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Tuesday, June 23, 2020

पत्रकार सुप्रिया शर्मा के खिलाफ FIR प्रेस को खामोश करने की कोशिश

वरिष्ठ पत्रकार सुप्रिया शर्मा के मुद्दे को NWMI ने ज़ोरदार ढंग से उठाया 
नई दिल्ली: 20 जून 2020: (समकालीन जनमत)::
नेटवर्क ऑफ वुमेन इन मीडिया, इंडिया (एनडब्ल्यूएमआई) ने प्रधानमंत्री द्वारा 2018 में गोद लिये गये वाराणसी के पास के डुमरी गाँव के निवासियों की आजीविका छिन जाने और उनके भूख के बारे में स्क्रोल डॉट इन की कार्यकारी सम्पादक सुप्रिया शर्मा की रिपोर्ट को निशाना बनाते हुये उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा दर्ज की गयी एफआईआर की निन्दा की है और इसे प्रेस को खामोश करने का प्रयास बताया है। एनडब्ल्यूएमआई ने एफ.आई.आर. को वापस लेने और सुप्रिया शर्मा को गिरफ्तारी से बचाने की मांग की है। 
शुक्रवार को जारी एक बयान में एनडब्ल्यूएमआई ने कहा कि नोवल कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिये लागू कठोर लाॅक डाउन ने भारत के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में ठेका और दैनिक वेतनभोगी मजदूरों को घोर तंगी और अनिश्चितता में झोंक दिया है। ऐसे समय में सार्वजनिक बहसों और नीतिनिर्धारण के लिये ग्रामीण क्षेत्रों और संवेदनशील समुदायों की सूचनायें बहुत महत्वपूर्ण हो गयी हैं। फिर भी पूरे भारत में और खासतौर पर उत्तर प्रदेश में सरकार और पुलिस विभाग ने यह जरूरी कर्तव्य निभानेवाले पत्रकारों को निशाना बनाते हुये मार्च में जारी लाॅक डाउन की तिथि से अब तक कम से कम 55 शिकायतें दर्ज की हैं।
उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा एक सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार सुप्रिया शर्मा को निशाना बनाते हुये एफ0आई0आर0 दर्ज किया जाना इसी कड़ी का ताज़ा उदाहरण है।
वाराणसी के हाशिये के दलित समुदायों और अनौपचारिक श्रमिकों पर लाॅक डाउन के प्रभावों के गहन शोधों के आधार पर सुप्रिया शर्मा ने आठ विस्तृत रिपोर्टें जारी की हैं। डुमरी के निवासियों, पंचायत के कर्मचारियों और जिले के अधिकारियों से साक्षात्कार पर आधारित उनकी रिपोर्ट में गाँव के लोगों की भयंकर भूख का वर्णन है और यह भी कहा गया है कि कैसे सरकार के वायदों के बावजूद उन्हें दोहरी मार झेलनी पड़ी है- उनकी जीविका छिन गयी और उन्हें सार्वजनिक वितरण प्रणाली से राशन भी नहीं मिल सका. जातीय पूर्वाग्रहों के चलते हालात और भी बिगड़ गये.
13 जून की एफ.आई.आर. में उन्हीं माला देवी को शिकायतकर्ता बनाया गया है जिनका साक्षात्कार सुश्री शर्मा ने किया था, और कहा गया है कि माला देवी ने लाॅक डाउन के दौरान भूखे रहने की शिकायत नहीं की थी।  एफ.आई.आर. में माला देवी का आरोप है कि अपनी स्टोरी में सुप्रिया शर्मा ने अपना कर्तव्य और अपने लाॅक डाउन के अनुभव का ठीक ढंग से प्रतिनिधित्व नहीं किया है। एफ.आई.आर. में शिकायतकर्ता ने कहा है कि वह किसी नागरिक संगठन के लिये काम कर रही थी। सुश्री शर्मा के रिपोर्ट में उन्होंने कहा था कि उनका बेटा किसी नागरिक संगठन के लिये काम कर रहा था और वह एक घरेलू सहायिका थी।
पुलिस ने सुप्रिया शर्मा सुश्री के ऊपर पत्रकार बिरादरी को आतंकित करने के उद्देश्य से भा.द.वि. की धारा 501 (मानहानि) के अलावा अनुसूचित जाति एवं जनजाति (नृशंसता निवारण) कानून, 1989 के अन्तर्गत भी मुकदमा कायम किया है। 
हाँलाकि, एफ.आई.आर. में उल्लिखित अनुसूचित जाति एवं जनजाति (नृशंसता निवारण) कानून की दो धाराओं का सुश्री शर्मा की रिपोर्ट से कोई सम्बन्ध नहीं है, और न ही उनमें ऐसा कुछ दिखायी देता है जिसका जिक्र माला देवी ने अपनी शिकायत में किया है। पुलिस ने एफ.आई.आर. में बिना किसी आधार के भा.द.वि. की धारा 269- लापरवाही की धारा, जिससे संक्रमण फैलता है, भी लगाया है।
सुश्री शर्मा की रिपोर्ट से इन धाराओं का कुछ भी लेना-देना नहीं है. आदिवासियों और दलित कार्यकर्ताओं के वर्षों के सतत संघर्ष से ही अनुसूचित जाति एवं जनजाति (नृशंसता निवारण) कानून में 2015 और 2018 के संशोधन अस्तित्व में आये हैं। एक ओर तो पुलिस अनवरत रूप से दलितों और आदिवासियों के विरुद्ध किये गये गम्भीर अपराधों पर एफ.आई.आर. दर्ज करने से मना करके उनका दमन और उनके प्रति शत्रुवत व्यवहार कर रही है और दूसरी ओर उनकी संवेदनशीलता की रिपोर्टिंग करने पर पत्रकारों के विरुद्ध उसी कानून का प्रयोग कर रही है, यह पत्रकारों के प्रति पुलिसिया अत्याचार और उनके दमन की ख़तरनाक़ नयी प्रवृत्ति है।
ऐसे मामले एक पत्रकार और स्क्रोल.इन जैसे छोटे मीडिया संगठनों के वित्तीय संसाधनों की बर्बादी का सबब बनते हैं। फिर भी स्क्रोल.इन अपनी साहसी रिपोर्टिंग पर ऐसे खुल्लमखुल्ला हमले की कोशिशों से बिना डरे अपनी रिपोर्ट के मन्तव्य पर अटल है।
नेटवर्क ऑफ वुमेन इन मीडिया इंडिया, सुप्रिया शर्मा और स्क्रोल डॉट इन के पक्ष में मजबूती के साथ खड़ा है और प्रेस को ख़ामोश करने और उसे समाज के सर्वाधिक वंचित तबके के हालात पर रिपोर्टिंग करने के कर्तव्य से रोके जाने के ऐसे प्रयासों की पुरजोर मजम्मत करता है. हम माँग करते हैं कि यह एफ0आई0आर0 वापस ली जाय और शर्मा को गिरफ्तारी से बचाया जाय.  ---by समकालीन जनमत June 20, 2020


वरिष्ठ पत्रकार सुप्रिया शर्मा की  रिपोर्ट  को आप यहाँ पढ़ सकते हैं:










( नेटवर्क ऑफ वुमेन इन मीडिया के बयान का हिन्दी अनुवाद दिनेश अस्थाना ने किया है)

Sunday, May 31, 2020

वेब मीडिया में रोजगार की असीम संभावनाएं:जयदीप कर्णिक

माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय की तरफ से विशेष आयोजन
भोपाल: 31 मई 2020: (कार्तिका सिंह//मीडिया स्क्रीन ऑनलाइन)::
डिजिटल मीडिया या वेब मीडिया को लेकर बहुत सी भ्रांतियां पाई जा रही हैं। बहुत से लोग इसे मुख्या धारा का मीडिया ही नहीं समझते। बहुत से लोग यह कहते भी सुने जाते हैं कि वेब मीडिया को सरकार बंद करवाने वाली है। इस तरह के आधारहीन प्रचार पर विराम लगाते हुए एक विशेष सेमिनार में कहा गया है कि इस क्षेत्र में असीम सम्भवनाएं हैं। इस सेमिनार का आयोजन माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की तरफ से कराया गया। सेमिनार  में  कहा गया कि वेब मीडिया के क्षेत्र में रोजगार की असीम संभावनाएं हैं। इस क्षेत्र में युवा पत्रकार एक उद्यमी के रूप में अपना करियर बना सकते हैं। कोरोना संकट ने वेब मीडिया के महत्व को और अधिक प्रतिपादित कर दिया है। पत्रकारिता में अब ‘वर्क फ्रॉम होम’ की संस्कृति विकसित हो रही है। ये विचार देश के जाने-माने पत्रकार श्री जयदीप कर्णिक ने व्यक्त किया। 
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के आयोजन ‘हिन्दी पत्रकारिता सप्ताह’ के अंतर्गत उन्होंने ‘वेब मीडिया में उद्यमिता’ विषय पर अपना संबोधन दिया। इस मौके पर उन्होंने अनेक प्रश्नों के उत्तर भी दिए। वेब मीडिया में अपना करियर बनाने वाले युवाओं की जिज्ञासा का समाधान किया।
श्री कर्णिक ने कहा कि हमारे देश में परम्परागत मीडिया एवं टेलीविजन मीडिया एक महंगा उद्योग है जो विज्ञापन आधारित है। विज्ञापन कम मिलने पर परम्परागत मीडिया के सामने तमाम तरह की परेशानियां आने लगती हैं। पत्रकारों पर भी संकट रहता है। जबकि डिजिटल मीडिया में कोई भी व्यक्ति वेबसाइट बनाकर लैपटॉप या फिर मोबाइल से ही काम शुरू कर सकता है। इसमें लागत बहुत कम है। सबसे अच्छी बात यह है कि वह स्वयं ही रिपोर्टर, मालिक एवं सम्पादक होता है। कम पूँजी में वेव मीडिया में उद्यमी बन सकते हैं।
उन्होंने कहा कि आप सफल तभी होंगे जब आपकी वेबसाइट पर सामग्री गुणवत्तापूर्ण और विश्वसनीय होगी। वेबमीडिया के स्टार्टअप को चाहिए कि वे पर्यावरण, विज्ञान, आर्थिक, जनजातीय, गाँव जैसे विषयों पर काम करें। हिंदी भाषा में इन विषयों पर काम करने की खूब संभावनाएं हैं।
उन्होंने कहा कि उद्यमी बनने के लिए जोश, ऊर्जा और विषय का ज्ञान आवश्यक है। जब आप पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरेंगे तो सफलता निश्चित ही मिलेगी।


Wednesday, February 27, 2013

मीडिया की काली करतूत//अमलेन्दु उपाध्याय

जिसकी हो चुकी हत्या उसे बताया हैदराबाद का गुनाहगार 
पाकिस्तान की मुत्तहिदा कौमी मूवमेन्ट
(एमक्यूएम) के लीडर मरहूम एपीए मंज़र इमाम
हैदराबाद बम विस्फोट के बाद भारतीय मीडिया भले ही सरकार और जाँच एजेंसियों पर दबाव बनाने में कामयाब हो गया हो लेकिन न केवल उसकी साम्प्रदायिकता और कट्टरपंथी हिन्दुत्ववादी ताकतों से साँठ-गाँठ उजागर हो गयी बल्कि यह भी उजागर हो गया कि आतंकवाद के खेल में मीडिया घरानों की भूमिका भी कम संदिग्ध नहीं है। जहाँ एक ओर सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति अल्तमस कबीर मीडिया ट्रायल पर गम्भीर चिन्ता जता रहे हैं वहीं पाकिस्तान के एक अखबार ने यह पोल खोल दी है कि भारतीय मीडिया हैदराबाद बम विस्फोट में जिस संदिग्ध को दिखा रहा है उसकी तो पहले ही हत्या हो चुकी है।
हाल ही में जस्टिस अल्तमस कबीर ने पटना में एक कार्यक्रम में इस बात पर चिन्ता जतायी थी कि ट्रायल अदालतों में ही होना चाहिये और फैसला अदालतों में ही होना चाहिये। लेकिन ऐसी बातें चाहे जस्टिस कबीर कहें या जस्टिस मार्कण्डेय काटजू, हमारे मीडिया की समझ में यह बातें आना बन्द हो गयी हैं। तमाशा यह है कि आईबी या पुलिस अपनी चार्जशीट पहले मीडियाकर्मियों को उपलब्ध करा देती है और मीडिया उसे अपनी स्पेशल रिपोर्ट बताकर चिल्लाना और सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर देता है। हैदराबाद बम ब्लास्ट के बाद भी ऐसा देखने में आ रहा है। जब विस्फोट के दस मिनट बाद ही मीडिया एक सुर में चिल्लाने लगा कि इसके पीछे इण्डियन मुजाहिदीन का हाथ है और पूरी रटी-रटायी थ्योरी एक्सक्ल्यूसिव स्टोरी बताकर प्रसारित होने लगी।
पाकिस्तान के अखबार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने खुलासा किया है कि कुछ भारतीय मीडिया घराने इस ब्लास्ट में जिस संदिग्ध को दिखा रहे हैं वह पाकिस्तान की मुत्तहिदा कौमी मूवमेन्ट (एमक्यूएम) के लीडर मरहूम एपीए मंज़र इमाम का चित्र है। इतना ही नहीं गम्भीर बात यह है कि इमाम की हत्या बीती 17 जनवरी को हो चुकी है और तालिबानी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने इस हत्या की जिम्मेदारी कुबूल की है। मजे की बात यह है कि भारतीय मीडिया इमाम का चित्र दिखा कर उन्हें न सिर्फ इण्डियन मुजाहिदीन का सदस्य बता रहा है बल्कि हैदराबाद के संभावित गुनाहगारों में दिखा रहा है।
यहाँ सवाल उठता है कि खुफिया एजेन्सियों के प्रोपेगण्डा को ख़बर बनाकर चलाना कहाँ की पत्रकारिता है। क्या किसी खबर को प्रकाशित करने या ऑन एयर करने से पहले उसकी थोड़ी सी भी पड़ताल करना मीडियाकर्मियों के पेशे की नैतिकता में शामिल नहीं है। लोकतन्त्र के कथित चौथे खम्भे की ऐसी काली करतूतें देश विभाजन की भूमिका तैयार करती हैं।
सोशल मीडिया पर भी भारतीय मीडिया की इस काली करतूत की जमकर भर्त्सना हो रही है। फेसबुक पर एक पत्रकार ने मज़ाक उड़ाते हुये लिखा है – इट्स नॉट फेयर यार। इण्डियन मीडिया के बारे में ऐसा नहीं कहते….. यार अब वो भी क्या करें? आईबी वालों ने गरीब रिपोर्टर्स को जो दिया वो उन्होंने चला दिया… इसमें उनकी क्या गलती है? भाई मैं तो अपने भाइयों के साथ हूँ।
ऐसा नहीं है कि यह कोई पहला मौका है जब भारतीय मीडिया का काला चेहरा सामने आ रहा है। पहले भी कई मौकों पर इसका साम्प्रदायिक चरित्र उजागर हो चुका है। पत्रकार गिलानी प्रकरण में भी मीडिया ने अपना साम्प्रदायिक चरित्र दिखाया था।
मानवाधिकार कार्यकर्ता महताब आलम सवाल उठा रहे हैं कि हैदराबाद ब्लास्ट में कम से कम 6 लोग हिरासत में लिये गये या उनसे पूछताछ की गयी जबकि 13 के नाम उस सूची में हैं जिनसे पूछताछ की जानी है। सभी मुस्लिम हैं। वह व्यंग्य करते हैं- “कौन कहता है कि भारत में मुसलमानों के लिये आरक्षण नहीं है? आतंक का कोई रंग नहीं होता है लेकिन निश्चित रूप से यह इस्लामिक आतंकवाद है।“

(हस्तक्षेप से साभार) 


मीडिया: कोयले की दलाली से कोयले के व्यापार तक