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Tuesday, January 30, 2024

सुनो!! वो जीत गए.. मगर मैं नही हारा !

आखिर हारकर....मेरी समाधि पर सर झुकाए खड़े हो जाते हो


जन मीडिया की दुनिया से: 30 जनवरी 2024: (मीडिया लिंक रविंद्र//मीडिया स्क्रीन ऑनलाइन)::

यह सच है कि शरीर तो नश्वर ही होता है इसकी हत्या की जा सकती है, किन अमरता इससे भी बढ़ा सच है। हत्या कर के भी कुछ लोगों को कभी मिटाया नहीं जा सका। आज जब असहनशीलता फिर ज़ोरों पर है। आज फिर अमरता की चर्चा आवश्यक लग रही है।  उनकी अमरता जिन शख्सियतों की जान ले कर भी उन्हें मारा नहीं जा सका। ऐसी ही अनुभूति की अभिव्यक्ति इस पोस्ट में भी है। इसमें काव्य का रंग भी है, फलसफे का रंग भी और  का ज़मीन के पाताल जैसी गहराई का भी और आसमानों की ऊंचाई का भी। मनीष सिंह उनका लोकप्रिय नाम है लेकिन आजकल वह स्वयं को रिबोर्न मनीष भी कहते हैं। वैसे थोडा समझने की बात है--ज्ञान और अनुभव के बाद एक तरह से पुनर्जन्म ही तो होते है। इंसान पहले कहां रह जाता है! मनीष लम्बे समय से बहुत कुछ ऐसा लिख रहे हैं जो आपको ऐसा ज्ञान देता है जिसे सहेजना और याद रखना फायदे में ही होगा। गांधी जी की पुण्य तिथि आज ही थी 30 जनवरी का दिन बहुत कुछ याद दिलाता है। आज़ादी के कुछ ही महीनों बाद चढ़े पहले साल 1948 की 30 जनवरी। उस दुःखद दिन पर इस विशेष पोस्ट का खास महत्व है:-रेक्टर कथूरिया 

सुनो!! कान खोलकर...॥

मोहन पैदा हुआ था, मोहन ही मरा हूँ। 

महात्मा तुम्हारे बापों और दादो ने जबरन बना दिया। मुझे ना महात्मा बनना था, न राष्ट्रपिता

न राष्ट्रपति, न प्रधानमंत्री ..। 

लेखक-मनीष सिंह 

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हां, तुम्हारे बड़े बूढों ने जो प्यार दिया था। जब वो "बापू" कहते तो बड़ा भला लगता। 

लगता.. सब मेरे बच्चे हैं, मेरी जिम्मेदारी हैं। जब सारा देश ही बापू कहने लगा, तो किसी ने उत्साह में राष्ट्रपिता कह डाला। मगर मैं तो मोहन था, मोहन ही रहा। 

सुनो!! तुम्हारे बड़े बूढ़े मुझे नेता कहते थे। मगर मैने कोई चुनाव नही लड़ा, चुनावी तकरीर नही की। 

कोई वादा नही किया, कोई सब्सिडी नही बांटी। मैं तो घूमता था, दोनो हाथ पसारे..  मांगता था बस प्रेम, शांति और एकता। 

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बहुतों ने दिया, तो कुछ ने इन बढ़े हुए हाथों को झटक भी दिया। उन्हें इस फकीर से डर लगता था। प्रेम से डर लगता था, शांति से डर लगता था.. एकता से डर लगता था।

उन्होंने लोगो को समझाया- 

नफरत करो.. तुम एक नही हो, ना कभी हो सकते हो। शांति झूठी है। लड़ो, आगे बढ़ो। मार डालो। जीत जाओ।

सुनो!! वो जीत गए। 

मुझे मार डाला। 

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और टुकड़े कर दिए ...हिन्दुओ के, मुसलमानों के, देश के.. दिलो के।

और वो जीतते गए है। 

साल दर साल, इंच इंच, कतरा कतरा.. धर्म का नाम लेकर, जाति की बात करके, गौरव का नशा पिलाकर वो तुम्हे मदहोश करते गए। वो जीत गए। 

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सुनो!! वो जीत गए.. मगर मैं नही हारा। 

मैं यहीं हूँ.. इस मिट्टी में घुला हुआ। वो रोज तुम्हे एक नया नशा देते है, और नशा फटते ही मैं याद आता हूँ। 

मैं तुम्हारी जागती आंखों का दुःस्वप्न हूँ। तुम हुंकार कर मुझे नकारते हो, उस नकार में ही स्वीकारते हो।

तुम्हें यकीन ही नही होता कि मैं मर चुका हूँ, तो सहमकर फिर से गोलियां चलाते हो। बार बार कब्र खोदते हो, फिर लेटकर देखते हो। कब्र छोटी पड़ती है, और खोदते हो। 

थक जाते हो, आखिर हारकर  .. मेरी समाधि पर सर झुकाए खड़े हो जाते हो। 

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तो सुनो ,कान खोलकर। न तो तुम्हारी इज्जत से महात्मा बना था, न तुम्हारी इज्जत से कोई महात्मा बन सकता है। 

असल तो ये है, जिसे तुम्हारी इज्जत हासिल हो.. वो महात्मा हो ही नही सकता।

तो मोहन की ये बात कान खोल कर सुन लो। तुमको, और तुम्हारे बाप को पीले चावल भेजकर राजघाट नही बुलाता। 

श्रद्धा से भरी अंजुली न हो, तो श्रद्धांजली लेकर आना भी मत। मोहनदास करमचंद गांधी का नाम ...

तुम्हारी इज्जत का मोहताज नही है।

मनीष जी से आप यहां क्लिक करके भी मिल सकते हैं और यहां क्लिक करके भी--आपको हर बार मिलेगा कुछ ऐसा जो आपको सोचने को मजबूर ज़रुर करेगा....  उनकी पोस्ट बिना  या  सही गलत का फैसला आप पर ही  देगी।  

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Friday, September 24, 2021

नहीं रहे आकाशवाणी के समाचार सुनाने वाले रामनुज प्रसाद सिंह

 दशकों तक जुड़े रहे रेडियो से रामानुज प्रसाद सिंह  

रेडियो की दुनिया//सोशल मीडिया : 23 सितंबर 2021: (मीडिया स्क्रीन ऑनलाइन ब्यूरो)::


ये आकाशवाणी है! अब आप रामानुज प्रसाद सिंह से समाचार सुनिए! दशकों तक रेडियो समाचार के माध्यम से श्रोताओं को मुग्ध करने वाली ये दमदार, गहरी और ठहरी हुई आवाज़ आज थम गई। 

आकाशवाणी में समाचार वाचक कैडर के आखिरी स्तंभ और महाकवि रामधारी सिंह दिनकर के भतीजे रामानुज प्रसाद सिंह ने 86 साल की उम्र में आज यानी 22 सितंबर 21के दिन इस दुनिया को अलविदा कह दिया। 

आकाशवाणी में समाचार वाचक कैडर की आखिरी चौकड़ी देवकी नंदन पांडेय, विनोद कश्यप, अशोक वाजपेयी और रामानुज प्रसाद सिंह की ही रही. इसके बाद ये कैडर समाप्त हो गया और बाद के समाचार वाचक अनुवादक सह समाचार वाचक की श्रेणी में ही आए. यह जानकारी मीडिया और साहित्य की दुनिया से जुडी शख्सियत मनविंदर भिंबर ने कल अर्थात 22 सितंबर 2021 की रात को 11:02 बजे दी। उन्होंने वाया राजेश चड्ढ़ा यह जानकारी दी। 

रेडियो की यादें दिमाग में आते ही याद आ जाती है रामनुज प्रसाद सिंह जी की याद। बहुत ही अच्छा बोलते थे। उन्हें नमन। बहुत ही दमदार आवाज़ थी। भावों से भरी हुई प्रभावशाली आवाज़। समाचार सुनने को उत्सुक करती हु आवाज़। नींद से जगाती हुई आवाज़। हालात के चक्र की की दस्तक देती हुई आवाज़। आज तक ज़हन में सुनाई देती है। उनका जाना--एक युग का चले जाना है। उनका अतीत हो जाना सचमुच पीड़ादायिक है। रामानुज प्रसाद सिंह जी को श्रद्धासुमन अर्पित हैं। दिल भरा हुआ है। ऑंखें भीगी हुई हैं। अंतर्मन में रेडियो से जुडी यादों का बवंडर सा है। उन्हें एक बार फिर से नमन। काश जाने वालों से कभी दोबारा भेंट का कोई सुअवसर मिला करता। काश वहां भी आकाशवाणी होती और हम सुन पाते उनकी आवाज़ में वहां के समाचार। उनके जाने से जो सदमा हम कुछ लोग महसूस कर रहे हैं उस  महसूस करते हुए हमें मिलजुल कर एक प्रयास करना होगा। रेडियो की दुनिया से जुड़े जो लोग अभी भी हमारे दरम्यान हैं। उन्हें संभालना होगा। उनकी आवाज़ें, उनके अनुभव, उनके ख्याल, उनकी रचनाएं, उनकी तस्वीरें बहुत कुछः सहेजने वाला है। आवाज़ की दुनिया से जुड़े उनके गुर भी उनसे पूछने होंगें तांकि रेडियो की दुनिया अमीर बनी रहे। निश्चिन्त रहिए ,रेडियो समाप्त नहीं होगा हैं तकनीकी रूप चाहे बदलता रहे। रेडियो का जादू कुछ कम हुआ अवश्य लगता है लेकिन जल्द ही लौटेगा रेडियो का करिश्मा। लोग टीवी से अब ऊबने लगे हैं। आओ सुनते हैं ज़रा ध्यान दीजिए। आवाज़ आ रही है---ये आकाशवाणी है! अब आप रामानुज प्रसाद सिंह से समाचार सुनिए......!!!                     ---रेक्टर कथूरिया


Wednesday, August 11, 2021

सोशल मीडिया के महत्व को फिर पहचाना लोक संपर्क विभाग ने

 11th August 2021 at 9:26 PM

सरकार की उपलब्धियों को सोशल मीडिया के पर प्रसारित करने की ज़रूरत-अनिंदिता मित्रा


चंडीगढ़
: 11 अगस्त 2021: (गुरजीत बिल्ला//मीडिया स्क्रीन)::

कोई ज़माना था जब सोशल मीडिया से जुड़े लोगों और मंचों को बहुत छोटा करके देखा जाता था। उस दौर में इसे  इससे सबंधित वर्ग को बहुत ज़्यादा अंडरएस्टिमेट किया गया। इसी नज़रअंदाज़ी के चलते धीरे धीरे इसने इतना ज़ोर पकड़ा लिया की यह मुख्य धरा के मीडिया को प्रभावित करने लगा। आज टवीटर और फेसबुक जैसे मंचों को बेहद महत्वपूर्ण घोषणाओं के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यूटयूब पर छोटी छोटी फ़िल्में और गीतों की एल्बम रिलीज़ होने लगी हैं। कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया ने अपन अलोहा मनवा लिया है। मुख्य ड्सरा का मीडिया भी अपने प्रचार प्रसार के लिए इसका सहारा ले रहा है। व्हाटसअप्प ने तो इसकी लोकप्रियता को चार चाँद लगा दिए हैं। ऐसे में पंजाब सरकार के लोक सम्पर्क विभाग ने भी इसके जादू को स्वीकार किया है। इसके इस्तेमाल की बाकायदा सिफारिशें होने लगीं हैं। 

आज के दौर में पंजाब सरकार की उपलब्धियों को घर-घर पहुँचाने के लिए सूचना एवं लोक संपर्क विभाग को नये युग के प्रचार साधन सोशल मीडिया का अधिकतम प्रयोग करना चाहिए। उक्त विचार विभाग की डायरैक्टर श्रीमती अनिंदिता मित्रा ने आज यहां विभाग के अधिकारियों के साथ मीटिंग के दौरान व्यक्त किये। मीटिंग में इसकी चर्चा ने काफी समय लिया। इस सदुपयोग पर कई बातें हुईं। 

इस अवसर पर श्रीमती मित्रा ने कहा कि सूचना एवं लोक संपर्क विभाग सरकार और लोगों के बीच सेतु का काम करता है जो कि सरकार की जन कल्याण स्कीमें और सरकार द्वारा जनहित में लिए फ़ैसलें अखबारों, टी.वी., रेडियो के द्वारा प्रचार करता आ रहा है। परंतु अब दिन-प्रतिदिन सूचना प्रौद्यौगिकी के परिणामस्वरुप प्रचार साधनों में आ रही तबदीलियों को देखते हुए समय की मांग अनुसार सरकार के कामों का प्रचार सोशल मीडिया के द्वारा भी किया जाना चाहिए। इस तरह छुटपण या हिकारत की नज़र से देखा जाने वाला सोशल मीडिया अब सम्मान पा रहा है। सोशल मीडिया की अहमियत को एक तरह से मान्यता मिल रही है। 

श्रीमती मित्रा ने विभाग के अधिकारियों को हिदायत की कि वह लोगों की समस्याओं संबंधी  फीडबैक तुरंत विभाग को दें जिससे सरकार इन समस्याओं को जल्द दूर कर सके।

उन्होंने कहा कि पंजाब सरकार द्वारा जन-समर्थकी नीतियों को ज़मीनी स्तर तक पहुँचाने के लिए 100 से अधिक अलग-अलग स्थानों पर एल.एफ.डी. स्थापित की गई हैं। यह एल.एफ.डीज़. स्थापित करने का कार्य अगस्त महीने के अंत तक मुकम्मल कर दिया जायेगा।

अतिरिक्त सचिव सूचना एवं लोक संपर्क विभाग सेनू दुग्गल, आई.ए.एस. ने मीटिंग को संबोधन करते हुये कहा कि कोविड -19 के कारण पैदा हुई स्थिति में सरकार द्वारा इस महामारी से निपटने के लिए समय-समय पर जारी हिदायतों और ऐडवायज़रियों को सोशल मीडिया के द्वारा ही बहुत कम समय में अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना संभव हो सका है।

मीटिंग में विशेष तौर पर अतिरिक्त डायरैक्टर ओपिन्दर सिंह लांबा, ज्वाइंट डायरैक्टर अजीत कंवल सिंह हमदर्द, ज्वाइंट डायरैक्टर रणदीप सिंह आहलूवालीया, ज्वाइंट डायरैक्टर हरजीत सिंह ग्रेवाल, डिप्टी डायरैक्टर पी.एस. कालड़ा, डिप्टी डायरैक्टर इशविन्दर सिंह ग्रेवाल, डी.सी.एफ.ए. गगनदीप बस्सी और समूह जि़ला लोक संपर्क अधिकारी और मुख्यालय में तैनात लोक संपर्क अधिकारी उपस्थित थे।

Saturday, January 2, 2021

नहीं रहे रेडियो प्लेबैक वाले सक्रिय पत्रकार कृष्णमोहन मिश्रा

 टैक्स्ट के साथ आवाज़ और शब्दों के प्रयोग में भी बहुत ही कुशल थे 

लखनऊ//इंटरनेट: 2 जनवरी 2020: (मीडिया स्क्रीन ऑनलाइन डेस्क):: 

देश के हालात की मायूसी और उदासी के इस माहौल में एक और उदास  खबर आई है राजू मिश्र की एक पोस्ट के रूप में। इसमें एक बहुत अच्छे पत्रकार के बिछुड़ जाने की सूचना है। यह खबर सोशल मीडिया पर सामने आई। उदास कर देने वाली यह पोस्ट है लखनऊ के एक  ऐसे कर्मयोगी पत्रकार के निधन से सबंधित जिन्होने टैक्स्ट के साथ साथ आवाज़ के जादू को भी ब्लॉग मीडिआ के तौर पर सक्रिय हो कर इस्तेमाल किया। उनके प्रयोग बेहद सफल रहे और ने टैक्स्ट और आवाज़ के समन्वय को बहुत ही खूबसूरती के साथ प्रस्तुत किया। रेडियो प्लेबैक उनका बहुत ही ज़बरदस्त प्रयोग रहा जो निकट भविष्य में ही हमें नए नए आर जे भी दिया करेगा। शब्दों और आवाज़ का संमिश्रण  जादू बिखेरता। एक पूरी टीम इस सारे प्रयोग पर नज़र रखती। रेडियो ब्लॉग की दुनिया में यह बहुत  लोकप्रिय हुआ।  Krishnamohan Mishra जी की पोस्टें हमें उनकी याद दिलाती  रहेंगी। राजनीतिक विचारों के भेदभाव से ऊपर उठ कर केवल समाज और विशुद्ध पत्रकारिता के धर्म को निभाते हुए हम उन्हें याद रखें  तो यही बात हमें आगे बढ़ने की शक्ति भी देगी।  

उनके मित्र  राजू मिश्रा बताते हैं-वरिष्ठ पत्रकार कृष्णमोहन मिश्र का गुरुवार की रात लखनऊ में हृदयाघात से निधन हो गया। वे लगभग 70 वर्ष के थे। श्री मिश्र ने अपने पीछे पत्नी और दो पुत्रियों को छोड़ा है। अपरान्ह दो बजे भैंसाकुंड स्थित श्मसान घाट पर उनकी अन्त्येष्टि हुई। श्री मिश्र को उनकी बेटी ने मुखाग्नि दी।कृष्ण मोहन जी का जन्म वाराणसी में हुआ था। उनकी शिक्षा दीक्षा वाराणसी में ही हुई। उन्होंने मिर्जापुर के पालिटेक्निक से शिक्षा ग्रहण की थी। इसके बाद लखनऊ के बांस मंडी स्थित आईटीआई में प्रशिक्षक रहे। यहीं से करीब दस वर्ष पूर्व वे सेवानिवृत्त हुए। श्री मिश्र सांस्कृतिक पत्रकार भी थे। सेवा में रहते हुए उन्होंने सांस्कृतिक पत्रकारिता की। वे दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान में सांस्कृतिक संवाददाता भी रहे। इसके साथ ही वे संस्कृति और संगीत पर लगातार लेखन करते थे। सोशल मीडिया में वे लगातार संगीत और गायन की विभिन्न विधाओं पर लेखन कर रहे थे। वे उ.प्र. जर्नलिस्ट्स एसोशिएशन की पत्रिका उपजा न्यूज और संस्कार भारती की पत्रिका कला कुंज भारती के भी संपादक रहे। आजकल वे राजधानी में जानकीपुरम् क्षेत्र की इकाई के अध्यक्ष थे। गोमती नगर निवासी श्री मिश्र को बीती रात करीब नौ बजे हृदयाघात हुआ। परिवार के लोग उन्हें तत्काल डा. राम मनोहर लोहिया चिकित्सालय ले गए जहां डाक्टरों ने बताया कि तीव्र हृदयाघात से उनका निधन हो चुका है। विनम्र श्रद्धांजलि।

उनके एक और गहरे मित्र सुजॉय चटर्जी उन्हें बहुत ही स्नेह और सम्मान के स्मरण करते हुए कहते हैं-ख़ामोश हुआ "स्वरगोष्ठी" का स्वर, नहीं रहे कृष्णमोहन मिश्र जी। इस गहरे सदमे को उनके मित्र किस मुश्किल से सहन कर पा रहे हैं इसे बताना मुश्किल है। 

श्री चटर्जी कहते हैं: कृष्णमोहन जी लखनऊ के प्रसिद्ध एवम् वरिष्ठ सांस्कृतिक पत्रकार/ सम्पादक होने के साथ-साथ शास्त्रीय एवम् लोक-संगीत के विशिष्ट जानकार, विश्लेषक, समीक्षक, लेखक, जानेमाने मंच संचालक, साक्षात्कारकर्ता और ब्लॉगर भी थे। हमारे ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ नामक ब्लॉग में वे शास्त्रीय एवम् लोकसंगीत पर आधारित स्तम्भ ’स्वरगोष्ठी’ का पिछले दस वर्षों से निरन्तर संचालन करते चले आ रहे थे। इन्टरनेट पर शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक, सुगम और फिल्म संगीत विषयक चर्चा का सम्भवतः यह एकमात्र नियमित साप्ताहिक स्तम्भ है, जो विगत दस वर्षों से निरन्तरता बनाए हुए है। आज उनके चले जाने से यह स्तम्भ अनाथ हो गया।

अपनी मित्रता और उनके साथ मीडिया और जीवन से जुड़े अनुभवों के आदान प्रदान का ज़िक्र करते हुए वह भरे मन से कहते हैं-मेरा कृष्णमोहन जी से पहला परिचय वर्ष 2011 में हुआ था। उन दिनों सेवानिवृत्ति के बाद वे इन्टरनेट पर सक्रिय हो रहे थे। उन्हीं दिनों शास्त्रीय संगीत पर आधारित एक स्तम्भ हमने शुरू किया था ’सुर संगम’, पर शास्त्रीय संगीत के जानकार न होने की वजह से हमारे लिए इसे लम्बे समय तक चला पाना मुश्किल हो रहा था। मेरे मित्र Sumit Chakravarty ने भी कुछ समय तक इसे आगे बढ़ाया। उन दिनों कृष्णमोहन जी इस स्तम्भ के पाठक हुआ करते थे। उनकी नियमित टिप्पणियों को पढ़ कर मुझे और सुमित को यह आभास हो गया था कि अगर कोई इस स्तम्भ को सही तरीके से आगे बढ़ा सकते हैं तो वो कृष्णमोहन जी ही हैं। उन्हें यह प्रस्ताव देते ही वे फ़ौरन राज़ी हो गए। और उस दिन से लेकर आज तक, उन्होंने ही इस साप्ताहिक स्तम्भ का संचालन किया ’स्वरगोष्ठी’ शीर्षक से और एक भी सप्ताह ऐसा नहीं बीता कि जब ’स्वरगोष्ठी’ का अंक प्रकाशित ना हुआ हो। आज इसके 495 अंक प्रकाशित हो चुके हैं। शास्त्रीय एवम् लोक संगीत के लेखों से सुसज्जित ये 495 अंक हिन्दी ब्लॉग जगत में किसी अनमोल ख़ज़ाने से कम नहीं है। इस धरोहर को हमें सहेज कर रखना है।

श्री चटर्जी बताते हैं कि कृष्णमोहन जी से मैंने बहुत कुछ सीखा है। लेखन शैली और प्रकाशनयोग्य formatting के बारे में उन्होंने तो बहुत कुछ बताया ही था, पर केवल उनको देख कर भी कई चीज़ें सीखने को मिली। वे पूरे perfection के साथ लेख लिखते थे, उनके लिखे पोस्ट्स पर किसी भी तरह की ग़लती ढूंढ पाना असम्भव सा था। वे कभी जल्दबाज़ी और shortcut में नहीं जाते थे, अगर समय ना हो तो साफ़ मना कर देते थे, पर quality के साथ कभी समझौता नहीं करते थे। वे इतने ईमानदार थे कि उनके लेखों के लिए जो भी कोई छोटी से छोटी जानकारी भी उन्हें देता था, वे उनका नाम लेख में उल्लेख करना कभी नहीं भूलते थे। ’स्वरगोष्ठी’ में जब भी कभी उन्हें किसी फ़िल्मी गीत से सम्बन्धित कोई रोचक जानकारी की आवश्यकता पड़ती थी तो वे मुझसे सलाह करते थे, और अगर मैं उन्हें कोई जानकारी उपलब्ध करवाता तो वे मेरा नाम लेख में “जानेमाने फ़िल्म इतिहासकार” के रूप में लिखते थे जिसे पढ़ कर मुझ हँसी आ जाती थी और embarrassment भी होता था क्योंकि मैं कोई फ़िल्म इतिहासकार नहीं हूँ। यह उनका बड़प्पन ही था बस! वे इतने विनयी थे कि जब भी कभी मैं उनसे कहता कि मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा है तो फ़ौरन उनका जवाब होता था कि उन्होंने भी मुझसे बहुत कुछ सीखा है। प्रसिद्ध अभिनेता Pranay Dixit जी के मौसा जी लगते थे कृष्णमोहन जी। जब वर्ष 2013 में प्रणय जी की पहली फ़िल्म ’Roar’ रिलीज़ होने जा रही थी, तब कृष्णमोहन जी के ज़रिये मुझे प्रणय जी का साक्षात्कार लेने का मौका मिला। उन्होंने यह दायित्व मुझे सौंप कर मेरा सम्मान बढ़ाया था।

हालांकि दोनों मित्रों में उम्र  का अंतर भी काफी था। चटर्जी साहिब बताते हैं उम्र में मैं कृष्णमोहन जी से करीब 30 साल छोटा हूँ, पर उनसे बात करते समय कभी इसका अहसास नहीं हुआ। हमेशा ऐसा ही लगा कि जैसे हम हम-उम्र हों। वे ऐसे बात करते थे कि जैसे अपने किसी हम-उम्र दोस्त के साथ बतिया रहे हों। उन्हें जब भी कभी मेरे द्वारा लिखा कोई पोस्ट पसन्द आता था तो फ़ोन करके बधाई देते थे। मुझे याद है एक बार मैंने जब अपने किसी लेख में “साज़िन्दों” की जगह “वाद्य-वृन्द” शब्द का प्रयोग किया था, उन्हे यह इतना अच्छा लगा कि केवल यही बताने के लिए उन्होंने मुझे फ़ोन किया। वे कभी फ़ोन पर व्यक्तिगत बात या इधर-उधर की बात नहीं करते थे, सीधे काम की बात करते थे, professionalism उनमें कूट-कूट कर भरा हुआ था। कुछ वर्ष पूर्व एक बार मैंने उनसे कहा कि मेरा बेटा शास्त्रीय संगीत सीख रहा है पर वो रियाज़ ही नहीं करता। तब कृष्णमोहन जी ने बताया कि दस वर्ष की आयु से पहले बच्चे से ज़्यादा रियाज़ ना करवाऊँ वरना आवाज़ ख़राब हो सकती है। यह बेहद महत्वपूर्ण बात उनसे जानने को मिली थी। एक बार मैंने उनसे कहा कि आपने लम्बे समय से एक ही profile pic लगा रखी है, इसे बदलते क्यों नहीं, तो बोले तो यह उनका प्रिय फ़ोटो है और उनका सबसे अच्छा फ़ोटो है। जितना मुझे याद है यह तसवीर किसी ने संगीत नाटक अकादमी में खींची थी। 

फेसबुक वाली प्रोफ़ाइल तस्वीर की तरह ही उन्होने अपने  मित्र भी नहीं बदले। जिससे मित्रता लगाई उसके साथ आखिर तक निभाया। 

कुछ सप्ताह पूर्व जब आख़िरी बार उनसे बात हुई थी तब वे काफ़ी उत्साहित थे इस बात को लेकर कि ’स्वरगोष्ठी’ के ना केवल दस वर्ष पूरे हो रहे हैं बल्कि इसके 500 अंक भी पूरे हो रहे हैं। और संयोग देखिए कि इसी सप्ताह ’स्वरगोष्ठी’ के दस वर्ष पूरे हो रहे हैं 495-वें अंक के साथ। ब्लॉगर में उन्होने इस सप्ताह का पोस्ट शेड्युल कर रखा है और इस पोस्ट में उन्होंने ’स्वरगोष्ठी’ के दस वर्ष पूर्ति पर इसके प्रथम अंक के लिए मेरे लिखे हुए लेख का एक अंश भी प्रस्तुत किया है, जिसे पढ़ कर निर्वाक् हो गया हूँ। आज कृष्णमोहन जी के इस तरह अचानक चले जाने से ऐसा लग रहा है कि जैसे एक महाशून्य सा उत्पन्न हुआ है। अभी तो उनके साथ बहुत काम करना बाकी था। उनसे बहुत सारी बातें करनी थीं। सब एक ही झटके में समाप्त हो गया। शायद इसी क्षणभंगुरता का नाम जीवन है। कृष्णमोहन जी मुझे हमें हमेशा याद रहेंगे। उनको श्रद्धांजलि स्वरूप और उनके 500-वें अंक के सपने को साकार करने हेतु हमने ’स्वरगोष्ठी’ के अन्तिम पाँच अंकों को लिखने का निर्णय लिया है। यही उनके लिए हमारी श्रद्धांजलि होगी।

Tuesday, May 5, 2020

70 वर्षीय चाची को कंधे पर उठा कर पैदल चल पड़ा मज़दूर

 Tuesday: 5th May 2020 at 12:07 PM
 विकास और बुलंदी के दावों को झुठलाती मिड डे की स्टोरी हुयी वायरल 
सोशल मीडिया: 5 मई 2020: (फेसबुक पर बोद्धिसत्व)::
Bodhi Sattva ने एक सच्ची कहानी पोस्ट की। इसे जानमाने अख़बार मिड डे, मुम्बई से साभार लिया गया था। तस्वीर भी और विवरण भी। ह पोस्ट सोशल मीडिया पर बेहद लोकप्रिय हुई क्यूंकि इसमें आज का सच था वह भी बिना किसी सियासत और बिना किसी अन्य आडम्बर के। इसी पोस्ट को उनके कुछ अन्य नए पुराने मित्रों ने भी शेयर किया। किसी ने कुछ शब्द घटा दिए और किसी ने कुछ शब्द जोड़ दिए। इस सब के बावजूद इसका सच लोगों के दिलों को झंकझौरता रहा। कोरोना के शोर में दब रहे अन्य समस्यायों के दर्द जिस तरह नज़रंदाज़ किया जा रहा है उस तरह इस दर्द को न छुपाया जा सका न ही दबाया जा सका। सोशल मीडिया पर मिली लोकप्रियता ने इसे नज़रंदाज़ होने से भी बचा लिया। इसे शेयर करने वाले मित्रों ने पूछा:
इस प्यार को क्या नाम और मान दिया जाए? 
यही कह सकता हूं कि हर चाची को ऐसा भतीजा मिले। हर मां को ऐसा बेटा मिले!
ये विश्वनाथ शिंदे हैं। उम्र चालीस साल। मुम्बई में कंस्ट्रक्शन वर्कर हैं। 
वही मज़दूर। घर जा रहा मज़दूर।
उनकी गोद में उनकी चाची वचेलाबाई हैं। चाची 70 साल की हैं और उनका अब विश्वनाथ के अलावा कोई नहीं। विश्वनाथ अपनी चाची को नवी मुंबई से अकोला ले जा रहे हैं।
भतीजा चाची के लिए पिता हो गया है। चाची बेटी हो गई है। यह मनुष्यता की सबसे बड़ी उपलब्धि है। साथ और स्नेह का बंधन!
इस प्यार और मार्मिक अपनापे भरी कठिन यात्रा पर किसी सरकार की नज़र क्यों न पड़ी?
मीडिया का बहुत बड़ा हिस्सा ऐसी हकीकतों को जानबूझ कर नज़र अंदाज़ कर रहा है। मिड डे ने इसे जगह दी इसलिए मिड डे, मुम्बई को सलाम।  
*तस्वीर और जानकारी मिड-डे, मुम्बई से साभार

Friday, April 24, 2020

Media: जोड़तोड़-तिकड़म-जुगाड़ और चैनल

पर्दे के पीछे होते तिकड़मी खेलों की एक झलक 
सोशल मीडिया: 24 अप्रैल 2020: (मीडिया स्क्रीन Online)::
आज के दौर में जोड़तोड़, तिकड़म और जुगाड़ के बिना मीडिया चलाना नामुमकिन सा हो गया है। कुछ प्रभावशाली लोग चाहें तो नया चैनल भी चल सकता है और बुरा मान जाएँ तो चला चलाया चैनल बंद भी हो सकता है। इन तिकड़मों की एक झलक श्याम मीरा सिंह की नई पोस्ट में भी मिलती है। बस कुछ मिंट ही लगेंगे लेकिन पढ़िए ज़रूर और अंत तक पढिये। पर्दे के पीछे होते कई खेल नज़र आने लगेंगे।-रेक्टर कथूरिया 
अर्नब गोस्वामी और रिपब्लिक चैनल//श्याम मीरा सिंह 
6 मई 2017 के दिन पत्रकारिता के बाजार में एक नए मदारी की एंट्री होती है। मदारी अर्नब, दुकान का नाम 'रिपब्लिक'। आप रिपब्लिक टीवी के बारे में कुछ याद कीजिए-
*पहले दिन - लालू प्रसाद यादव और शहाबुद्दीन की बातचीत की स्टोरी ब्रेक की जाती है।
*दूसरे दिन - आम आदमी पार्टी के पूर्व विधायक कपिल मिश्रा को लांच किया जाता है जो आम आदमी पार्टी में स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन पर 2 करोड़ की घूसखोरी का सनसनीखेज आरोप लगाता है।
- तीसरे दिन शशि थरूर और सुनंदा पुष्कर के पुराने मामले को निकाला जाता है।
शशि थरूर के मामले में कुछ भी नया नहीं घटा था, लेकिन अर्नब इसे कई दिन तक अपने प्राइम टाइम की डिबेट में जगह देते हैं। इस बात को थोड़ा ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे को कुछ देर के लिए यहीं छोड़िए। उससे पहले एक मामला बताता हूँ। टीवीस्क्रीन पर नीचे ब्रेकिंग न्यूज में जो लिखकर आता है, पत्रकारिता की भाषा में उसे "टिकर" कहा जाता है। एक कर्मचारी केवल टिकर का काम देखने के लिए ही रखा जाता है ताकि जैसे ही कोई खबर ब्रेक हो तुरंत टीवी की हेडलाइन्स में उसे नीचे लिख दिया जाए।
ऐसे ही सितंबर महीने की बात है, माया कोडनानी मामले में अमित शाह गुजरात कोर्ट में पेशी के लिए पहुंचे। ऐसा माना जाता है कि दर्जनों मुस्लिमों की हत्या के मामले में अमित शाह की भूमिका भी थी। रिपब्लिक चैनल के टिकर कर्मचारी ने इस खबर को हेडलाइन पर लगा दिया। जैसे ही खबर टीवी पर लगी, निरंजन नारायणस्वामी ने तुरंत उस कर्मचारी को फटकार लगाते हुए कहा "Let's not touch This". निरंजन नारायणस्वामी रिपब्लिक चैनल की एडिटोरियल डेस्क के हेड थे। एडिटोरियल डेस्क से अर्थ होता है कि ऐसी समिति जो ये तय करे कि अमुक टीवी में किस तरह की खबरें चलेंगी, किस तरह की नहीं। ये पूरी खबर आपको caravan मैगज़ीन की डिटेल्ड स्टोरी "No Land's Man" में मिल जाएगी।
क्या आपने कभी सोचा? कि वो इंसान जो लालू प्रसाद यादव, केजरीवाल से लेकर शशि थरूर को तीन दिन के अंदर लाइन में लगा देता है वह अमित शाह का नाम आते ही शंट कैसे हो जाता है?
इस सवाल का जबाव आपको रिपब्लिक चैनल के जन्म लेने की कहानी में मिलेगा। राजीव चंद्रशेखर नाम से एक बड़े उद्योगपति हैं, आपने टीवी, फ्रिज बनाने की कम्पनी BPL का नाम सुना है? सुना ही होगा खैर, इसी कंपनी ने 1995 के दौर में मोबाइल बनाने का काम शुरू किया था। इस पूरे प्रोजेक्ट को बनाने वाले आदमी का नाम था राजीव चंद्रशेखर। बाद में राजीव चंद्रशेखर कर्नाटक से दो बार राज्यसभा सांसद बने हैं, लेकिन इंडिपेंडेंट। देश में भाजपा सरकार आने के बाद ही राजीव चन्द्रशेखर की कोशिश थी कि कैसे भी मोदी सरकार की कैबिनेट में जगह मिल जाए। चूंकि सांगठनिक रूप से चंद्रशेखर कुछ भी नहीं थे, कोई अनुभव नहीं था। इसलिए उन्होंने दिल्ली मीडिया में इन्वेस्टमेंट के लिए प्लान बनाया। इसके लिए उन्होंने न्यूजएक्स से लेकर एनडीटीवी तक में बात की। लेकिन बात नहीं बनी। उन्हीं दिनों अर्नब गोस्वामी ने टाइम्स नाउ से इस्तीफा दिया था। अर्नब अपने लिए इन्वेस्टर ढूंढ रहे थे। राजीव अपने लिए एक बाजीगर ढूंढ रहे थे। बस इसी मोड़ पर दोनों का मिलन होता है।
रिपब्लिक टीवी चैनल को AGR Outlier Media Private Limited कंपनी के अंतर्गत शुरू किया जाता है। इसमें 26 करोड़ रुपए अर्नब गोस्वामी और उनकी पत्नी सम्यब्रत रे गोस्वामी और 30 करोड़ रुपए अकेले राजीव चंद्रशेखर के होते हैं। ये 30 करोड़ रुपए राजीव ने "जुपिटर कैपिटल" नाम की एक कम्पनी के माध्यम से इन्वेस्ट किए। इस कम्पनी का नाम याद कर लीजिए। आगे का पूरा खेल समझने में यही नाम आपके काम आने वाला है।
साल 2016 में राजीव चंद्रशेखर को केरल में भाजपा गठबंधन (NDA) का उपाध्यक्ष बनाया गया। साल 2014 में भी चंद्रशेखर केरल की तिरुवनंतपुरम सीट से टिकट लेना चाहते थे। तब नहीं मिली तो उनकी नजर साल 2019 के चुनावों में तिरुवनंतपुरम से लोकसभा सीट लेने पर हो गई। ये वही सीट है जहां से शशि थरूर सांसद हैं।
अब समझ आया? अर्नब गोस्वामी ने अपने चैनल के तीसरे तीन ही शशि थरूर और उनकी पत्नी के एक पुराने मामले को ब्रेकिंग न्यूज क्यों बना दिया था? राजीव चंद्रशेखर को तिरुवनंतपुरम में मजबूत करने के लिए।
इसके अलावा याद होगा किस तरह अर्नब गोस्वामी ने एक संघ कार्यकर्ता की मौत के लिए सीपीआई वर्कर्स को जिम्मेदार ठहराते हुए ये पूरा झूठ दिनभर टीवी पर बेचा था कि सीपीआई कार्यकर्ता तिरुवनंतपुरम में आरएसएस कार्यकर्ताओं की हत्या करते हैं। इसके पीछे एक ही कारण था चंद्रशेखर के लिए तिरुवनंतपुरम के मैदान को साफ करना।
साल 2014 में चन्द्रशेखर को भाजपा ने संसद की डिफेंस स्टैंडिंग कमिटी का सदस्य बना दिया। इस कमिटी का काम सरकार द्वारा डिफेंस सेक्टर में की गई खरीद फरोख्त पर नजर रखना। साल 2016 की बात है। एक कम्पनी थी Axiscades Aerospace & Technologies नाम से। इसका शार्ट नाम है ACAT. साल 2016 में सरकार ने इसे 88 aircraft-recognition training systems सप्लाई करने का एक कॉन्ट्रैक्ट दिया। तब से लेकर ऐसे अनगिनत कॉन्ट्रैक्ट इस कम्पनी को दिए गए। क्या आप जानते हैं इस ACAT कम्पनी में किसका पैसा लगा हुआ है?
मैं बताता हूँ, साल 2015 तक इस कम्पनी में 75 प्रतिशत शेयर जुपिटर कैपिटल के थे। वही जुपिटर कैपिटल जिसके मालिक चंद्रशेखर हैं। देखिए ये कितना बड़ा घपला है कि सरकार जिस कम्पनी को कॉन्ट्रैक्ट दे रही थी उस कम्पनी का मालिक "डिफेंस स्टैंडिंग कमिटी" का मेम्बर था। ये कितना बड़ा "कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट" है? मतलब जिस आदमी को कॉन्ट्रैक्ट बांटने का जिम्मा सौंपा गया है वही कॉन्ट्रैक्ट ले ले रहा है। ये ऐसा भ्रस्टाचार है जो सीधे सीधे भ्रस्टाचार के रूप में नहीं पकड़ा जा सकता। इस पूरे मसले पर "द वायर" ने एक डिटेल्ड रिपोर्ट की थी, उस खबर के बाद ही राजीव चन्द्रशेखर ने द वायर पर डिफेमेशन का केस कर दिया था।
ऐसा बताया जाता है कि प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से राजीव चंद्रशेखर के पास 7500 करोड़ की संपत्ति है। राजीव के पास 120 करोड़ रुपए का एक प्रायवेट जेट भी है। और उसका खिलौना अर्नब आज इतने बड़े चैनल का मालिक बन चुका है। दोनों शान से रहते हैं। ऐश की जिंदगी जीते हैं। नई खबरों के अनुसार आज रिपब्लिक न्यूज चैनल में अर्नब गोस्वामी और उनकी पत्नी के शेयर सबसे अधिक हो गए हैं। इसलिए किस दिन टीवी पर कौन सा एजेंडा चलाना है उसका निर्णय फिलहाल वे खुद ले सकते हैं। अर्नब, केंद्र सरकार और उसके समर्थकों की ताकत से भलीभांति परिचित हैं, इसलिए इस समय उनकी भाषा किसी सरकारी भौंपू से भी निचले स्तर पर आ गिरी है।
चैनल के पिछले मालिक यानी राजीव और नए मालिक यानी अर्नब दोनों करोड़पति हैं, दोनों को सरकार से फायदा होता है, दोनों सरकार का फायदा करते हैं। दोनों लग्जीरियस लाइफ जीते हैं। लेकिन इससे आपको क्या मिला? अर्नब ने आपकी रोजी रोटी के कितने सवाल सरकार से पूछे? महामारी के कारण आपके रोजगार बन्द हैं, आपकी दुकाने बन्द हैं, आपके ठेले बन्द हैं। आपकी भूख, और रोटी के सवाल न पूछकर अर्नब अभी भी हिन्दू-मुसलमान में आपको उलझाए हुए है! आखिर क्यों? आप क्यों इस बात को नहीं समझते, आप सिर्फ यूज किए जा रहे हैं।
इस पूरे खेल को समझना उतना भी मुश्किल नहीं है। आप सच में इसे समझने के लिए गंभीर हैं तो आप आराम से समझ सकते हैं कि सरकार ने चंद्रशेखर को डिफेंस स्टैंडिंग कमिटी का सदस्य क्यों बनाया? और राजीव ने अर्नब के चैनल में पैसा क्यों लगाया।
अब समझ आया? जो आदमी पूरे दिन सोनिया, सोनिया, राहुल राहुल, लालू, लालू कर सकता है वह अमित शाह का नाम लिखने से पहले ही ये क्यों कह देता है कि "Let's not touch This"
 फेसबुक पर श्याम मीरा सिंह इ प्रोफाईल-वाल से साभार 

Wednesday, January 29, 2020

तब आपका एंकर, अपने स्टूडियो में क्या कर रहा था?

Posted on 29th January 2020 at 10:51 AM 
जब आप अपनी रोजी-रोटी छोड़कर,सड़कों पर लड़ रहे थे
जब आप अपनी रोजी-रोटी छोड़कर, सड़कों पर लड़ रहे थे, तब आपका एंकर, अपने स्टूडियो में क्या कर रहा था-
●मुद्दा- तमिलनाडु के किसानों का पानी और सूखे के मुद्दे पर प्रदर्शन।  
एंकर-किसानों के लिए इतने दिनों तक खाने-पीने के पैसे कहाँ से आ रहे हैं? ग्रीनपीस और विदेशी NGO फंडिंग कर रहे हैं। 
●मुद्दा- SSC परीक्षा में घपलों के खिलाफ आम छात्रों का प्रदर्शन
एंकर- कांग्रेस पार्टी छात्रों को सरकार के खिलाफ भड़का रही है.
● मुद्दा- SC-ST Act में छेड़छाड़ के खिलाफ दलितों का भारत बन्द
एंकर- कुछ नेता राजनीतिक रोटियां सेंकना चाहते हैं, राजनीतिक फायदे के लिए देश को जला रहे हैं।
●मुद्दा- MSP को लेकर महाराष्ट्र के किसानों का दिल्ली की तरफ पैदल मार्च
एंकर- इनकी लाल टोपियों, पानी के बोतलों की फंडिंग कहां से हो रही है?
●मुद्दा- 8 साल की बच्ची आसिफा के साथ हुए रेप के खिलाफ देश भर में नागरिकों के प्रदर्शन 
एंकर- जब हिन्दू लड़कियों का रेप होता है तब कोई कैंडल मार्च क्यों नहीं करता?
●मुद्दा- JNU में अप्रत्याशित फीस वृद्धि के खिलाफ छात्रों का प्रदर्शन.
एंकर- जेनएयू में भारत के टुकड़े टुकड़े गैंग के लोग पढ़ते हैं
●मुद्दा- NRC-CAA के खिलाफ मुसलमानों, प्रगतिशील नागरिकों का देशभर में प्रदर्शन
एंकर- शाहीनबाग की औरतों को 500-500 रूपये प्रतिदिन मिल रहे हैं.

आप सड़क पर भूखे-प्यासे लड़ते हैं। काम छोड़ते हैं, तख्तियों पर अपनी समस्याएं लिखते हैं, नारे लगाते हैं, आपकी पूरी मेहनत को शाम होते-होते ही आपका एंकर न्यूट्रलाइज कर देता है। न्यूट्रलाइज ही नहीं करता बल्कि नेगेटिव कर देता है। आपको दंगाई की तरह पेश करेगा। आरोप लगाएगा, आपका चरित्र-चित्रण करेगा, अंततः आपको देशद्रोहियों की तरह पेश करेगा। 

आपकी चीखें, आपके नारे, आपके एंकर की तेज़ आवाज़ में कहीं दबकर रह जाते हैं। आप दिल्ली में लड़ते हैं, एंकर टीवी पर। आपके नारे एक गली से दूसरी गली नहीं पहुंच पाते, एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले नहीं पहुंच पाते लेकिन आपका एंकर उड़ीसा के कालाहांडी के सबसे दूर गांव तक पहुंचा हुआ है। 

आपका एंकर आपके बैडरूम तक पहुंचा हुआ है। मोबाइल और इंटरनेट के थ्रू आपके घर की संडास, रसोई, मंदिर, मस्जिद, स्कूल, कॉलेज, बस, दुकान, शोरूम, हर जगह पहुंचा हुआ है। हर रोज वह आपके लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचल रहा है। हर रोज वह आपकी नागरिकता को खत्म कर रहा है। हर रोज वह आपके पिता, आपके चाचा, भाई, रिश्तेदारों को मिसइन्फॉर्म कर रहा है, दूसरे मजहबों के प्रति उनमें घृणा भर रहा है। एंकर जो क्षति पहुंचा रहा है, वह इतनी स्थायी है कि इस देश में वर्षों तक पुनर्जागरण काल रहे तब भी इस क्षति को भरा नहीं जा सकता। ये नागरिकों की बर्बादी है। लोकतंत्र की बर्बादी है, एक पूरे देश की बर्बादी है। 

ऐसा करने के लिए ज़िम्मेदार एंकरों का प्रतिकार क्यों न किया जाना चाहिए? ऐसे न्यूज चैनलों के मालिकों का विरोध क्यों न किया जाना चाहिए?

क्या आप अपने मुल्क, अपने देश के नागरिकों, अपने परिवारों को बर्बाद होते हुए, सिर्फ देखते ही रहेंगे?

क्योंकि चुप रहना है हमारी सभ्यता है, चुप रहना ही हमारा सहूर है।  आपके देश को मूर्ख बनाने वालों से से, एक अदब सवाल भी न किया जाए?

मैं सच बता रहा हूँ असली बैटल यूनिवर्सिटीयों में नहीं है, दिल्ली में नहीं है, पीएमओ में नहीं है, पुलिस कार्यालय में नहीं है, सच कहूं तो आपके गांव में भी नहीं है, क्योंकि गांव गांव पहुंचने के लिए आपके पास संसाधन नहीं हैं। 

असली बैटल आपके घर की टीवी में है। असली बैटल नोएडा फ़िल्म सिटी के दफ्तरों में है जहां से ये एंकर आपके घरों में जहर सींचते हैं। 

आपके घरों, आपके मुल्क को बर्बाद करने वाले के प्रति, बिल्कुल भी लिहाज करने की जरूरत नहीं है, बिल्कुल भी सभ्य बने रहने की आवश्यकता नहीं है, ऐसे एंकरों का नाम न ले लेकर दलाल कहिए, इनके नाम लीजिए, उसके नीचे लानते लिखिए, शेम कहिए, जहां मिलें उन्हें अहसास कराइए कि वो इस देश के नागरिकों के साथ क्या कर रहे हैं।  --Shyam Meera Singh
श्याम मीरा सिंह की फेसबुक प्रोफ़ाइल से साभार 

Wednesday, September 5, 2018

डीएम ने पकड़े "फर्जी पत्रकार", सूचना अधिकारी ने लिखाया मुकदमा

मामला रायबरेली का-निशाने पर आये संगठन करेंगे जवाबी करवाई ?
रायबरेली: 4 सितंबर 2018: (मीडिया स्क्रीन ऑनलाइन):: 
कौन पत्रकार है और कौन नहीं इसका विवाद गहराता जा रहा है।  फैसला किसी पत्रकार संगठन के हाथों में हो तो बात सही मार्ग पर आगे भी बढ़े लेकिन फैसला करने की " शक्ति" आ गयी है उनके हाथों में जिनके खुद भी पत्रकार होने पर संदेह हो सकता है। कुछ संगठन कुछ शुल्क ले कर लोगों को पत्रकारिता का प्रमाणपत्र और पहचानपत्र दोनों ही देने में लगे हैं। ऐसा नहीं है कि बड़े संगठन शुल्क नहीं लेते। उनका तौर तरीका और है। वे सप्लीमेंट पर ज़ोर देते हैं। इस सरे माहौल में कुछ लोग बिना पत्रकारिता की एबीसी सीखे धड़ल्ले से गलियों बाज़ारों में घुमते हैं। दूसरी तरफ सरकारी विभाग के साथ अगर इनमें से किसी की न बने तो विभागीय अधिकारी इन्हें पत्रकार मानने से साफ़ इंकार कर देते हैं।  
बहुत से सही लोग भी हैं जिनका नाम पत्रों और पत्रिकाओं में छपता है लेकिन उनके पास इतफ़ाक़ से कोई भी कार्ड या पहचान पत्र नहीं होता। क्यूंकि उनकी कार्ड बनवाने की तिकड़म नहीं।  उनकी कोई सिफारिश भी नहीं होती। वे चमचागिरी भी नहीं कर पाते। न वे किसी तथाकथित संगठन को उनका शुल्क दे पाते हैं और न ही किसी बड़े पत्र का सप्लीमेंट निकलने की शर्त पूरी कर सकते हैं। 
दूसरी तरफ बहुत से लोग पत्रकारिता तो नहीं जानते लेकिन वे शुल्क और सप्लीमेंट की शर्तें पूरी करके पत्रकार होने की प्रमाणिकता पूरी कर लेते हैं। ऐसी हालत में दब कर रह जाते हैं वास्तविक पत्रकार। अब टकराव की स्थिति बनने की खबर आई है रायबरेली से। 
सुना है "पत्रकारिता के पवित्र पेशे को दागदार करने वालों" पर रायबरेली जिला प्रशासन की नजरें टेढ़ी हो गई हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हुई जानकारी के मुताबिक एक लोकल न्यूज ग्रुप की आईडी बनाकर करीब आधा दर्जन संख्या में तहसील दिवस पहुंचे पत्रकारों को जिलाधिकारी ने पुलिस के हवाले कर दिया। इस मामले में जिला सूचना अधिकारी की तहरीर पर ऊंचाहार कोतवाली पुलिस ने मुकदमा दर्ज करके जांच शुरू कर दी है। 
मंगलवार को ऊंचाहार तहसील में तहसील समाधान दिवस का आयोजन किया गया था। आयोजित समाधान दिवस में जिलाधिकारी संजय कुमार खत्री और पुलिस अधीक्षक सुजाता सिंह भी मौजूद थीं। जिस समय डीएम और एसपी जनसमस्याओं की सुनवाई कर रहे थे उसी समय पांच लोग एक न्यूज चैनल की आईडी लेकर सभागार में पहुंच गए। 
वहां पहुंचे पत्रकारों ने जब इधर-उधर कैमरा चलाना शुरु किया तो जिलाधिकारी की नज़र उन पर पड़ी। उनकी गतिविधियां देखते ही जिलाधिकारी पहचान गए कि यह पत्रकारों की फौज नहीं बल्कि उनकी ‘फोटो काॅपी’ में आए कुछ "संदिग्ध लोग" हैं। 
डीएम ने एसपी से वार्ता की और फिर दोनों अधिकारियों ने क्षेत्राधिकारी डलमऊ विनीत सिंह व ऊंचाहार कोतवाल धनंजय सिंह को इन पांचों संदिग्धों को गिरफ्तार करने के निर्देश दे दिए। 
पकड़े गए लोगों से जब पुलिस ने पूछताछ की तो वह सही बातें नहीं बता सके। पुलिस ने जिला सूचना अधिकारी से तस्दीक की और जब उनके पत्रकार होने का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला तो जिला सूचना अधिकारी की तहरीर पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज करके जांच शुरु कर दी। क्षेत्राधिकारी डलमऊ सिंह ने बताया कि जिला सूचना अधिकारी की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। अब आज के व्यापारिक युग में कौन पत्रकार हैं और कौन नहीं? कौन करेगा इसका फैसला? इसकी सच्चाई जानने के लिए जांच की जा रही है। कुल मिला कर पत्रकार की परिभाषा एक बार फिर चर्चा में है? यदि यह चर्चा सभी वास्तविक पत्रकारों को एकजुट कर सके तो यह एक बहुत बड़ी बात होगी।