Saturday, April 3, 2021

बंधुआ मजदूरों के मुद्दे पर पंजाब के किसानों को दोषी नहीं कहा

 03-अप्रैल-2021 16:16 IST

मीडिया में छपी रिपोर्टों को भ्रामक कहा 


नई दिल्ली
: 03 अप्रैल 2021: (पीआईबी//पंजाब स्क्रीन)::

पंजाब के सीमावर्ती गाँवों में बंधुआ मजदूरों के मुद्दे पर पंजाब के किसानों को दोषी नहीं ठहराया गया। गृह मंत्रालय ने केवल ‘‘मानव तस्करी सिंडिकेट’’ के खिलाफ उचित कार्रवाई की मांग की है। 

मीडिया के एक वर्ग ने गलत तरीके से बताया है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पंजाब सरकार को पत्र लिखकर राज्य के किसानों के खिलाफ कथित रूप से गंभीर आरोप लगाए हैं। ये समाचार रिपोर्ट भ्रामक हैं और पंजाब के चार संवेदनशील सीमावर्ती जिलों में विगत दो वर्षों की अवधि में उभरने वाली सामाजिक-आर्थिक समस्या के बारे में एक साधारण अवलोकन की विकृत और अतिसंपादकीय राय प्रस्तुत करते हैं, जिसे संबंधित सीएपीएफ द्वारा इस मंत्रालय के संज्ञान में लाया गया है। गृह मंत्रालय hपहले तो इस मंत्रालय द्वारा किसी विशेष राज्य या राज्यों को जारी किए गए पत्र के लिए कोई प्रयोजन नहीं बताया जा सकता है क्योंकि यह कानून और व्यवस्था के मुद्दों पर नियमित संचार का हिस्सा है। सभी राज्यों में एक संवेदनशील अभ्यास करने के अनुरोध के साथ यह पत्र केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्रालय के सचिव को भी भेजा गया है, जिसका उद्देश्य कमजोर पीड़ितों का शोषण करने वाले असामाजिक तत्वों पर नकेल कसना है।

दूसरे, पत्र के बारे में कुछ तथ्‍यों की पूरी तरह से असंबंधित संदर्भ से तुलना की गई है ताकि यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि गृह मंत्रालय ने पंजाब के किसानों के खिलाफ "गंभीर आरोप" लगाए हैं और इसे वर्तमान में चल रहे किसान आंदोलन से भी जोड़ा गया है। पत्र में स्पष्ट रूप से और केवल यह कहा गया है कि "मानव तस्करी सिंडिकेट्स" द्वारा मजदूरों को किराए पर लिया जाता है और अधिक श्रम को निकालने के लिए ड्रग्स के लालच द्वारा उनके "शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य" को प्रभावित करने के साथ- साथ उनके साथ "अमानवीय व्यवहार किया जाता है"।

गृह मंत्रालय ने तेजी से बढती इस समस्या की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार से "इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए उपयुक्त उपाय करने" का केवल अनुरोध किया है।

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एनडब्‍लू/आरके/पीके/एडी/डीडीडी

Tuesday, January 19, 2021

मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी से पूरा महिला वर्ग भी हुआ आहत

   सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के नाम एक महिला का पत्र 


मीडिया का एक बड़ा हिस्सा आज भी संसाधनों के मामले में सचमुच बहुत बड़ा है। चाहे यह बड़प्पन गोदी में बैठ कर ही मिला हो। इसी के चलते मीडिया के इस हिस्से को भरम हो जाता है कि शायद हम झूठ को सच और सच को झूठ बना कर दिखा सकते हैं। इस भरम को जनवादी मीडिया अपने सीमित साधनों-संसाधनों से तोड़ता ही रहता है। इसी सिलसिले को आगे बढ़ा रहा है जन चौक। इस पत्र ने एक बहादर महिला का एक पत्र भी प्रकाशित किया है।  जनचौक की टिप्पणी सहित इस पत्र को यहाँ भी साभार प्रकाशित किया जा रहा है। -सम्पादक:मीडिया स्क्रीन 

जन चौक सम्पादक ने भी साफ़ शब्दों में कहा है कि किसान आंदोलन में शामिल महिलाओं को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी ने पूरे देश को आहत किया है। खास कर महिलाओं को इससे गहरी पीड़ा हुई है। और लोकतांत्रिक देश में जहां हर नागरिक का बराबर का अधिकार है वहां महिलाओं को कमतर देखने का नजरिया ही बेहद परेशान करने वाला है। यह बात कोई और करता तो एकबारगी सोचा भी जा सकता था लेकिन जब देश की सर्वोच्च अदालत का मुखिया जिसके ऊपर इस देश के संविधान की रक्षा का कार्यभार है, ऐसा करता है तो मामला बेहद गंभीर हो जाता है। पढ़ी-लिखी महिलाओं के एक बड़े हिस्से ने इसका प्रतिकार किया है। और अलग-अलग तरीके से यह सिलसिला अभी भी जारी है। इतिहास की अध्यापिका और सामाजिक कार्यकर्ता आशु वर्मा ने इस मसले पर सीधे मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा है। पेश है उनका पूरा पत्र-संपादक (जन चौक) 

पत्र लिखने वाली महिला आशु वर्मा 
देश की सबसे बड़ी अदालत के महामहिम, ये आपने क्या कह दिया? ये आपने क्यों कहा? किसने आपको यह अधिकार दिया महामहिम ? आप तो संविधान की रक्षा के लिए हैं, आप तो कानूनों की सही रोशनी में व्याख्या के लिए हैं। आपसे तो उम्मीद की जाती है कि आप दबे कुचले, सताए हुए, हाशिये के लोगों, की बात सुनेंगे, उनके बिना सुनाये ही उनकी पीड़ा समझ जायेंगे, उसे संज्ञान में लेंगे और उनके लिये बेहतर कानूनों की जमीन तैयार करेंगे।

महामहिम, आप से बेहतर कौन यह जानता है कि आलोचना, आन्दोलन और विरोध लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण अवयव है। वह तो लोकतंत्र की आत्मा है। उसी से लोकतंत्र लोकतंत्र बना रहता है। और जब किसी वर्गीय आन्दोलन में उस वर्ग की आधी आबादी यानि उस वर्ग की महिलाओं की भागेदारी भारी संख्या में हो रही हो तो मामला जरूर संगीन होगा, यह तो आप भी समझते होंगे। अब तक तो आप समझ ही गए होंगे कि मैं किस विषय पर बात कर रही हूँ।

आपने किसान आन्दोलन में शामिल महिला किसानों के बारे में कह दिया कि इन्हें आन्दोलन में नहीं शामिल होना चाहिए। इन्हें वहां से हटाया जाना चाहिए। आपने ऐसा कैसे कह दिया? महोदय, आपके इस सुझाव से मैं बेहद आहत और क्रुद्ध हूँ। आखिर न्यायापालिका के संरक्षक ने भी यही मान लिया कि ये ‘सामान्य महिलाएं’ हैं जो अपने-अपने पतियों के साथ की अर्धांगनी होने का फर्ज निभाने आई हैं। अधिकांश लोग तो यह मानते ही हैं कि ‘महिलाएं किसान नहीं होतीं’। लेकिन अफ़सोस कि आपने भी ऐसा ही माना।

आपने तो पूरा जीवन संविधान की सेवा में बिताया है। इस लम्बे न्यायिक सफ़र में तमाम समुदायों की तकलीफों भरी, न्याय मांगती याचिकाएं आपकी नजरों के सामने से गुजरी होंगी। आप से तो उम्मीद की जाती है कि ‘थोड़ा कहा ज्यादा समझना’। आप तो यह जानते ही होंगे की खेती का 75% काम महिलाएं करती हैं। अधिकांश के मन में उनके श्रम को पहचान नहीं दिए जाने का क्षोभ और गुस्सा होता है। भले ही सभी उसे व्यक्त न कर पाती हों। मैं यह सोचती थी कि संसद में बैठे लोग तो इस आकांक्षा को न तो समझ पाते हैं और न ही महसूस कर पाते हैं पर आप, एक लोकतांत्रिक संविधान, जिसकी आत्मा में समानता का मूल्य बसा है, उस संविधान के रक्षक हैं, आप कैसे इसे नहीं समझ पाए कि यहाँ आई महिलाएं सिर्फ पति का साथ निभाने नहीं आई हैं (और अगर आई भी है तो क्या? ये उनकी इच्छा और हक है) महोदय वे महिलाएं अपनी किसान होने की पहचान के नाते आई हैं, इस अहसास के साथ आई हैं कि वे किसान हैं।

वे समझ रही हैं कि किसानी कितना तकलीफदेह पेशा हो गया है। देश के धान्य-कोठारों को भरने में उनका भी पसीना बहता है। उनमें से तमाम के घरों में किसानी पर छाये संकट के कारण मौतें हुई हैं। उनके भी प्रियजनों ने इन्हीं मुसीबतों के कारण आत्महत्याएं की हैं। उनकी आत्महत्याओं के बाद कर्जे की वसूली के लिये आये बैंकों के आलिमों का यही सामना करती हैं या कर रही हैं। अधिकाँश को तो पति की मौत के बाद मुआवजा भी नहीं मिलता क्योंकि जमीन के कागजातों पर उनका नाम नहीं होता क्योंकि उन्हें किसान नहीं माना जाता। महामहिम, ये सारी बातें आपको तो पता ही होंगी। मेरा आपको बताना शोभा नहीं देता। आप बताइये कि क्या वे किसान नहीं हैं?

महोदय, ये महिलाएं खेती के तौर तरीकों पर किसी कृषि विश्वविद्यालय में पढ़ा सकती हैं, कृषि पर छाये संकट, उस संकट के आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-पर्यावरण और धार्मिक पहलुओं के रेशे-रेशे पर किसी मीडिया हाउस में घंटों चर्चा कर सकती हैं क्योंकि खेती ही उनका जीवन है, उसी से उनका वजूद है।

महोदय मैं तो सोचती थी कि लोकतंत्र के शीर्ष पर होने के कारण जीवन के हर क्षेत्र में महिलाओं की बढ़ती मौजूदगी और हिस्सेदारी आपको तसल्ली देती होगी, आश्वस्त करती होगी। इसीलिये किसान आन्दोलन में उनकी मौजूदगी और उनकी स्वायत्तता आपको भा रही होगी। उनकी गंभीरता और आत्मविश्वास से आप खुश हो रहे होंगे। राजनीतिक रैलियों में ट्रक में भर कर आई महिलाओं और डेढ़ महीने से प्रदर्शन पर बैठीं इन किसान महिलाओं में आप अंतर कर पा रहे होंगे। खबरें तो आप तक भी पहुँच ही होंगी। आप समझ ही गए होंगे कि ये कुछ कहना चाहती हैं। ये खेती पर छाये संकट और अपनी पहचान के लिए भी आई हैं। आपको उन्हें सुनना चाहिए था महामहिम, यह उनका हक है। अपनी पहचान की उनकी लड़ाई का संज्ञान लेना चाहिए था। लेकिन अफ़सोस आपने तो उन्हें जाने के लिए कह दिया।

आप जानते ही हैं कि जिस संविधान के आप संरक्षक हैं उसे बनाने में दुर्गाबाई देशमुख, अम्मू स्वामीनाथन, बेगम एजाज़ रसूल, दाक्षायनी वेलायुधन जैसी 15 महिलाओं का भी सक्रिय योगदान रहा है। एक-एक आन्दोलन और संघर्ष से ही महिलाओं ने अधिकार हासिल किये हैं। अनेक कानूनी लडाइयां भी लड़ी हैं। किसान के रूप में उनकी पहचान को मान्यता सिर्फ उनकी ही जीत नहीं होगी बल्कि समस्त नारी समुदाय की जीत होगी और वह आगे बढ़ेंगी।

क्षमा चाहती हूँ, पर मैं खुद को रोक नहीं पाई। महामहिम, आपने हम महिलाओं को बहुत निराश किया।  

              –आशु वर्मा

Saturday, January 2, 2021

नहीं रहे रेडियो प्लेबैक वाले सक्रिय पत्रकार कृष्णमोहन मिश्रा

 टैक्स्ट के साथ आवाज़ और शब्दों के प्रयोग में भी बहुत ही कुशल थे 

लखनऊ//इंटरनेट: 2 जनवरी 2020: (मीडिया स्क्रीन ऑनलाइन डेस्क):: 

देश के हालात की मायूसी और उदासी के इस माहौल में एक और उदास  खबर आई है राजू मिश्र की एक पोस्ट के रूप में। इसमें एक बहुत अच्छे पत्रकार के बिछुड़ जाने की सूचना है। यह खबर सोशल मीडिया पर सामने आई। उदास कर देने वाली यह पोस्ट है लखनऊ के एक  ऐसे कर्मयोगी पत्रकार के निधन से सबंधित जिन्होने टैक्स्ट के साथ साथ आवाज़ के जादू को भी ब्लॉग मीडिआ के तौर पर सक्रिय हो कर इस्तेमाल किया। उनके प्रयोग बेहद सफल रहे और ने टैक्स्ट और आवाज़ के समन्वय को बहुत ही खूबसूरती के साथ प्रस्तुत किया। रेडियो प्लेबैक उनका बहुत ही ज़बरदस्त प्रयोग रहा जो निकट भविष्य में ही हमें नए नए आर जे भी दिया करेगा। शब्दों और आवाज़ का संमिश्रण  जादू बिखेरता। एक पूरी टीम इस सारे प्रयोग पर नज़र रखती। रेडियो ब्लॉग की दुनिया में यह बहुत  लोकप्रिय हुआ।  Krishnamohan Mishra जी की पोस्टें हमें उनकी याद दिलाती  रहेंगी। राजनीतिक विचारों के भेदभाव से ऊपर उठ कर केवल समाज और विशुद्ध पत्रकारिता के धर्म को निभाते हुए हम उन्हें याद रखें  तो यही बात हमें आगे बढ़ने की शक्ति भी देगी।  

उनके मित्र  राजू मिश्रा बताते हैं-वरिष्ठ पत्रकार कृष्णमोहन मिश्र का गुरुवार की रात लखनऊ में हृदयाघात से निधन हो गया। वे लगभग 70 वर्ष के थे। श्री मिश्र ने अपने पीछे पत्नी और दो पुत्रियों को छोड़ा है। अपरान्ह दो बजे भैंसाकुंड स्थित श्मसान घाट पर उनकी अन्त्येष्टि हुई। श्री मिश्र को उनकी बेटी ने मुखाग्नि दी।कृष्ण मोहन जी का जन्म वाराणसी में हुआ था। उनकी शिक्षा दीक्षा वाराणसी में ही हुई। उन्होंने मिर्जापुर के पालिटेक्निक से शिक्षा ग्रहण की थी। इसके बाद लखनऊ के बांस मंडी स्थित आईटीआई में प्रशिक्षक रहे। यहीं से करीब दस वर्ष पूर्व वे सेवानिवृत्त हुए। श्री मिश्र सांस्कृतिक पत्रकार भी थे। सेवा में रहते हुए उन्होंने सांस्कृतिक पत्रकारिता की। वे दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान में सांस्कृतिक संवाददाता भी रहे। इसके साथ ही वे संस्कृति और संगीत पर लगातार लेखन करते थे। सोशल मीडिया में वे लगातार संगीत और गायन की विभिन्न विधाओं पर लेखन कर रहे थे। वे उ.प्र. जर्नलिस्ट्स एसोशिएशन की पत्रिका उपजा न्यूज और संस्कार भारती की पत्रिका कला कुंज भारती के भी संपादक रहे। आजकल वे राजधानी में जानकीपुरम् क्षेत्र की इकाई के अध्यक्ष थे। गोमती नगर निवासी श्री मिश्र को बीती रात करीब नौ बजे हृदयाघात हुआ। परिवार के लोग उन्हें तत्काल डा. राम मनोहर लोहिया चिकित्सालय ले गए जहां डाक्टरों ने बताया कि तीव्र हृदयाघात से उनका निधन हो चुका है। विनम्र श्रद्धांजलि।

उनके एक और गहरे मित्र सुजॉय चटर्जी उन्हें बहुत ही स्नेह और सम्मान के स्मरण करते हुए कहते हैं-ख़ामोश हुआ "स्वरगोष्ठी" का स्वर, नहीं रहे कृष्णमोहन मिश्र जी। इस गहरे सदमे को उनके मित्र किस मुश्किल से सहन कर पा रहे हैं इसे बताना मुश्किल है। 

श्री चटर्जी कहते हैं: कृष्णमोहन जी लखनऊ के प्रसिद्ध एवम् वरिष्ठ सांस्कृतिक पत्रकार/ सम्पादक होने के साथ-साथ शास्त्रीय एवम् लोक-संगीत के विशिष्ट जानकार, विश्लेषक, समीक्षक, लेखक, जानेमाने मंच संचालक, साक्षात्कारकर्ता और ब्लॉगर भी थे। हमारे ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ नामक ब्लॉग में वे शास्त्रीय एवम् लोकसंगीत पर आधारित स्तम्भ ’स्वरगोष्ठी’ का पिछले दस वर्षों से निरन्तर संचालन करते चले आ रहे थे। इन्टरनेट पर शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक, सुगम और फिल्म संगीत विषयक चर्चा का सम्भवतः यह एकमात्र नियमित साप्ताहिक स्तम्भ है, जो विगत दस वर्षों से निरन्तरता बनाए हुए है। आज उनके चले जाने से यह स्तम्भ अनाथ हो गया।

अपनी मित्रता और उनके साथ मीडिया और जीवन से जुड़े अनुभवों के आदान प्रदान का ज़िक्र करते हुए वह भरे मन से कहते हैं-मेरा कृष्णमोहन जी से पहला परिचय वर्ष 2011 में हुआ था। उन दिनों सेवानिवृत्ति के बाद वे इन्टरनेट पर सक्रिय हो रहे थे। उन्हीं दिनों शास्त्रीय संगीत पर आधारित एक स्तम्भ हमने शुरू किया था ’सुर संगम’, पर शास्त्रीय संगीत के जानकार न होने की वजह से हमारे लिए इसे लम्बे समय तक चला पाना मुश्किल हो रहा था। मेरे मित्र Sumit Chakravarty ने भी कुछ समय तक इसे आगे बढ़ाया। उन दिनों कृष्णमोहन जी इस स्तम्भ के पाठक हुआ करते थे। उनकी नियमित टिप्पणियों को पढ़ कर मुझे और सुमित को यह आभास हो गया था कि अगर कोई इस स्तम्भ को सही तरीके से आगे बढ़ा सकते हैं तो वो कृष्णमोहन जी ही हैं। उन्हें यह प्रस्ताव देते ही वे फ़ौरन राज़ी हो गए। और उस दिन से लेकर आज तक, उन्होंने ही इस साप्ताहिक स्तम्भ का संचालन किया ’स्वरगोष्ठी’ शीर्षक से और एक भी सप्ताह ऐसा नहीं बीता कि जब ’स्वरगोष्ठी’ का अंक प्रकाशित ना हुआ हो। आज इसके 495 अंक प्रकाशित हो चुके हैं। शास्त्रीय एवम् लोक संगीत के लेखों से सुसज्जित ये 495 अंक हिन्दी ब्लॉग जगत में किसी अनमोल ख़ज़ाने से कम नहीं है। इस धरोहर को हमें सहेज कर रखना है।

श्री चटर्जी बताते हैं कि कृष्णमोहन जी से मैंने बहुत कुछ सीखा है। लेखन शैली और प्रकाशनयोग्य formatting के बारे में उन्होंने तो बहुत कुछ बताया ही था, पर केवल उनको देख कर भी कई चीज़ें सीखने को मिली। वे पूरे perfection के साथ लेख लिखते थे, उनके लिखे पोस्ट्स पर किसी भी तरह की ग़लती ढूंढ पाना असम्भव सा था। वे कभी जल्दबाज़ी और shortcut में नहीं जाते थे, अगर समय ना हो तो साफ़ मना कर देते थे, पर quality के साथ कभी समझौता नहीं करते थे। वे इतने ईमानदार थे कि उनके लेखों के लिए जो भी कोई छोटी से छोटी जानकारी भी उन्हें देता था, वे उनका नाम लेख में उल्लेख करना कभी नहीं भूलते थे। ’स्वरगोष्ठी’ में जब भी कभी उन्हें किसी फ़िल्मी गीत से सम्बन्धित कोई रोचक जानकारी की आवश्यकता पड़ती थी तो वे मुझसे सलाह करते थे, और अगर मैं उन्हें कोई जानकारी उपलब्ध करवाता तो वे मेरा नाम लेख में “जानेमाने फ़िल्म इतिहासकार” के रूप में लिखते थे जिसे पढ़ कर मुझ हँसी आ जाती थी और embarrassment भी होता था क्योंकि मैं कोई फ़िल्म इतिहासकार नहीं हूँ। यह उनका बड़प्पन ही था बस! वे इतने विनयी थे कि जब भी कभी मैं उनसे कहता कि मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा है तो फ़ौरन उनका जवाब होता था कि उन्होंने भी मुझसे बहुत कुछ सीखा है। प्रसिद्ध अभिनेता Pranay Dixit जी के मौसा जी लगते थे कृष्णमोहन जी। जब वर्ष 2013 में प्रणय जी की पहली फ़िल्म ’Roar’ रिलीज़ होने जा रही थी, तब कृष्णमोहन जी के ज़रिये मुझे प्रणय जी का साक्षात्कार लेने का मौका मिला। उन्होंने यह दायित्व मुझे सौंप कर मेरा सम्मान बढ़ाया था।

हालांकि दोनों मित्रों में उम्र  का अंतर भी काफी था। चटर्जी साहिब बताते हैं उम्र में मैं कृष्णमोहन जी से करीब 30 साल छोटा हूँ, पर उनसे बात करते समय कभी इसका अहसास नहीं हुआ। हमेशा ऐसा ही लगा कि जैसे हम हम-उम्र हों। वे ऐसे बात करते थे कि जैसे अपने किसी हम-उम्र दोस्त के साथ बतिया रहे हों। उन्हें जब भी कभी मेरे द्वारा लिखा कोई पोस्ट पसन्द आता था तो फ़ोन करके बधाई देते थे। मुझे याद है एक बार मैंने जब अपने किसी लेख में “साज़िन्दों” की जगह “वाद्य-वृन्द” शब्द का प्रयोग किया था, उन्हे यह इतना अच्छा लगा कि केवल यही बताने के लिए उन्होंने मुझे फ़ोन किया। वे कभी फ़ोन पर व्यक्तिगत बात या इधर-उधर की बात नहीं करते थे, सीधे काम की बात करते थे, professionalism उनमें कूट-कूट कर भरा हुआ था। कुछ वर्ष पूर्व एक बार मैंने उनसे कहा कि मेरा बेटा शास्त्रीय संगीत सीख रहा है पर वो रियाज़ ही नहीं करता। तब कृष्णमोहन जी ने बताया कि दस वर्ष की आयु से पहले बच्चे से ज़्यादा रियाज़ ना करवाऊँ वरना आवाज़ ख़राब हो सकती है। यह बेहद महत्वपूर्ण बात उनसे जानने को मिली थी। एक बार मैंने उनसे कहा कि आपने लम्बे समय से एक ही profile pic लगा रखी है, इसे बदलते क्यों नहीं, तो बोले तो यह उनका प्रिय फ़ोटो है और उनका सबसे अच्छा फ़ोटो है। जितना मुझे याद है यह तसवीर किसी ने संगीत नाटक अकादमी में खींची थी। 

फेसबुक वाली प्रोफ़ाइल तस्वीर की तरह ही उन्होने अपने  मित्र भी नहीं बदले। जिससे मित्रता लगाई उसके साथ आखिर तक निभाया। 

कुछ सप्ताह पूर्व जब आख़िरी बार उनसे बात हुई थी तब वे काफ़ी उत्साहित थे इस बात को लेकर कि ’स्वरगोष्ठी’ के ना केवल दस वर्ष पूरे हो रहे हैं बल्कि इसके 500 अंक भी पूरे हो रहे हैं। और संयोग देखिए कि इसी सप्ताह ’स्वरगोष्ठी’ के दस वर्ष पूरे हो रहे हैं 495-वें अंक के साथ। ब्लॉगर में उन्होने इस सप्ताह का पोस्ट शेड्युल कर रखा है और इस पोस्ट में उन्होंने ’स्वरगोष्ठी’ के दस वर्ष पूर्ति पर इसके प्रथम अंक के लिए मेरे लिखे हुए लेख का एक अंश भी प्रस्तुत किया है, जिसे पढ़ कर निर्वाक् हो गया हूँ। आज कृष्णमोहन जी के इस तरह अचानक चले जाने से ऐसा लग रहा है कि जैसे एक महाशून्य सा उत्पन्न हुआ है। अभी तो उनके साथ बहुत काम करना बाकी था। उनसे बहुत सारी बातें करनी थीं। सब एक ही झटके में समाप्त हो गया। शायद इसी क्षणभंगुरता का नाम जीवन है। कृष्णमोहन जी मुझे हमें हमेशा याद रहेंगे। उनको श्रद्धांजलि स्वरूप और उनके 500-वें अंक के सपने को साकार करने हेतु हमने ’स्वरगोष्ठी’ के अन्तिम पाँच अंकों को लिखने का निर्णय लिया है। यही उनके लिए हमारी श्रद्धांजलि होगी।

Friday, December 25, 2020

प्रेस आज़ादी पहले से कहीं ज़्यादा अहम,

  59 मीडियाकर्मियों की हत्याओं की निन्दा 

Unsplash/Jovaughn Stephens//एक प्रेस गतिविधि को कवर करते हुए एक वीडियो पत्रकार

23 दिसम्बर 2020//कानून और अपराध की रोकथाम

संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक संगठन (UNESCO) ने बताया है कि वर्ष 2020 के दौरान, अभी तक कम से कम 59 मीडियाकर्मी मारे गए हैं, जिनमें चार महिलाएँ भी हैं. संगठन ने बुधवार को ये आँकड़े जारी करते हुए, सूचना प्राप्ति और तथ्यात्मक पत्रकारिता को एक सार्वजनिक अच्छाई के रूप में क़ायम रखने के समर्थन में खड़े होने की पुकार भी लगाई.

यूनेस्को ने बुधवार को जारी एक वक्तव्य में कहा कि पिछले एक दशक के दौरान, औसतन, हर चार दिन में एक पत्रकार को अपनी ज़िन्दगी गँवानी पड़ी है. 

यूनेस्को की महानिदेशक ऑड्री अज़ूले ने कहा है कि अलबत्ता, वर्ष 2020 में, पत्रकारों की मौतों की संख्या तुलनात्मक रूप में सबसे कम रही है.

लेकिन ये भी सच है कि लोकतंत्र और मानवाधिकारों की हिफ़ाज़त के लिये, शायद ही पत्रकारिता की इतनी अहमियत रही हो, क्योंकि दुनिया, कोरोनावायरस और उसके आसपास मौजूद दुष्प्रचार व ग़लत जानकारी के फैलाव के वायरस से भी जूझ रही है.

सत्य की सुरक्षा

ऑड्री अज़ूले ने कहा है कि कोरोनावायरस महामारी, एक ऐसा सटीक तूफ़ान साबित हुई है जिसने दुनिया भर में प्रेस स्वतंत्रता को प्रभावित किया है.

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि पत्रकारिता की सुरक्षा करना, दरअसल सत्य की हिफ़ाज़त करना है.

यूनेस्को की रिपोर्ट में कहा गया है कि लातीनी अमेरिका और कैरीबियाई क्षेत्रों में 22 – 22 पत्रकारों की हत्याएँ हुईं और इन क्षेत्रों को एशिया और प्रशान्त क्षेत्र के साथ मिलाकर कहा जाए तो, पत्रकारों की सबसे ज़्यादा हत्याएँ हुई हैं. 

इसके बाद अरब क्षेत्र में 9 और अफ्रीका में 6 पत्रकारों की हत्याएँ हुईं.

यूनेस्को का कहना है कि पत्रकारों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों में, औसतन 10 में से 9 मामलों में, दंडमुक्ति यानि न्यायिक प्रक्रिया का अभाव दिखा है, हालाँकि वर्ष 2020 में कुछ बेहतरी देखने को मिली है.

वर्ष 2020 में पत्रकारों की सुरक्षा पर यूनेस्को महानिदेशक की ये रिपोर्ट, पत्रकारों के ख़िलाफ़ अपराधों में न्याय के अभाव को ख़त्म करने के अन्तरराष्ट्रीय दिवस के आसपास ही प्रकाशित ही है.

इस दिवस के अवसर पर उपलब्ध आँकड़ों में पिछले दो वर्षों के दौरान पत्रकारों की हत्याओं के तरीक़ों की गहराई से जानकारी मुहैया कराई गई है.

यूनेस्को की ये ताज़ा रिपोर्ट जारी किये जाने के अवसर पर ही, संगठन ने वैश्विक स्तर पर एक जागरूकता अभियान भी शुरू किया है जिसका नाम है – Protect Journalists. Protect the Truth – पत्रकारों की हिफ़ाज़त करें. सत्य को बचाएँ.

यूनेस्को का कहना है, “अब भी बहुत सी हत्याएँ होती हैं और कम घातक हमले व प्रताड़ना और परेशान किये जाने के मामले अब भी बढ़ रहे हैं."

"वर्ष 2020 में, पत्रकारों के सामने दरपेश ख़तरे और भी उजागर हुए हैं. मसलन, दुनिया भर में, ब्लैक लाइव्स मैटर - Black Lives Matter जैसे और इसी तरह के अन्य प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग करते हुए उन्हें ज़्यादा ख़तरों का सामना करना पड़ा.”

प्रदर्शन ख़तरे

यूनेस्को ने वर्ष 2020 के आरम्भ में 65 देशों में हुए ऐसे 125 प्रदर्शनों की पहचान की थी  जिनमें पत्रकारों पर या तो हमले किये गए, या उन्हें गिरफ़्तार किया गया, और ये प्रदर्शन 1 जनवरी 2015 से लेकर 30 जून 2020 के बीच हुए.

इनमें से 21 प्रदर्शन वर्ष 2020 की पहली छमाही के दौरान हुए, लेकिन वर्ष 2020 के दूसरे हिस्से के दौरान पत्रकारों को गिरफ़्तार किये जाने या उन्हें हमलों का निशाना बनाए जाने की घटनाओं में बढ़ोत्तरी देखी गई है.

यूनेस्को का कहना है कि इनके अतिरिक्त, महिला पत्रकारों की सुरक्षा का मुद्दा अब भी चिन्ता का एक बड़ा कारण है. “महिला पत्रकारों को, पत्रकारिता के उनके पेशे और लिंग के लिये हमलों का निशाना बनाया जाता है और महिला पत्ररकार, ख़ासतौर से लिंग आधारित प्रताड़ना और हिंसा का भी सामना करती हैं.”

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Unsplash/Jovaughn Stephens//एक प्रेस गतिविधि को कवर करते हुए एक वीडियो पत्रकार

Saturday, December 12, 2020

पूरा देश किसानों के पीछे एकजुट है

  राष्ट्र को सावधानी, लोगों को चेतावनी  

यह कुछ भी नहीं था कि मोदी सरकार ने योजना आयोग को खत्म कर दिया। उनके लिए जवाहरलाल नेहरू से जुड़ी हर चीज एक अभिशाप थी। नीति आयोग आरएसएस नियन्त्रित भाजपा की देन था जो योजना आयोग के विकल्प की अवधारणा के रूप में आया है। क्योंकि उन्हें लगता था कि योजना शब्द ही समाजवाद की ओर एक कदम था। 

नीति आयोग एक चमचमाती हुई प्रोफाइल का प्रतिनिधित्व करता है- ‘नेशनल इंस्टीट्यूट फाॅर ट्रांसफार्मिंग इंडिया‘। कुछ ही समय में यह संस्थान मोदी सरकार के विचारों और कामों का आईना बन गया। कई बार नीति आयोग मोदी सरकार की नीतिगत दिशाओं का एक सिद्ध अग्रदूत था। आज वे जिसकी चर्चा करते हैं कल वह एक विचार के रूप में सरकार का मार्गदर्शक सिद्धांत बन जाएगा। वास्तव में यही कारण है कि देश ने हाल ही में नीति आयोग के सीईओ द्वारा दिए गए बयान का बैचेनी के साथ संज्ञान लिया। वह स्वराज पत्रिका द्वारा आयोजित एक वेबिनार, ‘द रोड टू आत्मनिर्भर भारत‘ को संबोधित कर रहे थे। उनके अनुसार ‘बहुत अधिक लोकतंत्र भारत की प्रगति के लिए मुख्य बाधा है‘। यह एक दर्शन का रहस्योद्घाटन था जो लोकतंत्र को आत्मनिर्भर भारत के लिए एक काउंटर करंट के रूप में रेखांकित करता है। जबकि पूरा देश उन किसानों के पीछे एकजुट है जो कृषि में न तथाकथित सुधारों के खिलाफलड़ रहे हैं। तो नीति अयोग प्रमुख रोना रो रहे हैं कि भारत में कठिन सुधार मुश्किल हैं। उन्होंने अपनी सरकार की प्रशंसा में कोई शब्द नहीं कहे जिसने सभी क्षेत्रों कोयला, श्रम, कृषि में सुधार लाने में हठपूर्ण कुशलता दिखाई है। भारत में हर राष्ट्र को सावधानी, लोगों को चेतावनी कोई जानता है कि देश में सुधार के नाम पर क्या हो रहा है। जीवन के सभी क्षेत्रों में एफडीआई सरकार के लिए मुक्ति मंत्र बन गया है। उनकी आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना स्वयं ही विदेशी पंूजी के पास गिरवी है। लगभग सभी सुधार जिनकों उन्होंने बढाया है लोकतंत्र की नींव पर चोट हैं। भारत में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक लोकतंत्र लगातर इन हठी सुधारों को शुरू करने वालों से खतरे में है। संगठित होने, मतान्तर रखने और विरोध करने के बुनियादी अधिकारों का दमन किया जा रहा है। राष्ट्रीय राजधानी की सीमा पर दस्तक दे रहे देश के अन्नदाताओं को लोतंत्र के उस दुर्ग में प्रवेश से रोक दिया गया है जहां चुनी हुई सरकारें बैठती हैं। भारत में लोकतंत्र के बारे में बोलने के सामने सीमेंट की बाधाएं, कंटीली तारें, पानी की बौछारें और आंसू गैस के गोले हजारो अर्धसैनिक बलों के साथ तैनात कर दिये गये हैं। नीति आयोग उस राह को समझता होगा जिससे धारा 370 को खत्म किया गया है, सीएए, एनआरसी सुधार लागू किये गये, और देश में श्रम सुधार थोपे गये। उन्हें संविधान के अनुच्छेद 14, 29 और 21 में समाहित अधिकारों की बुनियादी समझ होगी। किसान, मजदूर, छात्र, दलितों और समाज के दूसरे वंचित तबको को इन हठी सुधारों पर सवाल करने के अधिकार हैं। यह सुधार एक लोकतान्त्रिक देश में गरिमापूर्ण जीवने जीने के उनके अविच्छेद अधिकारों को प्रभावित करते हैं। बहस करने, असहमति रखने और विरोध कराने का अधिकार इसका हिस्सा है। नीति आयोग को भारतीय जनता के बीच चल रहे असंतोष को समझना चाहिए। इसके पीछे का कारण लोकतंत्र की प्रचुरता नहीं है बल्कि धन और जीवन की बढ़ती विषमता है। महामारी के दिनों में प्रोत्साहन पैकेज ने गरीबों के लिए कोई न्याय नहीं किया था। प्रवासी मजदूर, घरेलू सहायक और सफाई मजदूरों को भूला दिया गया था। यह तुच्छ लाभ जिन्हें दिये गये उनमें से अधिकांश तक नहीं पहुंचे। अर्थव्यवस्था का संकट ‘ईश्वर के कृत्य के कारण‘ या बहुत अधिक लोकतंत्र के कारण नहीं था। नीति अयोग द्वारा विकसित की गई नीतियां और सरकार द्वारा कार्यान्वित भारत के गहरे संकट के पीछे का कारण है। सत्तारूढ़ हलकों का इरादा विलफुल डिफाल्टर्स और विदेशी पूंजी को रियायतें प्रदान करके इसे हल करना है। हर जगह एक और एकसमान ही सवाल है कि मुनाफा अथवा जनता? यहां नीति आयोग दूरगामी प्रभाव वाले खतरनाक प्रस्तावों के साथ आ रहा है। यह सरकार का मागदर्शन अधिक से अधिक भयावह कानून अपनाने के लिए कर रहा है। यह लोगों के प्रतिरोध का गला घोंटने के लिए हैं ताकि बडों के लिए पूंजी की मस्ती बिना रूकावट के चलती रहे। सीईओ ने अपने भाषण में भारी मात्रा में राजनीतिक दृढ़ संकल्प के लिए आग्रह किया। यह सरकार से अधिक से अधिक दमनकारी कानूनों के साथ आगे बढ़ने का आह्वान है। राष्ट्र के लिए सावधानी और लोगों को चेतावनी। 

मुक्ति संघर्ष के तारीख  13 से  19 दिसंबर 2002 अंक में से साभार 

किसानों  पर आरोप लगाने वालों को खुद किसान  ही दे रहे हैं जवाब 

श्याम मीरा सिंह की तरफ से किसान धरने के दौरान क्लिक की गई एक तस्वीर
जिस पर अलग से भी एक विशेष पोस्ट दी जा रही है--रेक्टर कथूरिया 


Sunday, November 22, 2020

भाजपा महिला मोर्चा लुधियाना देगा सीपी को ज्ञापन

 जिला अध्यक्ष मनिंदर कौर घुम्मन करेंगी अगवानी 

प्रिय  बन्धुवर,

                                सभी मीडिया साथियों को नमस्कार !

       भाजपा महिला मोर्चा लुधियाना की जिला अध्यक्ष मनिंदर कौर घुम्मन के नेतृत्व में  एक मांग-पत्र लुधियाना के सी.पी.साहब को 23 नवम्बर 2020 दिन सोमवार दोपहर 12  बजे दिया जायेगा ! 

आप सब मीडिया साथियो से अनुरोध है की इस कार्यक्रम को कवरेज करने की कृपा करें।

          धन्यवाद ! 

                                                                                              दिनांक:-- 23 नवम्बर 2020 , समय :--दोपहर 12  बजे                                                            स्थान :-- सी पी दफ्तर ,फ़िरोज़पुर रोड,लुधियाना 

 * डॉ.सतीश कुमार  dr.skumar30@rediffmail.com 

 ☎ 9815413363 ,9815999909

Tuesday, November 17, 2020

जंग के खिलाफ अभियान की कहानी बता रहे हैं डा.अरुण मित्रा

 जंग की भयानक तस्वीर को साहिर साहिब ने भी दिखाया 

लुधियाना
: 17 नवंबर 2020: (कार्तिका सिंह//मीडिया स्क्रीन ऑनलाइन)::
साहिर लुधियानवी साहिब अपनी लम्बी और संगीतमय काव्य रचना "परछाइयां" में युद्ध के पागलपन का ऐसा भयावह चित्र खींचते हैं की पढ़ते पढ़ते आँखों में आंसू आ जाते हैं। वह कहते हैं:
उस शाम मुझे मालूम हुआ, जब भाई जंग में काम आये
सरमाए के कहबाख़ाने में बहनों की जवानी बिकती है
सूरज के लहू में लिथड़ी हुई वह शाम है अब तक याद मुझे
चाहत के सुनहरे ख्वाबों का अंजाम है अब तक याद मुझे

इस  नज़्म के आखिर  साहिब कहते हैं:
हमारा खून अमानत है नस्ले-नौ के लिए,
हमारे खून पे लश्कर न पल सकेंगे कभी॥

कहो कि आज भी हम सब अगर खामोश रहे,
तो इस दमकते हुए खाकदाँ की खैर नहीं।

जुनूँ की ढाली हुई ऐटमी बलाओं से,
ज़मीं की खैर नहीं आसमाँ की खैर नहीं॥

गुज़श्ता जंग में घर ही जले मगर इस बार,
अजब नहीं कि ये तनहाइयाँ भी जल जायें।

गुज़श्ता जंग में पैकर जले मगर इस बार,
अजब नहीं कि ये परछाइयाँ भी जल जायें॥

डाक्टर अरुण मित्रा और उनके सक्रिय सहयोगी साथी इस नज़्म के मकसद को बहुत पहले ही अपना चुके थे। जवानी की उम्र में जब लोग मस्ती करते हैं उस उम्र में यह लोग जंग के खिलाफ जन चेतना जगाने लगे थे। जब देश और दुनिया के बड़े बड़े असरदायिक लोग जंग का जनून भड़काने में लगे हों और जंग की ही सियासत हो रही हो उस समय जंग के खिलाफ बात करना आंधियों में दिया जलाने जैसा ही होता है लेकिन इन लोगों ने बहुत बार ऐसी कोशिशें की। अब उन कोशिशों का सुखद परिणाम सामने आ रहा है। उसी परिणाम की चर्चा करती है यह वीडियो जो डाक्टर अरुण मित्रा से हुई एक भेंट पर आधारित है। डाक्टर अरुण मित्रा से इस भेंट की प्रेरणा देने वाले वाम पत्रकार और कहानीकार एम् एस भाटिया डाक्टर मित्रा की ऐसी कोशिशों पर एक पुस्तक भी तैयार करवा रहे हैं। आप इस वीडियो को देखिये और इस पर अपने विचार भी बताएं। यह वीडियो Dr Arun Mitra on War and Nuclear Treaty इस नाम से यूट्यूब पर भी उपलब्ध है। --कार्तिका सिंह