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Wednesday, June 26, 2024

‘‘यदि आप गरीब हो तो मौत आपको जल्दी आलिंगन करती है’’

 26th June 2024 at 12:01 PM

जानेमाने लेखक और पत्रकार एल.एस. हरदेनिया बता रहे हैं विस्तार से 

"यदि आप गरीब हो तो मौत आपको जल्दी आलिंगन करती है’’ यह शीर्षक है इण्डियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट का। इस रिपोर्ट में यह बताया गया है कि देश की राजधानी दिल्ली में रोगियों की क्या स्थिति है। खासकर उन रोगियों की जो कैंसर से पीड़ित हैं। इस लंबी रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे दिल्ली में देश के सबसे बड़े अस्पताल एम्स में देश के विभिन्न भागों से खासकर बिहार, उत्तरप्रदेश और झारखंड से लोग आते हैं। इण्डियन एक्सप्रेस के संवाददाता ने इस तरह के अनेक रोगियों और उनके साथ आए उनके रिश्तेदारों से बातचीत की।

संकेतक तस्वीर प्लेग्राउंड की इमेज कला से साभार 
वे दिल्ली में कैंसर के रोगी होने के बाद भी कैसे फुटपाथ पर अपने इलाज का इंतज़ार करते रहते हैं। इस तरह के रोगी बताते हैं कि जब गर्मी की दोपहरी में वे इन फुटपाथों पर बैठे रहते हैं तो ऐसा लगता है कि वे गरम पानी के ऊपर बैठे हुए हैं। फुटपाथ इतने गरम होते हैं कि उसकी गर्मी सहना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसी तरह ठंड की रात और भारी बरसात के बीच में इन लोगों को अपनी जिंदगी बितानी पड़ती है। वे सब इतने गरीब होते हैं कि उनके लिए दिल्ली में कोई जगह किराये पर लेकर रह सकना मुश्किल होता है।

संकेतक तस्वीर प्लेग्राउंड की इमेज कला से 

संवाददाता लिखते हैं कि यह दृश्य सिर्फ अकेली दिल्ली का नहीं है देश के अनेक बड़े शहरों में भी इसी तरह की स्थिति है। संवाददाता चंद्रभान नाम के व्यक्ति से मिलते हैं। वे उत्तरप्रदेश से आए हुए हैं। उनके साथ 35 वर्ष के वीरपाल सिंह भी हैं, वे भी वहीं से आए हुए हैं। उनके साथ तीन बड़े झोले हैं जिनमें कपड़े रखे हुए हैं और कुछ सामान भी है। उनके पास कार्डबोर्ड की बनी कुछ चटाईयाँ भी हैं। वे बताते हैं कि यह मेरी पत्नि है प्रेमवती, ये मेरे दोस्त की पत्नि है अशोका देवी। वो चुपचाप बैठी हुई हैं। भारी गर्मी से थकी हुई उनके मुंह से आवाज़ भी नहीं निकल रही है, ये दोनों कैंसर से पीड़ित हैं। इलाज के लिए दिल्ली आती हैं। एक बार आने के बाद फिर 6 महीने के अंतराल के बाद आने को कहा जाता है। रेगुलर इलाज की कोई व्यवस्था नहीं है। इस दरम्यान कैंसर शरीर के बाकी हिस्सों में फैल जाता है। एम्स के बड़े अधिकारी डॉ. मदन कहते हैं कि उनके अस्पताल में कम से कम 20 हजार रोगी रोज़ आते हैं। इनमें बहुसंख्यक कैंसर पीड़ित होते हैं। अस्पताल में सिर्फ लगभग 3500 बिस्तर हैं। कभी-कभी तो एक रोगी को 3 साल के बाद आने का समय दिया जाता है।

एक और रोगी कहते हैं कि
भारत में गरीब होना सबसे बुरी सज़ा है। गरीब को तो कोई रोग लगना ही नहीं चाहिए। क्योंकि एक बार वह किसी रोग और खासकर कैंसर से पीड़ित हो जाता है तो उसकी एक ही प्रार्थना रहती है कि है ईश्वर मुझे उठाले। एक और कैंसर के रोगी बताते हैं कि हम 7 दिन में एक बार नहा पाते हैं और उसके लिए और अपने कपड़े धोने के लिए हमें कीमत चुकानी पड़ती है। कभी-कभी यह कीमत 50 रूपए होती है। जिस दिन हम नहाते हैं और नहाने के लिए 50 रूपए दे देते हैं उस दिन हम भोजन नहीं करते क्योंकि खाने के लिए हमारे पास पैसे नहीं बचते। पीने का पानी भी हम लोगों को टैंकर से दिया जाता है, जो कि पूरा अशुद्ध होता है। ऐसा पानी कम से कम कैंसर के रोगी को नहीं देना चाहिए। फिर ये टैंकर भी कभी-कभी नहीं आता है तो हम बड़ी मुश्किल से आसपास के घरों से पानी उपलब्ध कर पाते हैं। हमारी एक और मुश्किल है कि हम किसी काम से थोड़े समय के लिए फुटपाथ की वह जगह छोड़ कर जाते हैं जहां हम रहते हैं तो लौटकर पाते हैं कि उस हिस्से पर किसी और ने कब्जा कर लिया है। ऐसी हालत में हमें रात बैठे-बैठे गुजारनी पड़ती है। आप कल्पना कर सकते हैं कि कैसे कैंसर का पेशेंट पूरी रात बैठे-बैठे गुजारता है। हम पर कभी चोर लुटेरे भी हमला करते हैं। एक महिला बताती है कि एक चोर मेरे पति का मोबाइल चुरा कर ले गया। जब हमने पुलिस वालों से इसकी शिकायत की तो पुलिस का कहना था कि तुम फुटपाथ पर सोते ही क्यों हो।

एल एस हरदेनिया 
अंजना देवी इस रिपोर्टर को बताती हैं कि मैं 2 महीनों से इंतजार कर रही हूँ कि अस्पताल में मेरा नंबर लगेगा। रोज जाती हूँ पर खाली हाथ वापिस आती हूँ। अंततः मेरा ऑपरेशन हो पाया है। मैं थायराईड कैंसर से पीड़ित हूँ। परंतु दवाईयों के अभाव में रोग से निवारण भी नहीं पा रहे हैं। हमें बताया गया कि एम्स अस्पताल के पास 3 धर्मशालाएँ हैं परंतु वे हमेशा भरी रहती हैं। तीनों धर्मशालाओं के साथ कुछ गेस्टहाउस भी हैं। इनका किराया 20 रूपए से लेकर 300 रूपए तक है। जब हमारे लिए खाना भी दूभर है और दवाईयां तो दूभर हैं ही। रिपोर्टर की मुलाकात एक माँ से होती है जिसका 12 साल का बच्चा है। उसे इतनी जोर से बुखार आता है कि उसके पूरे शरीर में बार-बार गीला कपड़े लगाना पड़ता है। कपड़े को भिगोने के लिए पानी की उपलब्धता भी बड़ी मुश्किल से हो पाती है। रिपोर्टर की मुलाकात रामविलास राम नामक व्यक्ति से होती है। वे बताते हैं कि उनके बच्चे को ट्यूमर निकल गया है। हमने पहले उसका पटना में इलाज करवाया। वहां उसका ऑपरेशन भी हो गया परंतु दो महीनों के बाद वह फिर उसी रोग से पीड़ित हो गया है। फिर हम उसे लेकर दिल्ली आए हैं। 

इन रोगियों में कई ऐसे भी हैं जो रात में दिल्ली के मेट्रो की सीढ़ियों पर रात गुजारते हैं क्योंकि रात में ये सीढ़ियाँ ठंडी रहती हैं और रात में मेट्रो भी नहीं चलती हैं। हमें अपने राज्यों में, शहरों में, गाँवों में इलाज उपलब्ध नहीं रहता है इसलिए हमें दिल्ली आना पड़ता है और अपने मरीजों के साथ हम लगभग भिखारी से भी बदतर जीवन बिताते हैं।

----एल.एस. हरदेनिया मो. 9425301582

Thursday, January 19, 2023

नहीं रहे मित्र कुलदीप सिंह कोकी लेकिन छोड़ गए कई सवाल

Monday:16th January 2023 at 03:47 PM Via Mobile call 

पत्रकारों की आर्थिकता मज़बूत बनाने लिए समाज भी आगे आए   


लुधियाना: 18 जनवरी 2023: (रेक्टर कथूरिया//मीडिया स्क्रीन ऑनलाइन)::

आज बाद दोपहर ही पता चला कि पत्रकार कुलदीप जी नहीं रहे। पुराने मित्र और सुख दुःख के साथी रहे अजय कोहली जी ने उनके देहांत की खबर दी। उन्होंने और कुछ अन्य मित्रों ने बताया कि सुबह तक ठीक लग रहे थे। साढ़े सात बजे तक तो अपनी अख़बार मालवा प्वाइंट के लिंक सोशल मीडिया पर पोस्ट भी करते रहे। इसी बीच सुबह ही 09 और 09:30 के दरम्यान ही अचानक उनकी तबियत बिगड़ी। कहने लगे चक्कर से आ रहे हैं। उन्हें फवारा चौंक वाले न्यूरो अस्पताल पहुँचाया गया लेकिन अस्पताल के अंदर पहुँचने से पहले ही वह इस दुनिया से जा चुके थे। सुबह करीब 11 बजे तक उनके न रहने की खबर सभी मित्रों को मिलनी शुरू हुई। वरिष्ठ पत्रकार मित्र अश्वनी जेतली ने भी बहुत से लोगों को सूचित किया। 

बहुत दुखद है कुलदीप जी का यूं चले जाना। हम सभी मित्र प्यार से उन्हें कोकी कहा करते थे। हर रोज़ अक्सर मिलने मिलाने वाले और उनके ज़्यादा नज़दीक रहने वाले मित्रों ने बताया कि कामकाज को लेकर आजकल बहुत बेहद चिंतित थे। उसी चिंता और टेंशन के चलते शायद दिमाग की नाड़ी फट गई। बाद में उनके बेटे दमनप्रीत  सिंह ने  भी ब्रेन हैमरेज की पुष्टि की।  

अभी शायद उम्र के साठ साल ही मुश्किल से पूरे कर पाए थे कि मौत उन्हें देखते ही देखते हमसे छीन ले गई। हम सभी का स्नेही मित्र हमारे दरम्यान नहीं रहा। आर्थिक तंगियों के बावजूद ज़रूरत  पड़ने पर मित्रों का हर संभव सहायक साबित होना। जेब खाली होने पर भी संकटग्रस्त मित्र के लिए कोई रास्ता सुझा देना। खुद को भी अगर कभी कोई बेबसी जैसी हालत घेर ले तो भी दोस्तों को कठिन घड़ियों में हौंसला देना शायद कुलदीप को ही आता था। कोई खुद को तीसमारखां समझ कर कुछ ज़्यादा ही हवा करने लगे तो उसकी हवा पल भर में निकालना भी कुलदीप के लिए चुटकी का काम रहता। किसी की बात पर आशंका होनी तो झट से मोबाईल निकालना औए बात की पुष्टि कर के हकीकत का पता लगा लेना। 

ज़िंदगी और वक्त ने उन्हें बहुत जाने माने लोगों से मिलवाया और बहुत बड़े बड़े घटनाक्रमों का साक्षी भी बनाया।समाज और सियासत में जिन लोगों ने कई कई बार आंधियों के खिलाफ स्टैंड ले कर दिखाया था उनका साथ भी कुलदीप जी को मिलता रहा। क्लीन शेव्ड रहे लेकिन पंथ और सिख धर्म के हर दर्द से अवगत रहते थे। सिख शहादत पत्रिका पर उनका नाम भी प्रिंट लाईन में छपता रहा। कई कई दुर्लभ किताबों का अनुवाद भी हिंदी और अंग्रेज़ी से किया और करवाया। 

किसी को कोई भी समस्या हो तो उनके कंप्लेंट सैल का दरवाज़ा हमेशां उनके लिए खुला रहता। नैशनल रोड पर स्थित काली सी बिल्डिंग--सूर्य आर्केड की सीढ़ियां चढ़ कर उनका दफ्तर आ जाता था। जेब की हालत कैसी भी हो, माहौल का मिजाज़ कुछ भी हो वह अपने पास आने वाले हर व्यक्ति की आवभगत करते और उसका दुःख दर्द सुनते। कोशिश करते संकट का समाधान भी तुरंत बता सकें। 

घर को चलाने में पिता का साथ देते थे। इसी म्हणत मशक्कत ने उनका बचपन भी उनसे छीन लिया था। उनके बचपन का वह मासूम सा चेहरा भी अब तक याद है मुझे। सर पर जुड़ा और उस पर रबड़ के साथ सफ़ेद रुमाल किसी फूल की तरफ सजा लगता था। जब गली मोहल्ले के अन्य बच्चे खेल रहे होते तब वह पिता की प्रिंटिंग प्रेस पर मेहनत कर रहे होते। कभी कंपोज़िंग, कभी फर्मा बांधना और उठवाना, कभी प्रिंटिंग प्रेस पर काम करना। बस साड़ी उम्र काम में ही निकल गई। 

गौरतलब है कि छोटी सी उम्र में ही पिता के साथ लुधियाना के प्रसिद्ध पुराने इलाके इस्लामगंज//अमरपुरा में प्रिंटिंग प्रेस के ज़रिए मेहनत मुशक्कत करते हुए उनकी शख्सियत का दृश्य रह रह कर आंखों के सामने उभर रहा है। उन दिनों पत्र-पत्रिकाओं की छपाई के लिए एक एक अक्षर--एक एक मात्रा जोड़ कर कोई खबर या रचना तैयार होती थी। फिर उन सभी रचनाओं को जोड़ कर पूरा पेज बांधा जाता था और उसके बाद सभी पेज जोड़ कर कोई अख़बार या किताब छपा करती थी। 

उनके पिता बच्चों से बहुत सख्ती के साथ काम करवाया करते थे। उनके भाई भी पूरा सहयोग देते थे। प्रिंटिंग प्रेस नीचे वाले ग्राउंड फ्लोर पर चला  करती थी ऊपर रिहायश हुआ करती थी। थोड़ी थोड़ी देर बाद ऊपर से चाय बन कर आती रहती।  फिर कोशिश होती चाय भी खाली न हो। साथ बिस्कुट या कुछ और भी रहता। साथ ही उनके पिता बातों बातों में अपने सभी क्लाइंटस को बिठाए रखते। बिजली चली जाती तो सब को  मुसीबत ही लगती। कुछ देर के लिए काम रुक सा जाता। अँधेरे में भी कुलदीप कम्पोजिंग करते रहते। अतीत के वे सभी दृश्य अब इतने सालों बाद ज़हन में घूमने लगे हैं। ऐसा लगता है जैसे कोई फिल्म कल्पना के पर्दे पर चल रही हो। 

सत्तर का दशक शायद उस समय समाप्त हो चुका था। अस्सी का दशक शुरू भी हो चुका था। अस्सी के दशक का यह वही दौर था जब पंजाबी में भी आधुनिक प्रिंटिंग अपना रंग ढंग ज़ोरशोर से दिखाने की दस्तक दे रही थी। कम्प्यूटर के ज़रिए कॉमसेट की आधुनिक कम्पोज़िंग चर्चा का विषय बन गई थी। ऑफसेट की तेज़ रफ़्तार प्रिंटिंग हम सभी को हैरान करने लगी थी। 

छोटी प्रिंटिंग प्रेस बस छोटे छोटे जॉब वर्क तक सिमटने लगी थी। लगता था यह सब जल्द ही अतीत बन जाएगी लेकिन सलेमटाबरी और नाली मोहल्ला में अभी भी उनकी झलक मिल जाती है। उस दौर की कई मशीनें ज़ोर शोर से बहुत से लोगों का रोज़गार बनी हुई हैं। इसके बावजूद इस दौर में कइयों की किस्मत पर मंदहाली ने दस्तक दी। कुलदीप कोकी के पिता की प्रिंटिंग प्रेस पर भी इस का असर पड़ा। लेकिन आर्थिक मंदहालियों से जूझते हुए भी उन्होंने न तो कभी अच्छे साहित्य का अध्यन ही छोड़ा और न ही सृजन का सिलसिला बंद होने दिया। इसके साथ ही नई तकनीक से भी वाकिफ होते रहे। सीमित से संसाधनों के बावजूद वह किसी न किसी बहाने मीडिया में सक्रिय रहे। यह सक्रियता पैसे कमाने के लिए नहीं थी बल्कि एक मिश्र को लेकर थी। वह बड़े बड़े समूहों में रह कर और उनसे दूर हो कर भी इस मिशन को समर्पित रहे। 

आज उनके जाने की खबर सुन कर मन बहुत उदास हो गया है।

फिर बहुत से सवाल उठ रहे हैं क्या यही है ज़िंदगी? कभी भी किसी भी वक्त किसी मित्र से बिछड़ जाना और कुछ न कर पाना!

कितने बेबस से हैं हम लोग हैं।  मित्रों  देखते रहते हैं लेकिन उन्हें बचाने का कोई ठोस कदम नहीं उठा सकते। समाज को राह दिखने वाला मीडिया अभी तक अंधेरे में है। 

जो वास्तविक ज़िंदगी में काम करते हैं लेकिन तिकड़मबाज़ी नहीं करते वे क्यूं इतने गुमनाम रह जाते हैं। क्यूं  उन पर खुशहाली की कृपा नहीं होती? लक्ष्मी क्यूं उन पर मेहरबान नहीं होती? हम दोनों के एक नज़दीकी मित्र बलवीर सिद्धू (पंजाबी अख़बार-जस्टिस न्यूज़ के मालिक,संपादक और प्रकाशक) ने बताया कि बार उन्हें सरकारी कार्डों और फायदों के लिए कहा लेकिन वह हर बार हंसते हुए बात को टाल जाते। यूं लगने लगता जैसे वह उनकी ख़ामोशी और रहस्यमय हंसी में शायद एक पुराना गीत गुनगुना रहे हों--

सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी

सच है दुनिया वालों कि हम हैं अनाड़ी!

अब कुलदीप कोकी जी हमारे दरम्यान नहीं रहे। ज़िंदगी भर संघर्ष करने वाला शख्स अब मौत की आगोश में  चला गया। सब संघर्ष बीच में ही छूट गए। सभी इरादे भी अधर में ही रह गए। लेकिन उनका जाना बहुत से सवाल छोड़ गया है कि क्या यह सब यूं ही चलता रहेगा? मेहनत, मुशक्कत, ईमानदारी और प्रतिबद्धता इसी तरह दम तोड़ती रहेगी। 

सत्ता बदलती रहती है लेकिन सरकारों को चाहिए कि कलमकारों को मान्यता, सहायता और आवश्यक सहयोग देने के लिए नियमों को आसान करे। जान सम्पर्क विभाग की शक्तियों को बढ़ाया जाए। कलमकारों की तलाश के लिए एक विशेष सैल बनाया जाए जो अपने स्तर पर खोज करके सही लोगों को सत्ता की तरफ से बनती सहायता दे सके। कलमकारों के स्वास्थ्य की जाँच और अवस्य्हक उपचार तो हर छह महीने बाद होना ही चाहिए। नियमों की सख्ती की बजाए असली कलमकार बचने की तरफ पहल होनी चाहिए।  

यह सब लिखते हुए मैं उनकी कमज़ोरियों, खामियों और मजबूरियों से भी अवगत हूं लेकिन जब तक समाज कलमकारों के प्रति उदासीन और गैर-ज़िम्मेदार बना रहेगा तब तक यह सब होता रहेगा। हमारे पत्रकार, लेखक, बुद्धिजीव, कलाकार अलप आयु में ही दम तोड़ते रहेंगे। 

जब यह समाज अपनी वाहवाही के  आयोजन करता है तो उस समय आयोजक लोग चाय बनाने वाले को भी पैसे देते हैं, चाय परोसने और ले कर आने वाले  को भी पैसे दिए जाते हैं, दरियां बिछाने और कुर्सियां लाने लेजाने वालों को भी पैसे मिलते हैं लेकिन उसकी कवरेज के लिए दूर दराज से पहुंचे मीडिया वालों कोआयोजक नहीं  पूछते कि उनके वाहन में पैट्रोल है या नहीं? 

अगर कोई मजबूरी वश मांग भी ले तो उसे दे भी देते हैं लेकिन बाद में बदनाम करते हैं।  कोई सरकार से विज्ञापन मांग ले तो उसे सरकारिया कह कर बुरा भला कहते हैं लेकिन स्वयं की ज़िम्मेदारी का अहसास कभी नहीं करते। कवरेज की खबरों के ज़रिए अधिक से अधिक स्पेस और टाइमं बटोरने वाले ये चालाक लोग भी कलमकारों के जल्द देहांत के लिए कम ज़िम्मेदार नहीं हैं। सभी पत्रकार संगठनों को इस तरफ भी ध्यान देना होगा। 

आखिर में गोपाल दास नीरज जी का शेयर याद आ रहा है:

वो और ही थे जिन्हें थी ख़बर सितारों की;

मेरा ये देश तो रोटी की ही ख़बर में रहा - गोपालदास नीरज

स्नेह के साथ// बिछड़े हुए मित्रों की यादों के साथ//बिछड़ने की कगार पर खड़े और बहुत से कलमकारों के जाने के अंदेशे की चिंता के साथ आप सभी का--रेक्टर कथूरिया

Friday, September 24, 2021

नहीं रहे आकाशवाणी के समाचार सुनाने वाले रामनुज प्रसाद सिंह

 दशकों तक जुड़े रहे रेडियो से रामानुज प्रसाद सिंह  

रेडियो की दुनिया//सोशल मीडिया : 23 सितंबर 2021: (मीडिया स्क्रीन ऑनलाइन ब्यूरो)::


ये आकाशवाणी है! अब आप रामानुज प्रसाद सिंह से समाचार सुनिए! दशकों तक रेडियो समाचार के माध्यम से श्रोताओं को मुग्ध करने वाली ये दमदार, गहरी और ठहरी हुई आवाज़ आज थम गई। 

आकाशवाणी में समाचार वाचक कैडर के आखिरी स्तंभ और महाकवि रामधारी सिंह दिनकर के भतीजे रामानुज प्रसाद सिंह ने 86 साल की उम्र में आज यानी 22 सितंबर 21के दिन इस दुनिया को अलविदा कह दिया। 

आकाशवाणी में समाचार वाचक कैडर की आखिरी चौकड़ी देवकी नंदन पांडेय, विनोद कश्यप, अशोक वाजपेयी और रामानुज प्रसाद सिंह की ही रही. इसके बाद ये कैडर समाप्त हो गया और बाद के समाचार वाचक अनुवादक सह समाचार वाचक की श्रेणी में ही आए. यह जानकारी मीडिया और साहित्य की दुनिया से जुडी शख्सियत मनविंदर भिंबर ने कल अर्थात 22 सितंबर 2021 की रात को 11:02 बजे दी। उन्होंने वाया राजेश चड्ढ़ा यह जानकारी दी। 

रेडियो की यादें दिमाग में आते ही याद आ जाती है रामनुज प्रसाद सिंह जी की याद। बहुत ही अच्छा बोलते थे। उन्हें नमन। बहुत ही दमदार आवाज़ थी। भावों से भरी हुई प्रभावशाली आवाज़। समाचार सुनने को उत्सुक करती हु आवाज़। नींद से जगाती हुई आवाज़। हालात के चक्र की की दस्तक देती हुई आवाज़। आज तक ज़हन में सुनाई देती है। उनका जाना--एक युग का चले जाना है। उनका अतीत हो जाना सचमुच पीड़ादायिक है। रामानुज प्रसाद सिंह जी को श्रद्धासुमन अर्पित हैं। दिल भरा हुआ है। ऑंखें भीगी हुई हैं। अंतर्मन में रेडियो से जुडी यादों का बवंडर सा है। उन्हें एक बार फिर से नमन। काश जाने वालों से कभी दोबारा भेंट का कोई सुअवसर मिला करता। काश वहां भी आकाशवाणी होती और हम सुन पाते उनकी आवाज़ में वहां के समाचार। उनके जाने से जो सदमा हम कुछ लोग महसूस कर रहे हैं उस  महसूस करते हुए हमें मिलजुल कर एक प्रयास करना होगा। रेडियो की दुनिया से जुड़े जो लोग अभी भी हमारे दरम्यान हैं। उन्हें संभालना होगा। उनकी आवाज़ें, उनके अनुभव, उनके ख्याल, उनकी रचनाएं, उनकी तस्वीरें बहुत कुछः सहेजने वाला है। आवाज़ की दुनिया से जुड़े उनके गुर भी उनसे पूछने होंगें तांकि रेडियो की दुनिया अमीर बनी रहे। निश्चिन्त रहिए ,रेडियो समाप्त नहीं होगा हैं तकनीकी रूप चाहे बदलता रहे। रेडियो का जादू कुछ कम हुआ अवश्य लगता है लेकिन जल्द ही लौटेगा रेडियो का करिश्मा। लोग टीवी से अब ऊबने लगे हैं। आओ सुनते हैं ज़रा ध्यान दीजिए। आवाज़ आ रही है---ये आकाशवाणी है! अब आप रामानुज प्रसाद सिंह से समाचार सुनिए......!!!                     ---रेक्टर कथूरिया


Saturday, July 17, 2021

दानिश साहिब यहीं हैं हमारे आसपास-हमारे दरम्यान

 लानत है उनकी मौत का जश्न मनाने वालों पर 


नयी दिल्ली
: 17 जुलाई 2021: (मीडिया स्क्रीन ऑनलाइन+मित्र लोग)::

प्रेस क्लब आफ इण्डिया ने दानिश सिद्दीकी साहिब के याद में आज रात करीब 7:25 पर कैंडल मार्च किया है। उनकी चर्चा करनी ज़रूरी है शायद इसी बहाने उन लोगों की अंतरात्मा जाग उठे जो खुद को पत्रकार समझते  हैं लेकिन साडी उम्र भांड बने रहते हैं। पत्रकारिता की समझ उन्हें उम्र भर समझ नहीं आ पाती। काश ऐसे लोग दानिश साहिब की कुर्बानी के इस मौके पर अपनी डयूटी के प्रति सजग हो सकें। 

दुःखद है लेकिन सच है कि जब खुद को मीडिया का सरगर्म और बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा समझने और कहने वाले बहुत से लोग अपने अपने राजनीतिक आकाओं की चमक दमक को दर्शाते हुए अपने अपने कैमरे और कलम   सेट करने में व्यस्त थे, उनके आगे पीछे घूम रहे थे उस समय भी दानिश सिद्दीकी एक गौरवशाली सच्चे मुस्लिम होने के के साथ साथ प्रतिबद्ध पत्रकार का फ़र्ज़ भी निभा रहे थे। 

अलग अलग मामलों  में अलग अलग जगहों पर अलग अलग वक़्तों में दानिश साहिब ने दिखाया कि अगर कलम और कैमरा पकड़ो तो उसकी लाज कैसे रखी जाती है। जान हथेली पर और हौंसला दिल व दिमाग में दानिश साहिब ने बहुत पहले सीख लिया था। दानिश साहिब ने 40 की उम्र तक पहुँचने से पहले ही बहुत कुछ ऐसा क्लिक किया जो दस्तावेज़ी की तरह है। आने वाले वक्तों में  और बढ़ जाएगी। 

उल्लेखनीय है कि पुलित्जर पुरस्कार पत्रकारिता के क्षेत्र का अमेरिका का सर्वोच्च पुरस्कार है। इसकी शुरुआत 1917 से हुई थी। 2021 के लिए भारतीय मूल की पत्रकार मेघा राजगोपालन को भी अंतरराष्ट्रीय रिपोटिंग के दिया जाएगा। दानिश सिद्दीकी साहिब को साल 2018 में  पुलित्जर पुरस्कार  से नवाजा गया था, ये अवॉर्ड उन्हें रोहिंग्या मामले में कवरेज के लिए मिला था। बहुत बड़ी कवरेज थी यह। 

गौरतलब है कि दानिश सिद्दीकी ने अपने करियर की शुरुआत एक टीवी जर्नलिस्ट के रूप में की थी, बाद में वह फोटो पत्रकार बन गए थे। आज भी बहुत से लोग मीडिया का कार्ड जेब में दाल कर और कैमरा उठा कर समझते हैं कि वे फोटोग्राफर बने हुए हैं लेकिन उन्हें कुछ भूलता है तो बस अपनी डयूटी। या फिर अपने अपने फ़र्ज़। अपने आकाओं की तरफ से होती आवभगत और सेवा सम्मान उन्हें सपनों में नहीं भूलता। 

बस यही फरक है दानिश साहिब ने हर वक़्त अपनी ड्यूटी याद रखी। जान तक कुर्बान कर दी और अमन हो गए। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने दानिश सिद्दीकी के निधन पर शोक जताया है। ठाकुर ने कहा कि वह अपने पीछे अपना शानदार काम छोड़ गए हैं। हकीकत भी यही है। 

उन्हें याद करते हुए, उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए पुलित्जर पुरस्कार विजेता भारतीय फोटो पत्रकार दानिश सिद्दीकी को श्रद्धांजलि देने के लिए प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और जामिया मिलिया इस्लामिया में शनिवार को कैंडल लाइट मार्च निकाला गया। अन्य हमदर्द लोग भी इसमें पहुंचे। सब के मन में दर्द था। करीब 40 साल के सिद्दीकी की शुक्रवार को अफगानिस्तान के कंधार प्रांत में स्पिन बोल्डक जिले में अफगान बलों और तालिबान के बीच संघर्ष के दौरान मृत्यु हो गयी। वह कंधार के मौजूदा हालात की कवरेज कर रहे थे। बहुत से दुसरे मामलों की तरह यह भी उनका मिशन था। 

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में कैंडल लाइट मार्च के दौरान वर्किंग न्यूज कैमरामैन एसोसिएशन (डब्ल्यूएनसीए) के अध्यक्ष एस. एन. सिन्हा ने कहा कि युद्ध, दंगों और लोगों की तकलीफें तस्वीरों के जरिए सभी तक पहुंचा कर सिद्दीकी अपने पेशे में शीर्ष पर पहुंचे थे। शीर्ष सभी की किस्मत में भी नहीं होता। हर किसी के जज़्बे में दानिश साहिब जैसा जूनून भी नहीं होता। एस. एन. सिन्हा ने कहा कि उन्होंने पूरे जुनून और समर्पण के साथ सभी तस्वीरें लीं, खबरों का कवरेज किया और हमेशा मुश्किल में फंसे लोगों पर ध्यान दिया। जो कुछ सिन्हा साहिब ने कहा इससे बड़ा समान शायद कोई न हो। उनके मित्र और उनके पुराने साथी भी आहत हैं इस शहादत से। जामिया मिलिया के पुराने छात्र मोहम्मद मेहरबान ने मास कम्युनिकेशन के छात्र सृजन चावला के साथ मिलकर विश्वविद्यालय के गेट नंबर 17 पर कैंडल लाइट मार्च का आयोजन किया जिसमें 500 से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया।मोहम्मद मेहरबान ने कॉलेज में अपने सीनियर दानिश सिद्दीकी को याद किया। कभी कभी सीनियर लोग   जो किताबों में भी नहीं मिलता। 

दानिश साहिब को आर्थिक स्थितियों की भी पूरी समझ थी। देश कीध जा रहा है उन्हें मालुम था। सिद्दीकी ने अर्थशास्त्र विषय से स्नातक की पढ़ाई की थी। उन्होंने 2007 में जनसंचार विषय में स्नात्कोत्तर किया था। दानिश सिद्दीकी 2011 से समाचार एजेंसी रॉयटर्स के साथ बतौर फोटो पत्रकार काम कर रहे थे। उन्होंने अफगानिस्तान और ईरान में युद्ध, रोहिंग्या शरणार्थी संकट, हांगकांग में प्रदर्शन और नेपाल में भूकंप जैसी महत्वपूर्ण घटनाओं की तस्वीरें ली थीं। इन कहानियों का सिलसिला काफी लम्बा है। दानिश साहिब तो रुखसत हो गए लेकिन ु का काम लगातार अपनी मौजूदगी दर्शाता रहेगा। 

आखिर में लानत उन लोगों पर ज़रूरी है जो दानिश साहिब की मौत का जश्न मना रहे हैं। शर्म आनी चाहिए ऐसे बेशर्म लोगों को। इस तरह के जश्न मना कर वे अपनी औकात ही दिखा रहे हैं। बता रहे हैं की वे सचमुच साम्प्रदायिकता की ज़हर से भरे हुए खतरनाक लोग हैं। इन लोगों को याद रखना कि  रहेंगे रंग बदल कर रूप बदल कर।  किसी न किसी के हाथ में कोई न कोई कैमरा  इन लोगों को डराता भी रहेगा और भी  बेनकाब भी करता रहेगा।  दानिश साहिब यहीं हैं हमारे आसपास। हमारे दरम्यान। 

जामिया ने दानिश सिद्दीकी की दुखद मौत पर शोक व्यक्त किया

Friday, July 16, 2021

जामिया ने दानिश सिद्दीकी की दुखद मौत पर शोक व्यक्त किया

 16 जुलाई, 2021

फोटो पत्रकार दानिश जामिया के पूर्व छात्र थे और पुरस्कार विजेता भी
नई दिल्ली: 16 जुलाई 2021: (मीडिया स्क्रीन Online)::
जामिया मिल्लिया इस्लामिया (जेएमआई) ने कंधार के स्पिन बोल्डक जिले में हिंसा में मारे गए रॉयटर्स के फोटो पत्रकार दानिश सिद्दीकी के दुखद और असामयिक निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया। इस खबर से जामिया एजेके मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर (एमसीआरसी) में शोक की लहर दौड़ गई, जहां दानिश ने 2005-2007 तक पढ़ाई की और मास कम्युनिकेशन में परास्नातक किया।
जामिया की कुलपति ने इसे पत्रकारिता और जामिया बिरादरी के लिए एक बड़ी क्षति बताया. इस दुखद घटना की खबर मिलते ही उन्होंने दानिश के पिता प्रो. अख्तर सिद्दीकी से बात की। उन्होंने बताया कि दानिश ने दो दिन पहले उन से बात की थी और अफगानिस्तान में वह जो काम कर रहा था, उसके बारे में चर्चा की थी।
जामिया से सेवानिवृत्त प्रो. अख्तर सिद्दीकी शिक्षा संकाय के डीन थे। वह राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) के निदेशक भी थे।
2018 में एमसीआरसी ने दानिश को विशिष्ट पूर्व छात्र पुरस्कार से सम्मानित किया था। प्रोफेसर और कार्यवाहक निदेशक शोहिनी घोष कहती हैं: “यह एमसीआरसी के जीवन के सबसे दुखद दिनों में से एक है। दानिश हमारे हॉल ऑफ फ़ेम में सबसे चमकीले सितारों में से एक थे और एक सक्रिय पूर्व छात्र थे जो छात्रों के साथ अपने काम और अनुभवों को साझा करने के लिए अपने अल्मा मेटर में लौटते रहे। हम उनकी कमी पूरी नहीं क्र सकते लेकिन उनकी याद को जिंदा रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”
दानिश ने अपने काम के लिए 2018 में पुलित्जर पुरस्कार सहित सात सदस्यीय रॉयटर्स टीम के हिस्से के रूप में अपने काम के लिए कई पुरस्कार जीते, जिसने म्यांमार के अल्पसंख्यक रोहिंग्या समुदाय द्वारा सामना की गई हिंसा और अगस्त 2017 से बांग्लादेश में उनके सामूहिक पलायन का दस्तावेजीकरण किया। एक शरणार्थी महिला को बंगाल की खाड़ी के तट पर अपने घुटनों के बल डूबते हुए, थका हुआ और उदास दिखाया गया है। कुछ ही दूरी पर, पुरुषों का एक समूह अपने साथ एक छोटी नाव में अपने साथ लाए गए सामानों को उतार देता है, जब वे म्यांमार में अपने घरों से सुरक्षा के लिए बांग्लादेश गए थे इस फोटो के लिए उन्हें पुलित्जर दिया गया था।
एमसीआरसी के छात्रों के साथ उनकी आखिरी बातचीत 26 अप्रैल, 2021 को हुई थी, जब सोहेल अकबर ने उन्हें कन्वर्जेंट जर्नलिज्म के छात्रों से बात करने के लिए आमंत्रित किया था। सोहेल अकबर याद करते हैं, "कोविड-19 दूसरे उछाल के घातक चरम पर था और दानिश बहुत व्यस्त था" लेकिन हमेशा की तरह, उन्होंने एमसीआरसी के छात्रों के लिए समय निकाला।
एक फोटो जर्नलिस्ट के रूप में, दानिश ने एशिया, मध्य पूर्व और यूरोप में कई महत्वपूर्ण कहानियों को कवर किया है। उनके कुछ कार्यों में अफगानिस्तान और इराक में युद्ध, रोहिंग्या शरणार्थियों का संकट, हांगकांग विरोध, नेपाल भूकंप, उत्तर कोरिया में सामूहिक खेल और स्विट्जरलैंड में शरण चाहने वालों की रहने की स्थिति शामिल है। उन्होंने इंग्लैंड में धर्मान्तरित मुस्लिमों पर एक फोटो श्रृंखला भी तैयार की है। उनका काम व्यापक रूप से पत्रिकाओं, समाचार पत्रों, स्लाइडशो और दीर्घाओं में प्रकाशित हुआ है - जिसमें नेशनल ज्योग्राफिक पत्रिका, न्यूयॉर्क टाइम्स, द गार्जियन, द वाशिंगटन पोस्ट, वॉल स्ट्रीट जर्नल, टाइम मैगज़ीन, फोर्ब्स, न्यूज़वीक, एनपीआर, बीबीसी, सीएनएन शामिल हैं। अल जज़ीरा, साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट, द स्ट्रेट्स टाइम्स, बैंकॉक पोस्ट, सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड, द एलए टाइम्स, बोस्टन ग्लोब, द ग्लोब एंड मेल, ले फिगारो, ले मोंडे, डेर स्पीगल, स्टर्न, बर्लिनर ज़ितुंग, द इंडिपेंडेंट, द टेलीग्राफ , गल्फ न्यूज, लिबरेशन और कई अन्य प्रकाशन शामिल हैं।
जनसंपर्क कार्यालय
जामिया मिल्लिया इस्लामिया

Saturday, January 2, 2021

नहीं रहे रेडियो प्लेबैक वाले सक्रिय पत्रकार कृष्णमोहन मिश्रा

 टैक्स्ट के साथ आवाज़ और शब्दों के प्रयोग में भी बहुत ही कुशल थे 

लखनऊ//इंटरनेट: 2 जनवरी 2020: (मीडिया स्क्रीन ऑनलाइन डेस्क):: 

देश के हालात की मायूसी और उदासी के इस माहौल में एक और उदास  खबर आई है राजू मिश्र की एक पोस्ट के रूप में। इसमें एक बहुत अच्छे पत्रकार के बिछुड़ जाने की सूचना है। यह खबर सोशल मीडिया पर सामने आई। उदास कर देने वाली यह पोस्ट है लखनऊ के एक  ऐसे कर्मयोगी पत्रकार के निधन से सबंधित जिन्होने टैक्स्ट के साथ साथ आवाज़ के जादू को भी ब्लॉग मीडिआ के तौर पर सक्रिय हो कर इस्तेमाल किया। उनके प्रयोग बेहद सफल रहे और ने टैक्स्ट और आवाज़ के समन्वय को बहुत ही खूबसूरती के साथ प्रस्तुत किया। रेडियो प्लेबैक उनका बहुत ही ज़बरदस्त प्रयोग रहा जो निकट भविष्य में ही हमें नए नए आर जे भी दिया करेगा। शब्दों और आवाज़ का संमिश्रण  जादू बिखेरता। एक पूरी टीम इस सारे प्रयोग पर नज़र रखती। रेडियो ब्लॉग की दुनिया में यह बहुत  लोकप्रिय हुआ।  Krishnamohan Mishra जी की पोस्टें हमें उनकी याद दिलाती  रहेंगी। राजनीतिक विचारों के भेदभाव से ऊपर उठ कर केवल समाज और विशुद्ध पत्रकारिता के धर्म को निभाते हुए हम उन्हें याद रखें  तो यही बात हमें आगे बढ़ने की शक्ति भी देगी।  

उनके मित्र  राजू मिश्रा बताते हैं-वरिष्ठ पत्रकार कृष्णमोहन मिश्र का गुरुवार की रात लखनऊ में हृदयाघात से निधन हो गया। वे लगभग 70 वर्ष के थे। श्री मिश्र ने अपने पीछे पत्नी और दो पुत्रियों को छोड़ा है। अपरान्ह दो बजे भैंसाकुंड स्थित श्मसान घाट पर उनकी अन्त्येष्टि हुई। श्री मिश्र को उनकी बेटी ने मुखाग्नि दी।कृष्ण मोहन जी का जन्म वाराणसी में हुआ था। उनकी शिक्षा दीक्षा वाराणसी में ही हुई। उन्होंने मिर्जापुर के पालिटेक्निक से शिक्षा ग्रहण की थी। इसके बाद लखनऊ के बांस मंडी स्थित आईटीआई में प्रशिक्षक रहे। यहीं से करीब दस वर्ष पूर्व वे सेवानिवृत्त हुए। श्री मिश्र सांस्कृतिक पत्रकार भी थे। सेवा में रहते हुए उन्होंने सांस्कृतिक पत्रकारिता की। वे दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान में सांस्कृतिक संवाददाता भी रहे। इसके साथ ही वे संस्कृति और संगीत पर लगातार लेखन करते थे। सोशल मीडिया में वे लगातार संगीत और गायन की विभिन्न विधाओं पर लेखन कर रहे थे। वे उ.प्र. जर्नलिस्ट्स एसोशिएशन की पत्रिका उपजा न्यूज और संस्कार भारती की पत्रिका कला कुंज भारती के भी संपादक रहे। आजकल वे राजधानी में जानकीपुरम् क्षेत्र की इकाई के अध्यक्ष थे। गोमती नगर निवासी श्री मिश्र को बीती रात करीब नौ बजे हृदयाघात हुआ। परिवार के लोग उन्हें तत्काल डा. राम मनोहर लोहिया चिकित्सालय ले गए जहां डाक्टरों ने बताया कि तीव्र हृदयाघात से उनका निधन हो चुका है। विनम्र श्रद्धांजलि।

उनके एक और गहरे मित्र सुजॉय चटर्जी उन्हें बहुत ही स्नेह और सम्मान के स्मरण करते हुए कहते हैं-ख़ामोश हुआ "स्वरगोष्ठी" का स्वर, नहीं रहे कृष्णमोहन मिश्र जी। इस गहरे सदमे को उनके मित्र किस मुश्किल से सहन कर पा रहे हैं इसे बताना मुश्किल है। 

श्री चटर्जी कहते हैं: कृष्णमोहन जी लखनऊ के प्रसिद्ध एवम् वरिष्ठ सांस्कृतिक पत्रकार/ सम्पादक होने के साथ-साथ शास्त्रीय एवम् लोक-संगीत के विशिष्ट जानकार, विश्लेषक, समीक्षक, लेखक, जानेमाने मंच संचालक, साक्षात्कारकर्ता और ब्लॉगर भी थे। हमारे ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ नामक ब्लॉग में वे शास्त्रीय एवम् लोकसंगीत पर आधारित स्तम्भ ’स्वरगोष्ठी’ का पिछले दस वर्षों से निरन्तर संचालन करते चले आ रहे थे। इन्टरनेट पर शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक, सुगम और फिल्म संगीत विषयक चर्चा का सम्भवतः यह एकमात्र नियमित साप्ताहिक स्तम्भ है, जो विगत दस वर्षों से निरन्तरता बनाए हुए है। आज उनके चले जाने से यह स्तम्भ अनाथ हो गया।

अपनी मित्रता और उनके साथ मीडिया और जीवन से जुड़े अनुभवों के आदान प्रदान का ज़िक्र करते हुए वह भरे मन से कहते हैं-मेरा कृष्णमोहन जी से पहला परिचय वर्ष 2011 में हुआ था। उन दिनों सेवानिवृत्ति के बाद वे इन्टरनेट पर सक्रिय हो रहे थे। उन्हीं दिनों शास्त्रीय संगीत पर आधारित एक स्तम्भ हमने शुरू किया था ’सुर संगम’, पर शास्त्रीय संगीत के जानकार न होने की वजह से हमारे लिए इसे लम्बे समय तक चला पाना मुश्किल हो रहा था। मेरे मित्र Sumit Chakravarty ने भी कुछ समय तक इसे आगे बढ़ाया। उन दिनों कृष्णमोहन जी इस स्तम्भ के पाठक हुआ करते थे। उनकी नियमित टिप्पणियों को पढ़ कर मुझे और सुमित को यह आभास हो गया था कि अगर कोई इस स्तम्भ को सही तरीके से आगे बढ़ा सकते हैं तो वो कृष्णमोहन जी ही हैं। उन्हें यह प्रस्ताव देते ही वे फ़ौरन राज़ी हो गए। और उस दिन से लेकर आज तक, उन्होंने ही इस साप्ताहिक स्तम्भ का संचालन किया ’स्वरगोष्ठी’ शीर्षक से और एक भी सप्ताह ऐसा नहीं बीता कि जब ’स्वरगोष्ठी’ का अंक प्रकाशित ना हुआ हो। आज इसके 495 अंक प्रकाशित हो चुके हैं। शास्त्रीय एवम् लोक संगीत के लेखों से सुसज्जित ये 495 अंक हिन्दी ब्लॉग जगत में किसी अनमोल ख़ज़ाने से कम नहीं है। इस धरोहर को हमें सहेज कर रखना है।

श्री चटर्जी बताते हैं कि कृष्णमोहन जी से मैंने बहुत कुछ सीखा है। लेखन शैली और प्रकाशनयोग्य formatting के बारे में उन्होंने तो बहुत कुछ बताया ही था, पर केवल उनको देख कर भी कई चीज़ें सीखने को मिली। वे पूरे perfection के साथ लेख लिखते थे, उनके लिखे पोस्ट्स पर किसी भी तरह की ग़लती ढूंढ पाना असम्भव सा था। वे कभी जल्दबाज़ी और shortcut में नहीं जाते थे, अगर समय ना हो तो साफ़ मना कर देते थे, पर quality के साथ कभी समझौता नहीं करते थे। वे इतने ईमानदार थे कि उनके लेखों के लिए जो भी कोई छोटी से छोटी जानकारी भी उन्हें देता था, वे उनका नाम लेख में उल्लेख करना कभी नहीं भूलते थे। ’स्वरगोष्ठी’ में जब भी कभी उन्हें किसी फ़िल्मी गीत से सम्बन्धित कोई रोचक जानकारी की आवश्यकता पड़ती थी तो वे मुझसे सलाह करते थे, और अगर मैं उन्हें कोई जानकारी उपलब्ध करवाता तो वे मेरा नाम लेख में “जानेमाने फ़िल्म इतिहासकार” के रूप में लिखते थे जिसे पढ़ कर मुझ हँसी आ जाती थी और embarrassment भी होता था क्योंकि मैं कोई फ़िल्म इतिहासकार नहीं हूँ। यह उनका बड़प्पन ही था बस! वे इतने विनयी थे कि जब भी कभी मैं उनसे कहता कि मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा है तो फ़ौरन उनका जवाब होता था कि उन्होंने भी मुझसे बहुत कुछ सीखा है। प्रसिद्ध अभिनेता Pranay Dixit जी के मौसा जी लगते थे कृष्णमोहन जी। जब वर्ष 2013 में प्रणय जी की पहली फ़िल्म ’Roar’ रिलीज़ होने जा रही थी, तब कृष्णमोहन जी के ज़रिये मुझे प्रणय जी का साक्षात्कार लेने का मौका मिला। उन्होंने यह दायित्व मुझे सौंप कर मेरा सम्मान बढ़ाया था।

हालांकि दोनों मित्रों में उम्र  का अंतर भी काफी था। चटर्जी साहिब बताते हैं उम्र में मैं कृष्णमोहन जी से करीब 30 साल छोटा हूँ, पर उनसे बात करते समय कभी इसका अहसास नहीं हुआ। हमेशा ऐसा ही लगा कि जैसे हम हम-उम्र हों। वे ऐसे बात करते थे कि जैसे अपने किसी हम-उम्र दोस्त के साथ बतिया रहे हों। उन्हें जब भी कभी मेरे द्वारा लिखा कोई पोस्ट पसन्द आता था तो फ़ोन करके बधाई देते थे। मुझे याद है एक बार मैंने जब अपने किसी लेख में “साज़िन्दों” की जगह “वाद्य-वृन्द” शब्द का प्रयोग किया था, उन्हे यह इतना अच्छा लगा कि केवल यही बताने के लिए उन्होंने मुझे फ़ोन किया। वे कभी फ़ोन पर व्यक्तिगत बात या इधर-उधर की बात नहीं करते थे, सीधे काम की बात करते थे, professionalism उनमें कूट-कूट कर भरा हुआ था। कुछ वर्ष पूर्व एक बार मैंने उनसे कहा कि मेरा बेटा शास्त्रीय संगीत सीख रहा है पर वो रियाज़ ही नहीं करता। तब कृष्णमोहन जी ने बताया कि दस वर्ष की आयु से पहले बच्चे से ज़्यादा रियाज़ ना करवाऊँ वरना आवाज़ ख़राब हो सकती है। यह बेहद महत्वपूर्ण बात उनसे जानने को मिली थी। एक बार मैंने उनसे कहा कि आपने लम्बे समय से एक ही profile pic लगा रखी है, इसे बदलते क्यों नहीं, तो बोले तो यह उनका प्रिय फ़ोटो है और उनका सबसे अच्छा फ़ोटो है। जितना मुझे याद है यह तसवीर किसी ने संगीत नाटक अकादमी में खींची थी। 

फेसबुक वाली प्रोफ़ाइल तस्वीर की तरह ही उन्होने अपने  मित्र भी नहीं बदले। जिससे मित्रता लगाई उसके साथ आखिर तक निभाया। 

कुछ सप्ताह पूर्व जब आख़िरी बार उनसे बात हुई थी तब वे काफ़ी उत्साहित थे इस बात को लेकर कि ’स्वरगोष्ठी’ के ना केवल दस वर्ष पूरे हो रहे हैं बल्कि इसके 500 अंक भी पूरे हो रहे हैं। और संयोग देखिए कि इसी सप्ताह ’स्वरगोष्ठी’ के दस वर्ष पूरे हो रहे हैं 495-वें अंक के साथ। ब्लॉगर में उन्होने इस सप्ताह का पोस्ट शेड्युल कर रखा है और इस पोस्ट में उन्होंने ’स्वरगोष्ठी’ के दस वर्ष पूर्ति पर इसके प्रथम अंक के लिए मेरे लिखे हुए लेख का एक अंश भी प्रस्तुत किया है, जिसे पढ़ कर निर्वाक् हो गया हूँ। आज कृष्णमोहन जी के इस तरह अचानक चले जाने से ऐसा लग रहा है कि जैसे एक महाशून्य सा उत्पन्न हुआ है। अभी तो उनके साथ बहुत काम करना बाकी था। उनसे बहुत सारी बातें करनी थीं। सब एक ही झटके में समाप्त हो गया। शायद इसी क्षणभंगुरता का नाम जीवन है। कृष्णमोहन जी मुझे हमें हमेशा याद रहेंगे। उनको श्रद्धांजलि स्वरूप और उनके 500-वें अंक के सपने को साकार करने हेतु हमने ’स्वरगोष्ठी’ के अन्तिम पाँच अंकों को लिखने का निर्णय लिया है। यही उनके लिए हमारी श्रद्धांजलि होगी।