Sunday, February 16, 2014

पेंगुइन को एक वाजिब व जिम्मेदाराना फटकार...जरुर पढ़ें...

पेंगुइन तुम इतना डर किस बात से गए?  --अरुंधति रॉय
सुनीता भास्कर shared a link on Facebook on Yesterday (Saturday 15 Feb 2014 को बजे 
अमेरिकी लेखक वेंडी डॉनिगर की `द हिन्दू: एन ऑलटरनेटिव हिस्ट्री` को पेंगुइन ने एक अनजान से कट्टर हिंदू संगठन के दबाव में `भारत` के अपने ठिकानों से हटाने का फैसला किया है। मशहूर लेखिका-एक्टिविस्ट अरुंधति रॉय जिनकी खुद की किताबें भी इस प्रकाशन से ही आई हैं, ने पेंगुइन को यह कड़ा पत्र लिखा है जो Times of India में छपा है।पत्र का हिंदी अनुवाद:
सुनीता भास्कर 
तुम्हारी इस कारगुजारी से हर कोई स्तब्ध है। तुमने एक अनजान हिंदू कट्टरवादी संस्था से अदालत के बाहर समझौता कर लिया है और तुम वेंडी डॉनिगर की `द हिन्दू: एन ऑलटरनेटिव हिस्ट्री` को भारत के अपने किताबघरों से हटाकर इसकी लुगदी बनाने पर राजी हो गए हो। कोई शक नहीं कि प्रदर्शनकारी तुम्हारे दफ्तर के बाहर इकट्ठा होकर अपनी निराशा का इजहार करेंगे। 

कृपया हमें यह बताओ कि तुम इतना डर किस बात से गए? तुम भूल गए कि तुम कौन हो? तुम दुनिया के सबसे पुराने और सबसे शानदार प्रकाशकों में से हो। तुम प्रकाशन के व्यवसाय में बदल जाने से पहले और किताबों के मॉस्किटो रेपेलेंट और खुशबुदार साबुन जैसे बाज़ार के दूसरे खाक़ हो जाने वाले उत्पादनों जैसा हो जाने से पहले से (प्रकाशन में) मौज़ूद हो। तुमने इतिहास के कुछ महानतम लेखकों को प्रकाशित किया है। तुम उनके साथ खड़े रहे हो जैसा कि प्रकाशकों को रहना चाहिए। तुम अभिव्यक्ति की आजादी के लिए सबसे हिंसक और भयावह मुश्किलों के खिलाफ लड़ चुके हो। और अब जबकि न कोई फतवा था, न पाबंदी और न कोई अदालती हुक्म तो तुम न केवल गुफा में जा बैठे, तुमने एक अविश्वसनीय संस्था के साथ समझौते पर दस्तखत करके खुद को दीनतापूर्ण ढंग से नीचा दिखाया है। आखिर क्यों? कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए जरूरी हो सकने वाले सारे संसाधन तुम्हारे पास है। अगर तुम अपनी ज़मीन पर खड़े रह पाते तो तुम्हारे साथ प्रबुद्ध जनता की राय और सारे न सही पर तुम्हारे अधिकांश लेखकों का समर्थन भी होता। तुम्हें हमें बताना चाहिए कि आखिर हुआ क्या। आखिर वह क्या है, जिसने तुम्हें आतंकित किया? तुम्हें अपने लेखकों को कम से कम स्पष्टीकरण देना तो बनता ही है।
चुनाव में अभी भी कुछ महीने बाकी हैं। फासिस्ट् अभी दूर हैं, सिर्फ अभियान में मुब्तिला हैं। हां, ये भी खराब लग रहा है पर फिर भी वे अभी ताकत में नहीं हैं। अभी तक नहीं। और तुमने पहले ही दम तोड़ दिया।

हम इससे क्या समझें? क्या अब हमें सिर्फ हिन्दुत्व समर्थक किताबें लिखनी चाहिए। या `भारत` के किताबघरों से बाहर फेंक दिए जाने (जैसा कि तुम्हारा समझौता कहता है) और लुगदी बना दिए जाने का खतरा उठाएं? शायद पेंगुइन से छपने वाले लेखकों के लिए कुछ एडिटोरियल गाइडलाइन्स होंगी? क्या कोई नीतिगत बयान है?
साफ कहूं, मुझे यकीन नहीं होता, यह हुआ है। हमें बताओ कि यह प्रतिद्वंद्वी पब्लिशिंग हाउस का प्रोपेगंडा भर है। या अप्रैल फूल दिवस का मज़ाक था जो पहले ही लीक हो गया। कृपया, कुछ कहिए। हमें बताइए कि यह सच नहीं है।
अभी तक मैं से पेंगुइन छपने पर बहुत खुश होती थी। लेकिन अब?
तुमने जो किया है, हम सबके दिल पर लगा है।                       -अरुंधति रॉय

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ब्लूस्टार को जनरल शाहबेग का "महंगा बदला" बताया इण्डिया टुडे ने


Tuesday, February 11, 2014

भाषा के सवाल पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करती किताब-"भाषा का सच"

अपने हिंदी भाषी होने पर अफसोस आखिर क्यूँ ?
अगर लोकतंत्र में काबलियत की बजाये आंकड़ा तंत्र छाता जा रहा है, सियासत में सत्ता लोलुपता बढ़ रही है तो हालत मीडिया की भी अच्छी नहीं रही। अगर कोई वेश्या किसी मजबूरी के कारण अपना  जिस्म बेचती है तो हमारे आज के बहुत से कलमकार अपनी दिमागी और जिस्मानी मेहनत के साथ साथ अपनी सोच भी बेच रहे हैं--अपने ख्यालात भी बेच रहे हैं और जनता के सामने लगातार वही सच सामने ला रहे हैं जिसे उनके मालिक लोग देखना चाहते हैं। पेड न्यूज़ का सबसे अधिक दुष्प्रभाव पड़ने वाला है आम आदमी पर। सच को दबाने  बदलने की जितनी साज़िशें आज हो रही हैं पहले शायद कभी नहीं थीं। कुछ महीने पूर्व जब अनिल चमड़िया लुधियाना के एक गांव की सभा में आये थे तो उन्होंने बहुत सी सच्चाईयों से आम जनता को वाकिफ करवाया था। तब से एक उम्मीद बंधी थी कि सच की मशाल को थामने वाले अभी भी हैं। एक बार फिर यह विश्वास हुआ कि सच की आवाज़ फिर बुलंद होगी। चमक दमक के इस दौर में हकीकत अपने असली रूप में सबके सामने आकर रहेगी। "भाषा का सच" के बारे में जान कर यह उम्मीद और मज़बूत हुई। 
फेसबुक पर जारी हुईं अवनीश राय की पोस्टों के  मुताबिक "भाषा का सच" भाषा के सवाल पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करती किताब है। यह उन नीतियों को भी विस्तार से रखती है जिनसे मातृभाषाओं को धीरे-धीरे खत्म किया जा रहा है। मातृभाषा के खिलाफ और अंग्रेजी के पक्ष में फैलाई गई बहुत सी धारणाओं को भी यह किताब तमाम शोधों के माध्यम से दूर करती है। जाहिर है इंसाफ का सवाल भी इससे अलग नहीं है। यह किताब Media Studies Groupedia Studies Group ने प्रकाशित की है। इसके बारे में ज्यादा जानकारी भाषा का सच पर जाकर देखा जा सकता है।
हम अपने हिंदी भाषी होने पर अफसोस करते रहते है और अंग्रेजी सीखने के लिए दिन-रात लगे रहते है। यह भी जानने की कोशिश नहीं करते है कि जब तक हम अपनी ही भाषा को ठीक से नहीं समझेंगे, तब तक अन्य भाषाओं को कैसे समझ पाएंगे। अपनी भाषा के साथ अन्य भाषाओं को सीखने में भी आसानी होती है, यह बात विदेशों में भी मानी गई। और यूनेस्को के सर्वेक्षणों में यह बात साबित हुई है।
इससे कोई इँकार नहीं कर सकता कि सही समझ और बेहतर संचार के लिए मातृभाषा का बहुत महत्व है। इस किताब में इसी विषय को लेकर शोधपरक लेख सम्मिलित किए गए हैं। साथ ही इस विषय पर भी गंभीर चर्चा है कि किस तरह कुछ एक भाषाएं बाकी भाषाओं पर कब्जा कर रही हैं। यह किताब आपको विश्व पुस्तक मेले में Media Studies Group के स्टैंड पर मिलेगी।
हम अपने हिंदी भाषी होने पर अफसोस करते रहते है और अंग्रेजी सीखने के लिए दिन-रात लगे रहते है। यह भी जानने की कोशिश नहीं करते है कि जब तक हम अपनी ही भाषा को ठीक से नहीं समझेंगे, तब तक अन्य भाषाओं को कैसे समझ पाएंगे। अपनी भाषा के साथ अन्य भाषाओं को सीखने में भी आसानी होती है, यह बात विदेशों में भी मानी गई। और यूनेस्को के सर्वेक्षणों में यह बात साबित हुई है।

email- msgroup.india@gmail.com

9968771426
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Monday, February 10, 2014

ऐतराज़ उठने पर पेगुइन ने तत्काल प्रभाव से वापिस ली पुस्तक

Mon, Feb 10, 2014 at 8:46 PM 
शिक्षा बचाओ आन्दोलन को मिली सफलता 
नई दिल्ली: 10 फरवरी 2014: (राजीव गुप्ता//मीडिया स्क्रीन):
आज दिनांक 10 फरवरी 2014 को श्री दीनानाथ बत्रा तथा अन्य और पेगुइन पब्लिसर्स के मध्य में सिविल सूट नं. 360/2011 के मध्य अनुबंध हुआ है जिसमें:-
      पेगुइन बुक इंडिया प्राईवेट लिमिटेड ने तत्काल प्रभाव से हिन्दुत्व तथा वैकल्पिक इतिहास की पुस्तक को तत्काल वापस ले लिया है तथा उसके द्वारा अपने खर्च पर सम्पूर्ण पुस्तकें देश से एकत्रित करा ली जाएगी और उनको नष्ट कर दिया जाएगा.
·         यह पुस्तक पुनः से प्रकाशित नहीं होगी.
·         पुस्तक में हिन्दु देवी-देवताओं का अपमान, क्रान्तिकारियों तथा इतिहास को विकृत रूप से प्रस्तुत करने के परिणामस्वरूप यह मुकदमा अतिरिक्त जिला न्यायाधीश साकेत की अदालत में केस दर्ज किया गया था.

आपत्तिजनक अंश जैसे:-
      गांधी जी एक विचित्र व्यक्ति थे जो छोटी-छोटी लड़कियों के साथ सोते थे - पृष्ठ-625
     स्वामी विवेकानन्द ने लोगों को गोमांस भक्षण का सुझाव दिया- पृष्ठ-639
     लक्ष्मीबाई अंग्रेजों के प्रति निष्ठावान थी- पृष्ठ-586
     हिन्दुओं का कोई मूलग्रन्थ नहीं है- पृष्ठ-25
     सीता लक्ष्मण पर आरोप लगाती है कि लक्ष्मण की उनके प्रति कामभावना है - पृष्ठ-14

शिक्षा बचाओ आन्दोलन के मीडिया प्रभारी राजीव गुप्ता ने बताया कि पेगुइन बुक इंडिया प्राईवेट लिमिटेड की ओर से कहा गया कि हम सब धर्मों का सम्मान करते है. अतः वें इस पुस्तक को वापस ले रहे है. अब यह पुस्तक न आगे से छापी जाएगी और बची हुई पुस्तकों को बेचा नहीं जाएगा. यह अनुबंध श्री बलबंत राय बंसल ए.डी. जे कोर्ट नं. 615 के न्यायालय में प्रस्तुत किया गया. माननीय न्यायधीश ने इसे स्वीकृति प्रदान की. याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्रीमती मोनिका अरोड़ा उपस्थित रही.

ब्लूस्टार को जनरल शाहबेग का "महंगा बदला" बताया इण्डिया टुडे ने 

Saturday, February 8, 2014

ब्लूस्टार को जनरल शाहबेग का "महंगा बदला" बताया इण्डिया टुडे ने

संत भिंडरांवाले को बताया ग्रंथी और विद्रोही गुट का नेता 
लुधियाना: ब्लू स्टार आपरेशन में ब्रिटिश दखल की बात उठी तो सिख समाज के साथ साथ मीडिया में भी एक फिर तूफ़ान आ गया।  इसके साथ ही शुरू हुई सिख समाज के दर्द को भुनाने की एक और नयी कोशिश। क्यूंकि व्यापारी समाज के लिए हर बात  एक व्यापार  आंसुयों का व्यापर, जज़बात का व्यापार और खबरों का सिलसिला भी अब एक व्यापार बन गया है। कहा कुछ जाता है पर उसका छुपा मकसद कुछ और ही होता है।   बात को घुमा फिरा कर अर्थों का अनर्थ।  इण्डिया टुडे  (हिंदी)  नाज़ुक और संवेदनशील मामले को एक बार फिर सनसनी का आवरण औड़ाते हुए बहुत से नए तथ्य सामने लाने का दावा करता महसूस होता है।  इस आवरण स्टोरी में जहाँ कुछ काम की बातें भी हो सकती हैं वहीँ पत्रिका के इरादे छुपे नहीं रह सके। पत्रिका ने अपना पक्षपात एक बार फिर ज़ाहिर कर  दिया है। जहाँ पत्रिका ने गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी की ओर से स्थापित  दमदमी टकसाल के चौहदवें उत्तराधिकारी संत जरनैल सिंह भिंडरांवाले को एक "तेज़तर्रार ग्रंथी" बताया है वहीँ ब्लू स्टार ऑपरेशन को सही करार देने के प्रयास में यह भी कहा है कि उसके नेतृत्व में सिखों के एक विद्रोही गुट ने "जंग" छेड़  रखी थी और 1981 से 1984 तक 100 से अधिक आम नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों की जान ले ली थी। यह भी कहा कि भिंडरांवाला अपने हथियारबंद साथियों के घेरे में सिखों के सबसे पवित्र गुरुद्धारे में छिपा बैठा था। इस पत्रिका की इस आवरण कथा का चालाक लेखक यह नहीं बताता कि अगर समस्या केवल सवर्ण मंदिर में ही थी तो पंजाब के अन्य 36 गुरुद्धारों में सैनिक एक्शन क्यूँ किया गया?  क्या इतना बड़ा मीडिया हाऊस नहीं जानता कि सिखों के लिए वे अन्य गुरुद्धारे भी बहुत महत्वपूर्ण और पवित्र थे और रहेंगे।
आगे जाकर इण्डिया टुडे इंदिरा गांधी को बेहद संवेदनशील साबित करने के प्रयास में कहता है कि इंदिरा गांधी ने आपरेशन सनडाऊन की उस परियोजना को केवल इस लिए रद्द कर दिया था क्यूंकि उसमें अधिक नुक्सान होने का खतरा था। गौरतलब है कि इस योजना के अंतर्गत  हेलीकाप्टरों और स्पेशल ट्रेंड कमांडोज़ के ज़रिये होना था और  संत जरनैल सिंह भिंडरांवाले का अपहरण किया जाना था।
अपनी इस सारी "सच्ची कहानी" में पत्रिका ने यही प्रभाव देने का प्रयास किया कि जैसे वहाँ हमला करने गए सेनिक तो बेचारे सिखों का शिकार हो रहे थे। पत्रिका ने कहीं नहीं कहा कि इंदिरा गांधी ने इस एक्शन के लिए श्री गुरु अर्जुन देव जी के शहीदी पर्व का दिन क्यूँ चुना? वहाँ उस पावन दिवस पर माथा टेकने गए श्रद्धालुयों में बच्चे भी थे--महिलाएं भी और बज़ुरग भी---उनमें से किसी के  नहीं थे। सेना ने उन को भी निशान बनाया जिसकी हकीकत एक बार नहीं बहुत बार मीडिया में आ चुकी है। इसके बावजूद इण्डिया टुडे बताता है कि जब इंदिरा गांधी को खबर मिली कि बहुत बड़ी संख्या में सैनिक और असैनिक मरे गए हैं तो इंदिरा गांधी के मुँह से निकला"हे भगवान"। इसके साथ ही स्व्तंत्र भारत के इस इतने बड़े युद्ध के वास्तविक कारणों पर पर्दा डालने ले नापाक प्रयास में इण्डिया टुडे इसे जनरल शाहबेग सिंह का एक व्यक्तिगत बदला बताता है।  पत्रिका ने लिखा है-"सेना के नायक रह चुके शाबेग ने सेना से बहुत महंगा बदला लिया।"
फिर भी इस पत्रिका को बड़े पैमाने पर पढ़ा जाना चाहिए ख़ास तौर पर सिख सियासत और सिख इतिहास से जुड़े कलमकारों और पाठकों दोनों को।  तभी इस तरह साज़िशी कलमों का जवाब कलम से दिया जा सकेगा। आपके विचारों की इंतज़ार बनी रहेगी। चुनावी मौसम है इसलिए इस तरह के बहुत से नए मामले सामने आएंगे सनसनी के आवरण मेंलपेटे हुए तांकि आम लोगों को दाल रोटी का सच भूला रहे, क्रांति का सच भूला रहे--सियासतदानों के घोटालों का सच भूला रहे---और लोग उलझे रहे साम्प्रदायिक टकरावों में। इस तरह के मामले जनता का ध्यान असली सच से हटाने की साज़िश मात्र हैं। -रेकटर कथूरिया 
ब्लू स्टार को जनरल शाहबेग का महंगा बदला बताया इण्डिया टूडे ने 

Sunday, January 12, 2014

FM Gold: खबर गर्म है में पहुंचे गौतम जालंधरी

Sun, Jan 12, 2014 at 6:14 PM
खबर गर्म है के जरिये हुए श्रौताओं से रूबरू:कई मुद्दों पर की चर्चा 
लुधियाना: 12 जनवरी 2014: (रेकटर कथूरिया//मीडिया स्क्रीन):
वरिष्ठ पत्रकार एवं ऑन लाइन न्यूज पार्टल नया शिखर के मुखय संपादक गौतम जालंधरी प्रसार भारती के एफएम गोल्ड में हर रविवार सुबह साढ़े नौ बजे प्रसारित कार्यक्रम खबर गर्म है, में विशेष रूप से शामिल हुए। खबर गर्म हैअकाशवाणी लुधियाना एफएम गोल्ड का एक बेहद संजीदा कार्यक्रम है तथा श्रौताओं में काफी पसंद किया जाता है। कार्यक्रम की शुरूआत में संचालक नवयेश नवराही ने पत्रकार जालंधरी को श्रौताओं से रूबरू करवाते हुए आज विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित आम आदमी पाटी, एनआरआई स्म्मेलन व देवयानी प्रकरण सहित अन्य बड़ी खबरों पर विस्तारपूर्वक चर्चा की। श्रौताओं से रूबरू होते हुए पत्रकार जालंधरी ने इन खबरों पर अपना नजरिया व इसका आने वाले समय में प्रभाव के बारे में गहराई से बताया। इससे पहले स्टूडियों आने पर एफएम स्टाफ ने पत्रकार जालंधरी का स्वागत किया। 

Monday, December 9, 2013

छत्तीससगढ़ में पत्रकार कल्याण कोष

मीडिया स्क्रीन में हम मीडिया से जुड़ी जानकारी अक्सर देते रहते हैं। इसी सिलसिले में इस बार प्रस्तुत है छत्तीसगढ़ में जारी पत्रकार कल्याण कोष  विवरण। इसे आप छत्तीसगढ़ मेल में भी पढ़ सकते हैं। 
छत्तीसगढ़ पत्रकार कल्याण कोष नियम 2001
छत्तीसगढ़ राजपत्र
प्राधिकार से प्रकाशित  


क्रमांक 17,   रायपुर, शुक्रवार, दिनांक 27 अप्रैल 2001 - वैशाख 7, शक 1923

छत्तीसगढ़ पत्रकार कल्याण कोष नियम 2001
जनसम्पर्क विभाग
मंत्रालय, डी.के.एस. भवन, रायपुर
रायपुर, दिनांक 27 अप्रैल 2001

   क्रमांक 1176 एच./जसंसं/2001.-छत्तीसगढ़ पत्रकार कल्याण समिति के विधान के अधीन छत्तीसगढ़ पत्रकार कल्याण कोष के उद्देश्यों को पूरा करने के लिये प्रबंध समिति अपने कार्य संचालन के लिए नीचे दी गयी नियमावली बनाती है, अर्थात :-

   नियम (1) नाम-यह नियम छत्तीसगढ़ पत्रकार कल्याण कोष नियम 2001 कहलायेंगे.

   नियम (2) पत्रकारों के कल्याण के लिये शासन द्वारा आबंटित राशि का वितरण इन नियमों के अनुसार किया जायेगा.

   नियम (3) पत्रकार कल्याण कोष का आहरण और संवितरण जनसंपर्क संचालक अथवा उनके द्वारा  नामजद अधिकारी द्वारा किया जायेगा.

   नियम (4) पात्रता-छत्तीसगढ़ के श्रमजीवी पत्रकार और ऐसे पत्रकार जिन्हें समिति सहायता के लिये पात्र समझती है और उन पर आश्रित परिवार के सदस्य इस निधि से सहायता पाने के पात्र होंगें.

   नियम (5) सहायता निम्नलिखिल स्थितियों में दी जा सकेगी :-

   (क) नियम 4 से उल्लिखित पत्रकार अथवा उनके परिवार के सदस्यों को लंबी अथवा गंभीर बीमारी या दुर्घटना में आहत होने पर इलाज के लिये.

   (ख) किसी दैवी विपत्ति से पीड़ित होने पर.

   (ग) पत्रकारिता के क्षेत्र में कम से कम 30 वर्ष की सेवा करने के बाद वृध्दावस्था में विपन्नता के कारण.

   (घ) नियम (4) में उल्लेखित श्रमजीवी पत्रकार की मृत्यु हो जाने पर यदि उस परिवार के पास आजीविका का कोई साधन न हो.

नोट - (परिवार से आशय यथास्थिति पति/पत्नी आश्रित  माता-पिता और नाबालिक बच्चों से है)

   नियम (6) सहायता की राशि-पत्रकार कल्याण निधि से एक वर्ष में एक व्यक्ति को एक बार कम से कम 5,000 रूपए एवं अधिकतम 50,000 (पचास हजार) रूपये की सहायता दी जा सकेगी.
टीप -विशेष परिस्थितियों में जनसंपर्क संचालक को यह अधिकार होगा कि समिति की दो बैठकों के बीच के अंतराल में वे इस सीमा तक सहायता स्वीकृत कर सकें. ऐसे प्रकरण समिति की अगली बैठक में कार्योत्तर अनुमोदन के लिये रखे जाएंगे.

   नियम (7) सहायता प्राप्त करने का तरीका - (क) सहायता प्राप्त करने के लिये परिशिष्ट एक में निर्धारित प्रपत्र पर संबंधित श्रमजीवी पत्रकार/परिवार के सदस्य को आवेदन करना होगा.

   (ख) लेकिन यदि अशक्त होने के कारण सहायता प्राप्त करने के इच्छुक पत्रकार/परिवार के सदस्य निर्धारित प्रपत्र में आवेदन नहीं भर सकें तो उन्हें निकट से जानने वाले दो पत्रकार उनकी ओर से आवेदन कर सकेंगे.

   (ग) विशेष परिस्थितियों में समिति स्वविवेक से सहायता स्वीकृत कर सकेगी.

टीप :- नियम 6 की टीप के अधीन नियम 7 क ख ग के अंतर्गत जनसंपर्क संचालक द्वारा सहायता सव्ीकृत की जा सकेगी.

   नियम (8)-प्राप्त आवेदन पत्रों पर समिति का निर्णय अंतिम होगा.

   नियम (9)  व्याख्या-नियम की व्याख्या के संबंध में शासन का निर्णय अंतिम होगा.

छत्तीसगढ़ के राज्यपाल के नाम से तथा आदेशानुसार
सी.के. खेतान, अपर सचिव

प्रपत्र परिशिष्ट एक
आवेदन - पत्र
(1) आवेदक का  पूरा नाम
(2) आवेदक के पिता/पति का नाम
(3) आवेदक का पता
(4) पत्रकारिता के क्षेत्र में आवेदक की सेवा की संक्षिप्त जानकारी

नोट- आश्रितों द्वारा आवेदन किये जाने पर दिवंगत पत्रकार की सेवाओं का संक्षिप्त विवरण दिया जाये.
(5) समस्त स्रोतों से आवेदक /आश्रितों की आय
(6) परिवार के आश्रित सदस्यों के बारे में निम्नानुसार जानकारी दें :-

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   क्र.        नाम        आयु        संबंध        सभी स्रोतों से वार्षिक आय
   (1)        (2)        (3)        (4)            (5)

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(7) अपने/पति/पत्नी अथवा परिवार के आश्रित सदस्यों के पास, यदि कोई हो तो, अचल संपत्ति का विवरण और उससे होने वाली वार्षिक आय.
(8) प्रयोजन जिसके लिये सहायता अपेक्षित है.
(9) यदि अन्य किसी कोष से सहायता मिली हो तो उसकी जानकारी.
(10) अन्य जानकारी ..........................................................
(11) स्थान और दिनांक ...................................................
 

जहां श्रमजीवी पत्रकार/आश्रित खुद आवेदन नहीं करते एवं उसके बदले उन्हें जानने वाले दो पत्रकार आवेदन करते हैं, तो दोनों के हस्ताक्षर होंगे और बिंदु 10 के तहत यह स्पष्ट बतायेंगे कि किन परिस्थितियों में आवेदक/आश्रित आवेदन नहीं कर रहे हैं।

नोट- आवेदन प्रपत्र में निर्दिष्ट सभी बिंदुओं पर सुवाच्च अक्षरों में पूरी जानकारी दी जानी चाहिए
हस्ताक्षर

(आवेदक का पूरा नाम)

Date:  5 March 2007 - 6:52pm         

छत्तीससगढ़ में पत्रकार कल्याण कोष 

Friday, October 11, 2013

"इंडोनेशिया पड़ोस में सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी"

10-अक्टूबर-2013 19:24 IST
इंडोनेशिया के कोम्पास समाचार पत्र को प्रधानमंत्री का साक्षात्कार
प्र. भारत और इंडोनेशिया के बीच पुरानी सभ्यता से संबंध चले आ रहे हैं और हम

रणनीतिक साझेदार हैं। आपकी यात्रा से इंडोनेशिया को क्या मुख्य उम्मीदें हैं ?

उत्तर . हम इंडोनेशिया को अपने पड़ोस में सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी और भारत की पूर्व की ओर देखो नीति के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में मानते हैं। हमारे दोनों देश दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाले देशों में भी शामिल हैं। हम दोनों बहुलवादी लोकतंत्र हैं जिनके समुद्री सुरक्षा और शांतिपूर्ण, स्थिर और समृद्ध एशिया के उद्भव सहित अनेक साझा हित हैं।  हमारे सभ्यतागत संबंधों पर आधारित जो सिर्फ कला और संस्कृति का ही संगम नहीं है बल्कि विचारों , मूल्यों और सामाजिक लोकाचार का एक संगम है, इसमें व्यापार और निवेश सहित अनेक व्यापक क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। रामायण और महाभारत , प्राचीन मंदिरों और स्तूप की वास्तुकला , डिजाइन और हथकरघा वस्त्रों की रूपांकनों में समानता , बुजुर्गों और बुद्धिमानों के लिए सम्मान, सब हमारी साझा विरासत हैं। हमारे दोनों देशों के नेताओं ने भी हमारे अपने स्वतंत्रता संघर्ष , एफ्रो एशियाई एकजुटता के दौरान अपने अनुभवों को साझा किया और गुट निरपेक्ष आंदोलन का नेतृत्व किया।

     हमारे संबंध आज मजबूत , बहुआयामी सामरिक साझेदारी के रूप में निखरे हैं।  हम संयुक्त राष्ट्र , गुटनिरपेक्ष आंदोलन , जी -20 , ईएएस और अन्य आसियान तंत्र , आईओआर-एआरसी तथा विश्व व्यापार संगठन जैसे  क्षेत्रीय , बहुपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मिलकर काम करते हैं।  2011 में राष्ट्रपति युधोयोनो की भारत यात्रा से हमारे संबंधों को अधिक गति मिली। मैं अपनी यात्रा से मजबूत और प्रगाढ़ सामरिक संबंधों, व्यापार और निवेश संबंधों को मजबूत बनाने  और लोगों से लोगों के बीच संबंधों को व्यापक बनाने की उम्मीद कर रहा हूं।

प्र. भारत और इंडोनेशिया के बीच व्यापार 20 अरब डॉलर का है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी के संदर्भ में, आप क्या सोचते हैं कि हमारे देशों के बीच व्यापार/निवेश संबंधों पर कैसे सुधार किया जा सकता है ? एक उपयोगी भारत-इंडोनेशिया भागीदारी के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र कौन से हैं?

उत्तर . द्विपक्षीय व्यापार में रुझान सकारात्मक हैं, हालांकि वैश्विक वित्तीय स्थिति के कारण व्यापार में 2012-13 में मामूली गिरावट देखी गई  और 20 अरब डॉलर का हुआ। हमें 2015 तक 25 अरब अमरीकी डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार लक्ष्य को हासिल करने का पूरा भरोसा है। हमें विश्वास है कि हमारी क्षमता इससे बहुत अधिक है।

     हमें अपने व्यापार में विविधता लानी चाहिए, व्यापार और निवेश करने के लिए बाधाओं को सुलझाने और दोनों दिशाओं में निवेश के उच्च प्रवाह को प्रोत्साहित करना चाहिए।  द्विपक्षीय व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते (सीईसीए) से पर दोनों पक्षों के लिए द्वार खुलेंगे और वृद्धि को मजबूत प्रोत्साहन मिलेगा।

     आसियान भारत सेवाओं और निवेश समझौते पर शीघ्र हस्ताक्षर करने, 2015 के अंत तक क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी पर वार्ता (आरसीइपी) और आसियान आर्थिक समुदाय के रूप में उभरने से  भी इंडोनेशिया के साथ हमारे व्यापार एवं निवेश संबंधों पर सकारात्मक असर होगा।

     इंडोनेशिया से हमारा आयात बड़े पैमाने पर होता रहा है जो विविधतापूर्ण चाहिए। भारत कृषि उत्पाद, ऑटोमोबाइल घटकों , इंजीनियरिंग सामान , आईटी , फार्मा, मांस और मांस उत्पादों तथा जैव प्रौद्योगिकी उत्पादों सहित माल की एक विस्तृत श्रृंखला के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत हो सकता है।

     भारतीय कंपनियां इंडोनेशिया को आकर्षक निवेश राष्ट्र के रूप में देखती हैं।  हम पहले ही आपके देश में बुनियादी सुविधाओं , बिजली , कपड़ा , इस्पात , मोटर वाहन , खनन , बैंकिंग और एफएमसीजी के निर्माण में महत्वपूर्ण निवेश कर चुके हैं।   टाटा , बिड़ला , रिलायंस , एसबीआई , और कई अन्य सहित सभी प्रमुख भारतीय कंपनियों की इंडोनेशिया में उपस्थिति है।  इसकी तुलना में भारत में इंडोनेशिया के निवेश अपेक्षाकृत सीमित हैं। मैं इंडोनेशियाई कंपनियों को आमंत्रित करता हूं कि वे उन भारी निवेश के अवसरों को देखें जो भारत बुनियादी ढांचे, रसद , आतिथ्य सत्कार और सेवा क्षेत्रों में उपलब्ध कराता है।  यह दोनों देशों के आपसी हित में होगा यदि इंडोनेशिया शिक्षा, स्वास्थ्य , दवाइयों और बंदरगाह के विकास के क्षेत्र में भारतीय निवेश को आमंत्रित करे।

प्र. आपकी यात्रा के दौरान कौन से मुख्य करारों / समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर होने जा रहे है ?

उत्तर . दोनों पक्षों ने अनेक समझौता ज्ञापन तैयार किए हैं।  उनमें से कुछ सरकारी मंत्रालयों और एजेंसियों के बीच हैं  और अन्य शिक्षा और प्रशिक्षण संस्थानों के बीच हैं।  ये हमारे संबंध के बहुआयामी चरित्र को प्रतिबिंबित करेंगे।

प्र. आसियान समुदाय 2015 में अस्तित्व में आ जाएगा।  भारत ने दिसंबर, 2012 में भारत आसियान स्मारक शिखर सम्मेलन की सफल मेजबानी की। आप आसियान समुदाय में भारत की क्या भूमिका देखते हैं?

उत्तर . मैं ब्रुनेई से सीधे जकार्ता आ रहा हूं जहां हमने 11 वां आसियान भारत शिखर सम्मेलन आयोजित किया। मैंने कई अवसरों पर कहा है कि आसियान के साथ हमारे संबंध हमारी पूर्व की ओर देखो नीति पर आधारित हैं। हम आसियान सहयोग और एकीकरण में प्रगति और व्यापक क्षेत्रीय सहयोग और एकीकरण की कोशिश में आसियान नेतृत्व की प्रशंसा करते हैं। हमें दृढ़ विश्वास है कि इस प्रक्रिया में आसियान की केन्द्रीयता सहकारी , नियम आधारित खुली और समावेशी क्षेत्रीय संरचना के विकास के लिए महत्वपूर्ण है।

     हम आसियान और आसियान केंद्रित प्रक्रियाओं में इंडोनेशिया के नेतृत्व की भूमिका को महत्व देते हैं।  हम पिछले साल दिसंबर में नई दिल्ली में आयोजित स्मारक शिखर सम्मेलन के दौरान अपने संबंधों को सामरिक भागीदारी के स्तर तक लाए। आसियान के साथ हमारे संबंधों में  राजनीतिक , सुरक्षा, आर्थिक और सामाजिक, सांस्कृतिक सहयोग के व्यापक क्षेत्र शामिल हैं।

     हम 2015 तक आसियान समुदाय के विकास की बेसब्री से उम्मीद कर रहे हैं और हर संभव सहायता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। हमारा ध्यान क्षमता निर्माण पर और कनेक्टिविटी पर रहा है ।  हमने कई उद्यमिता विकास केंद्र, अंग्रेजी भाषा प्रशिक्षण के लिए केंद्र और सीएलएमवी देशों में आइटी केंद्र और व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना की है। हम आसियान देशों को 1000 से अधिक छात्रवृत्ति प्रदान करते हैं।  हम भारत और आसियान को और करीब लाने के लिए भारत - म्यांमार- थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग के निर्माण की अपनी पहल के जरिए और कनेक्टिविटी पर आसियान मास्टर प्लान को समर्थन दे के लिए सक्रिय रूप से भौतिक और संस्थागत कनेक्टिविटी की पहल में लगे हुए हैं।

प्र. चीन एशिया प्रशांत क्षेत्र में प्रमुख भागीदार बन गया है।  इस संदर्भ में आप एशिया प्रशांत क्षेत्र में भारत की भूमिका को कैसे देखते हैं? एशिया प्रशांत क्षेत्र में क्षेत्रीय विवादों, सीमा मुद्दों और जापान एवं चीन और भारत एवं चीन के बीच अन्य मुद्दों के बीच कैसे मजबूत संबंध बन सकता है ?

उत्तर . भारत और चीन दो सभ्यतागत पड़ोसी हैं। आर्थिक सहयोग हमारे संबंधों का बहुत महत्वपूर्ण भाग है और यह हमारी दो अर्थव्यवस्थाओं की विकास क्षमता को अधिक से अधिक सहयोग के लिए इंजन प्रदान कर सकता है और यह एशिया और उससे परे भी समृद्धि में योगदान कर सकता है।  हमारे बीच मतभेद हैं लेकिन हमने लगातार एक परिपक्व और पारस्परिक रूप से लाभप्रद संबंधों का निर्माण किया है।  हमने अपनी सीमाओं पर शांति और सौहार्द बनाए रखा है। हमने क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर सहयोग किया है।

     मैं मानता हूं कि आज दुनिया में अपनी जरूरतों और आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए सभी पक्षों से सहकारी प्रयासों के लिए पर्याप्त जगह है।  इस सदी में, जब वैश्विक और अंतर - निर्भरता क्षेत्रीय निर्भरता तेजी से बढ़ रही हैं तब सभी देशों की शांति, सुरक्षा और समृद्धि के लिए  सहयोग , परामर्श और समन्वय , शांतिपूर्ण बातचीत के जरिए मतभेद की अंतरराष्ट्रीय कानून और संकल्प के रूप में भी सम्मान अपरिहार्य हैं।  क्षेत्रीय मंचा इस प्रक्रिया में उपयोगी भूमिका निभा सकते हैं।  इसलिए हम पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन , आसियान क्षेत्रीय मंच , एडीएमएम $ और क्षेत्र में अन्य सहकारी व्यवस्थाओं कोबहुत महत्वपूर्ण मानते हैं।  क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी भी हमारे क्षेत्र के लिए प्रमुख पहल है।

प्र. भारतीय अर्थव्यवस्था उच्च वृद्धि दर से नीचे आ रही है। ज्यादातर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करने वाली वैश्विक मंदी के अलावा भारतीय अर्थव्यवस्था के सुस्त प्रदर्शन के लिए कौन से मुख्य कारण हैं ?

उत्तर . आप पिछले साल के आर्थिक प्रदर्शन को एक तरफ रख दें , तो पिछले नौ वर्षों में , भारतीय अर्थव्यवस्था प्रतिवर्ष लगभग 8 प्रतिशत की औसत वार्षिक दर से बढ़ी है।  यह किसी भी पिछले एक दशक में भारत द्वारा हासिल की गई उच्चतम वृद्धि दर है।  पिछले साल हमारी वृद्धि दर यूरो क्षेत्र और अमरीका एवं जापान में धीमी गति से वृद्धि सहित , आंशिक रूप क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी के कारण घटकर  5 प्रतिशत पर आ गई है।  भारत अपनी तेल की आवश्यकता का करीब 80 प्रतिशत आयात करता है और तेल की बढ़ती कीमतों एवं निर्यात घटने ने हमारे व्यापार संतुलन को चोट पहुँचाई है। भारत में कुछ आपूर्ति संबंधी बाधाएं भी हैं जिनसे हम नीति और प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से निपट रहे हैं।

     हालांकि, हमारे आर्थिक बुनियादी कारक मजबूत बने हुए हैं।  हमारी बचत और निवेश दर अब भी सकल घरेलू उत्पाद के 30 प्रतिशत से अधिक है। अपने पूंजी उत्पादन अनुपात को देखते हुए हम मध्यम अवधि में प्रति वर्ष 8 प्रतिशत की वृद्धि दर को बहाल कर सकते हैं।  हमने घरेलू निवेश को बढ़ावा देने के लिए और अधिक विदेशी निवेश को आकर्षित करने, वित्तीय क्षेत्र को मजबूत बनाने तथा कर व्यवस्था में सुधार लाने एवं उसे सरल करने के लिए अनेक उपाय किए हैं।  हमने अपनी आबादी के कमजोर वर्गों के लिए पात्रता कार्यक्रमों की एक विस्तृत रेंज शुरू की है जिसके लिए सरकार के विशेष ध्यान की जरूरत है।  हम राजकोषीय और चालू खाता घाटे से उद्देश्यपूर्ण ढंग से निपट रहे हैं। इसके साथ ही, हम अपनी उदार  व्यापार व्यवस्था बनाए रखेंगे। मुझे विश्वास है कि इन उपायों का असर जल्द दिखाई देगा।

प्र. भारतीय रुपये में तेज गिरावट चिंता का विषय रहा है। इंडोनेशियाई रुपिया भी गिरा है।  हमें कौन सी सावधानियों /उपायों की जरूरत है जो विकासशील देश मुद्रा में स्थिरता लाने के लिए कर सकते हैं?

उत्तर . उभरती अर्थव्यवस्थाएं  लंबे समय से वैश्विक आर्थिक संकट और इसके पटरी पर आने की गति असमान एवं अनिश्चित रहने से प्रभावित हुई हैं। हमारे निर्यात में और निवेश की आवक में मंदी ने वृद्धि और भुगतान संतुलन को प्रभावित किया है।  भारत और इंडोनेशिया जी -20 के हिस्सा हैं। नीतियों पर अंतरराष्ट्रीय समन्वय और संचार बढ़ाने की जरूरत पर सितंबर में सेंट पीटर्सबर्ग में जी -20 शिखर सम्मेलन में बल दिया गया था। निरंतर वैश्विक आर्थिक सुधार से उभरती अर्थव्यवस्थाओं को फायदा होगा।

     हालांकि, हम में से प्रत्येक को भी, आर्थिक विकास में तेजी लाने के लिए विदेशी निवेश आकर्षित करने और निर्यात को बढ़ावा देने , मुद्रा अवमूल्यन से उत्पन्न प्रतिस्पर्धा से लाभ उठाने सहित उपयुक्त राष्ट्रीय कदम उठाने की जरूरत है।

प्र. भारत और इंडोनेशिया में 2014 के चुनावों के लिए कमर कस रहे हैं । वे कौन से मुख्य मद्दें हैं जो भारत में मतदाताओं को प्रभावित करेंगे ?

उत्तर . हम दोनों ही मजबूत लोकतंत्र हैं और चुनाव दोनों के जीवन का एक हिस्सा है।  आज के भारत में करीब 800 मिलियन  मतदाताओं शिक्षित है और राजनीतिक रूप से अच्छी तरह से वाकिफ हैं।  कई युवा हैं और ऊर्जा से भरपूर हैं, उद्यमी और महत्वाकांक्षा से भरे हुए हैं।  उन्हें अवसरों , रोजगार, शिक्षा , कौशल विकास , भोजन और स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच के जरिए अपने और अपने बच्चों के लिए बेहतर जीवन की तलाश है।  ये सभी मुद्दे आने वाले चुनावों में छाए रहने की उम्मीद है।

प्र. भारत विशेष रूप से व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों , प्रशिक्षण और शिक्षा की स्थापना में , विकास भागीदारी में बड़ी भूमिका निभा रहा है। इसे और अधिक प्रभावी बनाने के लिए आपकी नजर में और क्या किया जा सकता है ?

उत्तर . भारत विकासशील देश है, यह राष्ट्रीय विकास और लोगों के जीवन स्तर में सुधार पर केंद्रित है। साथ ही,  हम अपने अनुभव , विशेषज्ञता और संसाधनों को साझा करके जिस हद तक भी हम कर सकते हैं, अन्य देशों के विकास के प्रयासों में भागीदार होने के लिए खुश हैं।  मानव संसाधन किसी देश की सफलता की कुंजी है। इसीलिए हमने अपने विकास के लिए साझेदारी में शिक्षा , प्रशिक्षण और संस्थाओं पर जोर दिया है। हम अपने साथी देशों में बुनियादी ढांचे के विकास में मामूली योगदान भी करते हैं। उदाहरण के लिए,  हम अफ्रीकी देशों को 9.5 अरब अमरीकी डॉलर की रियायती सहायता के लिए प्रतिबद्ध हैं।

     वर्तमान में, हम विभिन्न योजनाओं के तहत इंडोनेशिया के छात्रों और अधिकारियों को करीब 100 छात्रवृत्तियां प्रदान करते हैं और इंडोनेशिया भी इस तरह की छात्रवृत्तियां प्रदान करता है।  हमने भी इंडोनेशिया के विश्वविद्यालयों में भारतीय अध्ययन के लिए चेयर का गठन किया है।  हर साल, हम कई छात्रों, शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों , इंडोनेशिया से विद्वानों और मीडिया के लोगों को भारत की यात्रा करने के लिए आमंत्रित करते हैं। हमने  इंडोनेशिया में जकार्ता और बांदा आचे में दो वीटीसी की स्थापना की है जो अच्छा काम कर रहे हैं और हम पापुआ में इसी तरह का एक केंद्र स्थापित करने के लिए तैयार हैं। हमारे विदेश मंत्रालय में हाल ही में स्थापित विकास भागीदारी एजेंसी हमारे अंतरराष्ट्रीय विकास भागीदारी के प्रयासों के लिए नई दृष्टि प्रदान कर रही है।

     मुझे विश्वास है कि भारत और इंडोनेशिया के रूप में ऐसी गतिशील उभरती अर्थव्यवस्थाओं को अपने विकास के अनुभव और विशेषज्ञता को साझा करना चाहिए क्योंकि यह अधिक संवेदनशील क्षेत्रों और दुनिया के देशों में आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में अधिक प्रासंगिक और प्रभावी हो सकता है। (PIB)

वि कासौटिया/प्रदीप/सागर-6581