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Tuesday, February 14, 2023

एकुपंक्चर के रहस्यों का पता लगा सकते हैं डा. ढींगरा से

पंजाब स्क्रीन में है डा. इंद्रजीत ढींगरा का विशेष आलेख 

लुधियाना:14 फरवरी 2023: (कार्तिका सिंह//मीडिया स्क्रीन डेस्क)::

आप पढ़ सकते हैं पंजाब स्क्रीन हिंदी में यहां क्लिक कर के
जब आज की तरह का आधुनिक चकाचौंध का दौर नहीं था उस समय नाम भी प्राचीन ढंग, तरीकों और उन  रिवाजों के हिसाब से रखे जाते थे जो उन दिनों आम हुआ करते थे। किसी का नाम होता था कनछेदी लाल तो किसी का नाम होता नकछेदी लाल। आज के युग में इस तरह के नामों का चलन बहुत निरथर्क सा लगता है लेकिन उस दौर के मुताबिक इनका गहरा अर्थ होता था।

ओशो एक जगह बताते हैं जब स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं दवाएं ले कर भी ठीक नहीं होती थी तो लोग किसी सियाने/वैद/हकीम के पास पहुंचते और वह बताता कि इसका कान छिदवा दी जा इसका नाक छिदवा दो। छिदवाने की इस रस्म के बाद स्वास्थ्य की समस्या ठीक हो जाती। मैंने स्वयं भी ऐसे कई मामले देखे जब कुछ बच्चों और युवाओं का बुखार नाक या कान छिदवाने से ठीक पूरी तरह ठीक हो गया और हमेशां के लिए। वास्तव में इतनी सी औपचारिकता से शरीर के अंदर का सर्कट ठीक हो जाता था। शायद इसी ज्ञान ने बाद में एकुपंक्चर विज्ञान के तौर पर बहुत  विकास किया। एकुपंक्चर में भी केवल सुई चुभो कर शरीर की गंभीर बिमारिओं का इलाज किया जाता है। उत्तर भारत में सफलता से डाक्टर कोटनिस की स्मृति में शानदार अस्पताल चला रहे डाक्टर इंद्रजीत सिंह ढींगरा इस सिस्टम के बारे में बहुत ही पते की बातें बताते हैं। उनका अस्पताल लुधियाना के सलेम टाबरी इलाके में है और उनसे अपॉइंटमेंट ले कर मिला जा सकता है।  उन्होंने जो कुछ मीडिया को बताया उसे आप पढ़ सकते हैं पंजाब स्क्रीन हिंदी में यहां क्लिक कर के। 

आजकल जिस तेज़ी से नई नई बीमारियां बढ़ रही हैं और इनके साथ ही बेहद तेज़ी से बढ़ रही है दवाओं की बिक्री बउसे देखते हुए भविष्य कोई ज़्यादा सुंदर नज़र नहीं आता। पहले हर घर परिवार में सबसे ज़्यादा ज़रूरी रूटीन का समान हुआ करता था रसोई का राशन लेकिन आजकल सबसे ज़्यादा ज़रूरी हो गया है हर घर में परिवार के तकरीबन हर सदस्य के लिए दवाओं का बड़ा सा डिब्बा। 

दवाओं की इस जीवन भर चलने वाली नियमित ज़रूरत ने हर मध्यवर्गीय घर परिवार के बजट को बुरी तरह हिला रखा है। इसके बावजूद इस बात की कोई गारंटी नहीं कि कुछ सप्ताह या कुछ महीने दवाएं खाने के बाद मरीज़ पूरी तरह से तंदरुस्त हो जाएगा। दवाओं पर निर्भरता जीवन भर का अभिशाप बन चुकी है। अख़बारों और दुसरे मीडिया में बड़े बड़े विज्ञापन दवाओं की बिक्री के भी आने लगे हैं। ज़ाहिर है इतने बड़े पैमाने पर होने वाली विज्ञापनबाजी का सारा खर्च इन दवाओं की बिक्री से ही निकलता होगा। 

इस मुद्दे पर जल्दी ही हम आपके सामने लाएंगे कुछ नए खोजपूर्ण आलेख और वीडियोज़ लेकिन फ़िलहाल आप पढ़ सकते हैं एकुपंक्चर के संबंध में डाक्टर इंद्रजीत सिंह ढींगरा से हुई बात पर आधारित जानकारी। इस आलेख से आपको मिल सकेगी उस थरेपी की जानकारी जो आपको निश्चित इलाज के बाद पूरी तरह ठीक होने का वायदा भी दे सकती है। बस क्लिक कीजिए यहां और पढ़ लीजिए सारी जानकारी। 

Saturday, September 12, 2020

जानीमानी पत्रिकाओं की बेवक़्त मौत पर भी नहीं रोया यह समाज

सारी उम्र मीडिया की साधना करने वाले अब किस राह पर चलें?
सोशल मीडिया//इंटरनेट: 12 सितंबर 2020: (मीडिया स्क्रीन online)::  
जानीमानी पत्रिकाओं की बेवक़्त मौत हो रही है और मीडिया संस्थानों से पत्रकारों की छंटनी हो रही है। इतना कुछ होने पर भी समाज मूक दर्शक बना हुआ है। इस समाज के पास शराब पीने के लिए बहुत से पैसे हैं लेकिन बौद्धिक सम्पदा को बचाने के लिए कुछ भी नहीं। 
बुरी खबर यह है कि कोरोनावायरस (कोविड-19) के कारण मध्यवर्गीय लोगों के कारोबार ठप्प हो रहे हैं। बहुत से ढाबे, बहुत काम और बहुत से कारोबार बंद हो चुके हैं। इस मार का असर मीडिया पर भी पड़ा है।  ऐसे में जहां पाठकों पर ऑनलाइन पढ़ने का दबाव बना है वहीं एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू में कमी भी आई है।
ऐसे में ब्रिटेन प्रसिद्ध अखबार ‘डेली मिरर’ (Daily Mirror) और ‘डेली एक्सप्रेस’ (Daily Express) की प्रकाशक कंपनी ‘रीच’ (Reach) ने 550 एम्प्लॉयीज की छंटनी करने की योजना बनाई जिसकी खबरें जुलाई में बाहर आ गयीं थीं। इतना बड़ा  ब्रांड अगर ऐसा करता है तो यह यकीकन एक दुखद सत्य है। इसके साथ ही यह सुखद तथ्य भी सामने आया है कि डिजिटल मीडिया में लोगों का उत्साह भी तेज़ी से बढ़ रहा है।
इसी सिलसिले में जानीमानी प्रकाशक कंपनी "रीच" (Reach) के चीफ एग्जिक्यूटिव जिम मुलेन (Jim Mullen) ने एक बयान में कहा कि महामारी के दौरान मीडिया क्षेत्र में संरचनात्मक परिवर्तन में तेजी आई है और इससे हमारे डिजिटल उत्पादों को बढ़ावा मिला है। साथ ही यह भी कहा कि विज्ञापन ज़्यादा न मिलने की वजह से  डिजिटल रेवेन्यू नहीं बढ़ा है। रेवन्यू न बढ़ने के कारण आर्थिक संकट की तलवार लटकने लगी है। तलवार गिरी है अब पत्रकार और गैर-पत्रकार  कामगारों पर। 
मीडिया में आई खबरों के मुताबिक इस गंभीर आर्थिक संकट को बहुत बड़ा कारण बताते हुए प्रकाशक कंपनी ने कहा कि कंपनी लगभग 550 कर्मचारियों की छंटनी करेगा, जोकि इसके कर्मचारियों की संख्या का करीब 12 प्रतिशत है। ऐसा करने से कंपनी को 35 मिलियन पाउंड यानी करीब 43 मिलियन डॉलर की सालाना बचत होगी। अब कम्पनी को तो बचत हो जाएगी लेकिन जिनको नौकरी से बाहर किया जाना है उनका क्या बनेगा। शायद ऐसे सवालों का जवाब पूंजीवादी सोच के लोगों के पास होता ही नहीं।
केवल नफा नुकसान की बात सोचने वाले लोग संवेदना से दूर होते चले जाते हैं। ऐसे में अगर कोई पत्रकार आर्थिक तंगी  चल  या वह ख़ुदकुशी कर लेता  है तो पूरी खबर सामने नहीं आती। बस छोटी सी खबर कि एक पत्रकार की मौत हो गई। पूरे का पूरा परिवार उजड़ने वाली इस दुखद घटना को भी कोरोना की वजह से हुई मौत बता दिया जाता है। 
ऐसी नाज़ूक हालत में  "रीच" (Reach) के चीफ एग्जिक्यूटिव जिम मुलेन (Jim Mullen) का ब्यान बहुत ही महत्वपूर्ण भी बन जाता है। इस नुक्सान भरी स्थिति के तकनीकी फायदे गिनवाते हुए उन्होंने कहा कि इस कदम से हमारा एडिटोरियल प्रिंट व डिजिटल की नेशनल व रीजनल टीमों को एक साथ लेकर अधिक केंद्रीयकृत रूप में आगे बढ़ेगा। हमारे न्यूज ब्रैंड्स की मज़बूत एडिटोरियल पहचान को बरकरार रखते हुए इसकी दक्षता में महत्वपूर्ण वृद्धि होगी और डुप्लीकेशन खत्म होगा। ब्रिटेन में कई रीजनल न्यूजपेपर का प्रकाशन करने वाली इस कंपनी ने कहा कि पुनर्गठन से ग्रुप को करीब 20 मिलियन पाउंड का खर्च आएगा। शायद इसे ही कहा जाता है आपदा की अवसर में बदलना। 
कंपनी ने कहा कि उसके पास अब कम स्पेस होगा और मैनेजमेंट स्ट्रक्चर भी बहुत ही सिम्पल होगा। कंपनी ने इस बात की भी जानकारी दी है कि सर्कुलेशन और ऐडवर्टाइजिंग की कमी के चलते कंपनी का राजस्व 27.5 प्रतिशत घट गया है। निश्चय ही यह बहुत बड़ी गिरावट है।
लेकिन सत्य यह भी कि यह है इस नाज़ुक दौर में इतनी बढ़ी कम्पनी की कारोबारी रणनीति। साथ ही उन्होंने बहुत ही ईमानदारी से अपने फायदे भी गिनवाए हैं। राजस्व में आई कमी और पुनर्गठन पर आने वाले खर्चे की बात भी स्पष्ट हुई है लेकिन बेरोज़गार होने वालों पर क्या असर होगा इसका कोई ज़िक्र तक नहीं है। शायद पूंजवादी सिस्टम में उनका कोई अर्थ नहीं है। यही सोच अधिकतर लोगों को साम्यवाद की तरफ ले जाती है।
अब देखना है कि पूरा समाज इसके लिया क्या करता है? अफ़सोस है कि न जाने कितनी कितनी शराब पी जाने वाले समाज ने मीडिया के कम हो रहे राजस्व को पूरा करने की कोई औपचारिक पेशकश तक भी नहीं की। इस पूरे समाज ने बेरोज़गार हुए पत्रकार और गैरपत्रकार मीडिया कर्मियों के घरों की चिंता भी नहीं की।  ज़ाहिर है कि अपने आप को पढ़ा लिखा और सांस्कृतिक समाज कहलाने वाला यह पूरा सिस्टम मीडिया, लेखन, कविता, कला या बौद्धिक सम्पदा से भरे लोगों के रहने लायक है ही नहीं। यह समाज अभी भी बेहद पिछड़ा हुआ और स्वार्थी है। शायद यहाँ वह सुबह कभी नहीं आएगी जिसके सपने हमें साहिर लुधियानवी साहिब ने दिखाए।
अफ़सोस कि इस समाज को नंदन और कादम्बिनी जैसी पत्रिकाएं बंद होने पर कोई मलाल नहीं हुआ। यह समाज की जीवन धारा से कम तो न थीं। गौरतलब है कि एचटी मीडिया द्वारा जहां एक ओर संस्करणों से पत्रकारों की विदाई की जा रही है, वहीं कंपनी ने प्रसिद्ध और लोकप्रिय नंदन और कादम्बिनी पत्रिका का प्रकाशन भी पूरी तरह से बंद करने का फैसला सुना दिया है। उल्लेखनीय है कि साहित्यिक पत्रिका कादम्बिनी 1960 से प्रकाशित हो रही थी वहीं बाल पत्रिका नंदन 1964 से।  दोनों पत्रिकाएं बहुत बड़े पैमाने पर पढ़ीं जाती थीं। इनकी लोकप्रियता का ग्राफ बहुत ऊंचा था। अंग्रेजी की रीडर डाइजेस्ट की तरह हिंदी पत्रिका को भी हाथ में लेकर चलने से साख बढ़ती है इस बात को फैशन बनाने में इन पत्रिकाओं का भी बहुत बड़ा योगदान रहा। अफ़सोस कि हमारा खोखला समाज इनकी बेवक़्त मौत पर मूकदर्शक ही बना रहा। बोले भी तो बस वही थोड़े से लोग जो किसी न किसी तरह इन पत्रिकाओं से जज़्बाती तौर पर जुड़े हुए थे। समाज की यह चुप्पी इस समाज में बढ़ती जा रही गिरावट का इशारा भी है। न जाने अभी और क्या क्या देखना बाकी है। --मीडिया लिंक रविंद्र 

Thursday, June 11, 2020

इंडिया क्वार्टरली पत्रिका अब हिंदी में भी

 वैश्विक मामलों पर 1945 से हो रहा है लगातार प्रकाशन  
10 जून, 2020  
इंडिया क्वार्टरली, विश्व मामलों की भारतीय परिषद का वैश्विक मामलों पर 1945 से प्रमुख प्रकाशन है जिनका भारत के हितों पर प्रभाव पड़ता है। यह एक विचारक और विद्वत् समीक्षक पत्रिका है। इस पत्रिका का उद्देश्य भारत और विदेशों के विद्वानों, विश्लेषकों, नीति निर्माताओं को अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और राष्ट्रीय विदेश नीतियों से संबंधित विषयों पर मौलिक लेख लिखने के लिए प्रोत्साहित करना है। इसका उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय अभिज्ञान के महत्व के किसी भी विषय पर महत्वपूर्ण और वस्तुनिष्ठ विश्लेषण को बढ़ावा देना है।
इंडिया क्वार्टरली, अब पहली बार, हमारे पाठकों के लिए हिंदी में उपलब्ध करवाई गई है। इसका पहला अंक - खंड 11, अंक 11, जनवरी 2020 का www.icwa.in अथवा www.sagebhasha.com पर ऑनलाइन अवलोकन किया जा सकता है। इंडिया क्वार्टरली का हिंदी संस्करण आईसीडब्ल्यूए द्वारा मेसर्स सेज प्रकाशन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के सहयोग से प्रकाशित किया जाएगा।
आईसीडब्ल्यूए, इस महत्वपूर्ण पहल के माध्यम से, भारत में अंतर्राष्ट्रीय मामलों और विदेश नीति से जुड़े मामलों पर हिंदी में संसूचित और सुदृढ़ संवाद करने में योगदान देना चाहता है।

Wednesday, March 21, 2018

रीतू कलसी ने किया समाज को अनैतिक बनाने की साजिश का पर्दाफाश

बच्चों को टीवी पर वल्गैरिटी दिखाने की "मजबूरी" पर उठाये सवाल 
नई दिल्ली: 21 मार्च 2018: (मीडिया स्क्रीन डेस्क):: 
रीतू कलसी की पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें 
शायद ही कोई ऐसा दिन हो जब रेप या छेड़छाड़ की खबरें न आती हों। विकास और तकनीक के दावों  की धज्जियां उड़ाते हुए गुंडे किस्म के लोग इस तरह के अपराधों को अंजाम दे रहे हैं। कई बार तो ऐसे लोगों में बड़ी उम्र के लोग, सफेदपोश लोग और धार्मिक स्थलों में काम करने वाले लोग भी शामिल रहते हैं। लड़कियों और महिलाओं के लिए शायद ही कोई जगह सुरक्षित बची हो। अगर इस पर कभी विवाद खड़ा भी होता है तो उसे बहुत ही चालाकी से लड़कियों के फैशन या आधुनिक सोच की ज़िम्मेदारी बता दिया जाता है। बात न बने तो कह दिया जाता है कि आरोपी ने कोई नशा कर रखा होगा।  वास्तविक मुद्दे को दबाने की साज़िशी कोशिश में सारा विवाद अलग अलग दिशाओं की तरफ ले जाया जाता है और इतने में ही कोई न कोई और नई घटना हो जाती है। इस सारे घटनाक्रम में इस बात पर पर्दा डाल दिया जाता है कि मीडिया अपनी ज़िम्मेदारी को भूलते हुए लगातार ऐसा अनैतिक माहौल पैदा कर रहा है जिसमें कभी कभी सही सोच भी प्रदूषित हो जाती है। अगर  गीत लिखे जाते हैं तो उनमें लडकीयों की कमर और वज़न का मापतोल गिना जाता है। अगर टायर का विज्ञापन हो तो कहा जाता है फलां टायर खरीदो तो लड़कियां फंसेंगी।  अगर फलां परफ्यूम इस्तेमाल करो तो लड़कियां फंसेंगी। अगर यह बाईक चलायो तो लड़कियां फंसेंगी। हर मामले में लड़कियों की देह का प्रदर्शन इस सिस्टम में अब आवश्यक बन चुका  है। तथाकथित ज्योतिषी और तांत्रिक भी पीछे नहीं रहे। स्पष्ट कहते हैं-हमारे पास आओ 11 मिण्टस, 21 मिंट या फिर एक घंटे में वो लड़की तड़पती हुई आपके कदमों में आएगी। 
आसानी से समझा जा सकता है कि कच्ची उम्र के बच्चों और नवयुवकों के मन में किस तरह के अनैतिक समाज का निर्माण हो रहा है। इसका पर्दाफाश किया है सरगर्म और जोशीली पत्रकार रीतू कलसी ने सिने दुनिया में।  मीडिया में रहते हुए मीडिया के कारनामों को उजागर करना आसान नहीं होता। आजकल के कार्पोरेट मीडिया में जिस तेज़ी से पत्रकारों को बाहर का रास्ता दिखाने की करवाई की जाती है उसने बड़ों बड़ों को खामोश रहना सीखा दिया है। खबरों के सच के कारण दुश्मन बने लोग भी कातिलाना हमलों से बाज़ नहीं आते। सड़क हादसों में पत्रकारों की मौत अचानक नहीं हुआ करती। इसके बावजूद रीतू कलसी की हिम्मत एक नई उम्मीद जगाती है। सच के ज़िंदा रहने की उम्मीद। हमारे मीडिया जगत की जांबाज़ पत्रकार है रीतू कलसी। हम रीतू को इस तरह की दलेरी भरी पोस्टों पर बधाई देते हए वायदा करते हैं कि हम इस हिम्मत में हमेशां साथ देंगें। 

Monday, April 14, 2014

ये बता आज कौन सा प्रेस वाला बिना पैसे लिए खबर छापता है...?

लागा चुनरी पे दाग छुपायुं कैसे----------
आज़मगढ़ के अवनीश राय आजकल दिल्ली में बसे हुए हैं। पेशे से पत्रकार है और हर तरह से सैटल भी।  अच्छा चैनल--अच्छी ज़िंदगी लेकिन सक बोलना--दलील से बात करना---जैसा सोचना वैसा करना---बहुत सी "बुरी आदतें" हैं।  कुछ रोको तोको तो हंस कर ताल देते हैं। उनकी नयी पोस्ट फिर कि लिहाज़ वह अपने पेशे से जुड़े बहिचारे का भी नहीं करते। पूरा माजरा क्या है---आप खुद ही पढ़ लीजिये। स्थान दिल्ली का है और पोस्ट करने का समय 14 अप्रैल 2014 सोमवार को सांय 4:28 पर लेकिन इस हकीकत को आप कहीं भी देख सकते है---महसूस कर सकते हैं। आपके विचारों की इंतज़ार रहेगी ही। -रेक्टर कथूरिया 
आज सुबह भाई को स्टेशन से लेने पुरानी दिल्ली पहुंचा। अंदर घुस ही रहा था कि सीढियों के पास खड़े टीटी पर नजर पड़ी। वे दो थे और एक सूटेड-बूटेड शख्स से बहस कर रहे थे। हालांकि बिना टिकट यात्रियों या पहली बार दिल्ली आने वाले यूपी बिहार के लोगों के झोरा - झंपट पकड़कर उनसे वसूली के लिए कुख्यात इन टीटियों की टें-पें से तो अब खूब वाकिफ हो चुके हैं लेकिन ये बहस कुछ अलग थी। मैं भी थोड़ा रूक गया।
शख्स - सर मैं भी स्टाफ हूं। प्रेस से हूं। 
टीटी - ना भाई...255 रूपये तो देने ही होंगे।
शख्स - सर, मैं प्रेस से हूं
टीटी - कौन से प्रेस से...
शख्स - इलेक्ट्रानिक मीडिया से हूं सर..
टीटी - तो क्या हुआ भाईइइइ...पैसे तो देने ही पड़ेंगे...
शख्स - सर, प्रेस....
टीटी - भाईइइ..ये बता आज कौन सा प्रेस वाला बिना पैसे लिए खबर छापता है...तू भी तो पैसे लेता होगा...क्यों?
शख्स - क्या बात करते हैं सर..हम पैसे नहीं लेते..
टीटी - ना भाईइइ...आज तो कोई प्रेस वाला ना है..जो बिना पैसे के खबर छापता हो
शख्स - अरेsss सर...
दूसरा टीटी - जा भाई...पर आज के बाद ना जाने दूंगा ऐसे...

Sunday, February 16, 2014

पेंगुइन को एक वाजिब व जिम्मेदाराना फटकार...जरुर पढ़ें...

पेंगुइन तुम इतना डर किस बात से गए?  --अरुंधति रॉय
सुनीता भास्कर shared a link on Facebook on Yesterday (Saturday 15 Feb 2014 को बजे 
अमेरिकी लेखक वेंडी डॉनिगर की `द हिन्दू: एन ऑलटरनेटिव हिस्ट्री` को पेंगुइन ने एक अनजान से कट्टर हिंदू संगठन के दबाव में `भारत` के अपने ठिकानों से हटाने का फैसला किया है। मशहूर लेखिका-एक्टिविस्ट अरुंधति रॉय जिनकी खुद की किताबें भी इस प्रकाशन से ही आई हैं, ने पेंगुइन को यह कड़ा पत्र लिखा है जो Times of India में छपा है।पत्र का हिंदी अनुवाद:
सुनीता भास्कर 
तुम्हारी इस कारगुजारी से हर कोई स्तब्ध है। तुमने एक अनजान हिंदू कट्टरवादी संस्था से अदालत के बाहर समझौता कर लिया है और तुम वेंडी डॉनिगर की `द हिन्दू: एन ऑलटरनेटिव हिस्ट्री` को भारत के अपने किताबघरों से हटाकर इसकी लुगदी बनाने पर राजी हो गए हो। कोई शक नहीं कि प्रदर्शनकारी तुम्हारे दफ्तर के बाहर इकट्ठा होकर अपनी निराशा का इजहार करेंगे। 

कृपया हमें यह बताओ कि तुम इतना डर किस बात से गए? तुम भूल गए कि तुम कौन हो? तुम दुनिया के सबसे पुराने और सबसे शानदार प्रकाशकों में से हो। तुम प्रकाशन के व्यवसाय में बदल जाने से पहले और किताबों के मॉस्किटो रेपेलेंट और खुशबुदार साबुन जैसे बाज़ार के दूसरे खाक़ हो जाने वाले उत्पादनों जैसा हो जाने से पहले से (प्रकाशन में) मौज़ूद हो। तुमने इतिहास के कुछ महानतम लेखकों को प्रकाशित किया है। तुम उनके साथ खड़े रहे हो जैसा कि प्रकाशकों को रहना चाहिए। तुम अभिव्यक्ति की आजादी के लिए सबसे हिंसक और भयावह मुश्किलों के खिलाफ लड़ चुके हो। और अब जबकि न कोई फतवा था, न पाबंदी और न कोई अदालती हुक्म तो तुम न केवल गुफा में जा बैठे, तुमने एक अविश्वसनीय संस्था के साथ समझौते पर दस्तखत करके खुद को दीनतापूर्ण ढंग से नीचा दिखाया है। आखिर क्यों? कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए जरूरी हो सकने वाले सारे संसाधन तुम्हारे पास है। अगर तुम अपनी ज़मीन पर खड़े रह पाते तो तुम्हारे साथ प्रबुद्ध जनता की राय और सारे न सही पर तुम्हारे अधिकांश लेखकों का समर्थन भी होता। तुम्हें हमें बताना चाहिए कि आखिर हुआ क्या। आखिर वह क्या है, जिसने तुम्हें आतंकित किया? तुम्हें अपने लेखकों को कम से कम स्पष्टीकरण देना तो बनता ही है।
चुनाव में अभी भी कुछ महीने बाकी हैं। फासिस्ट् अभी दूर हैं, सिर्फ अभियान में मुब्तिला हैं। हां, ये भी खराब लग रहा है पर फिर भी वे अभी ताकत में नहीं हैं। अभी तक नहीं। और तुमने पहले ही दम तोड़ दिया।

हम इससे क्या समझें? क्या अब हमें सिर्फ हिन्दुत्व समर्थक किताबें लिखनी चाहिए। या `भारत` के किताबघरों से बाहर फेंक दिए जाने (जैसा कि तुम्हारा समझौता कहता है) और लुगदी बना दिए जाने का खतरा उठाएं? शायद पेंगुइन से छपने वाले लेखकों के लिए कुछ एडिटोरियल गाइडलाइन्स होंगी? क्या कोई नीतिगत बयान है?
साफ कहूं, मुझे यकीन नहीं होता, यह हुआ है। हमें बताओ कि यह प्रतिद्वंद्वी पब्लिशिंग हाउस का प्रोपेगंडा भर है। या अप्रैल फूल दिवस का मज़ाक था जो पहले ही लीक हो गया। कृपया, कुछ कहिए। हमें बताइए कि यह सच नहीं है।
अभी तक मैं से पेंगुइन छपने पर बहुत खुश होती थी। लेकिन अब?
तुमने जो किया है, हम सबके दिल पर लगा है।                       -अरुंधति रॉय

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ब्लूस्टार को जनरल शाहबेग का "महंगा बदला" बताया इण्डिया टुडे ने


Tuesday, February 11, 2014

भाषा के सवाल पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करती किताब-"भाषा का सच"

अपने हिंदी भाषी होने पर अफसोस आखिर क्यूँ ?
अगर लोकतंत्र में काबलियत की बजाये आंकड़ा तंत्र छाता जा रहा है, सियासत में सत्ता लोलुपता बढ़ रही है तो हालत मीडिया की भी अच्छी नहीं रही। अगर कोई वेश्या किसी मजबूरी के कारण अपना  जिस्म बेचती है तो हमारे आज के बहुत से कलमकार अपनी दिमागी और जिस्मानी मेहनत के साथ साथ अपनी सोच भी बेच रहे हैं--अपने ख्यालात भी बेच रहे हैं और जनता के सामने लगातार वही सच सामने ला रहे हैं जिसे उनके मालिक लोग देखना चाहते हैं। पेड न्यूज़ का सबसे अधिक दुष्प्रभाव पड़ने वाला है आम आदमी पर। सच को दबाने  बदलने की जितनी साज़िशें आज हो रही हैं पहले शायद कभी नहीं थीं। कुछ महीने पूर्व जब अनिल चमड़िया लुधियाना के एक गांव की सभा में आये थे तो उन्होंने बहुत सी सच्चाईयों से आम जनता को वाकिफ करवाया था। तब से एक उम्मीद बंधी थी कि सच की मशाल को थामने वाले अभी भी हैं। एक बार फिर यह विश्वास हुआ कि सच की आवाज़ फिर बुलंद होगी। चमक दमक के इस दौर में हकीकत अपने असली रूप में सबके सामने आकर रहेगी। "भाषा का सच" के बारे में जान कर यह उम्मीद और मज़बूत हुई। 
फेसबुक पर जारी हुईं अवनीश राय की पोस्टों के  मुताबिक "भाषा का सच" भाषा के सवाल पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करती किताब है। यह उन नीतियों को भी विस्तार से रखती है जिनसे मातृभाषाओं को धीरे-धीरे खत्म किया जा रहा है। मातृभाषा के खिलाफ और अंग्रेजी के पक्ष में फैलाई गई बहुत सी धारणाओं को भी यह किताब तमाम शोधों के माध्यम से दूर करती है। जाहिर है इंसाफ का सवाल भी इससे अलग नहीं है। यह किताब Media Studies Groupedia Studies Group ने प्रकाशित की है। इसके बारे में ज्यादा जानकारी भाषा का सच पर जाकर देखा जा सकता है।
हम अपने हिंदी भाषी होने पर अफसोस करते रहते है और अंग्रेजी सीखने के लिए दिन-रात लगे रहते है। यह भी जानने की कोशिश नहीं करते है कि जब तक हम अपनी ही भाषा को ठीक से नहीं समझेंगे, तब तक अन्य भाषाओं को कैसे समझ पाएंगे। अपनी भाषा के साथ अन्य भाषाओं को सीखने में भी आसानी होती है, यह बात विदेशों में भी मानी गई। और यूनेस्को के सर्वेक्षणों में यह बात साबित हुई है।
इससे कोई इँकार नहीं कर सकता कि सही समझ और बेहतर संचार के लिए मातृभाषा का बहुत महत्व है। इस किताब में इसी विषय को लेकर शोधपरक लेख सम्मिलित किए गए हैं। साथ ही इस विषय पर भी गंभीर चर्चा है कि किस तरह कुछ एक भाषाएं बाकी भाषाओं पर कब्जा कर रही हैं। यह किताब आपको विश्व पुस्तक मेले में Media Studies Group के स्टैंड पर मिलेगी।
हम अपने हिंदी भाषी होने पर अफसोस करते रहते है और अंग्रेजी सीखने के लिए दिन-रात लगे रहते है। यह भी जानने की कोशिश नहीं करते है कि जब तक हम अपनी ही भाषा को ठीक से नहीं समझेंगे, तब तक अन्य भाषाओं को कैसे समझ पाएंगे। अपनी भाषा के साथ अन्य भाषाओं को सीखने में भी आसानी होती है, यह बात विदेशों में भी मानी गई। और यूनेस्को के सर्वेक्षणों में यह बात साबित हुई है।

email- msgroup.india@gmail.com

9968771426
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ब्लूस्टार को जनरल शाहबेग का "महंगा बदला" बताया इण्डिया टुडे ने


Saturday, February 8, 2014

ब्लूस्टार को जनरल शाहबेग का "महंगा बदला" बताया इण्डिया टुडे ने

संत भिंडरांवाले को बताया ग्रंथी और विद्रोही गुट का नेता 
लुधियाना: ब्लू स्टार आपरेशन में ब्रिटिश दखल की बात उठी तो सिख समाज के साथ साथ मीडिया में भी एक फिर तूफ़ान आ गया।  इसके साथ ही शुरू हुई सिख समाज के दर्द को भुनाने की एक और नयी कोशिश। क्यूंकि व्यापारी समाज के लिए हर बात  एक व्यापार  आंसुयों का व्यापर, जज़बात का व्यापार और खबरों का सिलसिला भी अब एक व्यापार बन गया है। कहा कुछ जाता है पर उसका छुपा मकसद कुछ और ही होता है।   बात को घुमा फिरा कर अर्थों का अनर्थ।  इण्डिया टुडे  (हिंदी)  नाज़ुक और संवेदनशील मामले को एक बार फिर सनसनी का आवरण औड़ाते हुए बहुत से नए तथ्य सामने लाने का दावा करता महसूस होता है।  इस आवरण स्टोरी में जहाँ कुछ काम की बातें भी हो सकती हैं वहीँ पत्रिका के इरादे छुपे नहीं रह सके। पत्रिका ने अपना पक्षपात एक बार फिर ज़ाहिर कर  दिया है। जहाँ पत्रिका ने गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी की ओर से स्थापित  दमदमी टकसाल के चौहदवें उत्तराधिकारी संत जरनैल सिंह भिंडरांवाले को एक "तेज़तर्रार ग्रंथी" बताया है वहीँ ब्लू स्टार ऑपरेशन को सही करार देने के प्रयास में यह भी कहा है कि उसके नेतृत्व में सिखों के एक विद्रोही गुट ने "जंग" छेड़  रखी थी और 1981 से 1984 तक 100 से अधिक आम नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों की जान ले ली थी। यह भी कहा कि भिंडरांवाला अपने हथियारबंद साथियों के घेरे में सिखों के सबसे पवित्र गुरुद्धारे में छिपा बैठा था। इस पत्रिका की इस आवरण कथा का चालाक लेखक यह नहीं बताता कि अगर समस्या केवल सवर्ण मंदिर में ही थी तो पंजाब के अन्य 36 गुरुद्धारों में सैनिक एक्शन क्यूँ किया गया?  क्या इतना बड़ा मीडिया हाऊस नहीं जानता कि सिखों के लिए वे अन्य गुरुद्धारे भी बहुत महत्वपूर्ण और पवित्र थे और रहेंगे।
आगे जाकर इण्डिया टुडे इंदिरा गांधी को बेहद संवेदनशील साबित करने के प्रयास में कहता है कि इंदिरा गांधी ने आपरेशन सनडाऊन की उस परियोजना को केवल इस लिए रद्द कर दिया था क्यूंकि उसमें अधिक नुक्सान होने का खतरा था। गौरतलब है कि इस योजना के अंतर्गत  हेलीकाप्टरों और स्पेशल ट्रेंड कमांडोज़ के ज़रिये होना था और  संत जरनैल सिंह भिंडरांवाले का अपहरण किया जाना था।
अपनी इस सारी "सच्ची कहानी" में पत्रिका ने यही प्रभाव देने का प्रयास किया कि जैसे वहाँ हमला करने गए सेनिक तो बेचारे सिखों का शिकार हो रहे थे। पत्रिका ने कहीं नहीं कहा कि इंदिरा गांधी ने इस एक्शन के लिए श्री गुरु अर्जुन देव जी के शहीदी पर्व का दिन क्यूँ चुना? वहाँ उस पावन दिवस पर माथा टेकने गए श्रद्धालुयों में बच्चे भी थे--महिलाएं भी और बज़ुरग भी---उनमें से किसी के  नहीं थे। सेना ने उन को भी निशान बनाया जिसकी हकीकत एक बार नहीं बहुत बार मीडिया में आ चुकी है। इसके बावजूद इण्डिया टुडे बताता है कि जब इंदिरा गांधी को खबर मिली कि बहुत बड़ी संख्या में सैनिक और असैनिक मरे गए हैं तो इंदिरा गांधी के मुँह से निकला"हे भगवान"। इसके साथ ही स्व्तंत्र भारत के इस इतने बड़े युद्ध के वास्तविक कारणों पर पर्दा डालने ले नापाक प्रयास में इण्डिया टुडे इसे जनरल शाहबेग सिंह का एक व्यक्तिगत बदला बताता है।  पत्रिका ने लिखा है-"सेना के नायक रह चुके शाबेग ने सेना से बहुत महंगा बदला लिया।"
फिर भी इस पत्रिका को बड़े पैमाने पर पढ़ा जाना चाहिए ख़ास तौर पर सिख सियासत और सिख इतिहास से जुड़े कलमकारों और पाठकों दोनों को।  तभी इस तरह साज़िशी कलमों का जवाब कलम से दिया जा सकेगा। आपके विचारों की इंतज़ार बनी रहेगी। चुनावी मौसम है इसलिए इस तरह के बहुत से नए मामले सामने आएंगे सनसनी के आवरण मेंलपेटे हुए तांकि आम लोगों को दाल रोटी का सच भूला रहे, क्रांति का सच भूला रहे--सियासतदानों के घोटालों का सच भूला रहे---और लोग उलझे रहे साम्प्रदायिक टकरावों में। इस तरह के मामले जनता का ध्यान असली सच से हटाने की साज़िश मात्र हैं। -रेकटर कथूरिया 
ब्लू स्टार को जनरल शाहबेग का महंगा बदला बताया इण्डिया टूडे ने 

Friday, May 10, 2013

मासि‍क पत्रि‍का का वि‍मोचन

10-मई-2013 19:54 IST
कुमारी शैलजा ने कि‍या ‘सामाजि‍क न्‍याय संदेश’ का वि‍मोचन
सामाजि‍क न्‍याय और अधि‍कारि‍ता मंत्री कुमारी शैलजा ने आज यहां डॉ. अंबेडकर प्रति‍ष्‍ठान द्वारा प्रकाशि‍त ‘सामाजि‍क न्‍याय संदेश’ नामक मासि‍क पत्रि‍का का वि‍मोचन कि‍या। इस अवसर पर मंत्री महोदया ने कहा कि‍ भारत के इति‍हास में डॉ अंबेडकर का एक अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। भारतीय संवि‍धान का मसौदा तैयार करने में उनके व्‍यापक योगदान के बारे में सभी जानते है। उन्‍होंने कहा कि‍बाबासाहेब एक सच्‍चे राष्‍ट्रवादी थे जो समाज के सभी हि‍स्‍सों के कल्‍याण में और एक न्‍याय आधारि‍त समाज में वि‍श्‍वास करते थे। उन्‍होंने बताया कि‍यह पत्रि‍का बाबा साहेब के वि‍चारों और संदेशों को लोगों तक पहुंचाएगी। 

इस अवसर पर उपस्‍थि‍त लोगों में सचि‍व श्री सुधीर भार्गव, अपर सचि‍व श्री अनूप कुमार श्रीवास्‍तव, संयुक्‍त सचि‍व और डॉ. अंबेडकर प्रति‍ष्‍ठान के सदस्‍य सचि‍व श्री संजीव कुमार, डॉ. अंबेडकर फाउंडेशन के नि‍देशक श्री वि‍नय कुमार पॉल आदि‍शामि‍ल थे। (PIB)

वि.कासोटिया/सुधीर/राजीव-2324

Tuesday, April 16, 2013

द संडे इंडियन का नया अंक

चीन साईबर युद्ध की पूरी तैयारी में है
द संडे इंडियन का नया अंक भी बाज़ार में है। हमेशां की तरह हर बात अर्थ पूर्ण और हर बात तथ्यों और आंकड़ों के साथ। अंदाज़ भी दिलचस्प यानि कि हर अंक की तरह यह अंक भी विशेषांक। इस अंक में सुखदेव के नाम भगत सिंह का पत्र भी है और साथ ही चेतावनी भी कि चीन साईबर युद्ध की पूरी तैयारी में है। समाज में शुरू हो चुके नए ट्रेंड सेक्स कोचिंग की भी चर्चा भी इसी अंक में है और तेज़ी से गधी जा रही एक अद्भुत मानव जाति का विस्तृत विवरण भी। घरों में काम करने वाली बाई के असंगठित श्रमिक होने का दर्द भी और देश में लगातार बढ़ रहे टैक्स चोरों का दर्द भी। बारबार एफ आई आर के बावजूद लगातार जारी खनन। यूपी में अखिलेश यादव के दावों और वादों की चर्चा भी दिलचस्प है।रियासत की बिसात पर नीतीश कुमार की चाल को भी विशेष जगह मिली है और मध्यप्रदेश में इंटरनेट के विकास की बात भी।भरपेट भोजन फिर भी कुपोषण नामक रिपोर्ट में काफी कुछ है। अपराध, खेल और साहित्य की चर्चा भी है। --रेक्टर कथूरिया 

ताज़ा हवा के झोंके की तरह--मुस्लिम टुडे

कुछ ऐसा करें जिससे मीरा के आंसू मीर के आँखों से निकलें
लगातार बढ़ रहीं साम्प्रदायिक भावनायों की घुटन में एक हिंदी मासिक पत्रिका मुस्लिम टुडे ताज़ा हवा के झोंके की तरह आई है।सदभावना का संदेश लेकर आई इस पत्रिका (वर्ष-3 अंक 9) का कहना है कि  हिन्दू व मुसलमान हमारे देश की दो आँखें हैं। दोनों समुदाय सदियों से एक साथ रहते चले आ रहे हैं लेकिन इतनी सदियों के बाद भी दोनों के बीच एक दुसरे के बारे में बहुत सी भ्रांतियां फैली हुई हैं। वर्तमान समय में तो यह दूरिय और भी बढ़ गईं है। अब समय आ गया है कि मुस्लिम समुदाय इस क्षेत्र में विशेष कार्य करे। मुस्लिम टुडे का यही प्रयास है कि वह दोनों समुदायों को क़रीब लाने का भरकस प्रयास करे जिससे देश की एकता और अखंडता पर कोई सवालिया निशान न लगे। गंगा जमुनी सभ्यता को बढ़ावा देकर ऐसा वातावरण पैदा करे जिससे मीरा के आंसू मीर के आँखों से निकलें। मुस्लिम टुडे ऐसे प्रयासों के लिए वचनबद्ध है।पत्रिका में नर्म हिंदुत्व---गर्म हिंदुत्व जैसे कई महत्वपूर्ण आलेख भी हैं और राजनीति के साथ साथ अपराध पर भी चर्चा है और बहुत से दुसरे मुद्दों के साथ ही गजल का रंग भी मिलता है। कुल 62 पृष्ठों की पत्रिका का मूल्य है केवल 15 रुपये। बहुत ही खूबसूरती से प्रकाशित इस पत्रिका सफलता की उंचाईयों पर पहुंचे इसी कामना के साथ।--रेक्टर कथूरिया

Wednesday, February 27, 2013

मीडिया की काली करतूत//अमलेन्दु उपाध्याय

जिसकी हो चुकी हत्या उसे बताया हैदराबाद का गुनाहगार 
पाकिस्तान की मुत्तहिदा कौमी मूवमेन्ट
(एमक्यूएम) के लीडर मरहूम एपीए मंज़र इमाम
हैदराबाद बम विस्फोट के बाद भारतीय मीडिया भले ही सरकार और जाँच एजेंसियों पर दबाव बनाने में कामयाब हो गया हो लेकिन न केवल उसकी साम्प्रदायिकता और कट्टरपंथी हिन्दुत्ववादी ताकतों से साँठ-गाँठ उजागर हो गयी बल्कि यह भी उजागर हो गया कि आतंकवाद के खेल में मीडिया घरानों की भूमिका भी कम संदिग्ध नहीं है। जहाँ एक ओर सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति अल्तमस कबीर मीडिया ट्रायल पर गम्भीर चिन्ता जता रहे हैं वहीं पाकिस्तान के एक अखबार ने यह पोल खोल दी है कि भारतीय मीडिया हैदराबाद बम विस्फोट में जिस संदिग्ध को दिखा रहा है उसकी तो पहले ही हत्या हो चुकी है।
हाल ही में जस्टिस अल्तमस कबीर ने पटना में एक कार्यक्रम में इस बात पर चिन्ता जतायी थी कि ट्रायल अदालतों में ही होना चाहिये और फैसला अदालतों में ही होना चाहिये। लेकिन ऐसी बातें चाहे जस्टिस कबीर कहें या जस्टिस मार्कण्डेय काटजू, हमारे मीडिया की समझ में यह बातें आना बन्द हो गयी हैं। तमाशा यह है कि आईबी या पुलिस अपनी चार्जशीट पहले मीडियाकर्मियों को उपलब्ध करा देती है और मीडिया उसे अपनी स्पेशल रिपोर्ट बताकर चिल्लाना और सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर देता है। हैदराबाद बम ब्लास्ट के बाद भी ऐसा देखने में आ रहा है। जब विस्फोट के दस मिनट बाद ही मीडिया एक सुर में चिल्लाने लगा कि इसके पीछे इण्डियन मुजाहिदीन का हाथ है और पूरी रटी-रटायी थ्योरी एक्सक्ल्यूसिव स्टोरी बताकर प्रसारित होने लगी।
पाकिस्तान के अखबार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने खुलासा किया है कि कुछ भारतीय मीडिया घराने इस ब्लास्ट में जिस संदिग्ध को दिखा रहे हैं वह पाकिस्तान की मुत्तहिदा कौमी मूवमेन्ट (एमक्यूएम) के लीडर मरहूम एपीए मंज़र इमाम का चित्र है। इतना ही नहीं गम्भीर बात यह है कि इमाम की हत्या बीती 17 जनवरी को हो चुकी है और तालिबानी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने इस हत्या की जिम्मेदारी कुबूल की है। मजे की बात यह है कि भारतीय मीडिया इमाम का चित्र दिखा कर उन्हें न सिर्फ इण्डियन मुजाहिदीन का सदस्य बता रहा है बल्कि हैदराबाद के संभावित गुनाहगारों में दिखा रहा है।
यहाँ सवाल उठता है कि खुफिया एजेन्सियों के प्रोपेगण्डा को ख़बर बनाकर चलाना कहाँ की पत्रकारिता है। क्या किसी खबर को प्रकाशित करने या ऑन एयर करने से पहले उसकी थोड़ी सी भी पड़ताल करना मीडियाकर्मियों के पेशे की नैतिकता में शामिल नहीं है। लोकतन्त्र के कथित चौथे खम्भे की ऐसी काली करतूतें देश विभाजन की भूमिका तैयार करती हैं।
सोशल मीडिया पर भी भारतीय मीडिया की इस काली करतूत की जमकर भर्त्सना हो रही है। फेसबुक पर एक पत्रकार ने मज़ाक उड़ाते हुये लिखा है – इट्स नॉट फेयर यार। इण्डियन मीडिया के बारे में ऐसा नहीं कहते….. यार अब वो भी क्या करें? आईबी वालों ने गरीब रिपोर्टर्स को जो दिया वो उन्होंने चला दिया… इसमें उनकी क्या गलती है? भाई मैं तो अपने भाइयों के साथ हूँ।
ऐसा नहीं है कि यह कोई पहला मौका है जब भारतीय मीडिया का काला चेहरा सामने आ रहा है। पहले भी कई मौकों पर इसका साम्प्रदायिक चरित्र उजागर हो चुका है। पत्रकार गिलानी प्रकरण में भी मीडिया ने अपना साम्प्रदायिक चरित्र दिखाया था।
मानवाधिकार कार्यकर्ता महताब आलम सवाल उठा रहे हैं कि हैदराबाद ब्लास्ट में कम से कम 6 लोग हिरासत में लिये गये या उनसे पूछताछ की गयी जबकि 13 के नाम उस सूची में हैं जिनसे पूछताछ की जानी है। सभी मुस्लिम हैं। वह व्यंग्य करते हैं- “कौन कहता है कि भारत में मुसलमानों के लिये आरक्षण नहीं है? आतंक का कोई रंग नहीं होता है लेकिन निश्चित रूप से यह इस्लामिक आतंकवाद है।“

(हस्तक्षेप से साभार) 


मीडिया: कोयले की दलाली से कोयले के व्यापार तक

Sunday, January 13, 2013

साइबर-आतंकवाद क्या चीज़ है?

साइबर युद्ध का ख़तरा-अमरीका के लिए सबसे बड़ा ख़तरा चीन से
वर्ष 2013 में दुनिया भर में साइबर हमलों की संख्या में बड़ी तेज़गति से वृद्धि होगी। कुछ ख़ास ठिकानों पर ऐसे हमले किए जाएंगे और सरकारी एजेंसियों पर विशाल पैमाने के हमले भी होंगे। यह निष्कर्ष एंटीवायरस निगम "कैसपेर्स्की लैब" के विशेषज्ञों ने निकाला है। अमरीकी खुफिया सेवाओं ने भविष्यवाणी की है कि आनेवाले 20 वर्षों में वैश्विक साइबर युद्ध शुरू हो जाएगा।

"कैसपेर्स्की लैब" के विश्लेषकों के मुताबिक, अगले साल कई सरकारी संस्थानों और व्यापार के विभिन्न क्षेत्रों की निजी कंपनियों की गोपनीय जानकारी की चोरी बड़े पैमाने पर होने लगेगी। सामाजिक सेवाओं और परिवहन जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों पर साइबर हमले अक्सर होने की सम्भावना है।

गूगल और फेसबुक जैसी बड़ी बड़ी नेटवर्क कंपनियों के पास भारी मात्रा में ऑनलाइन जानकारी हासल करने की क्षमता होगी। इसके अलावा, संचार प्रौद्योगिकी के विकास की तेज़गति की बदौलत देशों की सरकारों का अपने नागरिकों पर असीम नियंत्रण हो जाएगा। लेकिन इन देशों के नागरिकों के पास भी अपनी सरकारों को चुनौतियाँ देने के कई अवसर मौजूद होंगे।

वर्तमान में, सूचना प्रौद्योगिकी हमारे समाज के सूचना क्षेत्र के विकास के संदर्भ में एक बड़ा ख़तरा बनती जा रही है। इस संबंध में रूस के सूचना सुरक्षा संघ के अध्यक्ष गेन्नादी येमेलियानोव ने रेडियो रूस को बताया –

ऐसा ख़तरा इसलिए बढ़ता जाएगा क्योंकि इस ख़तरे का एक टाइमबम फिट कर दिया जा चुका है। यदि हम समय पर पर्याप्त सुरक्षा उपाये नहीं करेंगे तो यह बम ज़रूर फटेगा और बड़े विनाश का कारण बनेगा। जब हम सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग के इतने ज्यादा आदी हो जाएंगे कि इसके बिना जीवन ही असंभव हो जाएगा तब पूरी दुनिया के लिए बहुत-सी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। ज़रा सोचिए, इस सूचना प्रौद्योगिकी ने अचानक ही काम करना बंद कर दिया है। अब आप क्या करेंगे? पूरा जीवन ठप्प। आप ज़रा कल्पना कीजिए कि सभी स्थानों पर बिजली गुल हो गई है। सारा काम ठप्प। वित्तीय और आर्थिक कारणों से भी ऐसा ख़तरा पैदा हो सकता है। इसके लिए सूचना प्रौद्योगिकी को अच्छी तरह से समझने वाले एक बहुत अच्छे दिमाग़ की ही ज़रूरत होगी।

अमरीकी खुफिया सेवाओं ने अपने देश की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद को एक रिपोर्ट भेजी है जिसमें अमरीका के लिए मौजूदा साइबर हमलों के ख़तरों की समीक्षा की गई है। इसमें कहा गया है कि इस क्षेत्र में अमरीका के लिए सबसे बड़ा ख़तरा चीन से ही पैदा होगा। लॉस एंजिल्स टाइम्स में छपी इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि रूस, फ्रांस, इज़राइल और दुनिया के कुछ अन्य देश भी साइबर जासूसी करते हैं लेकिन वे उतना विश्वासघात नहीं करेंगे जितना कि चीन कर सकता है। कम से कम रूस ऐसा नहीं कर रहा है। वह अपने व्यापारियों के लाभ के लिए अमरीकी कंपनियों की जानकारियां चुराने की कोशिशें नहीं कर रहा है।

इस बीच, दिसंबर माह की शुरूआत में साइबर रक्षा पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय मंच साइबर सुरक्षा एशिया- 2012 के भागीदार इस बात पर सहमत हुए थे कि सूचना प्रौद्योगिकी की दुनिया की मुख्य समस्या यह है कि दुनिया की सरकारें अभी तक यह तय नहीं कर पाई हैः साइबर-आतंकवाद क्या चीज़ है? कुछ देशों की सरकारें साइबर युद्ध के लिए सबसे प्रभावकारी मालवेयर का विकास कर रही हैं। लेकिन कोई भी सरकार यह गारंटी नहीं दे सकती हैं कि ये मालवेयर और वायरस आतंकवादियों के लिए भी उपलब्ध नहीं हो सकेंगे। यदि ऐसा हुआ तो आतंकवादी गिरोह इन मालवेयरों और वायरसों का खूब इस्तेमाल करेंगे। इसलिए कहा जा सकता है कि आज भी दुनिया के कई देशों के लिए अपने ही साइबर संजाल में फंसने का बड़ा भारी ख़तरा बना हुआ है। माउस से एक ही “क्लिक” करने से पूरी सभ्यता का विनाश हो सकता है। (
रेडियो रूस से साभार)
13.12.2012, 16:32         
साइबर युद्ध का ख़तरा

Monday, December 24, 2012

श्री मणि बहादुर पत्रकार और सच्‍चे पेशेवर थे-मनीष तिवारी

24-दिसंबर-2012 15:34 IST
मणिपुर में एक प्राइवेट टी.वी. न्‍यूज चैनल के स्ट्रिंगर के निधन पर सूचना और प्रसारण मंत्री श्री मनीष तिवारी द्वारा शोक व्‍यक्‍त 

सूचना और प्रसारण मंत्री श्री मनीष तिवारी ने मणिपुर में एक प्राइवेट टी.वी. न्‍यूज चैनल के स्ट्रिंगर श्री धीज मणि के निधन पर शोक व्‍यक्‍त किया है। श्री मणि की कल इम्‍फाल में पुलिस की गोलीबारी के दौरान मृत्‍यु हो गई थी। वे एक अभिनेत्री के साथ हुए दुर्व्‍यवहार के विरोध में आयोजित बंद को कवर कर रहे थे। 

श्री तिवारी ने कहा कि श्री मणि एक बहादुर पत्रकार और एक सच्‍चे पेशेवर थे, जिन्‍होंने कई कठिन घटनाओं को कवर किया।   (PIB)
वि. कासोटिया/राजगोपाल/चन्‍द्रकला —6320

Tuesday, December 18, 2012

लोक सभा में एफटीआईआई का स्‍तरोन्‍नयन

राष्‍ट्रीय महत्‍व का संस्‍थान घोषित करने हेतु कदम उठाए
                                                                                                                                             Courtesy Photo
सूचना और प्रसारण राज्‍य मंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) श्री मनीष तिवारी ने आज लोक सभा में एक प्रश्‍न के लिखित उत्‍तर में बताया कि सरकार ने भारतीय फिल्‍म और टेलीविज़न संस्‍थान, पुणे (एफटीआईआई) को संसद के अधिनियम द्वारा राष्‍ट्रीय महत्‍व का संस्‍थान घोषित करने हेतु कदम उठाए हैं। उन्‍होंने यह भी बताया कि भारतीय फिल्‍म और टेलीविजन संस्‍‍थान, पुणे (एफटीआईआई) में पाठ्यक्रम शुल्‍क अत्‍यधिक सहायिकी-प्राप्‍त है। इसके अतिरिक्‍त, संस्‍थान विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति भी प्रदान करता है। फिल्‍म, टेलीविज़न और उससे जुड़े विषयों में अनुसंधान को बढ़ावा देना संसद के प्रस्‍तावित अधिनियम में संस्‍थान के उद्देश्‍यों में से एक रूप में प्रकल्पित है। (PIB)  18-दिसंबर-2012 14:32 IST
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मीणा/शोभा/रामकिशन-6181

टीवी चैनलों का कार्यकरण


410 समाचार तथा 438 गैर-समाचार चैनलों को अनुमति      
सूचना और प्रसारण राज्‍य मंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) श्री मनीष तिवारी ने आज लोक सभा में एक प्रश्‍न के लिखित उत्‍तर में बताया कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने आज की तिथि के अनुसार 410 समाचार एवं समसामयिकी तथा 438 गैर-समाचार और समसामयिकी चैनलों को अनुमति प्रदान की है। विगत तीन वर्षों और चालू वर्ष के दौरान स्‍वीकृत किए गए अनुरोधों की श्रेणी-वार संख्‍या निम्‍नानुसार है:-
वर्ष
अनुमति दी गई

समाचार
गैर-समाचार
2009
34
46
2010
40
58
2011
117
107
2012
9
27
         165 प्रस्‍ताव अंतर-मंत्रालयीय स्‍वीकृति की विभिन्‍न अवस्‍थाओं में हैं।
     उन्‍होंने यह भी बताया कि मंत्रालय द्वारा जारी अपलिंकिंग और डाउनलिंकिंग दिशानिर्देशों के अनुसार अपलिंकिंग/डाउनलिंकिंग अनुमति प्रदान किए जाने के लिए प्राप्‍त आवेदन आवश्‍यक स्‍वीकृति के लिए गृह मंत्रालय, अंतरिक्ष विभाग, राजस्‍व विभाग और विदेश मंत्रालय को संदर्भित कर दिए जाते हैं। अत: लंबित प्रस्‍ताव की स्‍वीकृति के संबंध में कोई समय-सीमा नहीं बताई जा सकती है।  (PIB) 18-दिसंबर-2012 14:31 IST
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मीणा/शोभा/रामकिशन-6170

डीटीएच परिचालकों की सेवाएं

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अधीन भी निस्तारण 
सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री मनीष तिवारी ने आज लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि मंत्रालय को समय-समय पर निजी डायरेक्ट-टु-होम (डीटीएच) ऑपरेटरों द्वारा प्रदान की जा रही सेवाओं के संबंध में उपभोक्ताओं से शिकायतें प्राप्त होती रहती हैं जिन्हें समय पर समाधान किए जाने के लिए संबंधित डीटीएच ऑपरेटर को अग्रेषित कर दिया जाता है। डिजिटल केबल टीवी उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने 14.5.2012 को सेवा की गुणवत्ता के मानक (डिजिटल संबोधनीय केबल टीवी प्रणाली) विनियम, 2012 और उपभोक्ता शिकायत निवारण (डिजिटल संबोधनीय केबल टीवी प्रणाली) विनियम, 2012 जारी किया है। सेवा की गुणवत्ता संबंधी विनियमों में अन्य बातों के साथ-साथ, सेवा के कनेक्शन, डिस्कनेक्शन, शिफ्टिंग, अंतरण, शिकायतों के निस्तारण की समय-सीमा, बिलिंग प्रक्रिया, सेट-टॉप बॉक्स (एसटीबी) से संबंधी मुद्दों और सेवा प्रदाताओं आदि द्वारा अनुपालन किए जाने वाले तकनीकी मानकों के संबंध में मानदंड निर्धारित किए गए हैं। 

उपभोक्ता शिकायत निवारण विनियमों में एक शिकायत केन्द्र की स्थापना करने, टॉल फ्री नम्बर का प्रावधान करने और जिन मामलों में उपभोक्ता की शिकायत का शिकायतकर्ता की तुष्टि के अनुसार समाधान नहीं किया जाता, नोडल अधिकारियों के प्रावधान रखे गए हैं। किसी अनुचित व्यापार-आचरण को रोकने के लिए डीटीएच ऑपरेटर को डीटीएच लाइसेंस करार की निबंधन और शर्तों के साथ-साथ उपभोक्ताओं को सेवाएं प्रदान करने के संबंध में ट्राई के विनियमों/आदेशों का अनुपालन करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। ट्राई अधिनियम, 1997 की धारा 14 के अनुसार उपभोक्ताओं का समूह डीटीएच सेवा प्रदाता के खिलाफ दूरसंचार विवाद निपटान एवं अपीलीय न्यायाधिकरण (टीडीएसएटी) के समक्ष याचिका दायर कर सकता है। डीटीएच उपभोक्ता, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अधीन भी निस्तारण की मांग कर सकता है जो जिला उपभोक्ता न्यायालयों के क्षेत्राधिकार के दायरे में आता है। (PIB)

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मीणा/राजगोपाल/शदीद-6185

टी.वी. चैनलों की कमाई

दूरदर्शन का अधिदेश एवं प्रयोजन निजी प्रसारकों से भिन्न
     सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री मनीष तिवारी ने आज लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि प्रसार भारती ने सूचित किया है कि दूरदर्शन के पास दूसरे चैनलों की राजस्व सृजन ब्यौरे जानने के लिए कोई तंत्र नहीं है। इसलिए दूरदर्शन एवं अन्य निजी चैनलों की कमाई के बीच तुलना का प्रश्न नहीं उठता। इसके अतिरिक्त दूरदर्शन एक लोक सेवा प्रसारक है और उसका अधिदेश एवं प्रयोजन निजी प्रसारकों से भिन्न है। निजी प्रसारकों से भिन्न, यह मूलत: राजस्व उत्पादन की नीयत से कार्य नहीं करता बल्कि यह प्रसार भारती अधिनियम में दिए गए अपने अधिदेश को पूरा करने के लिए कार्य करता है। तथापि, दूरदर्शन द्वारा विछले तीन वर्षों के लिए अर्जित की गई आय निम्नानुसार है:-
                                                     (करोड़ रूपए में)
वर्ष
दूरदर्शन द्वारा अर्जित की गई आय
2009-10
828.48
2010-11#
944.44
2011-12#
990.76
2012-13$
578.75
***      (PIB)
मीणा/राजगोपाल/शदीद-6174