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Thursday, March 21, 2013

यूएनआई के 52वें वार्षि‍क समारोह में श्री मनीष ति‍वारी

21-मार्च-2013 19:44 IST
देश भर में वायर से जुड़ी और समाचार एजेंसि‍यों की आवश्‍यकता पर जोर 
सूचना और प्रसारण मंत्री श्री मनीष ति‍वारी ने मीडि‍या क्षेत्र की बढती संभावनाओं और समाचार के क्षेत्र में सूचना के प्रवाह को देखते हुए देश भर में वायर से जुड़ी और समाचार एजेंसि‍यां स्‍थापि‍त करने की आवश्‍यकता बताई है। उन्‍होंने कहा कि‍ इसकी अत्‍यधि‍क संभावनाएं हैं क्‍योकि‍ ये एजेंसि‍यां उप-क्षेत्रीय, क्षेत्रीय और राष्‍ट्रीय स्‍तर पर सूचना के प्रवाह को बनाए रखती हैं। समाचार एजेंसि‍यों की संख्‍या बढ़ने से न केवल स्‍थानीय खबरें राष्‍ट्रीय स्‍तर पर पहुंचेंगी बल्‍कि‍ इससे ये एजेंसि‍यां राष्‍ट्रीय और स्‍थानीय स्‍तर पर समाचार के प्रसार में संतुलन स्‍थापि‍त कर पाएंगी। सूचना के पहुंचाने में वि‍वि‍धता को देखते हुए ऐसी व्‍यवस्‍था से स्‍थानीय मुद्दों को वि‍शि‍ष्‍टता से राष्‍ट्रीय स्‍तर पर पहुंचाया जा सकेगा। सूचना और प्रसारण मंत्री ने आज दि‍ल्‍ली में यूनाइटेड न्‍यूज ऑफ इंडि‍या के 52वें वार्षि‍क समारोह को संबोधि‍त करते हुए ये बात कही। 

श्री ति‍वारी ने वहन कि‍ए जाने वाले राजस्‍व मॉडल की रूप रेखा तैयार करने की तत्‍काल आवश्‍यकता बताई। डि‍जीटलीकरण प्रक्रि‍या का जि‍क्र करते हुए उन्‍होंने कहा कि‍ यह प्रसारण क्षेत्र में पारदर्शि‍ता तथा दीर्घकालीन टि‍काउ प्रक्रि‍या लाने का प्रयास है जि‍ससे सभी संबंद्ध पक्षों को मदद मि‍लेगी। उन्‍होने कहा कि‍ नई मीडि‍या और त्‍वरि‍त संचार व्‍यवस्‍था के आगमन के साथ ही राजस्‍व मॉडलों को उन मापदंडों के बारे में भी वि‍चार करना होगा जो वि‍भि‍न्‍न दर्शक/श्रोता वर्गों के लि‍ए हों।


यूएनआई के 52वें वार्षि‍क समारोह में हुई विस्तृत चर्चा 
वि. कासोटिया/अजीत/सुजीत-1539

Tuesday, March 12, 2013

मीडिया: कोयले की दलाली से कोयले के व्यापार तक

बड़ी-बड़ी बहस चलाने वाला मीडिया चुप्पी साधे खड़ा है
भारत में कोयला घोटाले ने एक बार फिर तथाकथित लोकतांत्रिक संस्थाओं के चेहरे से नकाब हटाने के काम किया है। एक लाख छियासी हजार करोड़ की कोयले की दलाली में केंद्र और राज्य सरकारों के साथ पक्ष-विपक्ष के कई नेता तो कटघरे में हैं ही, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का दम भरने वाला समाचार मीडिया भी इससे अछूता नहीं है। इस घोटाले में दैनिक भास्कर चलाने वाली कंपनी डीबी कॉर्प लिमिटेड, प्रभात खबर की मालिक कंपनी ऊषा मार्टिन लिमिटेड, लोकमत समाचार समूह और इंडिया टुडे समूह में बड़ी हिस्सेदारी रखने वाले आदित्य बिड़ला समूह का नाम सामने आया है। छोटी-छोटी बातों पर बड़ी-बड़ी बहस चलाने वाला सरकारी और कॉरपोरेट मीडिया इन कंपनियों की करतूत पर या तो चुप्पी साधे खड़ा है या खबर को घुमा-फिराकर पेश कर रहा है।
इसी मार्च में सरकारी ऑडिटर, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में कोयला खदान आवंटन में हुई गड़बड़ी सामने आई तो इसमें कई मीडिया कंपनियों के शामिल होने की चर्चाएं भी थीं। आखिरकार इंटर मिनिस्टीरियल ग्रुप (अंतर मंत्रिमंडलीय समूह) की बैठक में यह साफ हो गया कि कौन-कौन सी मीडिया कंपनियां इस घोटाले में शामिल हैं। इस घटना से एक बार फिर यह भी छिपा नहीं रहा है कि किस तरह कॉरपोरेट मीडिया जनता के साथ धोखेबाजी करता है। पहले भी टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले और कॉमनवेल्थ घोटाले में मीडिया की आपराधिक भूमिका सामने आ चुकी है। यह इस बात का भी उदाहरण है कि किस तरह भारतीय लोकतंत्र का प्रहरी (वॉच डॉग) खुद लूट में शामिल होकर लोकतंत्र का मजाक बना रहा है। सीएजी की रिपोर्ट से पता चलता है कि दो हजार चार से दो हजार नौ के दौरान हुए कोयला खदानों के आवंटन में भारी घोटाला किया गया। रिपोर्ट कहती है कि सरकार ने को औने-पौने दामों में कोयला खदानों को निजी कंपनियों के हवाले कर दिया। इस भ्रष्टाचार से सरकारी खजाने को एक लाख छियासी हजार करोड़ की रकम का नुकसान हुआ। यह घोटाला इस बात का भी पुख्ता सबूत है कि देश के बहुराष्ट्रीय व्यापारी घराने सरकारी नीतियों को मन मुताबिक तोडऩे-मोडऩे में किस तरह जुटे हुए हैं।

यह बात जग जाहिर है कि विज्ञापन और अन्य प्रलोभनों के चलते समाचार मीडिया लगातार पूंजीपतियों के हाथ की कठपुतली बना रहता है। पूंजीपति भी अपने पक्ष में जनमत बनाने और सत्ता पर प्रभाव जमाने में मीडिया की भूमिका से अनजान नहीं हैं, इसलिए कई पूंजीपति सीधे मीडिया को अपने नियंत्रण में ले लेते हैं। कोयला घोटाले में फंसी कंपनियों ने भी इसी रणनीति के तहत मीडिया को अपने कब्जे में लिया है, उनके गैरकानूनी काम इस बात की खुलेआम गवाही देते हैं। यह कॉरपोरेट मीडिया का ही कमाल है कि कोयला घोटाले की पोल खुलने के बाद भी बहस सिर्फ कोयला खदानों के आवंटन में हुई गड़बड़ी पर केंद्रित है। यह सवाल नहीं उठाया जा रहा है कि आखिर कोयला खदानों को निजी हाथों में सौंपने की जरूरत ही क्या है? इस तरह के नीतिगत सवाल कॉरपोरेट मीडिया के खिलाफ जाते हैं इसलिए वह मरे मन से सिर्फ आवंटन का सवाल उठा रहा है (ऐसा करना उसकी विश्वसनीयता को बरकरार रखने के लिए जरूरी है)।

कोयला घोटाले में शामिल चार मीडिया कंपनियों का जायया लिया जाए तो यह बात साबित हो जाएगी कि किस तरह कॉरपोरेट, मीडिया और सरकार को चला रहे हैं। इससे कॉरपोरेट साजिशों को समझना भी और आसान होगा। पहले बात करते हैं लोकमत समूह की। यह अखबार अपने प्रसार के हिसाब से मराठी का सबसे बड़ा अखबार है। महाराष्ट्र के कई जिलों से इसका प्रकाशन होता है। मराठी के अलावा हिंदी में भी लोकमत समाचार प्रकाशित होता है। इस कंपनी का रिश्ता मुकेश अंबानी-राघव बहल-राजदीप सरदेसाई से भी है, मराठी न्यूज चैनल आइबीएन-लोकमत इसका उदाहरण है। लोकमत के मालिक विजय दर्डा कांग्रेस पार्टी के सांसद भी हैं और कंपनी के दूसरे मालिक और विजय के भाई राजेंद्र दर्डा महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार में शिक्षा मंत्री हैं। विजय दर्डा पत्रिकारिता के उसूलों की धज्जियां उड़ाते हुए पत्रकार, व्यापारी और राजनीतिज्ञ एक साथ हैं। उन्हें 1990-91 में फिरोज गांधी मेमोरियल अवॉर्ड फॉर एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म मिल चुका है। इसके अलावा 1997 में जायंट इंटरनेशनल जर्नलिज्म अवॉर्ड और दो हजार छह में ब्रिजलालजी बियानी जर्नलिज्म अवॉर्ड भी मिला हुआ है।

विजय दर्डा मीडिया मालिकों के प्रभाव वाली संस्था ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन के अध्यक्ष रहने के अलावा इंडियन न्यूज पेपर सोसायटी के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। ये दोनों संस्थाएं मीडिया मालिकों के प्रभाव और उनका हित देखने वाली संस्थाएं हैं। दर्डा साउथ एशियन एडिटर्स फोरम के अध्यक्ष रहकर भी उसे धन्य कर चुके हैं। भारत में प्रेस की नैतिकता को बनाये रखने वाली संस्था प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआइ) के सदस्य रहकर भी उन्होंने पत्रकारीय नैतिकता की रक्षा की है! वल्र्ड न्यूज पेपर एसोसिएशन के सदस्य होने के साथ और भी कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठनों के सदस्य हैं। कुल मिलाकर पत्रकारिता के नाम पर मालिक होकर भी जितने फायदे हो सकते हैं उन्होंने दोनों हाथों से बटोरे हैं। फिर, कोयले पर तो उनका हक बनता ही था! जब पेड न्यूज का मामला जोर-शोर से उठ रहा था तब लोकमत का नाम उसमें सबसे ऊपर था। अब कोयला घोटाले में भी विजय दर्डा और राजेंद्र दर्डा आरोपी कंपनी जेडीएस यवतमाल कंपनी के मालिक/डायरेक्टर होने के साथ ही दूसरी आरोपी कंपनी जैस इंफ्रास्ट्रक्चर के भी सात फीसदी के मालिक हैं।

दूसरी मीडिया कंपनी है दैनिक भास्कर अखबार को प्रकाशित करने वाली कंपनी डीबी कॉर्प लिमिटेड। दैनिक भास्कर के उत्तर भारत के सात राज्यों से कई संस्करण प्रकाशित होते हैं। यह हिंदी का दूसरा सबसे बड़ा अखबार है। डीबी स्टार, बिजनेस भास्कर, गुजराती में दिव्य भास्कर और अहा जिंदगी पत्रिका भी इसी के प्रकाशन हैं। चार राज्यों से निकलने वाले अंग्रेजी अखबार डीएनए में भी इसकी हिस्सेदारी है। भोपाल के गिरीश, रमेश, सुधीर और पवन अग्रवाल कंपनी के मालिक हैं। पिछले कुछ वर्षों में दैनिक भास्कर मीडिया बाजार में अपनी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों को किनारे लगाते हुए बड़ी तेजी से उभरा है। मार्केटिंग का हर हथकंडा अपनाते हुए इसने उत्तर भारत में अपने लिए एक खास जगह बनाई है लेकिन इसके कर्मचारियों और पत्रकारों पर छंटनी की तलवार हमेशा लटकी रहती है। प्रबंधन की नीतियों के मुताबिक उनकी नौकरी कभी भी छीनी जा सकती है। डीबी कॉर्प के चार भाषाओं में प्रकाशित होने वाले अखबारों के उनहत्तर संस्करण और एक सौ पैंतीस उप-संस्करण जनता के बीच पहुंचते हैं। कंपनी माई एफएम नाम से देश के सत्रह शहरों से रेडियो भी संचालित करती है।

डीबी कॉर्प का धंधा सिर्फ मीडिया ही नहीं है। इसकी मौजूदगी और भी कई धंधों में है। भारतीय बाजार के रेग्युलेटर सेक्योरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) ने इस कंपनी की वित्तीय स्थिति के बारे में कहा है कि इसके पास उनहत्तर अन्य कंपनियों का मालिकाना भी है। जिनमें खनन, ऊर्जा उत्पादन, रियल एस्टेट और टैक्सटाइल जैसे कई धंधे शामिल हैं। कहा जाता है कि कंपनी ने भोपाल में जो मॉल बनाया है वैसा भव्य मॉल एशिया में और कहीं नहीं है। मुनाफा कमाने के लिए जहां भी इस कंपनी को रास्ता दिखता है ये वहीं चल पड़ती है और रास्ते में कोई दिक्कत आ गई तो मीडिया का इतना बड़ा साम्राज्य किस दिन के लिए है! डीबी कॉर्प के कामों को आगे बढ़ाने में दैनिक भास्कर लगातार उसके साथ रहता है। जहां-जहां कंपनी को धंधा करना होता है वहां से वो अखबार निकालना नहीं भूलती ताकि जनमत और सत्ता को साधने में आसानी रहे। कोयला घोटाले में नाम आने से पहले ही छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में जनता के विरोध के बावजूद भाजपा सरकार ने इसे 693.2 हेक्टेयर जमीन स्वीकृत कर दी, वहां जनता का आक्रोश फूट पड़ा और आखरिकार छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पाया कि कंपनी ने पर्यावरण के मानकों का बुरी तरह उल्लंघन किया है। कोर्ट ने आदेश दिया कि आगे से इस कंपनी को पर्यावरण मानकों को लेकर हरी झंडी न दी जाए। हाईकोर्ट में कंपनी के खिलाफ याचिका डालने वाले डीएस मालिया का कहना है कि दैनिक भास्कर ने उनके तथ्यों को झुठलाने के लिए अपने अखबार के कई पृष्ठ रंग डाले और सही खबर को दबाने के लिए हर संभव कोशिश की। दैनिक भास्कर ने राहुल सांस्कृत्यायन के ‘भागो नहीं, दुनिया को बदलो’ की तर्ज पर ‘अपने लिए जिद करो, दुनिया बदलो’ की टैग लाइन चुनी है। जिस तरह से भास्कर देश के संसाधनों की लूट में शामिल है उससे जाहिर है कि वह कैसी बेशर्म जिद का शिकार है! लोकमत समाचार की तरह ही यह कंपनी भी पेड न्यूज छापकर अपना नाम कमा चुकी है! पेड न्यूज पर भारतीय प्रेस परिषद की परंजॉय गुहा ठकुरता और के श्रीनिवास रेड्डी वाली रिपोर्ट में इन दोनों कंपनियों का नाम दर्ज है।

कोयले की दलाली में शामिल तीसरा अखबार प्रभात खबर है। बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल से इसके कई संस्करण निकलते हैं। इसका प्रकाशन उन्नीस सौ चौरासी में खनन उद्योग से जुड़ी कंपनी उषा मार्टिन लिमिटेड ने शुरू किया। उषा मार्टिन समूह के और भी कई धंधे हैं। अपने राजनीतिक संपर्कों के लिए पहचाने जाने वाले हरिवंश उन्नीस सौ नवासी से इसके संपादक हैं। चंद्रशेखर के प्रधानमंत्रित्व काल में वह प्रधानमंत्री ऑफिस में पब्लिक रिलेशन का काम भी कर चुके हैं। ऊषा मार्टिन कंपनी का मुख्य धंधा बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में ही चलता है। कंपनी पर आरोप लगता रहा है कि इस इलाके में अपने धंधे के पक्ष में माहौल बनाने के लिए ही उसने अखबार का भी सहारा लिया है। कोयला घोटाले में नाम आने से इस सच्चाई पर पक्की मोहर लग जाती है।

चौथी दागी कॉरपोरेट आदित्य बिड़ला समूह है। यह एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी है जिसका धंधा देश-विदेश में कई क्षेत्रों में फैला हुआ है। यह समूह खाद, रसायन सीमेंट रीटेल, टेलीकॉम जैसे अनगिनत धंधों से जुड़ा हुआ है। हिंडाल्को, आइडिया सेल्यूलर और अल्ट्राटेक सीमेंट इसकी कुछ कंपनियों के नाम हैं। इस समूह ने अरुण पुरी के लिविंग मीडिया इंडिया ग्रुप में 27.5 फीसदी की हिस्सेदारी है। अरुण पुरी इंडिया टुडे के विभिन्न प्रकाशनों और टीवी टुडे समूह के चैनलों के मालिक हैं, जिनमें आजतक और हेडलाइंस टुडे जैसे चैनल भी शामिल हैं। आदित्य बिड़ला समूह ने मीडिया में क्यों पैसा लगाया है इसके लिए किसी शोध की जरूरत नहीं है!

जिन भी कंपनियों का नाम कोयला घोटाले में आया है क्या उनसे उम्मीद की जा सकती है कि वे अपने मालिकाने वाले मीडिया में कोयला घोटाले को सही तरह से रिपोर्ट कर पाएंगे? इस सरल से सवाल के जवाब को आज का मीडिया परिदृश्य काफी कठिन बना देता है जिससे हकीकत पर हमेशा के लिए पर्दा पड़ा रहे। बाजार अर्थव्यवस्था जन-पक्षधर नियमों को ढीला किए बिना चल ही नहीं सकती। सरकारें भी कॉरपोरेट दबाव में मीडिया नियमन के सवाल को लगातार अनदेखा करती रहती हैं। इस मौके का फायदा उठाते हुए बड़े-बड़े बिजनेस समूह मीडिया को खरीदकर उसकी आड़ में अपने बाकी धंधों को चमका रहे हैं। उन्हें ऐसा कदम उठाने से रोकने वाला कोई कानून नहीं है, यही वजह है कि चावल से लेकर सीमेंट का धंधा करने वाली और बिल्डरों से लेकर कोयला बेचने वाली कंपनियां तक मीडिया में पैसा लगा रही हैं। नई आर्थिक नीतियों को अपनाने और तथाकथित सूचना क्रांति के अस्तित्व में आने के बाद सरकारें निजी कंपनियों के सामने ज्यादा आत्मसमर्पण की मुद्रा में हैं। कॉरपोरेट अपराधों के खिलाफ कोई नियम बनाने से उन्हें लगता है कि इससे देश की विकास दर मंदी पड़ जाएगी, विदेशी निवेश घट जाएगा।

वैसे आजादी के बाद से ही व्यापारिक घरानों द्वारा मीडिया को इस्तेमाल करने की शुरुआत हो चुकी थी, इसलिए उस दौरान भारतीय प्रेस को जूट प्रेस भी कहा जाता था। टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स जैसे अखबारों के मालिक तब जूट मिलें चलाया करते थे। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और उनके रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन जूट प्रेस की आलोचना करते रहे लेकिन उन्होंने कभी मीडिया में दूसरे धंधों के मालिकों के आने के खिलाफ कोई नियम नहीं बना पाए। बाद में भारतीय प्रेस को स्टील प्रेस भी कहा जाने लगा क्योंकि टाटा जैसी कंपनी का तब के प्रभावशाली अखबार द स्टेट्समैन में पैसा लगा था। इसी तरह इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका ने भी पिछली सदी के साठ के दशक में इंडियन आयरन एंड स्टील कंपनी का नियंत्रण अपने हाथ में लेने की कोशिश की थी। ये कंपनियां हमेशा से अपने व्यापारिक हितों की रक्षा व उन्हें बढ़ाने के लिए मीडिया का इस्तेमाल करती रही हैं। कुछ समय पहले जिस तरह मुकेश अंबानी की कंपनी रियायंस इंडस्ट्रीज ने नेटवर्क 18 और तेलुगू अखबार समूह इनाडु का अधिग्रहण किया है उसे भी इसी क्रम में देखा जा सकता है। इसी तरह कहा जाता है कि कई मीडिया कंपनियों में मुकेश के भाई अनिल अंबानी और रतन टाटा का भी पैसा लगा हुआ है।

भारत में मीडिया के मालिकाने पर बात करते हुए इस बात को ध्यान में रखना जरूरी है कि बड़ी पूंजी का मीडिया पर कब्जा बढ़ता जा रहा हैं। अखबार, टेलीविजन, रेडियो और इंटरनेट से लेकर सभी प्रकार के मीडिया को वे अपने नियंत्रण में ले रहे हैं। मीडिया संकेंद्रण और एकाधिकार की यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे छोटी पूंजी के बल पर निकलने वाले स्वतंत्र समाचार मीडिया को खत्म कर रही है। मीडिया के मालिकाने का केंद्रीकरण लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। इसका उपाय यही है कि क्रास मीडिया होल्डिंग यानी एक ही मीडिया कंपनी के सभी तरह के मीडिया में पैसा लगाने पर रोक लगाई जाए। बहुसंस्करणों पर रोक हो। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे पूंजीवादों देशों में भी मीडिया में पूंजी निवेश को लेकर कोई न कोई नियम हैं लेकिन भारत सरकार इस मामले में अब तक सोयी हुई है। फिलहाल देश के प्रिंट मीडिया पर 9 बड़े मीडिया घरानों का प्रभुत्व हो चुका है। टाइम्स (ऑफ इंडिया) समूह, हिंदुस्तान टाइम्स समूह, इंडियन एक्सप्रेस समूह, द हिंदू समूह, आनंद बाजार पत्रिका समूह, मलयाला मनोरमा समूह, सहारा समूह, भास्कर समूह और जागरण समूह ने लगभग पूरे मीडिया बाजार पर कब्जा कर रखा है। इसी तरह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में स्टार इंडिया, टीवी 18, एनडीटीवी, सोनी, जी समूह, इंडिया टुडे समूह और सन नेटवर्क का बोलबाला है। यही हाल रहा तो जल्दी ही देश में पूरी तरह से मीडिया एकाधिकार (मोनोपली) के हालात पैदा हो सकते हैं। दो हजार नौ में टेलीकॉम रेग्युलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राइ) ने क्रॉस मीडिया ऑनरशिप संकेंद्रण को लेकर अपनी चिंता जताई थी। अपने आधार पत्र में उसने सख्त नियम बनाने की वकालत भी की थी लेकिन कमजोर राजनीतिक इच्छा शक्ति की वजह से इसको लेकर कोई ठोस कानून नहीं बन पाया है।

जिस तरह कई मीडिया समूहों के नाम कोयला घोटाले में आये हैं उससे सबक लेते हुए ऐसे नियम बनाने की जरूरत है जिससे देश में मीडिया स्वामित्व को अन्य उद्योगों से मालिकाने से स्वतंत्र रखा जा सके।

(समयांतर)


मीडिया की काली करतूत//अमलेन्दु उपाध्याय

Friday, February 15, 2013

नुक्‍कड़ नाटक के रूप में कार्यक्रम का प्रस्‍तुतीकरण

15-फरवरी-2013 17:58 IST
कुंभ मेले में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का जमुनिया कार्यक्रम
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने अपनी मीडिया इकाई संगीत और नाटक प्रभाग के जरिए अपने अभिनव कार्यक्रम के हिस्‍से के रूप में इलाहाबाद कुंभ मेले में जमुनिया विषय पर आधारित 14 दिन का ध्‍वनि और प्रकाश कार्यक्रम संचालित किया। यह कार्यक्रम मेले के माहौल को देखते हुए उचित रूप से ढ़ाला गया था। जमुनिया ध्‍वनि और प्रकाश कार्यक्रम शुरू में नुक्‍कड़ नाटक के रूप में अपनाया गया । इसका शीर्षक है जमुनिया-आकांक्षा उभरते भारत की । 

नुक्‍कड़ नाटक ने इलाहाबाद के कुंभ मेले में बड़ी संख्‍या में श्रद्धालुओं को आकर्षित किया और यह कार्यक्रम कई दिनों तक दिन के समय प्रस्‍तुत किया गया। नुक्‍कड़ नाटक की अवधि 45 मिनट थी और कुंभ मेले के परिसर में प्रस्‍तुत इस कार्यक्रम की लाखों श्रद्धालुओं में अनुकूल प्रतिक्रिया हुई। इस पहल ने मुख्‍य कार्यक्रम जमुनिया-तस्‍वीर बदलते भारत की ने भीड़ को आकर्षित करने में सफलता प्राप्‍त की। यह कुंभ मेले के मुख्‍य स्‍थल से थोड़ा हटकर इलाहाबाद के कंपनी बाग मैदान में सायंकाल के समय प्रस्‍तुत किया गया। इस कार्यक्रम में लगभग 150 कलाकारों ने भाग लिया और इसकी कुल अवधि 2 घंटे 20 मिनट थी। 

जमुनिया-तस्‍वीर बदलते भारत की ध्‍वनि और प्रकाश कार्यक्रम एक ग्रामीण महिला की कहानी है जो अभाव और गरीबी से उठकर एक स्‍थानीय नेता के रूप में उभरती है और अंतत: एक ग्राम सरपंच बनती है। वह केंद्र सरकार के सूचना के अधिकार और शिक्षा के अधिकार सहित विभिन्‍न महत्‍वपूर्ण्‍ कार्यक्रम का लाभ उठाती है। 

सन 2010 में शुरू किये गए जमुनिया ध्‍वनि और प्रकाश कार्यक्रम देश के अनेक भागों में प्रस्‍तुत किया जा चुका है। इनमें राजकोट,पोरबंदर,पन्‍ना, अमरावती, सीकर, हरिद्वार, रायबरेली और अमेठी प्रमुख शहर हैं। 

जमुनिया ध्‍वनि और प्रकाश कार्यक्रम भारत की प्रमुख भाषाओं यथा पंजाबी, गुजराती, उडि़या, बंग्‍ला, असमिया, कन्‍नड़ ,तेलुगु, मलयालम आदि में रूपांतरित किया जा चुका है और यह देश के अन्‍य भागों में भी प्रस्‍तुत किये जाने के लिए तैयार है। (PIB)

नुक्‍कड़ नाटक के रूप में कार्यक्रम का प्रस्‍तुतीकरण
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Wednesday, January 30, 2013

मीडिया के लिए दिशा- निर्देश

30-जनवरी-2013 16:51 IST
मेघालय, नगालैंड और त्रिपुरा विधानसभा चुनाव, 2013
निर्वाचन आयोग ने लोक प्रतिनिधित्‍व अधिनियम, 1951 की धारा 126 का हवाला देते हुए कहा है कि इस धारा के तहत मतदान के 48 घंटे के पहले टेलीविजन या अन्‍य माध्‍यमों से चुनाव चर्चा नहीं की जा सकती। आयोग ने मेघालय, नगालैंड और त्रिपुरा विधानसभा चुनाव, 2013 के संदर्भ में यह कहा है। 

उल्‍लेखनीय है कि ऐसी शिकायतें मिली थीं कि टेलीविजन चैनल समाचारों और अन्‍य कार्यकम्रों के दौरान चुनाव चर्चा करके लोकप्रतिनिधित्‍व अधिनियम, 1951 की धारा 126 की अवहेलना करते हैं। इसके अलावा धारा 126ए के तहत एक्‍जिट पोल और उनके नतीजे भी प्रतिबंधित हैं। निर्वाचन आयोग टीवी/रेडियो चैनल और केबल नेटवर्क से आग्रह करता है कि वे मतदान के 48 घंटे के दौरान ऐसा कोई कार्यक्रम प्रस्‍तुत न करें जिससे धारा 126 का उल्‍लंघन होता हो। संबंधित टीवी और रेडियो चैनल मतदान संबंधी प्रसारण की अनुमति के लिए राज्‍य/जिला/स्‍थानीय अधिकारियों से संपर्क कर सकते हैं ताकि वे आदर्श आचार संहिता का पालन करते हुए कार्यकम्र पेश कर सकें। संबंधित सक्षम अधिकारी शांति व्‍यवस्‍था और अन्‍य मामलों को ध्‍यान में रखते हुए उपरोक्‍त अनुमति दे सकता है। 

निर्वाचन आयोग ने मीडिया का ध्‍यान भारतीय प्रेस परिषद के दिशा निर्देशों की तरफ भी दिलाया है जिनके तहत मीडिया को निष्‍पक्ष रूप से चुनाव की खबरें पेश करनी हैं। मीडिया को यह भी आदेश दिया गया है कि वह जाति, धर्म, समुदाय और भाषा पर आधारित किसी प्रकार की खबर नहीं देगा। इसके अलावा मीडिया पर यह पाबंदी भी है कि वह किसी भी उम्‍मीदवार या राजनीतिक दल के बारे में बढा-चढाकर कोई रिपोर्ट नहीं देगा। 
(PIB)  मीडिया के लिए दिशा- निर्देश
मीणा/अरुण/अखलद-364

Monday, December 24, 2012

श्री मणि बहादुर पत्रकार और सच्‍चे पेशेवर थे-मनीष तिवारी

24-दिसंबर-2012 15:34 IST
मणिपुर में एक प्राइवेट टी.वी. न्‍यूज चैनल के स्ट्रिंगर के निधन पर सूचना और प्रसारण मंत्री श्री मनीष तिवारी द्वारा शोक व्‍यक्‍त 

सूचना और प्रसारण मंत्री श्री मनीष तिवारी ने मणिपुर में एक प्राइवेट टी.वी. न्‍यूज चैनल के स्ट्रिंगर श्री धीज मणि के निधन पर शोक व्‍यक्‍त किया है। श्री मणि की कल इम्‍फाल में पुलिस की गोलीबारी के दौरान मृत्‍यु हो गई थी। वे एक अभिनेत्री के साथ हुए दुर्व्‍यवहार के विरोध में आयोजित बंद को कवर कर रहे थे। 

श्री तिवारी ने कहा कि श्री मणि एक बहादुर पत्रकार और एक सच्‍चे पेशेवर थे, जिन्‍होंने कई कठिन घटनाओं को कवर किया।   (PIB)
वि. कासोटिया/राजगोपाल/चन्‍द्रकला —6320

Tuesday, December 18, 2012

लोक सभा में एफटीआईआई का स्‍तरोन्‍नयन

राष्‍ट्रीय महत्‍व का संस्‍थान घोषित करने हेतु कदम उठाए
                                                                                                                                             Courtesy Photo
सूचना और प्रसारण राज्‍य मंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) श्री मनीष तिवारी ने आज लोक सभा में एक प्रश्‍न के लिखित उत्‍तर में बताया कि सरकार ने भारतीय फिल्‍म और टेलीविज़न संस्‍थान, पुणे (एफटीआईआई) को संसद के अधिनियम द्वारा राष्‍ट्रीय महत्‍व का संस्‍थान घोषित करने हेतु कदम उठाए हैं। उन्‍होंने यह भी बताया कि भारतीय फिल्‍म और टेलीविजन संस्‍‍थान, पुणे (एफटीआईआई) में पाठ्यक्रम शुल्‍क अत्‍यधिक सहायिकी-प्राप्‍त है। इसके अतिरिक्‍त, संस्‍थान विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति भी प्रदान करता है। फिल्‍म, टेलीविज़न और उससे जुड़े विषयों में अनुसंधान को बढ़ावा देना संसद के प्रस्‍तावित अधिनियम में संस्‍थान के उद्देश्‍यों में से एक रूप में प्रकल्पित है। (PIB)  18-दिसंबर-2012 14:32 IST
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मीणा/शोभा/रामकिशन-6181

टीवी चैनलों का कार्यकरण


410 समाचार तथा 438 गैर-समाचार चैनलों को अनुमति      
सूचना और प्रसारण राज्‍य मंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) श्री मनीष तिवारी ने आज लोक सभा में एक प्रश्‍न के लिखित उत्‍तर में बताया कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने आज की तिथि के अनुसार 410 समाचार एवं समसामयिकी तथा 438 गैर-समाचार और समसामयिकी चैनलों को अनुमति प्रदान की है। विगत तीन वर्षों और चालू वर्ष के दौरान स्‍वीकृत किए गए अनुरोधों की श्रेणी-वार संख्‍या निम्‍नानुसार है:-
वर्ष
अनुमति दी गई

समाचार
गैर-समाचार
2009
34
46
2010
40
58
2011
117
107
2012
9
27
         165 प्रस्‍ताव अंतर-मंत्रालयीय स्‍वीकृति की विभिन्‍न अवस्‍थाओं में हैं।
     उन्‍होंने यह भी बताया कि मंत्रालय द्वारा जारी अपलिंकिंग और डाउनलिंकिंग दिशानिर्देशों के अनुसार अपलिंकिंग/डाउनलिंकिंग अनुमति प्रदान किए जाने के लिए प्राप्‍त आवेदन आवश्‍यक स्‍वीकृति के लिए गृह मंत्रालय, अंतरिक्ष विभाग, राजस्‍व विभाग और विदेश मंत्रालय को संदर्भित कर दिए जाते हैं। अत: लंबित प्रस्‍ताव की स्‍वीकृति के संबंध में कोई समय-सीमा नहीं बताई जा सकती है।  (PIB) 18-दिसंबर-2012 14:31 IST
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मीणा/शोभा/रामकिशन-6170

केबल नियमों में संशोधन

18-दिसंबर-2012 14:39 IST
नियम 10क के अंतर्गत सूचना प्रदान करने की बाध्‍यता 
सूचना और प्रसारण राज्‍य मंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) श्री मनीष तिवारी ने आज लोक सभा में एक प्रश्‍न के लिखित उत्‍तर में बताया कि मंत्रालय ने अपनी अधिसूचना संख्‍या का.आ. 1521 (अ) दिनांक 06 जुलाई, 2012 द्वारा नियम अर्थात केबल टेलीविज़न नेटवर्क नियम, 1994 (‍द्वितीय संशोधन) नियम, 2012 बनाए हैं जो केबल टेलीविज़न नेटवर्क नियम, 1994 का संशोधन करते हैं, जिसमें एक नया नियम 10क अंत:स्‍थापित किया गया है जो प्रत्‍येक केबल ऑपरेटर और बहु-प्रणाली ऑपरेटर (एमएसओ) को समय से एवं यथातथ्‍य सूचना उपलब्‍ध कराने के लिए बाध्‍य करता है। उक्‍त नियम निम्‍नलिखित रूप में है:-''10क. सूचना प्रदान करने की बाध्‍यता''1. प्रत्‍येक बहुप्रणाली ऑपरेटर और केबल ऑपरेटर यथास्थिति केन्‍द्र सरकार अथवा राज्‍य सरकार अथवा केन्‍द्र सरकार द्वारा प्राधिकृत किसी प्राधिकरण या प्राधिकृत अधिकारी द्वारा मांगी गई सूचना ऐसी सरकार या अभिकरण या अधिकारी को यथाविहित अवधि और रूप में प्रदान करने के लिए बाध्‍य होगा।2. उपनियम (1) के अधीन मांगी गई सूचना प्रदान करने वाला बहु-प्रणाली ऑपरेटर या केबल ऑपरेटर का प्राधिकृत हस्‍ताक्षरकर्ता भी इस तरह प्रदान की गई सूचना की तथ्‍यता और विशुद्धता की अभिपुष्टि करेगा। संशोधित नियम 10क के अंतर्गत सूचना प्रदान करने की बाध्‍यता को केबल टेलीविजन नेटवर्क नियम, 1994 के नियम 5क के अधीन केबल ऑपरेटर और नियम 11घ के अंतर्गत बहु-प्रणाली ऑपरेटर के पंजीकरण की निबंधन एवं शर्तों में से एक के रूप में अंतर्विष्‍ट किया गया है। नए संशोधित नियमों के प्रावधानों के उल्‍लंघन को दंडित करने की शक्ति केन्‍द्र सरकार के पास है और इस संबंध में कोई प्रतिवेदन नहीं किया गया है। (PIB)
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मीणा/शोभा/रामकिशन-6168

टी.वी. चैनलों की कमाई

दूरदर्शन का अधिदेश एवं प्रयोजन निजी प्रसारकों से भिन्न
     सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री मनीष तिवारी ने आज लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि प्रसार भारती ने सूचित किया है कि दूरदर्शन के पास दूसरे चैनलों की राजस्व सृजन ब्यौरे जानने के लिए कोई तंत्र नहीं है। इसलिए दूरदर्शन एवं अन्य निजी चैनलों की कमाई के बीच तुलना का प्रश्न नहीं उठता। इसके अतिरिक्त दूरदर्शन एक लोक सेवा प्रसारक है और उसका अधिदेश एवं प्रयोजन निजी प्रसारकों से भिन्न है। निजी प्रसारकों से भिन्न, यह मूलत: राजस्व उत्पादन की नीयत से कार्य नहीं करता बल्कि यह प्रसार भारती अधिनियम में दिए गए अपने अधिदेश को पूरा करने के लिए कार्य करता है। तथापि, दूरदर्शन द्वारा विछले तीन वर्षों के लिए अर्जित की गई आय निम्नानुसार है:-
                                                     (करोड़ रूपए में)
वर्ष
दूरदर्शन द्वारा अर्जित की गई आय
2009-10
828.48
2010-11#
944.44
2011-12#
990.76
2012-13$
578.75
***      (PIB)
मीणा/राजगोपाल/शदीद-6174

लोकसभा में प्रश्न//उत्तर

दूरदर्शन पर आपत्तिजनक सामग्री
सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री मनीष तिवारी ने आज लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि प्रसार भारती ने सूचित किया है कि दूरदर्शन कार्यक्रमों के निर्माण और प्रसारण के लिए अपनी प्रसारण एवं विज्ञापन संहिता का कड़ाई से अनुपालन करता है। अत: दूरदर्शन पर अभद्रता या आपत्तिजनक विषय-वस्तु वाले कार्यक्रमों का प्रसारण नहीं होता है। इस मंत्रालय ने महिला और बाल विकास मंत्रालय (डब्ल्यूसीडी) अथवा गृह मंत्रालय को दूरदर्शन और अन्य चैनलों पर प्रसारित विषय-वस्तु के लिए विद्यमान कानून में संशोधन करने अथवा नई संहिता बनाने के लिए कोई अनुरोध नहीं भेजा है। गृह मंत्रालय ने सूचित किया है कि वर्तमान में उनके पास दूरदर्शन के विभिन्न चैनलों पर प्रसारित किए जाने वाले कार्यक्रमों और विज्ञापनों में अभद्रता/आपत्तिजनक विषय-वस्तु को रोकने के लिए भारतीय दंड संहिता में संशोधन हेतु कोई प्रस्ताव नहीं है। तथापि, महिला और बाल विकास मंत्रालय ने सूचित किया है कि वह दृश्य श्रव्य मीडिया और इलैक्ट्रोनिक फॉर्म की सामग्री को दायरे में लाने के लिए तथा स्त्रियों के अशिष्ट निरूपण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1986 में शास्ति संबंधी प्रावधानों को मजबूत बनाने के लिए कानून के दायरे का विस्तार करने के साथ ही कतिपय संशोधन पर विचार कर रहा है जिसे संसद में संशोधन विधेयक के रूप में पुर:स्थापित करने हेतु सरकार द्वारा अनुमोदित किया जा चुका है। (PIB)  18-दिसंबर-2012 15:55 IST***
मीणा/राजगोपाल/शदीद-6186

टेलीविजन प्रसारणकर्ताओं हेतु आचार-संहिता

पूरे देश में राज्य स्तर और जिला स्तर की मॉनीटरिंग समितियां गठित 
सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री मनीष तिवारी ने आज लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि टीवी चैनलों पर प्रसारित होने वाले सभी कार्यक्रमों एवं विज्ञापनों, जिनका प्रसारण/पुन: प्रसारण केबल टीवी नेटवर्क के माध्यम से किया जाता है, को केबल टीवी नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम, 1995 और उसके अधीन बनाए गए नियमों के अंतर्गत विनिर्धारित पहले से विद्यमान कार्यक्रम और विज्ञापन संहिताओं का अनुपालन करना होता है। 

मंत्रालय ने कार्यक्रम और विज्ञापन संहिताओं के उल्लंघन की जांच के लिए एक अंतर-मंत्रालयीय समिति गठित की है। इस अंतर-मंत्रालयीय समिति में गृह मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, विधि मंत्रालय, महिला व बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, उपभोक्ता मामले मंत्रालय और भारतीय विज्ञापन मानक परिषद (एएससीआई) के प्रतिनिधि होते हैं। अंतर-मंत्रालयीय समिति की बैठकों में उल्लंघनों के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा की जाती है। सरकार ने भी 24 घंटे निजी सैटेलाइट टेलीविजन चैनलों पर प्रसारित होने वाली विषय-वस्तु की मॉनीटरिंग के लिए इलेक्ट्रोनिक मीडिया मॉनीटरिंग केन्द्र (ईएमएमसी) की भी स्थापना की है। 

श्री तिवारी ने कहा कि केबल नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम, 1995 और उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों के प्रावधान क्षेत्रीय भाषा चैनलों सहित सभी निजी सैटेलाइट/केबल टीवी चैनलों पर लागू होते हैं। इसके अतिरिक्त, सरकार ने पूरे देश में राज्य स्तर और जिला स्तर की मॉनीटरिंग समितियां गठित की हैं जो निजी सैटेलाइट/केबल टेलीविजन चैनलों में प्रसारित विषय-वस्तु की मॉनीटरिंग करती है। अभी तक केन्द्रशासित प्रदेशों सहित 21 राज्य स्तरीय मॉनीटरिंग समितियां और 274 जिसा स्तरीय मॉनीटरिंग समितियां देश भर में गठित की जा चुकी हैं। (PIB)
 18-दिसंबर-2012 14:36 IST***
मीणा/राजगोपाल/शदीद-6173

प्रिंट मीडिया में प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई)

भारतीय संस्‍थाओं में 26 प्रतिशत तक विदेशी निवेश की अनुमति
सूचना और प्रसारण राज्‍य मंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) श्री मनीष तिवारी ने आज लोक सभा में एक प्रश्‍न के लिखित उत्‍तर में बताया कि प्रिंट मीडिया क्षेत्र में, गैर-समाचारों अर्थात प्रिंट मीडिया के विशेषज्ञता/तकनीकी/वैज्ञानिक क्षेत्र में 100 प्रतिशत तक के विदेशी निवेश की अनुमति है, जबकि समाचार और समसामयिकी से संबंधित समाचार पत्रों और पत्रिकाओं का प्रकाशन करने वाली भारतीय संस्‍थाओं में 26 प्रतिशत तक विदेशी निवेश की अनुमति है। तथापि, पूर्ण स्‍वामित्‍व वाली सह-संस्‍था के माध्‍यम से अपने समाचार पत्रों के फैसीमाइल संस्‍करण प्रकाशित करने वाले विदेशी प्रकाशन घरानों के मामले में 100 प्रतिशत तक विदेशी निवेश की अनुमति है। उन्‍होंने यह भी बताया कि भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने प्रिंट मीडिया में विदेशी प्रत्‍यक्ष निवेश के मुद्दे पर कोई सिफारिश नहीं की है। वर्तमान में, प्रिंट मीडिया में विदेशी प्रत्‍यक्ष निवेश की अधिकतम सीमा बढ़ाने का कोई प्रस्‍ताव नहीं है। सरकार ने गैर-समाचार क्षेत्र अर्थात वैज्ञानिक/तकनीकी/विशेषज्ञता पत्रिकाएं/आवधिकियां/जर्नल प्रकाशित करने के लिए पहले ही 100 प्रतिशत तक विदेशी प्रत्‍यक्ष निवेश की अनुमति दी है।  (PIB)  18-दिसंबर-2012 14:33 IST
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मीणा/शोभा/रामकिशन-6182

प्रेस स्वतंत्रता संबंधी रिपोर्ट

18-दिसंबर-2012 14:40 IST
चैनलों पर प्रसारित विषय-वस्तु के पूर्व-सैंसरशिप का प्रावधान नहीं 
सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री मनीष तिवारी ने आज लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि सरकार को 'रिपोर्टर्ज विदाउट बोर्ड्ज' द्वारा कराए गए सर्वेक्षण के परिणामों और इस संस्था द्वारा समेकित विश्व प्रैस स्वतंत्रता सूचकांक 2012 के संबंध में मीडिया में प्रकाशित रिपोर्ट की जानकारी मिली है। 

सरकार वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कायम रखने की अपने नीति का अनुसरण करते हुए प्रिंट या इलेक्ट्रोनिक मीडिया में प्रकाशित विषय-वस्तु या ऑनलाइन विषय-वस्तु को सेंसर या विनियमित नहीं करती है। भारतीय प्रैस परिषद की स्थापना प्रैस की स्वतंत्रता को संरक्षण प्रदान करने और प्रैस में स्व-विनियमन के सिद्धांतों का संचार करने के भी दोहरे उद्देश्यों से प्रैस परिषद अधिनियम, 1978 के अंतर्गत एक सांविधिक स्वायत्तशासी निकाय के रूप में की गई है। जहां तक निजी सैटेलाइट टीवी चैनलों का संबंध है, केबल टेलीविजन नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम में इन चैनलों पर प्रसारित विषय-वस्तु के पूर्व-सैंसरशिप का प्रावधान नहीं है। तथापि, सभी चैनलों को उक्त अधिनियम के अधीन केबल टेलीविजन नेटवर्क नियम, 1994 द्वारा विनिर्धारित कार्यक्रम एवं विज्ञापन संहिता का अनुपालन करना होता है। इसके अतिरिक्त, उद्योग ने भी विषय-वस्तु के विनियमन हेतु एक स्व-विनियमन तंत्र गठित किया है। अपने स्व-विनियमन पहल के हिस्से के रूप में उद्योग ने सामान्य मनोरंजन चैनलों और समाचार चैनलों की शिकायतों संबंधी विषय-वस्तु पर विचार करने के लिए प्रसारण विषय-वस्तु शिकायत परिषद (बीसीसीसी) और समाचार प्रसारण मानक प्राधिकरण (एनबीएसए) का गठन किया है।

इसके अतिरिक्त, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 के अंतर्गत अधिसूचित सूचना प्रौद्योगिकी (अंतर्वर्ती दिशानिर्देश) नियम, 2011 में प्रावधान है कि अंतर्वर्ती अपने कर्तव्यों का निर्दहन करने में सम्यक तत्परता बरतेंगे। ये नियम स्व-विनियमन प्रकृति के हैं और भारत के संविधान में प्रतिष्ठापित वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अनुरूप है।

सरकार वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा नागरिकों के अधिकारों को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। (PIB)

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मीणा/राजगोपाल/शदीद-6175

Tuesday, October 9, 2012

केबल सेट टॉप बॉक्स द्वारा बिजली की खपत


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने दिया स्पष्टीकरण
पिछले दिनों कुछ समाचारपत्रों में छपा है कि केबल टीवी के डिजिटीकरण से सेट टॉप बॉक्स (एसटीबी) के जरिए बिजली की खपत काफी बढ़ जाएगी। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने इस बारे में स्थिति को स्पष्ट करते हुए बताया है कि यह खबर गलत है कि एसटीबी की बिजली की खपत 20 वाट है। मल्टी सिस्टम और स्थानीय केबल ऑपरेटरों द्वारा एसटीबी के कई तरह के मेक और मॉडल सप्लाई किए जाते हैं। अलग-अलग किस्मों के केबल एसटीबी की बिजली की खपत के आंकड़े नीचे तालिका में दिए गए हैं, जिनसे पता चलता है केबल एसटीबी इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ता करीब आठ वाट बिजली खर्च करते हैं, जो सीएफएल की खपत से भी कम है।
तालिका 1- विभिन्न मेकों के केबल एसटीबी की बिजली खपत की दरें
एसटीबी मेक एवं मॉडल
बिजली खपत  (वाट)
चालू स्थिति
प्रतीक्षा स्थिति
डेन एंटरटेनमेंट नेटवर्क्स
स्काईवर्थ 7000
8
7
स्काईवर्थ 7600
8
7
स्काईवर्थ 7631
8
7
डिजिकेबल
इंडियोन एलडीसीए 1000
5.4
4.5
चांगहोंग C8899C0
7.5
6.9
स्काईवर्थ C371N EN
10
8
आईएमसीएल
एसडी एसटीबी
12
10
मॉयबॉक्स
7.5
6.9
हैथवे डेटाकॉम
स्काईवर्थ 9000
8
7
हुमा एनडी-1200C
15
5
डब्ल्यूडब्ल्यूआईएल
हेंडोन 1002C
6.5
5.8
हेंडोन 1041C
6.5
5.8
एरियोन 5012S
7.5
6.9
चांगहोंग C8899C0
7.5
6.9
मॉयबॉक्स
7.5
6.9
स्रोतः विनिर्माताओं के उत्पादों के विवरण से प्राप्त
विभिन्न घरेलू बिजली उपकरणों द्वारा बिजली की खपत की दरें नीचे तालिका 2 में दर्शायी गई हैं।
तालिका 2- विभिन्न मेकों के केबल एसटीबी की बिजली खपत की दरें
उपभोक्ता उपकरण
मॉडल
बिजली खपत (वॉट)
फ्रिज
210 लीटर
270
कूलर (डेजर्ट)
बजाज DC 2012
200
टेलीविजन
सोनी  KV-SZ292M88 CRT - 29”
138
टेलीविजन
एलजी  14D7RBA CRT
80
टेलीविजन
सोनी  KLV 20S400A LCD
60
टेलीविजन
सोनी  KDL 26EX550 LCD
50
पंखा
क्रॉम्पटन ग्रीव्ज – 56”
80
पंखा
ओरियंट 32 – टेबल पंखा
70
पीसी (कंप्यूटर)
एचपी V185E
60
पीसी (कंप्यूटर)
मॉनीटर – 17”
80
लाइट
बल्ब इनकेंडिसेंट
100
डीवीडी प्लेयर
सोनी BDP S350
26
लाइट
फ्लोरेसेंट ट्यूब
50
लाइट
सीएफएल
10
एसटीबी
केबल टीवी के लिए औसत
8
स्रोतः विनिर्माताओं के उत्पादों और एनपीसीएल की वेबसाइट पर उपलब्ध विवरण
जैसा कि उपरोक्त तालिका से पता चलता है कि  टेलीविजन,पंखें और ट्यूबलाइटें 60-60 वाट की बिजली की खपत करती हैं,जबकि एसटीबी की खपत 8 वाट है। इसलिए अगर कोई व्यक्ति एक घंटे तक टेलीविजन देखता है और एक कमरे मे एक पंखा और एक ट्यूबलाइट भी चलाता है तो इन उपकरणों द्वारा एक घंटे में बिजली की खपत एसटीबी की खपत से ज्यादा होगी, चाहे उसे 24 घंटे तक क्यों न चलाया जाए। दूसरे शब्दों में एसटीबी की खपत 1 दिन में 1/5 यूनिट है जबकि एक पंखे, एक टेलीविजन और एक ट्यूबलाइट की खपत 1.5 यूनिट है। इसी प्रकार घरेलू फ्रिज की खपत रोजाना औसतन 4-5 यूनिट है, जो एसटीबी की एक दिन की खपत के 20 गुना से भी ज्यादा है। इस प्रकार केबल एसटीबी की खपत महीने में 5-6 यूनिट बैठती है और अन्य बिजली उपकरणों के मुकाबले बहुत मामूली है।
डिजिटिकरण से उपभोक्ताओं को तस्वीर और आवाज की बेहतर क्वालिटी मिलेगी और चैनल चुनने की आजादी होगी। फिल्म और गेम आदि भी अपनी पसंद के मांगे जा सकेंगे और यह सब बिजली की मामूली खपत पर ही उपलब्ध होंगे।
आमतौर पर घरों में एसटीबी स्विच ऑफ नहीं किए जाते है। जब टीवी नहीं देखा जा रहा होता, तब भी एसटीबी को प्रतीक्षा स्थिति में रखा जाता है, ताकि ऑफ होने के बाद एसटीबी को फिर से शुरू करने में और समय न लगे। प्रतीक्षा स्थिति में एसटीबी के ऑन रहने के बिजली की खपत और भी कम होती है।(PIB)  (08-अक्टूबर-2012 15:17 IST)

मीणा/राजगोपाल/अर्जुन- 4825