्टर हरप्रीत सिंह, टीवी एंकर, द हरप्रीत सिंह शो, कनाडा ने बताया कि पत्रकार बनना चाहने वालों की ऊर्जा और प्रतिभा का उपयोग धीरे-धीरे किया जा सकता है। कॉलेज के प्राचार्य डॉ. अरविंदर सिंह ने सभी गणमान्य वक्ताओं और दर्शकों का धन्यवाद किया. उन्होंने कहा कि सटीक जानकारी के प्रसार में पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका पर ज़ोर देने के लिए विभाग ने हमेशा अथक और नए प्रयास किये हैं। 

Tuesday, January 19, 2021

मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी से पूरा महिला वर्ग भी हुआ आहत

   सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के नाम एक महिला का पत्र 


मीडिया का एक बड़ा हिस्सा आज भी संसाधनों के मामले में सचमुच बहुत बड़ा है। चाहे यह बड़प्पन गोदी में बैठ कर ही मिला हो। इसी के चलते मीडिया के इस हिस्से को भरम हो जाता है कि शायद हम झूठ को सच और सच को झूठ बना कर दिखा सकते हैं। इस भरम को जनवादी मीडिया अपने सीमित साधनों-संसाधनों से तोड़ता ही रहता है। इसी सिलसिले को आगे बढ़ा रहा है जन चौक। इस पत्र ने एक बहादर महिला का एक पत्र भी प्रकाशित किया है।  जनचौक की टिप्पणी सहित इस पत्र को यहाँ भी साभार प्रकाशित किया जा रहा है। -सम्पादक:मीडिया स्क्रीन 

जन चौक सम्पादक ने भी साफ़ शब्दों में कहा है कि किसान आंदोलन में शामिल महिलाओं को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी ने पूरे देश को आहत किया है। खास कर महिलाओं को इससे गहरी पीड़ा हुई है। और लोकतांत्रिक देश में जहां हर नागरिक का बराबर का अधिकार है वहां महिलाओं को कमतर देखने का नजरिया ही बेहद परेशान करने वाला है। यह बात कोई और करता तो एकबारगी सोचा भी जा सकता था लेकिन जब देश की सर्वोच्च अदालत का मुखिया जिसके ऊपर इस देश के संविधान की रक्षा का कार्यभार है, ऐसा करता है तो मामला बेहद गंभीर हो जाता है। पढ़ी-लिखी महिलाओं के एक बड़े हिस्से ने इसका प्रतिकार किया है। और अलग-अलग तरीके से यह सिलसिला अभी भी जारी है। इतिहास की अध्यापिका और सामाजिक कार्यकर्ता आशु वर्मा ने इस मसले पर सीधे मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा है। पेश है उनका पूरा पत्र-संपादक (जन चौक) 

पत्र लिखने वाली महिला आशु वर्मा 
देश की सबसे बड़ी अदालत के महामहिम, ये आपने क्या कह दिया? ये आपने क्यों कहा? किसने आपको यह अधिकार दिया महामहिम ? आप तो संविधान की रक्षा के लिए हैं, आप तो कानूनों की सही रोशनी में व्याख्या के लिए हैं। आपसे तो उम्मीद की जाती है कि आप दबे कुचले, सताए हुए, हाशिये के लोगों, की बात सुनेंगे, उनके बिना सुनाये ही उनकी पीड़ा समझ जायेंगे, उसे संज्ञान में लेंगे और उनके लिये बेहतर कानूनों की जमीन तैयार करेंगे।

महामहिम, आप से बेहतर कौन यह जानता है कि आलोचना, आन्दोलन और विरोध लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण अवयव है। वह तो लोकतंत्र की आत्मा है। उसी से लोकतंत्र लोकतंत्र बना रहता है। और जब किसी वर्गीय आन्दोलन में उस वर्ग की आधी आबादी यानि उस वर्ग की महिलाओं की भागेदारी भारी संख्या में हो रही हो तो मामला जरूर संगीन होगा, यह तो आप भी समझते होंगे। अब तक तो आप समझ ही गए होंगे कि मैं किस विषय पर बात कर रही हूँ।

आपने किसान आन्दोलन में शामिल महिला किसानों के बारे में कह दिया कि इन्हें आन्दोलन में नहीं शामिल होना चाहिए। इन्हें वहां से हटाया जाना चाहिए। आपने ऐसा कैसे कह दिया? महोदय, आपके इस सुझाव से मैं बेहद आहत और क्रुद्ध हूँ। आखिर न्यायापालिका के संरक्षक ने भी यही मान लिया कि ये ‘सामान्य महिलाएं’ हैं जो अपने-अपने पतियों के साथ की अर्धांगनी होने का फर्ज निभाने आई हैं। अधिकांश लोग तो यह मानते ही हैं कि ‘महिलाएं किसान नहीं होतीं’। लेकिन अफ़सोस कि आपने भी ऐसा ही माना।

आपने तो पूरा जीवन संविधान की सेवा में बिताया है। इस लम्बे न्यायिक सफ़र में तमाम समुदायों की तकलीफों भरी, न्याय मांगती याचिकाएं आपकी नजरों के सामने से गुजरी होंगी। आप से तो उम्मीद की जाती है कि ‘थोड़ा कहा ज्यादा समझना’। आप तो यह जानते ही होंगे की खेती का 75% काम महिलाएं करती हैं। अधिकांश के मन में उनके श्रम को पहचान नहीं दिए जाने का क्षोभ और गुस्सा होता है। भले ही सभी उसे व्यक्त न कर पाती हों। मैं यह सोचती थी कि संसद में बैठे लोग तो इस आकांक्षा को न तो समझ पाते हैं और न ही महसूस कर पाते हैं पर आप, एक लोकतांत्रिक संविधान, जिसकी आत्मा में समानता का मूल्य बसा है, उस संविधान के रक्षक हैं, आप कैसे इसे नहीं समझ पाए कि यहाँ आई महिलाएं सिर्फ पति का साथ निभाने नहीं आई हैं (और अगर आई भी है तो क्या? ये उनकी इच्छा और हक है) महोदय वे महिलाएं अपनी किसान होने की पहचान के नाते आई हैं, इस अहसास के साथ आई हैं कि वे किसान हैं।

वे समझ रही हैं कि किसानी कितना तकलीफदेह पेशा हो गया है। देश के धान्य-कोठारों को भरने में उनका भी पसीना बहता है। उनमें से तमाम के घरों में किसानी पर छाये संकट के कारण मौतें हुई हैं। उनके भी प्रियजनों ने इन्हीं मुसीबतों के कारण आत्महत्याएं की हैं। उनकी आत्महत्याओं के बाद कर्जे की वसूली के लिये आये बैंकों के आलिमों का यही सामना करती हैं या कर रही हैं। अधिकाँश को तो पति की मौत के बाद मुआवजा भी नहीं मिलता क्योंकि जमीन के कागजातों पर उनका नाम नहीं होता क्योंकि उन्हें किसान नहीं माना जाता। महामहिम, ये सारी बातें आपको तो पता ही होंगी। मेरा आपको बताना शोभा नहीं देता। आप बताइये कि क्या वे किसान नहीं हैं?

महोदय, ये महिलाएं खेती के तौर तरीकों पर किसी कृषि विश्वविद्यालय में पढ़ा सकती हैं, कृषि पर छाये संकट, उस संकट के आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-पर्यावरण और धार्मिक पहलुओं के रेशे-रेशे पर किसी मीडिया हाउस में घंटों चर्चा कर सकती हैं क्योंकि खेती ही उनका जीवन है, उसी से उनका वजूद है।

महोदय मैं तो सोचती थी कि लोकतंत्र के शीर्ष पर होने के कारण जीवन के हर क्षेत्र में महिलाओं की बढ़ती मौजूदगी और हिस्सेदारी आपको तसल्ली देती होगी, आश्वस्त करती होगी। इसीलिये किसान आन्दोलन में उनकी मौजूदगी और उनकी स्वायत्तता आपको भा रही होगी। उनकी गंभीरता और आत्मविश्वास से आप खुश हो रहे होंगे। राजनीतिक रैलियों में ट्रक में भर कर आई महिलाओं और डेढ़ महीने से प्रदर्शन पर बैठीं इन किसान महिलाओं में आप अंतर कर पा रहे होंगे। खबरें तो आप तक भी पहुँच ही होंगी। आप समझ ही गए होंगे कि ये कुछ कहना चाहती हैं। ये खेती पर छाये संकट और अपनी पहचान के लिए भी आई हैं। आपको उन्हें सुनना चाहिए था महामहिम, यह उनका हक है। अपनी पहचान की उनकी लड़ाई का संज्ञान लेना चाहिए था। लेकिन अफ़सोस आपने तो उन्हें जाने के लिए कह दिया।

आप जानते ही हैं कि जिस संविधान के आप संरक्षक हैं उसे बनाने में दुर्गाबाई देशमुख, अम्मू स्वामीनाथन, बेगम एजाज़ रसूल, दाक्षायनी वेलायुधन जैसी 15 महिलाओं का भी सक्रिय योगदान रहा है। एक-एक आन्दोलन और संघर्ष से ही महिलाओं ने अधिकार हासिल किये हैं। अनेक कानूनी लडाइयां भी लड़ी हैं। किसान के रूप में उनकी पहचान को मान्यता सिर्फ उनकी ही जीत नहीं होगी बल्कि समस्त नारी समुदाय की जीत होगी और वह आगे बढ़ेंगी।

क्षमा चाहती हूँ, पर मैं खुद को रोक नहीं पाई। महामहिम, आपने हम महिलाओं को बहुत निराश किया।  

              –आशु वर्मा

Monday, November 2, 2020

DGP पंजाब ने दिया पत्रकारों को निष्पक्ष जांच से न्याय का भरोसा

पत्रकारों की प्रतिनिधिता की अमरिंदर सिंह और हरप्रीत जस्सोवाल ने 


चंडीगढ़
//खरड़//कुराली: 2 नवम्बर 2020:  (मीडिया स्क्रीन Online टीम )::

समाज के समुचित विकास और सुरक्षा के लिए पुलिस भी अग्रसर रहती है और पत्रकार भी अपनी डयूटी तनदेही से निभाते हैं। प्रेस और पुलिस का यह रिश्ता कई बार नाज़ुक पड़ावों  गुज़रता है लेकिन खट्टे मीठे अनुभवों  के बावजूद कभी भी टूटता नहीं। एक बार फिर इसे टूटने से बचाया है डीजीपी दिनकर गुप्ता ने। 

इस तरह के वरिष्ठ पुलिस अधिकारीयों और की सुखद बातों के बावजूद अलग अलग स्थानों से पत्रकारों के साथ पुलिस द्वारा कुछ  ज़्यादती की खबरें आम होने लगीं हैं। कहीं किसी पत्रकार से कैमरा छीन लिया  जाता है और कहीं पर मोबाईल।  इसी तरह की बहुत सी बातों  के दरम्यान उभर कर सामने आई शहीद भगत सिंह प्रेस एसोसिएशन। पंजाब का शायद ही कोई इलाका बचा हो जहां इस संगठन की पहुंच न हुई हो।  उम्र और अनुभव  में छोटे बड़े सभी पत्रकार इस संगठन में सक्रिय हैं। इस संगठन का कार्यमन्त्र है-पहले विनम्रता और प्रेम से अपनी समस्या हल करने और करवाने का प्रयास करो अगर इसे कमज़ोरी समझा जाए तो फिर लोकतान्त्रिक राह अपनाते हुए एकजुटता की शक्ति का प्रदर्शन करो तांकि विजय प्राप्त हो सके। 

इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ।  पुलिस के साथ किसी मुद्दे पर बहस हुई तो मामला टूल पकड़ गया। दोनों तरफ की ज़िद। पत्रकारों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ तो बात और बिगड़ गई। मामला पांच नवंबर को पुलिस अधिकारिओं के पुतले जलाने की घोषणा तक पहुँच गया। 

पंजाब के बहुत महत्वपूर्ण ज़िले फाजिल्का में भी पुलिस और प्रेस के दरम्यान टकराव जैसी स्थिति बन गई। संगठन से जुड़े सूत्रों के मुताबिक बात आर पार जैस जंग जैसी बन गई। 

भारत के और भी बहुत सारे राज्यों में पत्रकारों के साथ हो रही बे इंसाफी के खिलाफ आज शहीद भगत सिंह प्रेस एसोसिएशन का एक स्टेट लेवल का डेलिगेशन पंजाब के डीजीपी दिनकर गुप्ता से मिलने उनके चंडीगढ़ ऑफिस में गया जिसकी अगुवाई शहीद भगत सिंह प्रेस एसोसिएशन के राष्ट्रीय चेयरमैन अमरिंदर सिंह और राष्ट्रीय जनरल सेक्टरी हरप्रीत सिंह जस्सोवाल ने की ओर उनके साथ रितिष राजा सेक्टरी ट्राइसिटी, हरपाल सिंह भंगू-प्रधान जिला अमृतसर, हरमिंदर सिंह नागपालजनरल सेक्टरी ट्राइसिटी, धरमिंदर सिंगला एडवाइजर,  शमशेर सिंह बग्गा  प्रधान जिला रोपड़, मनीष शंकर प्रधान जिला मोहाली, कुलदीप कुमार वाइस प्रेसिडेंट ट्राइसिटी, विजय जिंदल जीरकपुर, रोहित कुमार सीनियर पत्रकार, अमित कुमार एडवाइजर ओर रवी शर्मा और जगदीश सिंह खालसा इत्यादिकई पत्रकार शामिल थे ।

हरप्रीत सिंह जस्सोवाल, रितिष राजा ओर कुलदीप कुमार ने कहा के देश भर के पत्रकारों के हक में स्टैंड लेने वाली एकमात्र पत्रकार संस्था शहीद भगत सिंह प्रेस एसोसिएशन जो कि हमेशा ही किसी भी पत्रकार के साथ हुई नाइंसाफी के खिलाफ पत्रकारों के साथ खड़ी होती है आज पंजाब के हर जिले समेत भारत के अलग-अलग राज्य में पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, जम्मू कश्मीर, यूपी, महाराष्ट्र, चेन्नई, वेस्ट बंगाल में और ओर भी कई राज्यों में लोकप्रियता के साथ आगे बढ़ रही है।

आज फील्ड में काम करने वाले हजारों पत्रकार इस प्रेस एसोसिएशन के परिवार का मेंबर बन चुके हैं ।

 डीजीपी पंजाब से बातचीत के दौरान शिष्टमंडल का नेतृत्व कर रहे चेयरमैन अमरिंदर सिंह, धरमिंदर सिंगला ओर हरपाल भंगू ने बताया कि पूरे भारत में पुलिस द्वारा पत्रकारों पर नाजायज झूठे पर्चे दर्द करके उन्हें परेशान किया जा रहा है और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को उनका कार्य करने से रोका जा रहा है जो कि भारत के संविधान के विरुद्ध है। इसी गलत सोच के चलते पंजाब के विभिन्न हिस्सों में पत्रकारों पर दर्ज किए जा रहे झूठे पर्चे दर्ज किए जा रहे है और यह सब राजनीतिक व अन्य दबाव के चलते हो रहा है। 

हरमिंदर सिंह नागपाल , शमशेर सिंह बग्गा ओर कुलदीप कुमार ने कहा कि पंजाब के महत्वपूर्ण ज़िले फाजिल्का में काम कर रहे दो पत्रकारों सुनील सैन और राजू आज़मवालिया पर जिला बार एसोसिएशन फाजिल्का के दबाव मे एक ही मामले मे दो मुकदमो को लेकर उच्च स्तरीय जांच करवाने और इसी मामले मे फाजिल्का सीआईए प्रभारी नवदीप भट्टी ने फोन कर बातचित के दोरान राष्ट्रिय प्रधान रंजीत सिंह मसौन से गाली गलौच कर उन्हे उकसाया और प्रधान मसोन पर गाली गलोच करने का फाजिल्का मे पर्चा दर्ज करने के मामले मे जांच करने व नवदीप भट्टी का डोप् टेस्ट करवाने की मांग करते हुए एक मांग पत्र भी सौंपा गया ।

जिस पर डीजीपी साहब ने मामले की गंभीरता को देखते हुए करवाने इस सारे मामले की निष्पक्ष जांच आई जी फरीदकोट को सोंपते हुए पत्रकारों को इंसाफ दिलवाने का आश्वासन देते हुए कहा की पत्रकारों और पुलिस के रिश्तों को किसी भी कीमत पर खराब नही होने दिया जाएगा ।

एसोसिएशन की ओर से डीजीपी पंजाब श्री दिनकर गुप्ता का मनीष शंकर, अमित कुमार, विजय जिंदल, रवी शर्मा, रोहित कुमार और जगदीश सिंह खालसा ने धन्यवाद किया। प्रेस को यह सारी जानकारी एसोसिएशन के प्रेस सेक्टरी अमरजीत रतन की तरफ से दी गई ।


Tuesday, October 13, 2020

मीडिया के सूचनार्थ/आमंत्रण पत्र

 भारतीय लोकमंच पार्टी की तरफ से पत्रकार सम्मेलन 

दिनांक : मंगलवार, 13 अक्टूबर/2020

भारतीय लोकमंच पार्टी के तरफ से  कल दिनांक : 14/अक्टूबर/2020 दिन बुधवार समय 12:30 बजे दिन में बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन (दक्षिणी मंदिरी पटना आर्ट कॉलेज के पीछे) के सभागार में प्रेस को लोकमंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष साधु शरण पांडेय जी संबोधित करेंगे।

अतः श्रीमान से निवेदन है संवाददाता और छायाकार को भजेने की कृपा करें

सम्पर्क व्यक्ति:

                                कुणाल सिकंद

                              राष्ट्रीय प्रधान महासचिव

                             भारतीय लोकमंच पार्टी 

                               मो: 9430620783

Thursday, October 1, 2020

हाथरस कांड पर सामना ने भी बखिये उधेड़ दिए

 सत्ता के साथ साथ मीडिया पर भी किये कई सवाल 

 किस्सागोई… हाथरस में किसका हाथ?  

 अक्टूबर 1, 2020  संदीप सोनवलकर , मुंबई 

जिस अंदाज में यूपी पुलिस ने मंगलवार देर रात हाथरस की बलात्कार पीड़िता का बिना परिवारवालों को साथ लिए ही अंतिम संस्कार कर दिया, उससे इतना तो साफ हो गया है कि हाथरस के इस घृणित कार्य में केवल अपराधी ही नहीं अब सरकार और पुलिस भी शामिल हो गई है। पुलिस तो अब ये तक कहने लगी है कि उस लड़की के साथ रेप हुआ या नहीं? ये अभी जांच का विषय है। उत्तरप्रदेश पर सच में गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं और उतने ही सवाल ये भी कि अगर ये किसी गैर भाजपा शासित राज्य में हुआ होता तो क्या मीडिया उतना ही चुप रहता?

सवाल तो ये भी उठ रहा है कि अगर सरकार कानून व्यवस्था नहीं संभाल पा रही तो राज्यपाल आनंदी बेन पटेल क्यों चुप हैं? वो तो खुद एक महिला हैं, कम से कम रिपोर्ट तो मांग लेतीं। महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी से सीखिए वो तो अभिनेत्रियों तक से मिल लेते हैं। मनपा अफसरों को हड़का देते हैं। असल में मीडिया से लेकर सरकार तक सब इसलिए चुप हैं क्योंकि ये भाजपा शासित योगी सरकार है। अलीगढ़ के आईजी पीयूष मोर्डिया ने तो कह दिया कि अभी बलात्कार की पुष्टि तक नहीं हुई है लेकिन उनके पास इस बात का जवाब तक नहीं है कि पुलिस ने किस हैसियत से सफदरजंग अस्पताल से उस लड़की का शव लिया और बिना परिवारवालों के ही उसका अंतिम संस्कार कर दिया।

पुलिस का कहना है कि हाथरस गैंगरेप पीड़िता ने उपचार के दौरान विवेचक के सामने कई बार अपने बयान बदले थे। इसका विवेचक की रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है। पीड़िता के अलग-अलग तिथियों में लिए गए बयान में अलग-अलग बातें सामने आई हैं। इतना ही नहीं, मेडिकल रिपोर्ट में रेप की पुष्टि नहीं हो पाई है। उपचार के दौरान युवती के तीन बार बयान लिए गए। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, पहली बार में युवती ने रेप से जुड़ा कोई बयान नहीं दिया था। उसके बाद १९ सितंबर को बयान हुए, जिसमें कहा कि मेरे साथ छेड़छाड़ हुई है। बयान के आधार पर पुलिस ने धारा बदलकर आगे की कार्रवाई शुरू कर दी थी। उसके बाद २२ सितंबर को बयान दर्ज हुए, जिसमें पीड़िता ने कहा था कि उसके साथ रेप हुआ है। नए बयान के आधार पर पुलिस ने आगे की कार्रवाई शुरू कर आरोपियों को गिरफ्तार किया था। मेडिकल रिपोर्ट पर गौर करें तो उसमें युवती के साथ रेप की पुष्टि नहीं हुई है। घटना के अनुसार १४ सितंबर की सुबह गांव चंदपा की युवती अपनी मां के साथ खेत पर गई थी। वह खेत में घास काट रही थी। इसी बीच संदीप नाम का एक युवक वहां आ धमका और छेड़छाड़ करने लगा। युवती ने विरोध किया तो हमला बोल दिया। युवती के चिल्लाने पर युवती की मां आरोपी की तरफ दौड़ पड़ी। इतने में आरोपी मौका पाकर फरार हो गया था। घायल युवती को आनन-फानन में अस्पताल ले जाया गया।

युवती के भाई ने करीब १०.३० बजे थाने पहुंचकर बताया कि उसकी बहन का गला दबाकर मारने का प्रयास किया गया। मामले में एफआईआर दर्ज हुई। युवती की गंभीर हालत को देखते हुए उसको एएमयू के जेएन मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया। यहां चिकित्सकों ने देखा कि युवती की कमर की एक हड्डी टूटी है। इतना ही नहीं, दोनों पैर भी सही से काम नहीं कर रहे थे। हिंदी सामना से साभार 


Saturday, September 12, 2020

जानीमानी पत्रिकाओं की बेवक़्त मौत पर भी नहीं रोया यह समाज

सारी उम्र मीडिया की साधना करने वाले अब किस राह पर चलें?
सोशल मीडिया//इंटरनेट: 12 सितंबर 2020: (मीडिया स्क्रीन online)::  
जानीमानी पत्रिकाओं की बेवक़्त मौत हो रही है और मीडिया संस्थानों से पत्रकारों की छंटनी हो रही है। इतना कुछ होने पर भी समाज मूक दर्शक बना हुआ है। इस समाज के पास शराब पीने के लिए बहुत से पैसे हैं लेकिन बौद्धिक सम्पदा को बचाने के लिए कुछ भी नहीं। 
बुरी खबर यह है कि कोरोनावायरस (कोविड-19) के कारण मध्यवर्गीय लोगों के कारोबार ठप्प हो रहे हैं। बहुत से ढाबे, बहुत काम और बहुत से कारोबार बंद हो चुके हैं। इस मार का असर मीडिया पर भी पड़ा है।  ऐसे में जहां पाठकों पर ऑनलाइन पढ़ने का दबाव बना है वहीं एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू में कमी भी आई है।
ऐसे में ब्रिटेन प्रसिद्ध अखबार ‘डेली मिरर’ (Daily Mirror) और ‘डेली एक्सप्रेस’ (Daily Express) की प्रकाशक कंपनी ‘रीच’ (Reach) ने 550 एम्प्लॉयीज की छंटनी करने की योजना बनाई जिसकी खबरें जुलाई में बाहर आ गयीं थीं। इतना बड़ा  ब्रांड अगर ऐसा करता है तो यह यकीकन एक दुखद सत्य है। इसके साथ ही यह सुखद तथ्य भी सामने आया है कि डिजिटल मीडिया में लोगों का उत्साह भी तेज़ी से बढ़ रहा है।
इसी सिलसिले में जानीमानी प्रकाशक कंपनी "रीच" (Reach) के चीफ एग्जिक्यूटिव जिम मुलेन (Jim Mullen) ने एक बयान में कहा कि महामारी के दौरान मीडिया क्षेत्र में संरचनात्मक परिवर्तन में तेजी आई है और इससे हमारे डिजिटल उत्पादों को बढ़ावा मिला है। साथ ही यह भी कहा कि विज्ञापन ज़्यादा न मिलने की वजह से  डिजिटल रेवेन्यू नहीं बढ़ा है। रेवन्यू न बढ़ने के कारण आर्थिक संकट की तलवार लटकने लगी है। तलवार गिरी है अब पत्रकार और गैर-पत्रकार  कामगारों पर। 
मीडिया में आई खबरों के मुताबिक इस गंभीर आर्थिक संकट को बहुत बड़ा कारण बताते हुए प्रकाशक कंपनी ने कहा कि कंपनी लगभग 550 कर्मचारियों की छंटनी करेगा, जोकि इसके कर्मचारियों की संख्या का करीब 12 प्रतिशत है। ऐसा करने से कंपनी को 35 मिलियन पाउंड यानी करीब 43 मिलियन डॉलर की सालाना बचत होगी। अब कम्पनी को तो बचत हो जाएगी लेकिन जिनको नौकरी से बाहर किया जाना है उनका क्या बनेगा। शायद ऐसे सवालों का जवाब पूंजीवादी सोच के लोगों के पास होता ही नहीं।
केवल नफा नुकसान की बात सोचने वाले लोग संवेदना से दूर होते चले जाते हैं। ऐसे में अगर कोई पत्रकार आर्थिक तंगी  चल  या वह ख़ुदकुशी कर लेता  है तो पूरी खबर सामने नहीं आती। बस छोटी सी खबर कि एक पत्रकार की मौत हो गई। पूरे का पूरा परिवार उजड़ने वाली इस दुखद घटना को भी कोरोना की वजह से हुई मौत बता दिया जाता है। 
ऐसी नाज़ूक हालत में  "रीच" (Reach) के चीफ एग्जिक्यूटिव जिम मुलेन (Jim Mullen) का ब्यान बहुत ही महत्वपूर्ण भी बन जाता है। इस नुक्सान भरी स्थिति के तकनीकी फायदे गिनवाते हुए उन्होंने कहा कि इस कदम से हमारा एडिटोरियल प्रिंट व डिजिटल की नेशनल व रीजनल टीमों को एक साथ लेकर अधिक केंद्रीयकृत रूप में आगे बढ़ेगा। हमारे न्यूज ब्रैंड्स की मज़बूत एडिटोरियल पहचान को बरकरार रखते हुए इसकी दक्षता में महत्वपूर्ण वृद्धि होगी और डुप्लीकेशन खत्म होगा। ब्रिटेन में कई रीजनल न्यूजपेपर का प्रकाशन करने वाली इस कंपनी ने कहा कि पुनर्गठन से ग्रुप को करीब 20 मिलियन पाउंड का खर्च आएगा। शायद इसे ही कहा जाता है आपदा की अवसर में बदलना। 
कंपनी ने कहा कि उसके पास अब कम स्पेस होगा और मैनेजमेंट स्ट्रक्चर भी बहुत ही सिम्पल होगा। कंपनी ने इस बात की भी जानकारी दी है कि सर्कुलेशन और ऐडवर्टाइजिंग की कमी के चलते कंपनी का राजस्व 27.5 प्रतिशत घट गया है। निश्चय ही यह बहुत बड़ी गिरावट है।
लेकिन सत्य यह भी कि यह है इस नाज़ुक दौर में इतनी बढ़ी कम्पनी की कारोबारी रणनीति। साथ ही उन्होंने बहुत ही ईमानदारी से अपने फायदे भी गिनवाए हैं। राजस्व में आई कमी और पुनर्गठन पर आने वाले खर्चे की बात भी स्पष्ट हुई है लेकिन बेरोज़गार होने वालों पर क्या असर होगा इसका कोई ज़िक्र तक नहीं है। शायद पूंजवादी सिस्टम में उनका कोई अर्थ नहीं है। यही सोच अधिकतर लोगों को साम्यवाद की तरफ ले जाती है।
अब देखना है कि पूरा समाज इसके लिया क्या करता है? अफ़सोस है कि न जाने कितनी कितनी शराब पी जाने वाले समाज ने मीडिया के कम हो रहे राजस्व को पूरा करने की कोई औपचारिक पेशकश तक भी नहीं की। इस पूरे समाज ने बेरोज़गार हुए पत्रकार और गैरपत्रकार मीडिया कर्मियों के घरों की चिंता भी नहीं की।  ज़ाहिर है कि अपने आप को पढ़ा लिखा और सांस्कृतिक समाज कहलाने वाला यह पूरा सिस्टम मीडिया, लेखन, कविता, कला या बौद्धिक सम्पदा से भरे लोगों के रहने लायक है ही नहीं। यह समाज अभी भी बेहद पिछड़ा हुआ और स्वार्थी है। शायद यहाँ वह सुबह कभी नहीं आएगी जिसके सपने हमें साहिर लुधियानवी साहिब ने दिखाए।
अफ़सोस कि इस समाज को नंदन और कादम्बिनी जैसी पत्रिकाएं बंद होने पर कोई मलाल नहीं हुआ। यह समाज की जीवन धारा से कम तो न थीं। गौरतलब है कि एचटी मीडिया द्वारा जहां एक ओर संस्करणों से पत्रकारों की विदाई की जा रही है, वहीं कंपनी ने प्रसिद्ध और लोकप्रिय नंदन और कादम्बिनी पत्रिका का प्रकाशन भी पूरी तरह से बंद करने का फैसला सुना दिया है। उल्लेखनीय है कि साहित्यिक पत्रिका कादम्बिनी 1960 से प्रकाशित हो रही थी वहीं बाल पत्रिका नंदन 1964 से।  दोनों पत्रिकाएं बहुत बड़े पैमाने पर पढ़ीं जाती थीं। इनकी लोकप्रियता का ग्राफ बहुत ऊंचा था। अंग्रेजी की रीडर डाइजेस्ट की तरह हिंदी पत्रिका को भी हाथ में लेकर चलने से साख बढ़ती है इस बात को फैशन बनाने में इन पत्रिकाओं का भी बहुत बड़ा योगदान रहा। अफ़सोस कि हमारा खोखला समाज इनकी बेवक़्त मौत पर मूकदर्शक ही बना रहा। बोले भी तो बस वही थोड़े से लोग जो किसी न किसी तरह इन पत्रिकाओं से जज़्बाती तौर पर जुड़े हुए थे। समाज की यह चुप्पी इस समाज में बढ़ती जा रही गिरावट का इशारा भी है। न जाने अभी और क्या क्या देखना बाकी है। --मीडिया लिंक रविंद्र 

Saturday, June 13, 2020

वीडियो ब्लॉगिंग प्रतियोगिता ‘मेरा जीवन, मेरा योग’

13th June 2020 10:14AM  PIB Delhi
 प्रविष्टियां जमा करने की अंतिम तिथि 21 जून, 2020 तक बढ़ाई  
नई दिल्ली: 13 जून 2020: (पीआईबी)::
प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी द्वारा हाल ही में घोषित वीडियो ब्लॉगिंग प्रतियोगिता ‘मेरा जीवन, मेरा योग’ के लिए प्रविष्टियां जमा करने की अंतिम तिथि 21 जून, 2020 तक बढ़ा दी गई है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर यह वैश्विक प्रतियोगिता आयुष मंत्रालय और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) द्वारा छठे अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर संयुक्त रूप से आयोजित की जा रही है।

इससे पहले इस प्रतियोगिता के लिए प्रविष्टियां जमा करने की अंतिम तिथि 15 जून 2020 तय की गई थी। यह तिथि बढ़ाने के लिए देश-विदेश से मांग की जा रही थी, ताकि योग बिरादरी को वीडियो तैयार करने के लिए अधिक समय मिल सके। भारी मांग को ध्‍यान में रखते हुए ही मंत्रालय और आईसीसीआर ने प्रविष्टियां जमा करने की अंतिम तिथि को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस यानी 21 जून तक बढ़ाने का निर्णय लिया है।

प्रधानमंत्री ने 31 मई को अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम के दौरान राष्ट्र को संबोधित करते हुए सभी से वीडियो ब्लॉगिंग प्रतियोगिता ‘मेरा जीवन, मेरा योग’ में भाग लेने का आह्वान किया था। यह प्रतियोगिता लोगों के जीवन पर योग के उल्‍लेखनीय परिवर्तनकारी प्रभावों पर फोकस करती है और यह छठा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाए जाने से जुड़ी विभिन्‍न उत्‍कृष्‍ट गतिविधियों में से एक अहम गतिविधि के रूप में उभर कर सामने आई है।

इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए प्रतिभागियों को 3 योगाभ्यासों (क्रिया, आसन, प्राणायाम, बंध या मुद्रा) का 3 मिनट की अवधि वाला वीडियो अपलोड करना होगा, जिसमें इस आशय का एक लघु वीडियो संदेश भी शामिल करना होगा कि योगाभ्यासों से किस तरह उनके जीवन में उल्‍लेखनीय सकारात्‍मक परिवर्तन हुए हैं। वीडियो को प्रतियोगिता के हैशटैग #MyLifeMyYogaINDIA और उपयुक्त श्रेणी के हैशटैग के साथ फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम या माईगव प्लेटफॉर्म पर अपलोड किया जा सकता है। इसमें भागीदारी के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश आयुष मंत्रालय के योग पोर्टल (https://yoga.ayush.gov.in/yoga/) पर उपलब्‍ध हैं।

यह प्रतियोगिता दो चरणों में होगी। प्रथम चरण में देश-वार वीडियो ब्लॉगिंग प्रतियोगिताएं शामिल हैं, जिनके विजेताओं का चयन देश के स्तर पर किया जाएगा। इसके बाद वैश्विक पुरस्कार विजेताओं का चयन किया जाएगा जिन्हें विभिन्न देशों के विजेताओं में से चुना जाएगा। यह प्रतियोगिता लोगों के जीवन पर योग के उल्‍लेखनीय परिवर्तनकारी प्रभावों का पता लगाने का एक अहम प्रयास है, जिसके बारे में प्रत्येक प्रतिभागी स्‍वयं के द्वारा प्रस्‍तुत किए जाने वाले वीडियो में बताएंगे।

इस प्रतियोगिता के लिए प्रतिभागियों द्वारा प्रविष्टियों को तीन श्रेणियों के तहत प्रस्तुत किया जा सकता है जिनमें युवा (18 वर्ष से कम आयु), वयस्क (18 वर्ष से अधिक उम्र) और योग प्रोफेशनल शामिल हैं और इसके साथ ही ये श्रेणियां पुरुष एवं महिला प्रतिभागियों के लिए अलग-अलग होंगी। भारत के प्रतिभागियों के मामले में प्रथम, द्वितीय और तृतीय पुरस्कार पाने वालों को प्रथम चरण में प्रत्येक श्रेणी के लिए 1 लाख रुपये, 50,000 रुपये और 25,000 रुपये का पुरस्कार दिया जाएगा, जबकि वैश्विक पुरस्कार प्रथम, द्वितीय और तृतीय पुरस्कार पाने वालों के लिए 2500 डॉलर, 1500 डॉलर और 1000 डॉलर के होंगे।  

आयुष मंत्रालय ने सभी को बढ़ी हुई अवधि का उपयोग करने और बिना अधिक विलंब किए वीडियो प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित किया है। (PIB)
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Thursday, June 11, 2020

अमेरिका में विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पत्रकारों पर बल प्रयोग की निन्दा


 मीडियाकर्मियों को अपना काम करने की पूरी आज़ादी हो 
10 जून 2020:मानवाधिकार
संयुक्त राष्ट्र और अमेरिकी राष्ट्रों के संगठन (OAS) द्वारा नियुक्त स्वतन्त्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने नस्लभेद विरोधी आन्दोलनों की कवरेज कर रहे पत्रकारों के ख़िलाफ़ बल प्रयोग की निन्दा की है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा है कि लोकतान्त्रिक समाज में प्रैस की अहम भूमिका है और विरोध प्रदर्शनों के दौरान मीडिया को आज़ादी से काम करने की व्यवस्था का सुनिश्चित किया जाना चाहिए।  
पहरेदार की भूमिका
यूएन और अन्तर-अमेरिकी आयोग के विशेषज्ञों ने कहा कि लोकतान्त्रिक समाजों में प्रैस की एक बेहद आवश्यक पहरेदार (वॉचडॉग) के रूप में अहम भूमिका है। 

उनके मुताबिक अमेरिका में संघीय, प्रान्तीय और स्थानीय प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि मीडियाकर्मियों को अपना काम करने की पूरी आज़ादी हो और उन्हें पूर्ण सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए।  

क़ानून एजेंसियों का यह दायित्व है कि पत्रकारों के ख़िलाफ़ ताक़त के इस्तेमाल या फिर ऐसी धमकियाँ दिए जाने से परहेज़ किया जाए और किसी अन्य पक्ष द्वारा की जा रही हिन्सा के दौरान पत्रकारों की रक्षा की जाए। 

“पत्रकारीय ज़िम्मेदारी को निभाने में जुटे मीडियकर्मियों को निशाना बनाए जाने पर अन्तरराष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानूनों के अन्तर्गत पाबन्दी है और यह पुलिस के लिए निर्धारित सर्वश्रेष्ठ मानकों के भी विपरीत है।”

बयान में आगाह किया गया है कि अगर इन नियमों की अवहेलना होती है तो फिर जवाबदेही तय करने के लिए अनुशासनात्मक प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। 

विशेषज्ञों ने अफ़सोस ज़ाहिर किया कि अमेरिकी राष्ट्रपति पिछले कई सालों से अपने बयानों में मीडिया को जनता का दुश्मन बताकर हमला करते रहे हैं जिससे टकराव और असहिष्णुता को बढ़ावा मिलता है। 

साथ ही अमेरिका में पुलिस का सैन्यीकरण हो रहा है जिससे ना सिर्फ़ जनता के शान्तिपूर्ण ढँग से एकत्र होने का अधिकार प्रभावित होता है बल्कि विरोध-प्रदर्शनों की कवरेज करने की मीडिया की आज़ादी पर भी असर होता है।  

इसी को ध्यान में रखकर विशेषज्ञों ने असैन्यीकरण को प्रोत्साहन देने और प्रदर्शनों से निपटने के लिए अन्तरराष्ट्रीय मानकों का पालन करने की बात कही है। 

स्पेशल रैपोर्टेयर और वर्किंग ग्रुप संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की विशेष प्रक्रिया का हिस्सा हैं. ये विशेष प्रक्रिया संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार व्यवस्था में सबसे बड़ी स्वतंत्र संस्था है। ये दरअसल परिषद की स्वतंत्र जाँच निगरानी प्रणाली है जो किसी ख़ास देश में किसी विशेष स्थिति या दुनिया भर में कुछ प्रमुख मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करती है। 

स्पेशल रैपोर्टेयर स्वैच्छिक रूप से काम करते हैं; वो संयक्त राष्ट्र के कर्मचारी नहीं होते हैं और उन्हें उनके काम के लिए कोई वेतन नहीं मिलता है. ये रैपोर्टेयर किसी सरकार या संगठन से स्वतंत्र होते हैं और वो अपनी निजी हैसियत में काम करते हैं। 

अभिव्यक्ति की आज़ादी पर संयुक्त राष्ट्र के स्वतन्त्र मानवाधिकार विशेषज्ञ (विशेष रैपोर्टेयर) डेविड काए और मानवाधिकारों पर अन्तर-अमेरिकी आयोग के विशेषज्ञ एडीसन लान्ज़ा ने बुधवार को एक साझा बयान जारी करके पत्रकारों पर हमले, उनके उत्पीड़न, उन्हें हिरासत में रखने और गिरफ़्तार किए जाने पर चिन्ता जताई है। 

ग़ौरतलब है कि अमेरिका के मिनियापॉलिस शहर में एक काले अफ़्रीकी व्यक्ति जियॉर्ज फ़्लॉयड की गर्दन पर एक श्वेत पुलिस अधिकारी ने कई मिनटों तक घुटना टिकाए रखा था और समझा जाता है कि दम घुटने और हालत बिगड़ने पर बाद में पुलिस हिरासत में ही उनकी मौत हो गई। 

उनकी मौत के बाद बड़े पैमाने पर अमेरिका के कई शहरों और अन्य देशों में नस्लीय न्याय की माँग करते हुए प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे हैं। 

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने हाल ही में जानकारी देते बताया कि कम से कम 200 ऐसी घटनाएँ दर्ज की गई हैं जिनमें प्रदर्शनकारियों को कवर करने वाले पत्रकारों पर शारीरिक रूप से हमला किया गया, उन्हें डराया धमकाया गया या मनमाने तरीक़े से गिरफ़्तार किया गया, जबकि वो पत्रकार अपने प्रैस कार्ड पहने हुए थे। 

ताज़ा बयान में कहा गया है कि पत्रकारों के साथ ऐसा बर्ताव तब हुआ जब वे अमेरिका में ढाँचागत नस्लवाद और पुलिस क्रूरता के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों को कवर करने की अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहे थे। 

उन्होंने ध्यान दिलाया है कि विरोध-प्रदर्शनों की कवरेज कर रहे पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना क़ानून-व्यवस्था से जुड़ी एजेंसियों का कर्तव्य है। 

साथ ही यह ज़रूरी है कि जनता तक ऐसे प्रदर्शनों से सम्बन्धित जानकारी पहुँच सके, यह उनका अधिकार है। 

इंडिया क्वार्टरली पत्रिका अब हिंदी में भी

 वैश्विक मामलों पर 1945 से हो रहा है लगातार प्रकाशन  
10 जून, 2020  
इंडिया क्वार्टरली, विश्व मामलों की भारतीय परिषद का वैश्विक मामलों पर 1945 से प्रमुख प्रकाशन है जिनका भारत के हितों पर प्रभाव पड़ता है। यह एक विचारक और विद्वत् समीक्षक पत्रिका है। इस पत्रिका का उद्देश्य भारत और विदेशों के विद्वानों, विश्लेषकों, नीति निर्माताओं को अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और राष्ट्रीय विदेश नीतियों से संबंधित विषयों पर मौलिक लेख लिखने के लिए प्रोत्साहित करना है। इसका उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय अभिज्ञान के महत्व के किसी भी विषय पर महत्वपूर्ण और वस्तुनिष्ठ विश्लेषण को बढ़ावा देना है।
इंडिया क्वार्टरली, अब पहली बार, हमारे पाठकों के लिए हिंदी में उपलब्ध करवाई गई है। इसका पहला अंक - खंड 11, अंक 11, जनवरी 2020 का www.icwa.in अथवा www.sagebhasha.com पर ऑनलाइन अवलोकन किया जा सकता है। इंडिया क्वार्टरली का हिंदी संस्करण आईसीडब्ल्यूए द्वारा मेसर्स सेज प्रकाशन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के सहयोग से प्रकाशित किया जाएगा।
आईसीडब्ल्यूए, इस महत्वपूर्ण पहल के माध्यम से, भारत में अंतर्राष्ट्रीय मामलों और विदेश नीति से जुड़े मामलों पर हिंदी में संसूचित और सुदृढ़ संवाद करने में योगदान देना चाहता है।

Sunday, May 31, 2020

वेब मीडिया में रोजगार की असीम संभावनाएं:जयदीप कर्णिक

माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय की तरफ से विशेष आयोजन
भोपाल: 31 मई 2020: (कार्तिका सिंह//मीडिया स्क्रीन ऑनलाइन)::
डिजिटल मीडिया या वेब मीडिया को लेकर बहुत सी भ्रांतियां पाई जा रही हैं। बहुत से लोग इसे मुख्या धारा का मीडिया ही नहीं समझते। बहुत से लोग यह कहते भी सुने जाते हैं कि वेब मीडिया को सरकार बंद करवाने वाली है। इस तरह के आधारहीन प्रचार पर विराम लगाते हुए एक विशेष सेमिनार में कहा गया है कि इस क्षेत्र में असीम सम्भवनाएं हैं। इस सेमिनार का आयोजन माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की तरफ से कराया गया। सेमिनार  में  कहा गया कि वेब मीडिया के क्षेत्र में रोजगार की असीम संभावनाएं हैं। इस क्षेत्र में युवा पत्रकार एक उद्यमी के रूप में अपना करियर बना सकते हैं। कोरोना संकट ने वेब मीडिया के महत्व को और अधिक प्रतिपादित कर दिया है। पत्रकारिता में अब ‘वर्क फ्रॉम होम’ की संस्कृति विकसित हो रही है। ये विचार देश के जाने-माने पत्रकार श्री जयदीप कर्णिक ने व्यक्त किया। 
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के आयोजन ‘हिन्दी पत्रकारिता सप्ताह’ के अंतर्गत उन्होंने ‘वेब मीडिया में उद्यमिता’ विषय पर अपना संबोधन दिया। इस मौके पर उन्होंने अनेक प्रश्नों के उत्तर भी दिए। वेब मीडिया में अपना करियर बनाने वाले युवाओं की जिज्ञासा का समाधान किया।
श्री कर्णिक ने कहा कि हमारे देश में परम्परागत मीडिया एवं टेलीविजन मीडिया एक महंगा उद्योग है जो विज्ञापन आधारित है। विज्ञापन कम मिलने पर परम्परागत मीडिया के सामने तमाम तरह की परेशानियां आने लगती हैं। पत्रकारों पर भी संकट रहता है। जबकि डिजिटल मीडिया में कोई भी व्यक्ति वेबसाइट बनाकर लैपटॉप या फिर मोबाइल से ही काम शुरू कर सकता है। इसमें लागत बहुत कम है। सबसे अच्छी बात यह है कि वह स्वयं ही रिपोर्टर, मालिक एवं सम्पादक होता है। कम पूँजी में वेव मीडिया में उद्यमी बन सकते हैं।
उन्होंने कहा कि आप सफल तभी होंगे जब आपकी वेबसाइट पर सामग्री गुणवत्तापूर्ण और विश्वसनीय होगी। वेबमीडिया के स्टार्टअप को चाहिए कि वे पर्यावरण, विज्ञान, आर्थिक, जनजातीय, गाँव जैसे विषयों पर काम करें। हिंदी भाषा में इन विषयों पर काम करने की खूब संभावनाएं हैं।
उन्होंने कहा कि उद्यमी बनने के लिए जोश, ऊर्जा और विषय का ज्ञान आवश्यक है। जब आप पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरेंगे तो सफलता निश्चित ही मिलेगी।


Sunday, March 8, 2020

देखते ही देखते सब के सामने खबर उड़ा ले जाती है बिंदु उप्पल

महिला पत्रकारों में निरतंर सक्रिय रहने वाली खोजी पत्रकार
लुधियाना: 8 मार्च 2020: (रेक्टर कथूरिया//मीडिया स्क्रीन Online)::
लोकप्रिय समाचारपत्र दैनिक जागरण से सबंधित जानीमानी सक्रिय पत्रकार बिंदु उप्पल से कब और कहां मुलाकात हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। हर पल पत्रकारिता की डियूटी निभाने वाली बिंदु कहीं भी मिल सकती है। किसी प्रेस कांफ्रेंस में भी,.. किसी संगीत आयोजन में भी, किसी खेल टूर्नामेंट में भी, दशहरे-दीपावली के मेले में भी और किसी यूनिवर्सिटी के विशेष आयोजन में भी। हर चीज़ को गहराई से देखती हुई और हर बात को बहुत ही ध्यान से देखती हुई। आपके देखते ही देखते कब काम की खबर उड़ा लेती है इसका पता अगले दिन की अख़बार पढ़ कर ही चलता है और साथ वाले पत्रकार सोचते ही रह जाते हैं हमारी नज़र से यह खबर क्यूं छुपी रह गयी? 
मुलाकात होगी तो बिंदु बहुत सी बातें भी करेगी। रिफ्रेशमेंट कहीं मिस न हो जाये इसका भी ख्याल रखेगी लेकिन आपको खबर की भनक नहीं लगने देगी। हाल ही में जब सी टी यूनिवर्सिटी के खेती मेले में भेंट हुई तो उस मुलाकात के दौरान भी मैंने यही पूछा सब के सामने कैसे काम की खबर अपने हाथ में छुपा लेती हो? कौन सा जादू है? मुस्करा कर बोली-बस अपनी अपनी नज़र और अपने अपने नज़रिये की बात है। 
खबरों के साथ इतनी अटैचमेंट होने के बावजूद कभी मानवता को नज़रअंदाज़ नहीं किया। मानवीय पहलू को हर वक़्त याद रखने वाली बिंदु मानवीय रिश्तों को बहुत महत्व देती है। शायद यही कारण है कि लुधियाना और जगराओं के बहुत से परिवार उसे अपना पारिवारिक सदस्य ही मानते हैं। दुःख की घड़ी हो या सुख का मौका ये 
िवार बिंदु को नहीं भूलते। 
उस दिन खेती मेले में बिंदु की बेटी भी साथ थी। मैंने थोड़ा गंभीर और थोड़ा मज़ाक में कहा क्या इसे अभी से पत्रकारिता सिखाना शुरू कर दिया? इसे अख़बार का पत्रकार बनाओगी या किसी चैनल का? जवाब में बोली की भी नहीं। इसे आईपीएस बनाना है। उस दिन उसने बताया कि में पुलिस फ़ोर्स के लिए उसके मन में कितना सम्मान है कितनी आस्था है। शायद और बातें भी होतीं लेकिन उस दिन इस खेती मेले में कोई नई इवेंट शुरू हो गयी थी और हम सब उसकी कवरेज में व्यस्त हो गए। कोशिश होगी कभी जल्द ही बिंदु उप्पल पर कुछ विस्तार से सके। --रेक्टर कथूरिया (मीडिया स्क्रीन Online)

Sunday, June 23, 2019

दिल्ली में खोजी महिला पत्रकार मिताली चंदोला पर हमला

लगातार असुरक्षित होती जा रही है दिल्ली 
नई दिल्ली: 23 जून 2019: (मीडिया स्क्रीन ब्यूरो):: 
जिस दिल्ली के बारे में कभी गीत लिखे गए थे कि दिल्ली है दिल हिंदुस्तान का..वह दिल्ली लगातार असुरक्षित होती जा रही है। न महिलाएं सुरक्षित हैं नहीं दुसरे लोग। यहाँ तक की पत्रकार भी असुरक्षित हो गए हैं। कोई भी किसी पर हमला करके साफ़ बच।  अब नई घटना हुई है दिल्ली के जानेमाने इलाके वसुंधरा एन्क्लेव में। हमला रात 12:30 हुआ जब वह नोयडा की तरफ जा रही थी। यह सारी घटना देश की राजधानी दिल्ली के वसुंधरा एन्क्लेव इलाके में शनिवार देर रात को हुई। नकाबपोश बदमाशों ने एक खोजी महिला पत्रकार मिताली चंदोला को गोली मार दी। आरम्भिक सूचनाओं के मुताबिक उस पर कम से कम तीन गोलियां चलायीं गयी। पूर्व क्राइम रिपोर्टर मिताली चंदोला शनिवार देर रात करीब 12.30 बजे पूर्वी दिल्ली के धर्मशीला कैंसर अस्पताल रोड़ पर अपनी कार ड्राइव करते हुए आ रही थी कि तभी रेड लाइट के पास बाइक सवार दो नकाबपोश बदमाशों ने उसकी कार पर फेंकें। वह नहीं रुकी तो उस पर सामने से  गोलियां चलायीं गयीं। उस पर कम से कम तीन फायर हुए। बदमाशों ने महिला को तीन गोलियां मारी, जिनमें से एक गोली महिला को लगीं और दो कार के फ्रंट विंडशील्ड में जा लगी। गोली महिला के दाहिने हाथ में लगी। घटना की सूचना मिलने पर पुलिस द्वारा महिला को नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। जहां फिलहाल उनकी हालत खतरे से बाहर बताई जा रही है। गाड़ी के फ्रंट शीशे पर दो गोलिया मारी गई हैं, ड्राइवर व साइड शीशे पर अंडों से भी हमला किया गया है। शुरुआती जांच में यह मामला व्यक्तिगत दुश्मनी का लग रहा है। इस हमले के पीछे पारिवारिक विवाद है या कोई अन्य मकसद यह जांच के बाद ही साफ़ हो पाएगा।

Thursday, June 20, 2019

प्रेस निमंत्रण: जत्थेदार कुलदीप सिंह भोगल की मीडिया से भेंट 21 को

बहुप्रतीक्षित बाला साहिब हस्पताल के निर्माण पर होगी चर्चा 
नई दिल्ली: 19 जून 2019: (मीडिया स्क्रीन ब्यूरो):: 
वरिष्ठ अकाली नेता तथा सामाजिक कार्यकर्ता जत्थेदार कुलदीप सिंह भोगल, सिख कौम के बहुप्रतीक्षित बाला साहिब हस्पताल के निर्माण,विस्तार, आर्थिक स्रोत व  संचालन की राह में खड़े गतिरोध तथा उसके हल को लेकर जरूरी रोडमैप की मीडिया को जानकारी देंगे। 
समय: 2.30 बजे दोपहर, 21 जून 2019
स्थान: रशियन कल्चर सैंटर, फिरोजशाह रोड।

Sunday, December 9, 2018

विश्व मानवाधिकार दिवस के मौके पर कवरेज निमन्त्रण

9 दिसम्बर 2018 सांय 7:31 par पोस्ट किया  (WM)
करीब 1000 अति विशिष्ट लोग शामिल होंगे
सेवा में
संपादक महोदय/मुख्य संवाददाता/ डेस्क/ बियूरो चीफ
विषय अंतरराष्ट्रीय ह्यूमन राइट दिवस पर 1987 से आयोजित किया जाने वाला कार्यक्रम कवरेज करवाने हेतु
महोदय
आपको बताते हुए हमें ख़ुशी महसूस हो रही है कि विश्व मानवाधिकार दिवस के मौके पर देश को सभी के लिए समान न्याय और अधिकार प्राप्त हों जिसके लिए व्यवस्था परिवर्तन के लिए एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम  का आयोजन दस दिसम्बर को प्रातः 10 बजे से किया जा रहा है, जिसमे अलग अलग देशों, प्रदेशों, संस्थाओं से करीब 1000 अति विशिष्ट लोग शामिल होंगे।

अतः कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए कार्यक्रम कवरेज हेतु कृपया अपने सम्मानित मीडिया बैनर से रिपोर्टर एवं फोटोग्राफर को भेजने का कष्ट करें एवं स्वयं भी इस कार्यक्रम में हिस्सा लें।

कार्यक्रम दिनांक-10 दिसम्बर
कार्यक्रम समय-प्रातः 11 बजे से
मीडिया हेतु समय-प्रातः 11 से 3 बजे
कार्यक्रम स्थल संसद मार्ग दिल्ली

कार्यक्रम प्रातः 10 बजे से 3 बजे तक चलेगा।
उसके बाद सभी के लिए भोजन की व्यवस्था की गई है। शुरू हो किन्तु मीडिया को असुविधा न हो इसलिए कृपया 11 बजे पधारें ताकि किसी प्रकार की देरी न हो*

संपर्क
डॉ एम यू दुआ
नेशनल प्रेजिडेंट
आल इन्डिया ह्यूमन राइट्स एसोसिएशन

मीडिया प्रभारी
9213247209