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Thursday, January 19, 2023

नहीं रहे मित्र कुलदीप सिंह कोकी लेकिन छोड़ गए कई सवाल

Monday:16th January 2023 at 03:47 PM Via Mobile call 

पत्रकारों की आर्थिकता मज़बूत बनाने लिए समाज भी आगे आए   


लुधियाना: 18 जनवरी 2023: (रेक्टर कथूरिया//मीडिया स्क्रीन ऑनलाइन)::

आज बाद दोपहर ही पता चला कि पत्रकार कुलदीप जी नहीं रहे। पुराने मित्र और सुख दुःख के साथी रहे अजय कोहली जी ने उनके देहांत की खबर दी। उन्होंने और कुछ अन्य मित्रों ने बताया कि सुबह तक ठीक लग रहे थे। साढ़े सात बजे तक तो अपनी अख़बार मालवा प्वाइंट के लिंक सोशल मीडिया पर पोस्ट भी करते रहे। इसी बीच सुबह ही 09 और 09:30 के दरम्यान ही अचानक उनकी तबियत बिगड़ी। कहने लगे चक्कर से आ रहे हैं। उन्हें फवारा चौंक वाले न्यूरो अस्पताल पहुँचाया गया लेकिन अस्पताल के अंदर पहुँचने से पहले ही वह इस दुनिया से जा चुके थे। सुबह करीब 11 बजे तक उनके न रहने की खबर सभी मित्रों को मिलनी शुरू हुई। वरिष्ठ पत्रकार मित्र अश्वनी जेतली ने भी बहुत से लोगों को सूचित किया। 

बहुत दुखद है कुलदीप जी का यूं चले जाना। हम सभी मित्र प्यार से उन्हें कोकी कहा करते थे। हर रोज़ अक्सर मिलने मिलाने वाले और उनके ज़्यादा नज़दीक रहने वाले मित्रों ने बताया कि कामकाज को लेकर आजकल बहुत बेहद चिंतित थे। उसी चिंता और टेंशन के चलते शायद दिमाग की नाड़ी फट गई। बाद में उनके बेटे दमनप्रीत  सिंह ने  भी ब्रेन हैमरेज की पुष्टि की।  

अभी शायद उम्र के साठ साल ही मुश्किल से पूरे कर पाए थे कि मौत उन्हें देखते ही देखते हमसे छीन ले गई। हम सभी का स्नेही मित्र हमारे दरम्यान नहीं रहा। आर्थिक तंगियों के बावजूद ज़रूरत  पड़ने पर मित्रों का हर संभव सहायक साबित होना। जेब खाली होने पर भी संकटग्रस्त मित्र के लिए कोई रास्ता सुझा देना। खुद को भी अगर कभी कोई बेबसी जैसी हालत घेर ले तो भी दोस्तों को कठिन घड़ियों में हौंसला देना शायद कुलदीप को ही आता था। कोई खुद को तीसमारखां समझ कर कुछ ज़्यादा ही हवा करने लगे तो उसकी हवा पल भर में निकालना भी कुलदीप के लिए चुटकी का काम रहता। किसी की बात पर आशंका होनी तो झट से मोबाईल निकालना औए बात की पुष्टि कर के हकीकत का पता लगा लेना। 

ज़िंदगी और वक्त ने उन्हें बहुत जाने माने लोगों से मिलवाया और बहुत बड़े बड़े घटनाक्रमों का साक्षी भी बनाया।समाज और सियासत में जिन लोगों ने कई कई बार आंधियों के खिलाफ स्टैंड ले कर दिखाया था उनका साथ भी कुलदीप जी को मिलता रहा। क्लीन शेव्ड रहे लेकिन पंथ और सिख धर्म के हर दर्द से अवगत रहते थे। सिख शहादत पत्रिका पर उनका नाम भी प्रिंट लाईन में छपता रहा। कई कई दुर्लभ किताबों का अनुवाद भी हिंदी और अंग्रेज़ी से किया और करवाया। 

किसी को कोई भी समस्या हो तो उनके कंप्लेंट सैल का दरवाज़ा हमेशां उनके लिए खुला रहता। नैशनल रोड पर स्थित काली सी बिल्डिंग--सूर्य आर्केड की सीढ़ियां चढ़ कर उनका दफ्तर आ जाता था। जेब की हालत कैसी भी हो, माहौल का मिजाज़ कुछ भी हो वह अपने पास आने वाले हर व्यक्ति की आवभगत करते और उसका दुःख दर्द सुनते। कोशिश करते संकट का समाधान भी तुरंत बता सकें। 

घर को चलाने में पिता का साथ देते थे। इसी म्हणत मशक्कत ने उनका बचपन भी उनसे छीन लिया था। उनके बचपन का वह मासूम सा चेहरा भी अब तक याद है मुझे। सर पर जुड़ा और उस पर रबड़ के साथ सफ़ेद रुमाल किसी फूल की तरफ सजा लगता था। जब गली मोहल्ले के अन्य बच्चे खेल रहे होते तब वह पिता की प्रिंटिंग प्रेस पर मेहनत कर रहे होते। कभी कंपोज़िंग, कभी फर्मा बांधना और उठवाना, कभी प्रिंटिंग प्रेस पर काम करना। बस साड़ी उम्र काम में ही निकल गई। 

गौरतलब है कि छोटी सी उम्र में ही पिता के साथ लुधियाना के प्रसिद्ध पुराने इलाके इस्लामगंज//अमरपुरा में प्रिंटिंग प्रेस के ज़रिए मेहनत मुशक्कत करते हुए उनकी शख्सियत का दृश्य रह रह कर आंखों के सामने उभर रहा है। उन दिनों पत्र-पत्रिकाओं की छपाई के लिए एक एक अक्षर--एक एक मात्रा जोड़ कर कोई खबर या रचना तैयार होती थी। फिर उन सभी रचनाओं को जोड़ कर पूरा पेज बांधा जाता था और उसके बाद सभी पेज जोड़ कर कोई अख़बार या किताब छपा करती थी। 

उनके पिता बच्चों से बहुत सख्ती के साथ काम करवाया करते थे। उनके भाई भी पूरा सहयोग देते थे। प्रिंटिंग प्रेस नीचे वाले ग्राउंड फ्लोर पर चला  करती थी ऊपर रिहायश हुआ करती थी। थोड़ी थोड़ी देर बाद ऊपर से चाय बन कर आती रहती।  फिर कोशिश होती चाय भी खाली न हो। साथ बिस्कुट या कुछ और भी रहता। साथ ही उनके पिता बातों बातों में अपने सभी क्लाइंटस को बिठाए रखते। बिजली चली जाती तो सब को  मुसीबत ही लगती। कुछ देर के लिए काम रुक सा जाता। अँधेरे में भी कुलदीप कम्पोजिंग करते रहते। अतीत के वे सभी दृश्य अब इतने सालों बाद ज़हन में घूमने लगे हैं। ऐसा लगता है जैसे कोई फिल्म कल्पना के पर्दे पर चल रही हो। 

सत्तर का दशक शायद उस समय समाप्त हो चुका था। अस्सी का दशक शुरू भी हो चुका था। अस्सी के दशक का यह वही दौर था जब पंजाबी में भी आधुनिक प्रिंटिंग अपना रंग ढंग ज़ोरशोर से दिखाने की दस्तक दे रही थी। कम्प्यूटर के ज़रिए कॉमसेट की आधुनिक कम्पोज़िंग चर्चा का विषय बन गई थी। ऑफसेट की तेज़ रफ़्तार प्रिंटिंग हम सभी को हैरान करने लगी थी। 

छोटी प्रिंटिंग प्रेस बस छोटे छोटे जॉब वर्क तक सिमटने लगी थी। लगता था यह सब जल्द ही अतीत बन जाएगी लेकिन सलेमटाबरी और नाली मोहल्ला में अभी भी उनकी झलक मिल जाती है। उस दौर की कई मशीनें ज़ोर शोर से बहुत से लोगों का रोज़गार बनी हुई हैं। इसके बावजूद इस दौर में कइयों की किस्मत पर मंदहाली ने दस्तक दी। कुलदीप कोकी के पिता की प्रिंटिंग प्रेस पर भी इस का असर पड़ा। लेकिन आर्थिक मंदहालियों से जूझते हुए भी उन्होंने न तो कभी अच्छे साहित्य का अध्यन ही छोड़ा और न ही सृजन का सिलसिला बंद होने दिया। इसके साथ ही नई तकनीक से भी वाकिफ होते रहे। सीमित से संसाधनों के बावजूद वह किसी न किसी बहाने मीडिया में सक्रिय रहे। यह सक्रियता पैसे कमाने के लिए नहीं थी बल्कि एक मिश्र को लेकर थी। वह बड़े बड़े समूहों में रह कर और उनसे दूर हो कर भी इस मिशन को समर्पित रहे। 

आज उनके जाने की खबर सुन कर मन बहुत उदास हो गया है।

फिर बहुत से सवाल उठ रहे हैं क्या यही है ज़िंदगी? कभी भी किसी भी वक्त किसी मित्र से बिछड़ जाना और कुछ न कर पाना!

कितने बेबस से हैं हम लोग हैं।  मित्रों  देखते रहते हैं लेकिन उन्हें बचाने का कोई ठोस कदम नहीं उठा सकते। समाज को राह दिखने वाला मीडिया अभी तक अंधेरे में है। 

जो वास्तविक ज़िंदगी में काम करते हैं लेकिन तिकड़मबाज़ी नहीं करते वे क्यूं इतने गुमनाम रह जाते हैं। क्यूं  उन पर खुशहाली की कृपा नहीं होती? लक्ष्मी क्यूं उन पर मेहरबान नहीं होती? हम दोनों के एक नज़दीकी मित्र बलवीर सिद्धू (पंजाबी अख़बार-जस्टिस न्यूज़ के मालिक,संपादक और प्रकाशक) ने बताया कि बार उन्हें सरकारी कार्डों और फायदों के लिए कहा लेकिन वह हर बार हंसते हुए बात को टाल जाते। यूं लगने लगता जैसे वह उनकी ख़ामोशी और रहस्यमय हंसी में शायद एक पुराना गीत गुनगुना रहे हों--

सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी

सच है दुनिया वालों कि हम हैं अनाड़ी!

अब कुलदीप कोकी जी हमारे दरम्यान नहीं रहे। ज़िंदगी भर संघर्ष करने वाला शख्स अब मौत की आगोश में  चला गया। सब संघर्ष बीच में ही छूट गए। सभी इरादे भी अधर में ही रह गए। लेकिन उनका जाना बहुत से सवाल छोड़ गया है कि क्या यह सब यूं ही चलता रहेगा? मेहनत, मुशक्कत, ईमानदारी और प्रतिबद्धता इसी तरह दम तोड़ती रहेगी। 

सत्ता बदलती रहती है लेकिन सरकारों को चाहिए कि कलमकारों को मान्यता, सहायता और आवश्यक सहयोग देने के लिए नियमों को आसान करे। जान सम्पर्क विभाग की शक्तियों को बढ़ाया जाए। कलमकारों की तलाश के लिए एक विशेष सैल बनाया जाए जो अपने स्तर पर खोज करके सही लोगों को सत्ता की तरफ से बनती सहायता दे सके। कलमकारों के स्वास्थ्य की जाँच और अवस्य्हक उपचार तो हर छह महीने बाद होना ही चाहिए। नियमों की सख्ती की बजाए असली कलमकार बचने की तरफ पहल होनी चाहिए।  

यह सब लिखते हुए मैं उनकी कमज़ोरियों, खामियों और मजबूरियों से भी अवगत हूं लेकिन जब तक समाज कलमकारों के प्रति उदासीन और गैर-ज़िम्मेदार बना रहेगा तब तक यह सब होता रहेगा। हमारे पत्रकार, लेखक, बुद्धिजीव, कलाकार अलप आयु में ही दम तोड़ते रहेंगे। 

जब यह समाज अपनी वाहवाही के  आयोजन करता है तो उस समय आयोजक लोग चाय बनाने वाले को भी पैसे देते हैं, चाय परोसने और ले कर आने वाले  को भी पैसे दिए जाते हैं, दरियां बिछाने और कुर्सियां लाने लेजाने वालों को भी पैसे मिलते हैं लेकिन उसकी कवरेज के लिए दूर दराज से पहुंचे मीडिया वालों कोआयोजक नहीं  पूछते कि उनके वाहन में पैट्रोल है या नहीं? 

अगर कोई मजबूरी वश मांग भी ले तो उसे दे भी देते हैं लेकिन बाद में बदनाम करते हैं।  कोई सरकार से विज्ञापन मांग ले तो उसे सरकारिया कह कर बुरा भला कहते हैं लेकिन स्वयं की ज़िम्मेदारी का अहसास कभी नहीं करते। कवरेज की खबरों के ज़रिए अधिक से अधिक स्पेस और टाइमं बटोरने वाले ये चालाक लोग भी कलमकारों के जल्द देहांत के लिए कम ज़िम्मेदार नहीं हैं। सभी पत्रकार संगठनों को इस तरफ भी ध्यान देना होगा। 

आखिर में गोपाल दास नीरज जी का शेयर याद आ रहा है:

वो और ही थे जिन्हें थी ख़बर सितारों की;

मेरा ये देश तो रोटी की ही ख़बर में रहा - गोपालदास नीरज

स्नेह के साथ// बिछड़े हुए मित्रों की यादों के साथ//बिछड़ने की कगार पर खड़े और बहुत से कलमकारों के जाने के अंदेशे की चिंता के साथ आप सभी का--रेक्टर कथूरिया

Saturday, July 17, 2021

दानिश साहिब यहीं हैं हमारे आसपास-हमारे दरम्यान

 लानत है उनकी मौत का जश्न मनाने वालों पर 


नयी दिल्ली
: 17 जुलाई 2021: (मीडिया स्क्रीन ऑनलाइन+मित्र लोग)::

प्रेस क्लब आफ इण्डिया ने दानिश सिद्दीकी साहिब के याद में आज रात करीब 7:25 पर कैंडल मार्च किया है। उनकी चर्चा करनी ज़रूरी है शायद इसी बहाने उन लोगों की अंतरात्मा जाग उठे जो खुद को पत्रकार समझते  हैं लेकिन साडी उम्र भांड बने रहते हैं। पत्रकारिता की समझ उन्हें उम्र भर समझ नहीं आ पाती। काश ऐसे लोग दानिश साहिब की कुर्बानी के इस मौके पर अपनी डयूटी के प्रति सजग हो सकें। 

दुःखद है लेकिन सच है कि जब खुद को मीडिया का सरगर्म और बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा समझने और कहने वाले बहुत से लोग अपने अपने राजनीतिक आकाओं की चमक दमक को दर्शाते हुए अपने अपने कैमरे और कलम   सेट करने में व्यस्त थे, उनके आगे पीछे घूम रहे थे उस समय भी दानिश सिद्दीकी एक गौरवशाली सच्चे मुस्लिम होने के के साथ साथ प्रतिबद्ध पत्रकार का फ़र्ज़ भी निभा रहे थे। 

अलग अलग मामलों  में अलग अलग जगहों पर अलग अलग वक़्तों में दानिश साहिब ने दिखाया कि अगर कलम और कैमरा पकड़ो तो उसकी लाज कैसे रखी जाती है। जान हथेली पर और हौंसला दिल व दिमाग में दानिश साहिब ने बहुत पहले सीख लिया था। दानिश साहिब ने 40 की उम्र तक पहुँचने से पहले ही बहुत कुछ ऐसा क्लिक किया जो दस्तावेज़ी की तरह है। आने वाले वक्तों में  और बढ़ जाएगी। 

उल्लेखनीय है कि पुलित्जर पुरस्कार पत्रकारिता के क्षेत्र का अमेरिका का सर्वोच्च पुरस्कार है। इसकी शुरुआत 1917 से हुई थी। 2021 के लिए भारतीय मूल की पत्रकार मेघा राजगोपालन को भी अंतरराष्ट्रीय रिपोटिंग के दिया जाएगा। दानिश सिद्दीकी साहिब को साल 2018 में  पुलित्जर पुरस्कार  से नवाजा गया था, ये अवॉर्ड उन्हें रोहिंग्या मामले में कवरेज के लिए मिला था। बहुत बड़ी कवरेज थी यह। 

गौरतलब है कि दानिश सिद्दीकी ने अपने करियर की शुरुआत एक टीवी जर्नलिस्ट के रूप में की थी, बाद में वह फोटो पत्रकार बन गए थे। आज भी बहुत से लोग मीडिया का कार्ड जेब में दाल कर और कैमरा उठा कर समझते हैं कि वे फोटोग्राफर बने हुए हैं लेकिन उन्हें कुछ भूलता है तो बस अपनी डयूटी। या फिर अपने अपने फ़र्ज़। अपने आकाओं की तरफ से होती आवभगत और सेवा सम्मान उन्हें सपनों में नहीं भूलता। 

बस यही फरक है दानिश साहिब ने हर वक़्त अपनी ड्यूटी याद रखी। जान तक कुर्बान कर दी और अमन हो गए। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने दानिश सिद्दीकी के निधन पर शोक जताया है। ठाकुर ने कहा कि वह अपने पीछे अपना शानदार काम छोड़ गए हैं। हकीकत भी यही है। 

उन्हें याद करते हुए, उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए पुलित्जर पुरस्कार विजेता भारतीय फोटो पत्रकार दानिश सिद्दीकी को श्रद्धांजलि देने के लिए प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और जामिया मिलिया इस्लामिया में शनिवार को कैंडल लाइट मार्च निकाला गया। अन्य हमदर्द लोग भी इसमें पहुंचे। सब के मन में दर्द था। करीब 40 साल के सिद्दीकी की शुक्रवार को अफगानिस्तान के कंधार प्रांत में स्पिन बोल्डक जिले में अफगान बलों और तालिबान के बीच संघर्ष के दौरान मृत्यु हो गयी। वह कंधार के मौजूदा हालात की कवरेज कर रहे थे। बहुत से दुसरे मामलों की तरह यह भी उनका मिशन था। 

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में कैंडल लाइट मार्च के दौरान वर्किंग न्यूज कैमरामैन एसोसिएशन (डब्ल्यूएनसीए) के अध्यक्ष एस. एन. सिन्हा ने कहा कि युद्ध, दंगों और लोगों की तकलीफें तस्वीरों के जरिए सभी तक पहुंचा कर सिद्दीकी अपने पेशे में शीर्ष पर पहुंचे थे। शीर्ष सभी की किस्मत में भी नहीं होता। हर किसी के जज़्बे में दानिश साहिब जैसा जूनून भी नहीं होता। एस. एन. सिन्हा ने कहा कि उन्होंने पूरे जुनून और समर्पण के साथ सभी तस्वीरें लीं, खबरों का कवरेज किया और हमेशा मुश्किल में फंसे लोगों पर ध्यान दिया। जो कुछ सिन्हा साहिब ने कहा इससे बड़ा समान शायद कोई न हो। उनके मित्र और उनके पुराने साथी भी आहत हैं इस शहादत से। जामिया मिलिया के पुराने छात्र मोहम्मद मेहरबान ने मास कम्युनिकेशन के छात्र सृजन चावला के साथ मिलकर विश्वविद्यालय के गेट नंबर 17 पर कैंडल लाइट मार्च का आयोजन किया जिसमें 500 से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया।मोहम्मद मेहरबान ने कॉलेज में अपने सीनियर दानिश सिद्दीकी को याद किया। कभी कभी सीनियर लोग   जो किताबों में भी नहीं मिलता। 

दानिश साहिब को आर्थिक स्थितियों की भी पूरी समझ थी। देश कीध जा रहा है उन्हें मालुम था। सिद्दीकी ने अर्थशास्त्र विषय से स्नातक की पढ़ाई की थी। उन्होंने 2007 में जनसंचार विषय में स्नात्कोत्तर किया था। दानिश सिद्दीकी 2011 से समाचार एजेंसी रॉयटर्स के साथ बतौर फोटो पत्रकार काम कर रहे थे। उन्होंने अफगानिस्तान और ईरान में युद्ध, रोहिंग्या शरणार्थी संकट, हांगकांग में प्रदर्शन और नेपाल में भूकंप जैसी महत्वपूर्ण घटनाओं की तस्वीरें ली थीं। इन कहानियों का सिलसिला काफी लम्बा है। दानिश साहिब तो रुखसत हो गए लेकिन ु का काम लगातार अपनी मौजूदगी दर्शाता रहेगा। 

आखिर में लानत उन लोगों पर ज़रूरी है जो दानिश साहिब की मौत का जश्न मना रहे हैं। शर्म आनी चाहिए ऐसे बेशर्म लोगों को। इस तरह के जश्न मना कर वे अपनी औकात ही दिखा रहे हैं। बता रहे हैं की वे सचमुच साम्प्रदायिकता की ज़हर से भरे हुए खतरनाक लोग हैं। इन लोगों को याद रखना कि  रहेंगे रंग बदल कर रूप बदल कर।  किसी न किसी के हाथ में कोई न कोई कैमरा  इन लोगों को डराता भी रहेगा और भी  बेनकाब भी करता रहेगा।  दानिश साहिब यहीं हैं हमारे आसपास। हमारे दरम्यान। 

जामिया ने दानिश सिद्दीकी की दुखद मौत पर शोक व्यक्त किया

Saturday, January 2, 2021

नहीं रहे रेडियो प्लेबैक वाले सक्रिय पत्रकार कृष्णमोहन मिश्रा

 टैक्स्ट के साथ आवाज़ और शब्दों के प्रयोग में भी बहुत ही कुशल थे 

लखनऊ//इंटरनेट: 2 जनवरी 2020: (मीडिया स्क्रीन ऑनलाइन डेस्क):: 

देश के हालात की मायूसी और उदासी के इस माहौल में एक और उदास  खबर आई है राजू मिश्र की एक पोस्ट के रूप में। इसमें एक बहुत अच्छे पत्रकार के बिछुड़ जाने की सूचना है। यह खबर सोशल मीडिया पर सामने आई। उदास कर देने वाली यह पोस्ट है लखनऊ के एक  ऐसे कर्मयोगी पत्रकार के निधन से सबंधित जिन्होने टैक्स्ट के साथ साथ आवाज़ के जादू को भी ब्लॉग मीडिआ के तौर पर सक्रिय हो कर इस्तेमाल किया। उनके प्रयोग बेहद सफल रहे और ने टैक्स्ट और आवाज़ के समन्वय को बहुत ही खूबसूरती के साथ प्रस्तुत किया। रेडियो प्लेबैक उनका बहुत ही ज़बरदस्त प्रयोग रहा जो निकट भविष्य में ही हमें नए नए आर जे भी दिया करेगा। शब्दों और आवाज़ का संमिश्रण  जादू बिखेरता। एक पूरी टीम इस सारे प्रयोग पर नज़र रखती। रेडियो ब्लॉग की दुनिया में यह बहुत  लोकप्रिय हुआ।  Krishnamohan Mishra जी की पोस्टें हमें उनकी याद दिलाती  रहेंगी। राजनीतिक विचारों के भेदभाव से ऊपर उठ कर केवल समाज और विशुद्ध पत्रकारिता के धर्म को निभाते हुए हम उन्हें याद रखें  तो यही बात हमें आगे बढ़ने की शक्ति भी देगी।  

उनके मित्र  राजू मिश्रा बताते हैं-वरिष्ठ पत्रकार कृष्णमोहन मिश्र का गुरुवार की रात लखनऊ में हृदयाघात से निधन हो गया। वे लगभग 70 वर्ष के थे। श्री मिश्र ने अपने पीछे पत्नी और दो पुत्रियों को छोड़ा है। अपरान्ह दो बजे भैंसाकुंड स्थित श्मसान घाट पर उनकी अन्त्येष्टि हुई। श्री मिश्र को उनकी बेटी ने मुखाग्नि दी।कृष्ण मोहन जी का जन्म वाराणसी में हुआ था। उनकी शिक्षा दीक्षा वाराणसी में ही हुई। उन्होंने मिर्जापुर के पालिटेक्निक से शिक्षा ग्रहण की थी। इसके बाद लखनऊ के बांस मंडी स्थित आईटीआई में प्रशिक्षक रहे। यहीं से करीब दस वर्ष पूर्व वे सेवानिवृत्त हुए। श्री मिश्र सांस्कृतिक पत्रकार भी थे। सेवा में रहते हुए उन्होंने सांस्कृतिक पत्रकारिता की। वे दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान में सांस्कृतिक संवाददाता भी रहे। इसके साथ ही वे संस्कृति और संगीत पर लगातार लेखन करते थे। सोशल मीडिया में वे लगातार संगीत और गायन की विभिन्न विधाओं पर लेखन कर रहे थे। वे उ.प्र. जर्नलिस्ट्स एसोशिएशन की पत्रिका उपजा न्यूज और संस्कार भारती की पत्रिका कला कुंज भारती के भी संपादक रहे। आजकल वे राजधानी में जानकीपुरम् क्षेत्र की इकाई के अध्यक्ष थे। गोमती नगर निवासी श्री मिश्र को बीती रात करीब नौ बजे हृदयाघात हुआ। परिवार के लोग उन्हें तत्काल डा. राम मनोहर लोहिया चिकित्सालय ले गए जहां डाक्टरों ने बताया कि तीव्र हृदयाघात से उनका निधन हो चुका है। विनम्र श्रद्धांजलि।

उनके एक और गहरे मित्र सुजॉय चटर्जी उन्हें बहुत ही स्नेह और सम्मान के स्मरण करते हुए कहते हैं-ख़ामोश हुआ "स्वरगोष्ठी" का स्वर, नहीं रहे कृष्णमोहन मिश्र जी। इस गहरे सदमे को उनके मित्र किस मुश्किल से सहन कर पा रहे हैं इसे बताना मुश्किल है। 

श्री चटर्जी कहते हैं: कृष्णमोहन जी लखनऊ के प्रसिद्ध एवम् वरिष्ठ सांस्कृतिक पत्रकार/ सम्पादक होने के साथ-साथ शास्त्रीय एवम् लोक-संगीत के विशिष्ट जानकार, विश्लेषक, समीक्षक, लेखक, जानेमाने मंच संचालक, साक्षात्कारकर्ता और ब्लॉगर भी थे। हमारे ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ नामक ब्लॉग में वे शास्त्रीय एवम् लोकसंगीत पर आधारित स्तम्भ ’स्वरगोष्ठी’ का पिछले दस वर्षों से निरन्तर संचालन करते चले आ रहे थे। इन्टरनेट पर शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक, सुगम और फिल्म संगीत विषयक चर्चा का सम्भवतः यह एकमात्र नियमित साप्ताहिक स्तम्भ है, जो विगत दस वर्षों से निरन्तरता बनाए हुए है। आज उनके चले जाने से यह स्तम्भ अनाथ हो गया।

अपनी मित्रता और उनके साथ मीडिया और जीवन से जुड़े अनुभवों के आदान प्रदान का ज़िक्र करते हुए वह भरे मन से कहते हैं-मेरा कृष्णमोहन जी से पहला परिचय वर्ष 2011 में हुआ था। उन दिनों सेवानिवृत्ति के बाद वे इन्टरनेट पर सक्रिय हो रहे थे। उन्हीं दिनों शास्त्रीय संगीत पर आधारित एक स्तम्भ हमने शुरू किया था ’सुर संगम’, पर शास्त्रीय संगीत के जानकार न होने की वजह से हमारे लिए इसे लम्बे समय तक चला पाना मुश्किल हो रहा था। मेरे मित्र Sumit Chakravarty ने भी कुछ समय तक इसे आगे बढ़ाया। उन दिनों कृष्णमोहन जी इस स्तम्भ के पाठक हुआ करते थे। उनकी नियमित टिप्पणियों को पढ़ कर मुझे और सुमित को यह आभास हो गया था कि अगर कोई इस स्तम्भ को सही तरीके से आगे बढ़ा सकते हैं तो वो कृष्णमोहन जी ही हैं। उन्हें यह प्रस्ताव देते ही वे फ़ौरन राज़ी हो गए। और उस दिन से लेकर आज तक, उन्होंने ही इस साप्ताहिक स्तम्भ का संचालन किया ’स्वरगोष्ठी’ शीर्षक से और एक भी सप्ताह ऐसा नहीं बीता कि जब ’स्वरगोष्ठी’ का अंक प्रकाशित ना हुआ हो। आज इसके 495 अंक प्रकाशित हो चुके हैं। शास्त्रीय एवम् लोक संगीत के लेखों से सुसज्जित ये 495 अंक हिन्दी ब्लॉग जगत में किसी अनमोल ख़ज़ाने से कम नहीं है। इस धरोहर को हमें सहेज कर रखना है।

श्री चटर्जी बताते हैं कि कृष्णमोहन जी से मैंने बहुत कुछ सीखा है। लेखन शैली और प्रकाशनयोग्य formatting के बारे में उन्होंने तो बहुत कुछ बताया ही था, पर केवल उनको देख कर भी कई चीज़ें सीखने को मिली। वे पूरे perfection के साथ लेख लिखते थे, उनके लिखे पोस्ट्स पर किसी भी तरह की ग़लती ढूंढ पाना असम्भव सा था। वे कभी जल्दबाज़ी और shortcut में नहीं जाते थे, अगर समय ना हो तो साफ़ मना कर देते थे, पर quality के साथ कभी समझौता नहीं करते थे। वे इतने ईमानदार थे कि उनके लेखों के लिए जो भी कोई छोटी से छोटी जानकारी भी उन्हें देता था, वे उनका नाम लेख में उल्लेख करना कभी नहीं भूलते थे। ’स्वरगोष्ठी’ में जब भी कभी उन्हें किसी फ़िल्मी गीत से सम्बन्धित कोई रोचक जानकारी की आवश्यकता पड़ती थी तो वे मुझसे सलाह करते थे, और अगर मैं उन्हें कोई जानकारी उपलब्ध करवाता तो वे मेरा नाम लेख में “जानेमाने फ़िल्म इतिहासकार” के रूप में लिखते थे जिसे पढ़ कर मुझ हँसी आ जाती थी और embarrassment भी होता था क्योंकि मैं कोई फ़िल्म इतिहासकार नहीं हूँ। यह उनका बड़प्पन ही था बस! वे इतने विनयी थे कि जब भी कभी मैं उनसे कहता कि मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा है तो फ़ौरन उनका जवाब होता था कि उन्होंने भी मुझसे बहुत कुछ सीखा है। प्रसिद्ध अभिनेता Pranay Dixit जी के मौसा जी लगते थे कृष्णमोहन जी। जब वर्ष 2013 में प्रणय जी की पहली फ़िल्म ’Roar’ रिलीज़ होने जा रही थी, तब कृष्णमोहन जी के ज़रिये मुझे प्रणय जी का साक्षात्कार लेने का मौका मिला। उन्होंने यह दायित्व मुझे सौंप कर मेरा सम्मान बढ़ाया था।

हालांकि दोनों मित्रों में उम्र  का अंतर भी काफी था। चटर्जी साहिब बताते हैं उम्र में मैं कृष्णमोहन जी से करीब 30 साल छोटा हूँ, पर उनसे बात करते समय कभी इसका अहसास नहीं हुआ। हमेशा ऐसा ही लगा कि जैसे हम हम-उम्र हों। वे ऐसे बात करते थे कि जैसे अपने किसी हम-उम्र दोस्त के साथ बतिया रहे हों। उन्हें जब भी कभी मेरे द्वारा लिखा कोई पोस्ट पसन्द आता था तो फ़ोन करके बधाई देते थे। मुझे याद है एक बार मैंने जब अपने किसी लेख में “साज़िन्दों” की जगह “वाद्य-वृन्द” शब्द का प्रयोग किया था, उन्हे यह इतना अच्छा लगा कि केवल यही बताने के लिए उन्होंने मुझे फ़ोन किया। वे कभी फ़ोन पर व्यक्तिगत बात या इधर-उधर की बात नहीं करते थे, सीधे काम की बात करते थे, professionalism उनमें कूट-कूट कर भरा हुआ था। कुछ वर्ष पूर्व एक बार मैंने उनसे कहा कि मेरा बेटा शास्त्रीय संगीत सीख रहा है पर वो रियाज़ ही नहीं करता। तब कृष्णमोहन जी ने बताया कि दस वर्ष की आयु से पहले बच्चे से ज़्यादा रियाज़ ना करवाऊँ वरना आवाज़ ख़राब हो सकती है। यह बेहद महत्वपूर्ण बात उनसे जानने को मिली थी। एक बार मैंने उनसे कहा कि आपने लम्बे समय से एक ही profile pic लगा रखी है, इसे बदलते क्यों नहीं, तो बोले तो यह उनका प्रिय फ़ोटो है और उनका सबसे अच्छा फ़ोटो है। जितना मुझे याद है यह तसवीर किसी ने संगीत नाटक अकादमी में खींची थी। 

फेसबुक वाली प्रोफ़ाइल तस्वीर की तरह ही उन्होने अपने  मित्र भी नहीं बदले। जिससे मित्रता लगाई उसके साथ आखिर तक निभाया। 

कुछ सप्ताह पूर्व जब आख़िरी बार उनसे बात हुई थी तब वे काफ़ी उत्साहित थे इस बात को लेकर कि ’स्वरगोष्ठी’ के ना केवल दस वर्ष पूरे हो रहे हैं बल्कि इसके 500 अंक भी पूरे हो रहे हैं। और संयोग देखिए कि इसी सप्ताह ’स्वरगोष्ठी’ के दस वर्ष पूरे हो रहे हैं 495-वें अंक के साथ। ब्लॉगर में उन्होने इस सप्ताह का पोस्ट शेड्युल कर रखा है और इस पोस्ट में उन्होंने ’स्वरगोष्ठी’ के दस वर्ष पूर्ति पर इसके प्रथम अंक के लिए मेरे लिखे हुए लेख का एक अंश भी प्रस्तुत किया है, जिसे पढ़ कर निर्वाक् हो गया हूँ। आज कृष्णमोहन जी के इस तरह अचानक चले जाने से ऐसा लग रहा है कि जैसे एक महाशून्य सा उत्पन्न हुआ है। अभी तो उनके साथ बहुत काम करना बाकी था। उनसे बहुत सारी बातें करनी थीं। सब एक ही झटके में समाप्त हो गया। शायद इसी क्षणभंगुरता का नाम जीवन है। कृष्णमोहन जी मुझे हमें हमेशा याद रहेंगे। उनको श्रद्धांजलि स्वरूप और उनके 500-वें अंक के सपने को साकार करने हेतु हमने ’स्वरगोष्ठी’ के अन्तिम पाँच अंकों को लिखने का निर्णय लिया है। यही उनके लिए हमारी श्रद्धांजलि होगी।

Monday, November 2, 2020

DGP पंजाब ने दिया पत्रकारों को निष्पक्ष जांच से न्याय का भरोसा

पत्रकारों की प्रतिनिधिता की अमरिंदर सिंह और हरप्रीत जस्सोवाल ने 


चंडीगढ़
//खरड़//कुराली: 2 नवम्बर 2020:  (मीडिया स्क्रीन Online टीम )::

समाज के समुचित विकास और सुरक्षा के लिए पुलिस भी अग्रसर रहती है और पत्रकार भी अपनी डयूटी तनदेही से निभाते हैं। प्रेस और पुलिस का यह रिश्ता कई बार नाज़ुक पड़ावों  गुज़रता है लेकिन खट्टे मीठे अनुभवों  के बावजूद कभी भी टूटता नहीं। एक बार फिर इसे टूटने से बचाया है डीजीपी दिनकर गुप्ता ने। 

इस तरह के वरिष्ठ पुलिस अधिकारीयों और की सुखद बातों के बावजूद अलग अलग स्थानों से पत्रकारों के साथ पुलिस द्वारा कुछ  ज़्यादती की खबरें आम होने लगीं हैं। कहीं किसी पत्रकार से कैमरा छीन लिया  जाता है और कहीं पर मोबाईल।  इसी तरह की बहुत सी बातों  के दरम्यान उभर कर सामने आई शहीद भगत सिंह प्रेस एसोसिएशन। पंजाब का शायद ही कोई इलाका बचा हो जहां इस संगठन की पहुंच न हुई हो।  उम्र और अनुभव  में छोटे बड़े सभी पत्रकार इस संगठन में सक्रिय हैं। इस संगठन का कार्यमन्त्र है-पहले विनम्रता और प्रेम से अपनी समस्या हल करने और करवाने का प्रयास करो अगर इसे कमज़ोरी समझा जाए तो फिर लोकतान्त्रिक राह अपनाते हुए एकजुटता की शक्ति का प्रदर्शन करो तांकि विजय प्राप्त हो सके। 

इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ।  पुलिस के साथ किसी मुद्दे पर बहस हुई तो मामला टूल पकड़ गया। दोनों तरफ की ज़िद। पत्रकारों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ तो बात और बिगड़ गई। मामला पांच नवंबर को पुलिस अधिकारिओं के पुतले जलाने की घोषणा तक पहुँच गया। 

पंजाब के बहुत महत्वपूर्ण ज़िले फाजिल्का में भी पुलिस और प्रेस के दरम्यान टकराव जैसी स्थिति बन गई। संगठन से जुड़े सूत्रों के मुताबिक बात आर पार जैस जंग जैसी बन गई। 

भारत के और भी बहुत सारे राज्यों में पत्रकारों के साथ हो रही बे इंसाफी के खिलाफ आज शहीद भगत सिंह प्रेस एसोसिएशन का एक स्टेट लेवल का डेलिगेशन पंजाब के डीजीपी दिनकर गुप्ता से मिलने उनके चंडीगढ़ ऑफिस में गया जिसकी अगुवाई शहीद भगत सिंह प्रेस एसोसिएशन के राष्ट्रीय चेयरमैन अमरिंदर सिंह और राष्ट्रीय जनरल सेक्टरी हरप्रीत सिंह जस्सोवाल ने की ओर उनके साथ रितिष राजा सेक्टरी ट्राइसिटी, हरपाल सिंह भंगू-प्रधान जिला अमृतसर, हरमिंदर सिंह नागपालजनरल सेक्टरी ट्राइसिटी, धरमिंदर सिंगला एडवाइजर,  शमशेर सिंह बग्गा  प्रधान जिला रोपड़, मनीष शंकर प्रधान जिला मोहाली, कुलदीप कुमार वाइस प्रेसिडेंट ट्राइसिटी, विजय जिंदल जीरकपुर, रोहित कुमार सीनियर पत्रकार, अमित कुमार एडवाइजर ओर रवी शर्मा और जगदीश सिंह खालसा इत्यादिकई पत्रकार शामिल थे ।

हरप्रीत सिंह जस्सोवाल, रितिष राजा ओर कुलदीप कुमार ने कहा के देश भर के पत्रकारों के हक में स्टैंड लेने वाली एकमात्र पत्रकार संस्था शहीद भगत सिंह प्रेस एसोसिएशन जो कि हमेशा ही किसी भी पत्रकार के साथ हुई नाइंसाफी के खिलाफ पत्रकारों के साथ खड़ी होती है आज पंजाब के हर जिले समेत भारत के अलग-अलग राज्य में पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, जम्मू कश्मीर, यूपी, महाराष्ट्र, चेन्नई, वेस्ट बंगाल में और ओर भी कई राज्यों में लोकप्रियता के साथ आगे बढ़ रही है।

आज फील्ड में काम करने वाले हजारों पत्रकार इस प्रेस एसोसिएशन के परिवार का मेंबर बन चुके हैं ।

 डीजीपी पंजाब से बातचीत के दौरान शिष्टमंडल का नेतृत्व कर रहे चेयरमैन अमरिंदर सिंह, धरमिंदर सिंगला ओर हरपाल भंगू ने बताया कि पूरे भारत में पुलिस द्वारा पत्रकारों पर नाजायज झूठे पर्चे दर्द करके उन्हें परेशान किया जा रहा है और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को उनका कार्य करने से रोका जा रहा है जो कि भारत के संविधान के विरुद्ध है। इसी गलत सोच के चलते पंजाब के विभिन्न हिस्सों में पत्रकारों पर दर्ज किए जा रहे झूठे पर्चे दर्ज किए जा रहे है और यह सब राजनीतिक व अन्य दबाव के चलते हो रहा है। 

हरमिंदर सिंह नागपाल , शमशेर सिंह बग्गा ओर कुलदीप कुमार ने कहा कि पंजाब के महत्वपूर्ण ज़िले फाजिल्का में काम कर रहे दो पत्रकारों सुनील सैन और राजू आज़मवालिया पर जिला बार एसोसिएशन फाजिल्का के दबाव मे एक ही मामले मे दो मुकदमो को लेकर उच्च स्तरीय जांच करवाने और इसी मामले मे फाजिल्का सीआईए प्रभारी नवदीप भट्टी ने फोन कर बातचित के दोरान राष्ट्रिय प्रधान रंजीत सिंह मसौन से गाली गलौच कर उन्हे उकसाया और प्रधान मसोन पर गाली गलोच करने का फाजिल्का मे पर्चा दर्ज करने के मामले मे जांच करने व नवदीप भट्टी का डोप् टेस्ट करवाने की मांग करते हुए एक मांग पत्र भी सौंपा गया ।

जिस पर डीजीपी साहब ने मामले की गंभीरता को देखते हुए करवाने इस सारे मामले की निष्पक्ष जांच आई जी फरीदकोट को सोंपते हुए पत्रकारों को इंसाफ दिलवाने का आश्वासन देते हुए कहा की पत्रकारों और पुलिस के रिश्तों को किसी भी कीमत पर खराब नही होने दिया जाएगा ।

एसोसिएशन की ओर से डीजीपी पंजाब श्री दिनकर गुप्ता का मनीष शंकर, अमित कुमार, विजय जिंदल, रवी शर्मा, रोहित कुमार और जगदीश सिंह खालसा ने धन्यवाद किया। प्रेस को यह सारी जानकारी एसोसिएशन के प्रेस सेक्टरी अमरजीत रतन की तरफ से दी गई ।


Saturday, September 12, 2020

जानीमानी पत्रिकाओं की बेवक़्त मौत पर भी नहीं रोया यह समाज

सारी उम्र मीडिया की साधना करने वाले अब किस राह पर चलें?
सोशल मीडिया//इंटरनेट: 12 सितंबर 2020: (मीडिया स्क्रीन online)::  
जानीमानी पत्रिकाओं की बेवक़्त मौत हो रही है और मीडिया संस्थानों से पत्रकारों की छंटनी हो रही है। इतना कुछ होने पर भी समाज मूक दर्शक बना हुआ है। इस समाज के पास शराब पीने के लिए बहुत से पैसे हैं लेकिन बौद्धिक सम्पदा को बचाने के लिए कुछ भी नहीं। 
बुरी खबर यह है कि कोरोनावायरस (कोविड-19) के कारण मध्यवर्गीय लोगों के कारोबार ठप्प हो रहे हैं। बहुत से ढाबे, बहुत काम और बहुत से कारोबार बंद हो चुके हैं। इस मार का असर मीडिया पर भी पड़ा है।  ऐसे में जहां पाठकों पर ऑनलाइन पढ़ने का दबाव बना है वहीं एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू में कमी भी आई है।
ऐसे में ब्रिटेन प्रसिद्ध अखबार ‘डेली मिरर’ (Daily Mirror) और ‘डेली एक्सप्रेस’ (Daily Express) की प्रकाशक कंपनी ‘रीच’ (Reach) ने 550 एम्प्लॉयीज की छंटनी करने की योजना बनाई जिसकी खबरें जुलाई में बाहर आ गयीं थीं। इतना बड़ा  ब्रांड अगर ऐसा करता है तो यह यकीकन एक दुखद सत्य है। इसके साथ ही यह सुखद तथ्य भी सामने आया है कि डिजिटल मीडिया में लोगों का उत्साह भी तेज़ी से बढ़ रहा है।
इसी सिलसिले में जानीमानी प्रकाशक कंपनी "रीच" (Reach) के चीफ एग्जिक्यूटिव जिम मुलेन (Jim Mullen) ने एक बयान में कहा कि महामारी के दौरान मीडिया क्षेत्र में संरचनात्मक परिवर्तन में तेजी आई है और इससे हमारे डिजिटल उत्पादों को बढ़ावा मिला है। साथ ही यह भी कहा कि विज्ञापन ज़्यादा न मिलने की वजह से  डिजिटल रेवेन्यू नहीं बढ़ा है। रेवन्यू न बढ़ने के कारण आर्थिक संकट की तलवार लटकने लगी है। तलवार गिरी है अब पत्रकार और गैर-पत्रकार  कामगारों पर। 
मीडिया में आई खबरों के मुताबिक इस गंभीर आर्थिक संकट को बहुत बड़ा कारण बताते हुए प्रकाशक कंपनी ने कहा कि कंपनी लगभग 550 कर्मचारियों की छंटनी करेगा, जोकि इसके कर्मचारियों की संख्या का करीब 12 प्रतिशत है। ऐसा करने से कंपनी को 35 मिलियन पाउंड यानी करीब 43 मिलियन डॉलर की सालाना बचत होगी। अब कम्पनी को तो बचत हो जाएगी लेकिन जिनको नौकरी से बाहर किया जाना है उनका क्या बनेगा। शायद ऐसे सवालों का जवाब पूंजीवादी सोच के लोगों के पास होता ही नहीं।
केवल नफा नुकसान की बात सोचने वाले लोग संवेदना से दूर होते चले जाते हैं। ऐसे में अगर कोई पत्रकार आर्थिक तंगी  चल  या वह ख़ुदकुशी कर लेता  है तो पूरी खबर सामने नहीं आती। बस छोटी सी खबर कि एक पत्रकार की मौत हो गई। पूरे का पूरा परिवार उजड़ने वाली इस दुखद घटना को भी कोरोना की वजह से हुई मौत बता दिया जाता है। 
ऐसी नाज़ूक हालत में  "रीच" (Reach) के चीफ एग्जिक्यूटिव जिम मुलेन (Jim Mullen) का ब्यान बहुत ही महत्वपूर्ण भी बन जाता है। इस नुक्सान भरी स्थिति के तकनीकी फायदे गिनवाते हुए उन्होंने कहा कि इस कदम से हमारा एडिटोरियल प्रिंट व डिजिटल की नेशनल व रीजनल टीमों को एक साथ लेकर अधिक केंद्रीयकृत रूप में आगे बढ़ेगा। हमारे न्यूज ब्रैंड्स की मज़बूत एडिटोरियल पहचान को बरकरार रखते हुए इसकी दक्षता में महत्वपूर्ण वृद्धि होगी और डुप्लीकेशन खत्म होगा। ब्रिटेन में कई रीजनल न्यूजपेपर का प्रकाशन करने वाली इस कंपनी ने कहा कि पुनर्गठन से ग्रुप को करीब 20 मिलियन पाउंड का खर्च आएगा। शायद इसे ही कहा जाता है आपदा की अवसर में बदलना। 
कंपनी ने कहा कि उसके पास अब कम स्पेस होगा और मैनेजमेंट स्ट्रक्चर भी बहुत ही सिम्पल होगा। कंपनी ने इस बात की भी जानकारी दी है कि सर्कुलेशन और ऐडवर्टाइजिंग की कमी के चलते कंपनी का राजस्व 27.5 प्रतिशत घट गया है। निश्चय ही यह बहुत बड़ी गिरावट है।
लेकिन सत्य यह भी कि यह है इस नाज़ुक दौर में इतनी बढ़ी कम्पनी की कारोबारी रणनीति। साथ ही उन्होंने बहुत ही ईमानदारी से अपने फायदे भी गिनवाए हैं। राजस्व में आई कमी और पुनर्गठन पर आने वाले खर्चे की बात भी स्पष्ट हुई है लेकिन बेरोज़गार होने वालों पर क्या असर होगा इसका कोई ज़िक्र तक नहीं है। शायद पूंजवादी सिस्टम में उनका कोई अर्थ नहीं है। यही सोच अधिकतर लोगों को साम्यवाद की तरफ ले जाती है।
अब देखना है कि पूरा समाज इसके लिया क्या करता है? अफ़सोस है कि न जाने कितनी कितनी शराब पी जाने वाले समाज ने मीडिया के कम हो रहे राजस्व को पूरा करने की कोई औपचारिक पेशकश तक भी नहीं की। इस पूरे समाज ने बेरोज़गार हुए पत्रकार और गैरपत्रकार मीडिया कर्मियों के घरों की चिंता भी नहीं की।  ज़ाहिर है कि अपने आप को पढ़ा लिखा और सांस्कृतिक समाज कहलाने वाला यह पूरा सिस्टम मीडिया, लेखन, कविता, कला या बौद्धिक सम्पदा से भरे लोगों के रहने लायक है ही नहीं। यह समाज अभी भी बेहद पिछड़ा हुआ और स्वार्थी है। शायद यहाँ वह सुबह कभी नहीं आएगी जिसके सपने हमें साहिर लुधियानवी साहिब ने दिखाए।
अफ़सोस कि इस समाज को नंदन और कादम्बिनी जैसी पत्रिकाएं बंद होने पर कोई मलाल नहीं हुआ। यह समाज की जीवन धारा से कम तो न थीं। गौरतलब है कि एचटी मीडिया द्वारा जहां एक ओर संस्करणों से पत्रकारों की विदाई की जा रही है, वहीं कंपनी ने प्रसिद्ध और लोकप्रिय नंदन और कादम्बिनी पत्रिका का प्रकाशन भी पूरी तरह से बंद करने का फैसला सुना दिया है। उल्लेखनीय है कि साहित्यिक पत्रिका कादम्बिनी 1960 से प्रकाशित हो रही थी वहीं बाल पत्रिका नंदन 1964 से।  दोनों पत्रिकाएं बहुत बड़े पैमाने पर पढ़ीं जाती थीं। इनकी लोकप्रियता का ग्राफ बहुत ऊंचा था। अंग्रेजी की रीडर डाइजेस्ट की तरह हिंदी पत्रिका को भी हाथ में लेकर चलने से साख बढ़ती है इस बात को फैशन बनाने में इन पत्रिकाओं का भी बहुत बड़ा योगदान रहा। अफ़सोस कि हमारा खोखला समाज इनकी बेवक़्त मौत पर मूकदर्शक ही बना रहा। बोले भी तो बस वही थोड़े से लोग जो किसी न किसी तरह इन पत्रिकाओं से जज़्बाती तौर पर जुड़े हुए थे। समाज की यह चुप्पी इस समाज में बढ़ती जा रही गिरावट का इशारा भी है। न जाने अभी और क्या क्या देखना बाकी है। --मीडिया लिंक रविंद्र 

Friday, June 26, 2020

ऑनलाइन मीडिया वालों को भी सभी सुविधाएं मिलें-नरेंदर भंडारी

 नए सिरे से 'मीडिया' व 'पत्रकार' की परिभाषा तय हो 
नई दिल्ली//सोशल मीडिया: 26 जून 2020: (कार्तिका सिंह//मीडिया स्क्रीन ऑनलाइन)::
महासचिव नरेंद्र भंडारी 
देश के ज्यादातर मीडियाकर्मियों का मानना है कि केंद्र सरकार को जल्द से जल्द मीडिया आयोग का गठन करना चाहिये। माड़ियाकर्मियों का ये भी मानना है कि देश के सभी मीडिया संगठनों को पत्रकारो की मांगों को मनवाने के लिये एक्जुट होना चाहिये। देश के पत्रकारो के शीर्ष संगठन वर्किंग जर्नलिस्ट्स ऑफ इंडिया, सम्बद्ध भारतीय मजदूर संघ की तरफ से देश के मीडियाकर्मियों के बीच मीडिया रिफॉर्म्स को लेकर एक सर्वे अभियान चलाया गया है। इस सर्वे अभियान में अलग अलग राज्यो के पत्रकारो ने अपनी राय जतायी है।             वालों            
यूनियन के राष्ट्रीय अध्य्क्ष श्री अनूप चौधरी के अनुसार मीडिया रिफॉर्म्स सर्वे में ज्यादातर पत्रकारो का मानना है कि देश मे व्यापक स्तर पर मीडिया सुधारो की आवश्यकता है। ज्यादातर पत्रकारो का मानना है कि केंद्र सरकार को मीडिया आयोग बनाने की आवश्यकता है। श्री चौधरी के अनुसार देश मे पहले 2 प्रेस कमीशन बने थे। पर जिस तरह से मीडिया का विस्तार हुआ है, उसे देखते हुए अब मीडिया आयोग बनाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि मीडिया आयोग को नए सिरे से "मीडिया" व " पत्रकार" की परिभाषा तय करनी होगी।                 
यूनियन के राष्ट्रीय महासचिव नरेंद्र भंडारी के अनुसार मीडिया रिफॉर्म्स सर्वे फॉर्म में ज्यादातर पत्रकारो की राय है कि सरकार को ऑनलाइन मीडिया को मान्यता देनी चाहिये। श्री भंडारी के मुताबिक लॉकडाउन के बाद ये सामने आया है कि मीडिया जगत में ऑनलाइन मीडिया एक बड़ी ताकत बनकर उभरकर सामने आया है। देश मे बड़े माड़िया घरानों का भी झुकाव ऑनलाइन मीडिया की तरफ हुआ है। श्री भंडारी के अनुसार ऑनलाइन मीडिया के पत्रकारो को भी वे सभी सुविधाएं दी जानी चाहिये जो प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकारो को दी जाती है।                               
इस अभियान के संयोजक व यूनियन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री संजय उपाध्याय के अनुसार सर्वे में ज्यादातर पत्रकारो का मानना है कि पत्रकारो की मांगों को लेकर सभी मीडिया संस्थ्यओ को एकजुट होना चाहिये। श्री उपाध्याय के मुताबिक इस सर्वे में मीडियाकर्मियों की तरफ से जतायी गयी राय के अनुसार वर्किंग जर्नलिस्ट्स ऑफ इंडिया अपने आगे के आंदोलन की रणनीति तय करेगी।

Tuesday, June 23, 2020

पत्रकार सुप्रिया शर्मा के खिलाफ FIR प्रेस को खामोश करने की कोशिश

वरिष्ठ पत्रकार सुप्रिया शर्मा के मुद्दे को NWMI ने ज़ोरदार ढंग से उठाया 
नई दिल्ली: 20 जून 2020: (समकालीन जनमत)::
नेटवर्क ऑफ वुमेन इन मीडिया, इंडिया (एनडब्ल्यूएमआई) ने प्रधानमंत्री द्वारा 2018 में गोद लिये गये वाराणसी के पास के डुमरी गाँव के निवासियों की आजीविका छिन जाने और उनके भूख के बारे में स्क्रोल डॉट इन की कार्यकारी सम्पादक सुप्रिया शर्मा की रिपोर्ट को निशाना बनाते हुये उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा दर्ज की गयी एफआईआर की निन्दा की है और इसे प्रेस को खामोश करने का प्रयास बताया है। एनडब्ल्यूएमआई ने एफ.आई.आर. को वापस लेने और सुप्रिया शर्मा को गिरफ्तारी से बचाने की मांग की है। 
शुक्रवार को जारी एक बयान में एनडब्ल्यूएमआई ने कहा कि नोवल कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिये लागू कठोर लाॅक डाउन ने भारत के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में ठेका और दैनिक वेतनभोगी मजदूरों को घोर तंगी और अनिश्चितता में झोंक दिया है। ऐसे समय में सार्वजनिक बहसों और नीतिनिर्धारण के लिये ग्रामीण क्षेत्रों और संवेदनशील समुदायों की सूचनायें बहुत महत्वपूर्ण हो गयी हैं। फिर भी पूरे भारत में और खासतौर पर उत्तर प्रदेश में सरकार और पुलिस विभाग ने यह जरूरी कर्तव्य निभानेवाले पत्रकारों को निशाना बनाते हुये मार्च में जारी लाॅक डाउन की तिथि से अब तक कम से कम 55 शिकायतें दर्ज की हैं।
उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा एक सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार सुप्रिया शर्मा को निशाना बनाते हुये एफ0आई0आर0 दर्ज किया जाना इसी कड़ी का ताज़ा उदाहरण है।
वाराणसी के हाशिये के दलित समुदायों और अनौपचारिक श्रमिकों पर लाॅक डाउन के प्रभावों के गहन शोधों के आधार पर सुप्रिया शर्मा ने आठ विस्तृत रिपोर्टें जारी की हैं। डुमरी के निवासियों, पंचायत के कर्मचारियों और जिले के अधिकारियों से साक्षात्कार पर आधारित उनकी रिपोर्ट में गाँव के लोगों की भयंकर भूख का वर्णन है और यह भी कहा गया है कि कैसे सरकार के वायदों के बावजूद उन्हें दोहरी मार झेलनी पड़ी है- उनकी जीविका छिन गयी और उन्हें सार्वजनिक वितरण प्रणाली से राशन भी नहीं मिल सका. जातीय पूर्वाग्रहों के चलते हालात और भी बिगड़ गये.
13 जून की एफ.आई.आर. में उन्हीं माला देवी को शिकायतकर्ता बनाया गया है जिनका साक्षात्कार सुश्री शर्मा ने किया था, और कहा गया है कि माला देवी ने लाॅक डाउन के दौरान भूखे रहने की शिकायत नहीं की थी।  एफ.आई.आर. में माला देवी का आरोप है कि अपनी स्टोरी में सुप्रिया शर्मा ने अपना कर्तव्य और अपने लाॅक डाउन के अनुभव का ठीक ढंग से प्रतिनिधित्व नहीं किया है। एफ.आई.आर. में शिकायतकर्ता ने कहा है कि वह किसी नागरिक संगठन के लिये काम कर रही थी। सुश्री शर्मा के रिपोर्ट में उन्होंने कहा था कि उनका बेटा किसी नागरिक संगठन के लिये काम कर रहा था और वह एक घरेलू सहायिका थी।
पुलिस ने सुप्रिया शर्मा सुश्री के ऊपर पत्रकार बिरादरी को आतंकित करने के उद्देश्य से भा.द.वि. की धारा 501 (मानहानि) के अलावा अनुसूचित जाति एवं जनजाति (नृशंसता निवारण) कानून, 1989 के अन्तर्गत भी मुकदमा कायम किया है। 
हाँलाकि, एफ.आई.आर. में उल्लिखित अनुसूचित जाति एवं जनजाति (नृशंसता निवारण) कानून की दो धाराओं का सुश्री शर्मा की रिपोर्ट से कोई सम्बन्ध नहीं है, और न ही उनमें ऐसा कुछ दिखायी देता है जिसका जिक्र माला देवी ने अपनी शिकायत में किया है। पुलिस ने एफ.आई.आर. में बिना किसी आधार के भा.द.वि. की धारा 269- लापरवाही की धारा, जिससे संक्रमण फैलता है, भी लगाया है।
सुश्री शर्मा की रिपोर्ट से इन धाराओं का कुछ भी लेना-देना नहीं है. आदिवासियों और दलित कार्यकर्ताओं के वर्षों के सतत संघर्ष से ही अनुसूचित जाति एवं जनजाति (नृशंसता निवारण) कानून में 2015 और 2018 के संशोधन अस्तित्व में आये हैं। एक ओर तो पुलिस अनवरत रूप से दलितों और आदिवासियों के विरुद्ध किये गये गम्भीर अपराधों पर एफ.आई.आर. दर्ज करने से मना करके उनका दमन और उनके प्रति शत्रुवत व्यवहार कर रही है और दूसरी ओर उनकी संवेदनशीलता की रिपोर्टिंग करने पर पत्रकारों के विरुद्ध उसी कानून का प्रयोग कर रही है, यह पत्रकारों के प्रति पुलिसिया अत्याचार और उनके दमन की ख़तरनाक़ नयी प्रवृत्ति है।
ऐसे मामले एक पत्रकार और स्क्रोल.इन जैसे छोटे मीडिया संगठनों के वित्तीय संसाधनों की बर्बादी का सबब बनते हैं। फिर भी स्क्रोल.इन अपनी साहसी रिपोर्टिंग पर ऐसे खुल्लमखुल्ला हमले की कोशिशों से बिना डरे अपनी रिपोर्ट के मन्तव्य पर अटल है।
नेटवर्क ऑफ वुमेन इन मीडिया इंडिया, सुप्रिया शर्मा और स्क्रोल डॉट इन के पक्ष में मजबूती के साथ खड़ा है और प्रेस को ख़ामोश करने और उसे समाज के सर्वाधिक वंचित तबके के हालात पर रिपोर्टिंग करने के कर्तव्य से रोके जाने के ऐसे प्रयासों की पुरजोर मजम्मत करता है. हम माँग करते हैं कि यह एफ0आई0आर0 वापस ली जाय और शर्मा को गिरफ्तारी से बचाया जाय.  ---by समकालीन जनमत June 20, 2020


वरिष्ठ पत्रकार सुप्रिया शर्मा की  रिपोर्ट  को आप यहाँ पढ़ सकते हैं:










( नेटवर्क ऑफ वुमेन इन मीडिया के बयान का हिन्दी अनुवाद दिनेश अस्थाना ने किया है)

Sunday, June 23, 2019

दिल्ली में खोजी महिला पत्रकार मिताली चंदोला पर हमला

लगातार असुरक्षित होती जा रही है दिल्ली 
नई दिल्ली: 23 जून 2019: (मीडिया स्क्रीन ब्यूरो):: 
जिस दिल्ली के बारे में कभी गीत लिखे गए थे कि दिल्ली है दिल हिंदुस्तान का..वह दिल्ली लगातार असुरक्षित होती जा रही है। न महिलाएं सुरक्षित हैं नहीं दुसरे लोग। यहाँ तक की पत्रकार भी असुरक्षित हो गए हैं। कोई भी किसी पर हमला करके साफ़ बच।  अब नई घटना हुई है दिल्ली के जानेमाने इलाके वसुंधरा एन्क्लेव में। हमला रात 12:30 हुआ जब वह नोयडा की तरफ जा रही थी। यह सारी घटना देश की राजधानी दिल्ली के वसुंधरा एन्क्लेव इलाके में शनिवार देर रात को हुई। नकाबपोश बदमाशों ने एक खोजी महिला पत्रकार मिताली चंदोला को गोली मार दी। आरम्भिक सूचनाओं के मुताबिक उस पर कम से कम तीन गोलियां चलायीं गयी। पूर्व क्राइम रिपोर्टर मिताली चंदोला शनिवार देर रात करीब 12.30 बजे पूर्वी दिल्ली के धर्मशीला कैंसर अस्पताल रोड़ पर अपनी कार ड्राइव करते हुए आ रही थी कि तभी रेड लाइट के पास बाइक सवार दो नकाबपोश बदमाशों ने उसकी कार पर फेंकें। वह नहीं रुकी तो उस पर सामने से  गोलियां चलायीं गयीं। उस पर कम से कम तीन फायर हुए। बदमाशों ने महिला को तीन गोलियां मारी, जिनमें से एक गोली महिला को लगीं और दो कार के फ्रंट विंडशील्ड में जा लगी। गोली महिला के दाहिने हाथ में लगी। घटना की सूचना मिलने पर पुलिस द्वारा महिला को नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। जहां फिलहाल उनकी हालत खतरे से बाहर बताई जा रही है। गाड़ी के फ्रंट शीशे पर दो गोलिया मारी गई हैं, ड्राइवर व साइड शीशे पर अंडों से भी हमला किया गया है। शुरुआती जांच में यह मामला व्यक्तिगत दुश्मनी का लग रहा है। इस हमले के पीछे पारिवारिक विवाद है या कोई अन्य मकसद यह जांच के बाद ही साफ़ हो पाएगा।

Monday, December 9, 2013

छत्तीससगढ़ में पत्रकार कल्याण कोष

मीडिया स्क्रीन में हम मीडिया से जुड़ी जानकारी अक्सर देते रहते हैं। इसी सिलसिले में इस बार प्रस्तुत है छत्तीसगढ़ में जारी पत्रकार कल्याण कोष  विवरण। इसे आप छत्तीसगढ़ मेल में भी पढ़ सकते हैं। 
छत्तीसगढ़ पत्रकार कल्याण कोष नियम 2001
छत्तीसगढ़ राजपत्र
प्राधिकार से प्रकाशित  


क्रमांक 17,   रायपुर, शुक्रवार, दिनांक 27 अप्रैल 2001 - वैशाख 7, शक 1923

छत्तीसगढ़ पत्रकार कल्याण कोष नियम 2001
जनसम्पर्क विभाग
मंत्रालय, डी.के.एस. भवन, रायपुर
रायपुर, दिनांक 27 अप्रैल 2001

   क्रमांक 1176 एच./जसंसं/2001.-छत्तीसगढ़ पत्रकार कल्याण समिति के विधान के अधीन छत्तीसगढ़ पत्रकार कल्याण कोष के उद्देश्यों को पूरा करने के लिये प्रबंध समिति अपने कार्य संचालन के लिए नीचे दी गयी नियमावली बनाती है, अर्थात :-

   नियम (1) नाम-यह नियम छत्तीसगढ़ पत्रकार कल्याण कोष नियम 2001 कहलायेंगे.

   नियम (2) पत्रकारों के कल्याण के लिये शासन द्वारा आबंटित राशि का वितरण इन नियमों के अनुसार किया जायेगा.

   नियम (3) पत्रकार कल्याण कोष का आहरण और संवितरण जनसंपर्क संचालक अथवा उनके द्वारा  नामजद अधिकारी द्वारा किया जायेगा.

   नियम (4) पात्रता-छत्तीसगढ़ के श्रमजीवी पत्रकार और ऐसे पत्रकार जिन्हें समिति सहायता के लिये पात्र समझती है और उन पर आश्रित परिवार के सदस्य इस निधि से सहायता पाने के पात्र होंगें.

   नियम (5) सहायता निम्नलिखिल स्थितियों में दी जा सकेगी :-

   (क) नियम 4 से उल्लिखित पत्रकार अथवा उनके परिवार के सदस्यों को लंबी अथवा गंभीर बीमारी या दुर्घटना में आहत होने पर इलाज के लिये.

   (ख) किसी दैवी विपत्ति से पीड़ित होने पर.

   (ग) पत्रकारिता के क्षेत्र में कम से कम 30 वर्ष की सेवा करने के बाद वृध्दावस्था में विपन्नता के कारण.

   (घ) नियम (4) में उल्लेखित श्रमजीवी पत्रकार की मृत्यु हो जाने पर यदि उस परिवार के पास आजीविका का कोई साधन न हो.

नोट - (परिवार से आशय यथास्थिति पति/पत्नी आश्रित  माता-पिता और नाबालिक बच्चों से है)

   नियम (6) सहायता की राशि-पत्रकार कल्याण निधि से एक वर्ष में एक व्यक्ति को एक बार कम से कम 5,000 रूपए एवं अधिकतम 50,000 (पचास हजार) रूपये की सहायता दी जा सकेगी.
टीप -विशेष परिस्थितियों में जनसंपर्क संचालक को यह अधिकार होगा कि समिति की दो बैठकों के बीच के अंतराल में वे इस सीमा तक सहायता स्वीकृत कर सकें. ऐसे प्रकरण समिति की अगली बैठक में कार्योत्तर अनुमोदन के लिये रखे जाएंगे.

   नियम (7) सहायता प्राप्त करने का तरीका - (क) सहायता प्राप्त करने के लिये परिशिष्ट एक में निर्धारित प्रपत्र पर संबंधित श्रमजीवी पत्रकार/परिवार के सदस्य को आवेदन करना होगा.

   (ख) लेकिन यदि अशक्त होने के कारण सहायता प्राप्त करने के इच्छुक पत्रकार/परिवार के सदस्य निर्धारित प्रपत्र में आवेदन नहीं भर सकें तो उन्हें निकट से जानने वाले दो पत्रकार उनकी ओर से आवेदन कर सकेंगे.

   (ग) विशेष परिस्थितियों में समिति स्वविवेक से सहायता स्वीकृत कर सकेगी.

टीप :- नियम 6 की टीप के अधीन नियम 7 क ख ग के अंतर्गत जनसंपर्क संचालक द्वारा सहायता सव्ीकृत की जा सकेगी.

   नियम (8)-प्राप्त आवेदन पत्रों पर समिति का निर्णय अंतिम होगा.

   नियम (9)  व्याख्या-नियम की व्याख्या के संबंध में शासन का निर्णय अंतिम होगा.

छत्तीसगढ़ के राज्यपाल के नाम से तथा आदेशानुसार
सी.के. खेतान, अपर सचिव

प्रपत्र परिशिष्ट एक
आवेदन - पत्र
(1) आवेदक का  पूरा नाम
(2) आवेदक के पिता/पति का नाम
(3) आवेदक का पता
(4) पत्रकारिता के क्षेत्र में आवेदक की सेवा की संक्षिप्त जानकारी

नोट- आश्रितों द्वारा आवेदन किये जाने पर दिवंगत पत्रकार की सेवाओं का संक्षिप्त विवरण दिया जाये.
(5) समस्त स्रोतों से आवेदक /आश्रितों की आय
(6) परिवार के आश्रित सदस्यों के बारे में निम्नानुसार जानकारी दें :-

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   क्र.        नाम        आयु        संबंध        सभी स्रोतों से वार्षिक आय
   (1)        (2)        (3)        (4)            (5)

---------------------------------------------------------------

(7) अपने/पति/पत्नी अथवा परिवार के आश्रित सदस्यों के पास, यदि कोई हो तो, अचल संपत्ति का विवरण और उससे होने वाली वार्षिक आय.
(8) प्रयोजन जिसके लिये सहायता अपेक्षित है.
(9) यदि अन्य किसी कोष से सहायता मिली हो तो उसकी जानकारी.
(10) अन्य जानकारी ..........................................................
(11) स्थान और दिनांक ...................................................
 

जहां श्रमजीवी पत्रकार/आश्रित खुद आवेदन नहीं करते एवं उसके बदले उन्हें जानने वाले दो पत्रकार आवेदन करते हैं, तो दोनों के हस्ताक्षर होंगे और बिंदु 10 के तहत यह स्पष्ट बतायेंगे कि किन परिस्थितियों में आवेदक/आश्रित आवेदन नहीं कर रहे हैं।

नोट- आवेदन प्रपत्र में निर्दिष्ट सभी बिंदुओं पर सुवाच्च अक्षरों में पूरी जानकारी दी जानी चाहिए
हस्ताक्षर

(आवेदक का पूरा नाम)

Date:  5 March 2007 - 6:52pm         

छत्तीससगढ़ में पत्रकार कल्याण कोष 

Thursday, April 4, 2013

केन्‍द्रीय प्रैस प्रत्‍यायन समिति का पुनर्गठन

04-अप्रैल-2013 15:57 IST
समिति का कार्यकाल पहली बैठक की तारीख से दो वर्ष होगा
सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने सेन्‍ट्रल प्रैस एक्रेडिटेशन कमेटी (केन्‍द्रीय प्रैस प्रत्‍यायन समिति) का पुनर्गठन किया है। यह समिति आवेदनों पर विचार करके मीडिया के सदस्‍यों को प्रत्‍यायन प्रदान करने के लिए अनुमोदन करती है। इस समिति के सदस्‍यों के नाम हैं-

श्री हिमांशु चटर्जी (इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्‍टस), श्री बी.एम. शर्मा (ऑल इंडिया स्‍मॉल एंड मीडियम न्‍यूजपेपर्स फेडरेशन), श्री प्रमोद माथुर (वर्किंग न्‍यूज कैमरामेन्‍स एसोसिएशन), श्री सुरिन्‍दर कपूर (न्‍यूज कैमरामेन्‍स एसोसिएशन), सुश्री कूमी कपूर (एडिटर्स गिल्‍ड ऑफ इंडिया), श्री शाज़ी ज़मा (इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन), श्री स्‍वराज थापा (प्रैस एसोसिएशन), श्री मनोरंजन भारती (न्‍यूज ब्रॉडकास्‍टर्स एसोसिएशन), श्री सुप्रिया प्रसाद (ब्रॉडकास्‍ट एडिटर्स एसोसिएशन), श्रीमती मंगीपुडी अरूणा (एसोसिएशन ऑफ स्‍मॉल एंड मीडियम न्‍यूजपेपर्स ऑफ इंडिया), श्री त्‍यागराज (इंडियन फेडरेशन ऑफ स्‍मॉल एंड मीडियम न्‍यूजपेपर्स), श्री गीतार्थ पाठक (इंडियन जर्नलिस्‍टस यूनियन), श्री जगदीश यादव (एसोसिएशन ऑफ एक्रेडिटेड न्‍यूज कैमरामैन), श्री पद्मधर पति त्रिपाठी (ऑल इंडियन जर्नलिस्‍टस वेलफेयर एसोसिएशन), श्री राधेश्‍याम शर्मा (ऑल इंडिया न्‍यूजपेपर्स एडिटर्स कांफ्रेंस), श्री सुभाष निगम (नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्‍टस), श्री पंकज वोहरा, श्री निर्मल पाठक, सुश्री नीरजा चौधरी, सुश्री पल्‍लवी घोष, श्री विनोद अग्निहोत्री, श्री दिवाकर, श्री वर्गीस के. जॉर्ज, श्री सुनील गटाडे और श्री नवीन ग्रेवाल (नामांकित)। 

इस समिति का कार्यकाल इसकी पहली बैठक की तारीख से दो वर्ष होगा। 


मीणा/शुक्‍ल/यशोदा- 1712

Monday, February 4, 2013

मीडिया जगत में लोकप्रिय: मोबाइल रेडियो रूस

14.10.2009, 17:19
रेडियो रूस के प्रसारण 17 की जगह 39 भाषाओं में 
रेडियो रूस एक नई परियोजना शुरू कर रहा है जिसे नाम दिया गया है–“मोबाइल रेडियो रूस”। अब रेडियो रूस के प्रसारण मोबाइल टेलिफ़ोन पर भी सुने जा सकते हैं।
दुनिया में हर उस जगह पर जहाँ टेलिफ़ोन सेवा उपलब्ध है रेडियो रूस के श्रोता 17 भाषाओं में रेडियो रूस के प्रसारण सुन सकते हैं। इसके लिए आपको अपने अपने टेलिफ़ोन पर एक विशेष प्रोग्राम लोड करना होगा जो रेडियो रूस के श्रोताओं को निःशुल्क उपलब्ध कराया जा रहा है।इस समय “मोबाइल रेडियो रूस” के कार्यक्रम मोबाइल विन्डोज़ के आधार पर कार्यरत स्मार्ट फ़ोनों के लिए उपलब्ध हैं लेकिन जल्दी ही रेडियो रूस के प्रसारण 17 की जगह 39 भाषाओं में सभी तरह के सेलफ़ोनों पर सुने जा सकेंगे। आप अपने फ़ोन पर “मोबाइल रेडियो रूस” का प्रोग्राम सेट कर लीजिए फिर हम हमेशा आपके साथ होंगे।
आपको कम्प्यूटर पर रेडियो रूस की वेबसाईट खोलकर exe फ़ाईल पर जाकर यह विशेष प्रोग्राम लोड करना है।
इसके लिए सबसे पहले आप exe फ़ाईल को वेबसाईट से अपने कम्प्यूटर पर डाउनलोड कर लीजिए।
फिर ActiveSync प्रोग्राम की मदद से अपने सेलफ़ोन को कम्प्यूटर के साथ जोड़िए और exe फ़ाईल को अपने सेलफ़ोन पर लोड कर लीजिए।
इसके बाद इस फ़ाईल को खोलकर इसमें दी गई हिदायतों के अनुसार प्रोग्राम लोड कीजिए।
प्रोग्राम लोड करने के लिए cab फ़ाईल का इस्तेमाल करना होगा।

सबसे पहले cab फ़ाईल को अपने कम्प्यूटर पर डाउनलोड करिए और उसे कम्प्यूटर पर save यानी सुरक्षित कर लीजिए।
उसके बाद cab फ़ाईल को खोलकर उस में दी गईं हिदायतों का पालन कीजिए।
प्रोग्राम का उपयोग करने के लिए हिदायतें:
यह ज़रूरी है कि आपके स्मार्टफ़ोन को इन्टरनेट से जोड़ना सम्भव हो। इसके बाद प्रोग्राम स्टार्ट कीजिए और वह भाषा चुनिए जिसमें आपको प्रसारण सुनना है। मेनू में प्रसारणों की पूरी सूची दी गई है।
 (रेडियो रूस से साभार)

मोबाइल रेडियो रूस

Wednesday, January 30, 2013

मीडिया के लिए दिशा- निर्देश

30-जनवरी-2013 16:51 IST
मेघालय, नगालैंड और त्रिपुरा विधानसभा चुनाव, 2013
निर्वाचन आयोग ने लोक प्रतिनिधित्‍व अधिनियम, 1951 की धारा 126 का हवाला देते हुए कहा है कि इस धारा के तहत मतदान के 48 घंटे के पहले टेलीविजन या अन्‍य माध्‍यमों से चुनाव चर्चा नहीं की जा सकती। आयोग ने मेघालय, नगालैंड और त्रिपुरा विधानसभा चुनाव, 2013 के संदर्भ में यह कहा है। 

उल्‍लेखनीय है कि ऐसी शिकायतें मिली थीं कि टेलीविजन चैनल समाचारों और अन्‍य कार्यकम्रों के दौरान चुनाव चर्चा करके लोकप्रतिनिधित्‍व अधिनियम, 1951 की धारा 126 की अवहेलना करते हैं। इसके अलावा धारा 126ए के तहत एक्‍जिट पोल और उनके नतीजे भी प्रतिबंधित हैं। निर्वाचन आयोग टीवी/रेडियो चैनल और केबल नेटवर्क से आग्रह करता है कि वे मतदान के 48 घंटे के दौरान ऐसा कोई कार्यक्रम प्रस्‍तुत न करें जिससे धारा 126 का उल्‍लंघन होता हो। संबंधित टीवी और रेडियो चैनल मतदान संबंधी प्रसारण की अनुमति के लिए राज्‍य/जिला/स्‍थानीय अधिकारियों से संपर्क कर सकते हैं ताकि वे आदर्श आचार संहिता का पालन करते हुए कार्यकम्र पेश कर सकें। संबंधित सक्षम अधिकारी शांति व्‍यवस्‍था और अन्‍य मामलों को ध्‍यान में रखते हुए उपरोक्‍त अनुमति दे सकता है। 

निर्वाचन आयोग ने मीडिया का ध्‍यान भारतीय प्रेस परिषद के दिशा निर्देशों की तरफ भी दिलाया है जिनके तहत मीडिया को निष्‍पक्ष रूप से चुनाव की खबरें पेश करनी हैं। मीडिया को यह भी आदेश दिया गया है कि वह जाति, धर्म, समुदाय और भाषा पर आधारित किसी प्रकार की खबर नहीं देगा। इसके अलावा मीडिया पर यह पाबंदी भी है कि वह किसी भी उम्‍मीदवार या राजनीतिक दल के बारे में बढा-चढाकर कोई रिपोर्ट नहीं देगा। 
(PIB)  मीडिया के लिए दिशा- निर्देश
मीणा/अरुण/अखलद-364

Tuesday, December 18, 2012

लोकसभा में प्रश्न//उत्तर

दूरदर्शन पर आपत्तिजनक सामग्री
सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री मनीष तिवारी ने आज लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि प्रसार भारती ने सूचित किया है कि दूरदर्शन कार्यक्रमों के निर्माण और प्रसारण के लिए अपनी प्रसारण एवं विज्ञापन संहिता का कड़ाई से अनुपालन करता है। अत: दूरदर्शन पर अभद्रता या आपत्तिजनक विषय-वस्तु वाले कार्यक्रमों का प्रसारण नहीं होता है। इस मंत्रालय ने महिला और बाल विकास मंत्रालय (डब्ल्यूसीडी) अथवा गृह मंत्रालय को दूरदर्शन और अन्य चैनलों पर प्रसारित विषय-वस्तु के लिए विद्यमान कानून में संशोधन करने अथवा नई संहिता बनाने के लिए कोई अनुरोध नहीं भेजा है। गृह मंत्रालय ने सूचित किया है कि वर्तमान में उनके पास दूरदर्शन के विभिन्न चैनलों पर प्रसारित किए जाने वाले कार्यक्रमों और विज्ञापनों में अभद्रता/आपत्तिजनक विषय-वस्तु को रोकने के लिए भारतीय दंड संहिता में संशोधन हेतु कोई प्रस्ताव नहीं है। तथापि, महिला और बाल विकास मंत्रालय ने सूचित किया है कि वह दृश्य श्रव्य मीडिया और इलैक्ट्रोनिक फॉर्म की सामग्री को दायरे में लाने के लिए तथा स्त्रियों के अशिष्ट निरूपण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1986 में शास्ति संबंधी प्रावधानों को मजबूत बनाने के लिए कानून के दायरे का विस्तार करने के साथ ही कतिपय संशोधन पर विचार कर रहा है जिसे संसद में संशोधन विधेयक के रूप में पुर:स्थापित करने हेतु सरकार द्वारा अनुमोदित किया जा चुका है। (PIB)  18-दिसंबर-2012 15:55 IST***
मीणा/राजगोपाल/शदीद-6186

प्रिंट मीडिया में प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई)

भारतीय संस्‍थाओं में 26 प्रतिशत तक विदेशी निवेश की अनुमति
सूचना और प्रसारण राज्‍य मंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) श्री मनीष तिवारी ने आज लोक सभा में एक प्रश्‍न के लिखित उत्‍तर में बताया कि प्रिंट मीडिया क्षेत्र में, गैर-समाचारों अर्थात प्रिंट मीडिया के विशेषज्ञता/तकनीकी/वैज्ञानिक क्षेत्र में 100 प्रतिशत तक के विदेशी निवेश की अनुमति है, जबकि समाचार और समसामयिकी से संबंधित समाचार पत्रों और पत्रिकाओं का प्रकाशन करने वाली भारतीय संस्‍थाओं में 26 प्रतिशत तक विदेशी निवेश की अनुमति है। तथापि, पूर्ण स्‍वामित्‍व वाली सह-संस्‍था के माध्‍यम से अपने समाचार पत्रों के फैसीमाइल संस्‍करण प्रकाशित करने वाले विदेशी प्रकाशन घरानों के मामले में 100 प्रतिशत तक विदेशी निवेश की अनुमति है। उन्‍होंने यह भी बताया कि भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने प्रिंट मीडिया में विदेशी प्रत्‍यक्ष निवेश के मुद्दे पर कोई सिफारिश नहीं की है। वर्तमान में, प्रिंट मीडिया में विदेशी प्रत्‍यक्ष निवेश की अधिकतम सीमा बढ़ाने का कोई प्रस्‍ताव नहीं है। सरकार ने गैर-समाचार क्षेत्र अर्थात वैज्ञानिक/तकनीकी/विशेषज्ञता पत्रिकाएं/आवधिकियां/जर्नल प्रकाशित करने के लिए पहले ही 100 प्रतिशत तक विदेशी प्रत्‍यक्ष निवेश की अनुमति दी है।  (PIB)  18-दिसंबर-2012 14:33 IST
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मीणा/शोभा/रामकिशन-6182

Monday, October 8, 2012

आर्थिक सम्पादकों का सम्मेलन-2012

सम्मेलन में उदघाटन भाषण देते हुए श्री पी चिदम्बरम 
आर्थिक सम्पादकों का सम्मेलन-2012 सोमवार आठ अक्टूबर को नई दिल्ली में शुरू हुआ। इसे  सफल बनाने के लिए पत्र सूचना कार्यालय की और से व्यापक स्तर पर बहुत से प्रबंध किये गए। ऍफ़ डी आई जैसे बहुत से अन्य मुद्दों पर बड़े पैमाने पर हो रही चर्चा के दिनों में इस तरह के सम्मेलन का आयोजन और भी प्रासंगिक हो गया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह सम्मेलन देश की आर्थिकता को लेकर ने ज्ञान का प्रकाश देश की जनता के साथ साथ पूरी दुनिया के सामने लायेगा। इस सम्मेलन के उद्घाटन का भाषण वित्त मंत्री पी चिदम्बरम ने दिया। इस एतिहासिक भाषण के यादगारी पलों को वहां मौजूद छायाकारों ने झट से अपने कैमरे में संजो लिया। उसी अवसर की एक तस्वीर यहाँ भी प्रस्तुत है।    (PIB)    08-October-2012

Friday, September 28, 2012

मतदाता शिक्षण पर राष्ट्रीय मीडिया पुरस्कार

जी न्यूज और अमर उजाला को किया जाएगा पुरस्कृत
जी न्यूज को विधानसभा चुनाव (जनवरी-मार्च) 2012 के लिए भारतीय निर्वाचन आयोग का मतदाता शिक्षण पर राष्ट्रीय मीडिया पुरस्कार, अमर उजाला को विशेष पुरस्कार
भारतीय निर्वाचन आयोग ने खासतौर पर उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव (जनवरी-मार्च) 2012 के दौरान मतदाताओं में जागरुकता के उत्कृष्ट अभियान के लिए जी न्यूज का चयन मतदाता शिक्षण पर राष्ट्रीय मीडिया पुरस्कार के लिए किया है। उपर्युक्त चुनावों में मतदाता शिक्षा और जागरुकता में सराहनीय योगदान देने के लिए हिन्दी दैनिक 'अमर उजाला' को विशेष पुरस्कार के लिए चयनित किया गया है। 
भारतीय निर्वाचन आयोग ने 23 जनवरी 2012 को आयोजित मीडिया सम्मेलन के दौरान इस आशय की घोषणा की थी कि मतदाता शिक्षण और जागरुकता के लिए सर्वश्रेष्ठ अभियान चलाने वाले मीडिया समूह को पुरस्कृत किया जाएगा। 
नई दिल्ली में 25 जनवरी 2013 को तीसरे मतदाता दिवस के अवसर पर यह पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे।
आयोग ने निर्णय लिया है कि आने वाले सभी चुनावों के लिए इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के लिए अलग-अलग पुरस्कारों की शुरुआत की जाएगी। (PIB)      27-सितम्बर-2012 10:45 IST

Thursday, September 27, 2012

यू-ट्यूब पर आपत्तिजनक वी‍डियो

राष्‍ट्रपति ने की कड़े शब्‍दों में निंदा
राष्‍ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी ने सोशल मीडिया के जरिये आपत्तिजनक वीडियो बनाने और उसके प्रसार की कड़े शब्‍दों में निन्‍दा की है। उन्‍होंने कहा कि भारत ऐसे किसी भी कार्य की अनदेखी नहीं कर सकता, जो धार्मिक भावनाओं की निन्‍दा करता हो या उन्‍हें चोट पहुंचाता हो। विदेश मंत्रालय अमरीकी अधिकारियों के सम्‍पर्क में है, जिन्‍होंने इस मामले पर हमारी चिंता पर गौर किया है। गूगल इंडिया ने भारतीय कानून का पालन करते हुए आपत्तिजनक सामग्री तक पहुंच पर रोक लगा दी है। {PIB} 27-सितम्बर-2012 15:41 IST

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Wednesday, September 19, 2012

कोरिया गणराज्‍य और फिलिपिन्‍स के पत्रकार

पत्रकारों ने की इस्‍पात मंत्री से भेंट 
कोरिया गणराज्‍य और फिलिपिन्‍स के वरिष्‍ठ पत्रकारों के एक दल ने आज यहां केन्‍द्रीय इस्‍पात मंत्री श्री बेनी प्रसाद वर्मा से भेंट की। मुलाकात के दौरान मंत्रालय के वरिष्‍ठ अधिकारी, सेल के अध्‍यक्ष और विदेश मंत्रालय के प्रतिनिधि भी मौजूद थे। 

इस्‍पात मंत्री ने 
मीडिया के प्रतिनिधियों को भारतीय इस्‍पात उद्योग के बारे में जानकारी दी और उन्‍हें भारत के इस्‍पात उत्‍पादन, उपभोग और क्षमता विस्‍तार से अवगत कराया। उन्‍होंने कहा कि भारत ने वर्ष 2011-12 के दौरान इस्‍पात के उत्‍पादन में 7 प्रतिशत की प्रभावशाली वृद्धि दर्ज की और वह दुनिया के चौथे सबसे बड़े इस्‍पात निर्माता के रूप में उभरा है। वर्तमान ग्रीनफील्‍ड और ब्राउनफील्‍ड विस्‍तारों के साथ भारत के अगले कुछ वर्षों में दूसरा सबसे बड़ा उत्‍पादक बनने की संभावना है। 

पत्रकारों को ओडि़शा में पास्‍को परियोजना की स्थिति की जानकारी दी गई और राज्‍य के स्‍थानीय लोगों की अनु‍मति से परियोजना को आगे बढ़ाने की जरूरत बताई गई। (पत्र सूचना कार्यालय)
18-सितम्बर-2012 19:35 IST

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