Saturday, September 6, 2014

अब फिर लौट रहा है रेडियो का ज़माना

06-सितम्बर-2014 18:34 IST
प्रधानमंत्री ने रेडियो के जरिए जुड़ने के लिए लोगों से सुझाव मांगे
नई दिल्ली: 6 सितमबर 2014: (रेक्टर कथूरिया//मीडिया स्क्रीन):
कभी  रेडियो का ही ज़माना था। रेडियो ने हिंदी-पंजाबी के साथ साथ अन्य भारतीय भाषाओं के गीत संगीत को भी दूर दूर तक पहुँचाया।  वर्ष 1984 में हुए ब्ल्यू स्टार आप्रेशन जैसी संवेदनशील कार्रवाई तक भी लोग रेडियो पर ही निर्भर थे। विविध भारती हो या तामील-ए-इरशाद या फिर बिनाका गीत माला लोग पूरे ध्यान से सुनते थे। रेडियो की फरमायश में अपना नाम बुलवाने की एक होड़ सी रहती थी। पोस्ट कार्डों के बंडलों के बंडल इस फरमायश के लिए पोस्ट किये जाते थे। आल इंडिया उर्दू सर्विस  (तामील-ए-इरशाद) शमीम कुरैशी, अज़रा कुरैशी, जालंधर की चन्द्रकिरण, हेमराज शर्मा, जानकीदास भारद्धाज  और रेडियो सिलोन के अमीन सयानी से मिलना एक सपना समझा जाता था। रेडियो के रिसेप्शन रूम में मनाही के बावजूद लोग इनसे  मिलते थे। घंटों इनका इंतज़ार करते थे। श्रोता क्लब बनाने का रिवाज सा हो गया था पर दूरदर्शन के बाद रेडियो का जादू कुछ कम  होने लगा।  फिर केबल का ज़माना आते ही इसे ग्रहण लग गया।  अब रेडियो में उतनी भीड़ नहीं होती। इसके बावजूद रेडियो का ज़माना फिर से लौट रहा है। उसके कई कारण है। रेडियो को अपने सिरहाने रख कर आँखें बंद करके सुना जा सकता है। उसके लिए काम छोड़ने की तो कतई कोई आवश्यकता नहीं। ऍफ़ एम और मोबाईल फोन में रेडियो सुनने की सुविधा ने इसकी खूबियों को दोबारा उजागर किया है।
  
इसके साथ ही चमत्कार हुआ है सरकार की तरफ से। इसकी आशा नहीं थी लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद मोदी ने इस तरफ विशेष तवज्जो दी है। पीआईबी की एक सूचना के मुताबिक प्रधानमंत्री श्री मोदी ने रेडियो के जरिए जुड़ने के लिए लोगों से सुझाव मांगे हैं। प्रधानमंत्री ने लोगों से कहा है कि वे इस संबंध में अपने विचार माईगव प्‍लेटफॉर्म-www.mygov.in पर साझा करें। उम्मीद की जानी चाहिए कि अब रेडियो के अच्छे दिन आने वाले हैं। क्या आप रेडियो से जुड़ना चाहते हैं? अगर हाँ तो अब देर न कीजिये--तुरंत भेजिए अपने कीमती सुझाव। 
गौरतलब है कि रेडियो ने 1962, 1965  और 1971  में लोगों का मनोबल मज़बूत करने और सूचनाओं का आदान प्रदान करने में महत्वपूर्ण सूचना निभाई थी। सैनिक भाईयों के लिए फरमाइशी कार्यक्रम आज भी लोकप्रिय हैं। 
वि.कासोटिया/अर्चना/आरआरएस/एसएनटी-3569




Monday, April 14, 2014

ये बता आज कौन सा प्रेस वाला बिना पैसे लिए खबर छापता है...?

लागा चुनरी पे दाग छुपायुं कैसे----------
आज़मगढ़ के अवनीश राय आजकल दिल्ली में बसे हुए हैं। पेशे से पत्रकार है और हर तरह से सैटल भी।  अच्छा चैनल--अच्छी ज़िंदगी लेकिन सक बोलना--दलील से बात करना---जैसा सोचना वैसा करना---बहुत सी "बुरी आदतें" हैं।  कुछ रोको तोको तो हंस कर ताल देते हैं। उनकी नयी पोस्ट फिर कि लिहाज़ वह अपने पेशे से जुड़े बहिचारे का भी नहीं करते। पूरा माजरा क्या है---आप खुद ही पढ़ लीजिये। स्थान दिल्ली का है और पोस्ट करने का समय 14 अप्रैल 2014 सोमवार को सांय 4:28 पर लेकिन इस हकीकत को आप कहीं भी देख सकते है---महसूस कर सकते हैं। आपके विचारों की इंतज़ार रहेगी ही। -रेक्टर कथूरिया 
आज सुबह भाई को स्टेशन से लेने पुरानी दिल्ली पहुंचा। अंदर घुस ही रहा था कि सीढियों के पास खड़े टीटी पर नजर पड़ी। वे दो थे और एक सूटेड-बूटेड शख्स से बहस कर रहे थे। हालांकि बिना टिकट यात्रियों या पहली बार दिल्ली आने वाले यूपी बिहार के लोगों के झोरा - झंपट पकड़कर उनसे वसूली के लिए कुख्यात इन टीटियों की टें-पें से तो अब खूब वाकिफ हो चुके हैं लेकिन ये बहस कुछ अलग थी। मैं भी थोड़ा रूक गया।
शख्स - सर मैं भी स्टाफ हूं। प्रेस से हूं। 
टीटी - ना भाई...255 रूपये तो देने ही होंगे।
शख्स - सर, मैं प्रेस से हूं
टीटी - कौन से प्रेस से...
शख्स - इलेक्ट्रानिक मीडिया से हूं सर..
टीटी - तो क्या हुआ भाईइइइ...पैसे तो देने ही पड़ेंगे...
शख्स - सर, प्रेस....
टीटी - भाईइइ..ये बता आज कौन सा प्रेस वाला बिना पैसे लिए खबर छापता है...तू भी तो पैसे लेता होगा...क्यों?
शख्स - क्या बात करते हैं सर..हम पैसे नहीं लेते..
टीटी - ना भाईइइ...आज तो कोई प्रेस वाला ना है..जो बिना पैसे के खबर छापता हो
शख्स - अरेsss सर...
दूसरा टीटी - जा भाई...पर आज के बाद ना जाने दूंगा ऐसे...

Saturday, March 8, 2014

ओपिनियन पोल धोखा है, जाग जाओ मौक़ा है

हमेश सारे सर्वे बीजेपी को ही जीतते है 2004 .2009 में येही होया था
Comrade Aman Mishra Dyfi On Friday 7th March 2014 at 6:20 PM
कई राजनैतिक पार्टियाँ अपनी छवि सुधारने के लिए देशी-विदेशी एजेंसियों और कंपनियों को करोड़ों रूपये का ठेका दे रखी हैं,जबकि विकास के मसले पर धन के अभाव का रोना रोती रही हैं। वोट हासिल करने के लिए विज्ञापनों और रैलियों पर धुआँधार सरकारी और कारपोरेट घरानों से मिले काले धन ख़र्च किये जा रहे हैं। हालिया ओपिनियन पोल / चुनावी सर्वेक्षण पर हुए ‘स्टिंग आपरेशन’ के बाद से पूरी बहस इसकी निष्पक्षता, हक़ीक़त,उपयोगिता और ज़रूरत के इर्द-गिर्द होने लगी है। इस बहस में सिर्फ़ विश्लेषक ही नहीं है,पार्टियाँ भी कूद पड़ी हैं। यह सिर्फ़ चुनावी सर्वेक्षण भर का मामला नहीं है,बल्कि इसके पीछे छुपे राजनैतिक मंशा का पड़ताल होना चाहिए । आइए ओपिनियन पोल के ‘होल’ की बानगी देखते हैं !
सर्वे की बानगी एक : भारतीय समाज की जटिलताओं को एक क्रूर सच के रूप में देखा जाना चाहिए। हमारा समाज कई तरह के दबाओं और भय में जीता है। सामंती सामाजिक ढाँचा और पुरूष सत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था होने की वजह से बहुत जगहों पर स्वतंत्र,निष्पक्ष और बेबाक़ अभिव्यक्ति,आमतौर पर आपसी संघर्ष में तब्दील हो जाता है। कई बार यह ख़ूनी संघर्ष का रूप भी धारण कर लेता है। यहीं कारण है कि बहुतेरे मामलों में और कई मुद्दों पर लोग खुलकर अपनी राय नहीं देते । इसीलिए अकसर कई मामलों के परिणाम,दिए गये राय के विपरीत निकलते हैं । इस उदाहरण को चुनावी सर्वेंक्षण / ओपिनियन पोल के साथ जोड़कर भी देखा जा सकता हैं। मान लीजिए आप ऐसे इलाक़े में सर्वे कर रहे हैं,जहाँ दबंग जातियाँ रहती हैं । वहाँ के लोग किसी पार्टी /उम्मीदवार के पक्ष में खुल कर अपनी राय देते हैं, लेकिन उन्हीं के आसपास रहने वाली कमज़ोर जातियों की राय एक दम अलग होगी । संबंधित मुद्दों पर या तो वो गोलमोल जवाब देंगे या जो देंगे,चुनाव में उस पर खरा नहीं उतरेंगे। लेकिन दिये गये प्राथमिक उत्तर को आधार बनाकर सर्वे एजेंसियाँ आँकड़ा पेश करती हैं । जबकि यह हक़ीक़त से कोसों दूर होता है। यहीं कारण है कि सर्वे एजेंसियों के इतर चुनावी नतीजे एक दम चौंकाने वाले आते हैं।
अर्थ यह कि खुलकर राय देना मतलब ख़तरे से ख़ाली नहीं है। सहीं बात बोलकर जातीय /ख़ूनी संघर्ष को आमंत्रित करना भी है। अक्सर चुनाव के ठीक बाद/महीनों तक चुनावी रंजीश की ख़बरें पढ़ने को मिलती हैं। हत्या/ आपसी संघर्ष की ख़बरों पर ग़ौर कीजिए । इसीलिए लोग बोलते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं। यहाँ नोट करने लायक बात यह है कि जिस इलाकों में चुनावी सर्वेक्षण किये गये और प्राथमिक राय की बदौलत निकाले गये आँकड़ों के आधार पर ओपिनियन पोल को पब्लिक किया गया। चुनाव पूर्व जिस पार्टी / प्रत्याशी की बढ़त दिखायी गयी,चुनाव बाद उसकी पराजय हुई।

ज़ाहिर है,प्राथमिक राय मतदान के समय बदल गये। इसका मतलब यह हुआ कि चुनाव पूर्व सर्वेक्षण,चुनाव बाद ग़लत साबित हुए । क्योंकि प्राथमिक राय स्वतंत्र,सटीक,निष्पक्ष, और निर्भीक नहीं थे। डर और भय के आधार पर दिए गये थे। यह लक्षण कमोबेश भारत के अधिकतर हिस्से में है। ख़ासतौर पर उत्तर भारत में जहाँ का सामाजिक ढाँचा आज भी स्वर्ण सामंती बना हुआ है और जहाँ सामाजिक जकड़न बेहद संवेदनशील है। ऐसे मामलों में पुलिस मशीनरी भी बहुत निष्पक्ष तरीक़े से काम नहीं करती,इसलिए बहुतेरे लोग झगड़ा मोल नहीं लेना चाहते हैं। इस मामले में शहर और देहात का अलग-अलग लक्षण है। यहाँ ग्रामीण पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर विश्लेषण किया गया है।

सर्वे की बानगी दो : चुनाव पूर्व सर्वेक्षण /ओपिनियन पोल में सिर्फ़ राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय एजेंसियाँ भी लगी हुई हैं। आमतौर पर सर्वे एजेंसियों के पास पर्याप्त मात्रा में मैनपावर नहीं होता। इसलिए वो कम खर्चे में आँकड़ा जुटाने के लिए अप्रशिक्षित युवाओं का सहारा लेती हैं। उत्तरदाता ऐसे लोगों पर भरोसा कम करते हैं,उनके मन में अपनी राय या विचार लीक होने का भय होता है। इसलिए भी लोग खुलकर जवाब नहीं देते हैं। चूँकि ये युवा संबंधित सर्वे एजेंसी द्वारा प्रशिक्षित नहीं होते,इसलिए किसी न किसी पार्टी के प्रति इनका आग्रह होता है। यानी कुल मिलाकर सर्वे पूर्वाग्रह के आसपास घूमता नज़र आता है। मान लीजिए चुनावी सर्वे के काम में कोई स्थानीय या क्षेत्रीय सर्वेकर्ता शामिल है,उसे पता है फलां पार्टी के समर्थक फलां एरिया में अधिक रहते हैं। यदि वहाँ से प्राथमिक आँकड़ा लिया गया तो ज़ाहिर है,सर्वे का रुझान फलां पार्टी के पक्ष में गया। प्राप्त आँकड़ों पर बाज़ीगरी करने वाला बहुत दूर वातानुकूलीत कमरों में बैठा होता है। कई बार उसे ज़मीनी हक़ीक़त की जानकारी नहीं होती,लेकिन निकाले गये परिणाम पूरे चुनाव को प्रभावित करते हैं। यह एक तरह का ख़तरनाक खेल है,जो लम्बे समय से जारी है।

सर्वे की बानगी तीन : जैसे ही ओपिनियन पोल पब्लिक किया जाता है। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया इसे हाथों-हाथ लेते हैं। देखते ही देखते यह सर्वे सनसनी में तब्दील हो जाता है। सर्वे में बढ़त पायी पार्टी तो ख़ुश होती है,लेकिन पिछड़ने वाली पार्टियाँ अपने आप को लड़ाई में दिखाने या बने रहने के लिए विज्ञापनों का सहारा लेती हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया और प्रिंट मीडिया के पीठ की सवारी कर दर्शकों तक इस खेल को पहुँचाया /दिखाया जाता है। कुल मिलाकर इस खेल में सर्वे एजेंसी को फ़ायदा होता है। उसकी पब्लिसिटी होती है। उसे और काम मिलने लगते हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया को धड़ाधड़ विज्ञापन मिलने लगते हैं। चुनावी मौसम में कारपोरेट घरानों को ज़बरदस्त मुनाफ़ा होता है। सर्वे में जिस पार्टी को बढ़त दिखाया गया होता है,वो इसे भजाना शुरू करती है। मतदाताओं को भ्रमित करने या चुनावी हवा बनाने के लिए आँकड़ों का खेल काफ़ी होता है।

सर्वे की बानगी चार : जब हम कहते हैं कि – चुनावी सर्वे धोखा है,जाग जाओ मौक़ा है / ओपिनियन पोल में होल है,इसमें पूँजीपतियों का रोल है । तो यह तर्क हवाहवाई नहीं है। इसके पीछे एक हक़ीक़त है। एक तर्क है । ओपिनियन पोल या चुनावी सर्वेक्षण के ज़रिए राजसत्ता / राष्ट्रीय /प्रादेशिक राजनैतिक पार्टियों और पूँजीपतियों के बीच बने नापाक गठजोड़ के आधार पर यह खेल,खेला जाता है,जिसे भोली-भाली जनता अनभिज्ञ रहती है। जो जागरूक और चेतनाशील हैं,वो आधुनिक कंदराओं में बंद रहते हैं। विशिष्ट सैंपल विधि से चुनावी सर्वेक्षण कर किसी पार्टी के चुनावी जीत की भविष्यवाणी करना । उसे प्रचारित-प्रसारित करना। पूरे चुनावी माहौल को एक ख़ास पार्टी के इर्द-गिर्द ला कर खड़ा कर देना एक तरह से जनता को गुमराह करना भी है। यहीं हो रहा है और बड़े पैमाने पर हो रहा है। दरअसल भारत में चुनावी सर्वे ; ओपिनियन पोल हो या एक्ज़िट पोल,बहुत पारदर्शी और हक़ीक़त के क़रीब नहीं रहे हैं। बीते वर्ष दिल्ली विधान सभा का चुनाव इसकी बानगी भी है और गवाह भी ।

याद कीजिए 2004 के चुनाव में ‘इंडिया शाइनिंग’ को । करोड़ों रूपये शाइनिंग पर ख़र्च हुए,लेकिन निकला क्या ? वहीं ‘ढाक के तीन पात…’ हालाँकि इसका कोई लिखित प्रमाण नहीं है,लेकिन अधिकतर ओपिनियन पोल किसी ख़ास पार्टी द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से वित्तपोषित होते हैं,जो उसके हित और बढ़त को प्रदर्शित करते हैं। यह काम कोई एक पार्टी नहीं करती है,बल्कि इसमें बहुत सारी पार्टियाँ लिप्त हैं। यह एक तरह का कारोबार है,जो चुनावी सीज़न देखकर शुरू किया जाता है। बहुत सारी पार्टियाँ छद्म रूप से एजेंसियों से सहयोग लेती हैं या बहुत सारी एजेंसियाँ ही कुछ पार्टियों के सहयोगी के रूप में काम करती हैं। क़ानूनी तौर पर इन्हें पकड़ा नहीं जाता या क़ानूनी काग़ज़ों से ये मुस्तैद रहती हैं। यहीं कारण है कि एक ही चुनाव को लक्ष्य करके हुए,अलग-अलग सर्वे,भिन्न-भिन्न परिणाम दिखाते /दर्शाते हैं। एक करोड़ की आबादी में मुठ्ठी भर लोगों का सैंपल ज़ाहिर है,सही,सटीक और वैज्ञानिक उत्तर नहीं मिल पाता। कोई ज़रूरी नहीं है कि सर्वे में जिनका विचार लिया गया है,वो वोट भी दिए हों या जिसके पक्ष में राय दिये हों उसी को वोट भी दिए हों। यह एक तरह का पूर्वानुमान है,जो अक्सर ग़लत साबित होता रहा है। ओपिनियन पोल से चुनावी नतीजों को की भविष्यवाणी करके मतदाताओं को एक हद तक प्रभावित किया जाता है। उन्हें गुमराह किया जाता है और उनपर एक तरह का मनोवैज्ञानिक दबाव भी बनाया जाता है। ख़ासतौर पर वहाँ,जहाँ का चुनावी माहौल साम्प्रदायिक सेंटीमेंट पर लड़ने और जीतने की रणनीति बनायी जाती है। इसलिए ओपिनियन पोल को ‘पेड ओपिनियन पोल’ की संज्ञा देना ग़लत न होगा। हालिया ओपिनियन पोल पर हुए ‘स्टिंग औप्रेशन’ (ऑपरेशन प्राइम मिनिस्टर, न्यूज़ एक्सप्रेस) के बाद भले इसकी निष्पक्षता पर सवाल उठने लगी हो,लेकिन यह खेल कभी भरोसेमंद नही रहा, हमेशा इसे संदिग्ध नज़र से देखा-परखा गया।

सर्वे की बानगी पाँच : 2014 के लोकसभा चुनाव पर केन्द्रित ताज़ा चुनावी सर्वे में जिस अंदाज में बीजेपी की बढ़त को दिखाया गया है। इससे कांग्रेस भी बेकला गयी है। इससे लगता है कि सर्वे की दुनिया में एक बड़ा खेल,खेला जा रहा है। यहाँ मामला किसी सर्वे एजेंसी तक सीमित नहीं है,एजेंसी के मुँह से कौन क्या बुलवा रहा है,इसपर सोचने और निष्पक्ष विश्लेषण करने की जरूरत है । इस तरह के सर्वे सच साबित नहीं हो रहे हैं,लिहाज़ा इन पर रोक लगनी चाहिए। सर्वे को आधार बनाकर मुख्यधारा का मीडिया ‘सर्वे सनसनी’ फैला रहा है। इस तरह के सर्वे को मीडिया ख़बरों का आधार बना रहा है और बड़े पैमाने पर विज्ञापन का खेल,खेल रहा है। सर्वे आधारित ख़बरें जनता को भ्रमित कर रही हैं। इसके लिए राजनैतिक पार्टियाँ बड़े पैमाने पर मीडिया का सहारा ले रही हैं। यहीं कारण है कि सत्ताधारी पार्टियों से लगायत अन्य पार्टियाँ विज्ञापनों के मद में अकूत धन ख़र्चा कर रही हैं। यह धन कहाँ से आ रहा है और कहाँ जा रहा है। इसका निष्पक्ष और सार्वजनिक हिसाब-किताब नहीं है। चुनाव आयोग को इस पर भी विचार करना चाहिए । क्योंकि यह पूरा खेल एक ख़ास राजनैतिक मंशा के तहत खेला जा रहा है,जिसका भंडाफोड़ होना चाहिए और इसपर प्रतिबंध लगना चाहिए। 

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Sunday, February 16, 2014

पेंगुइन को एक वाजिब व जिम्मेदाराना फटकार...जरुर पढ़ें...

पेंगुइन तुम इतना डर किस बात से गए?  --अरुंधति रॉय
सुनीता भास्कर shared a link on Facebook on Yesterday (Saturday 15 Feb 2014 को बजे 
अमेरिकी लेखक वेंडी डॉनिगर की `द हिन्दू: एन ऑलटरनेटिव हिस्ट्री` को पेंगुइन ने एक अनजान से कट्टर हिंदू संगठन के दबाव में `भारत` के अपने ठिकानों से हटाने का फैसला किया है। मशहूर लेखिका-एक्टिविस्ट अरुंधति रॉय जिनकी खुद की किताबें भी इस प्रकाशन से ही आई हैं, ने पेंगुइन को यह कड़ा पत्र लिखा है जो Times of India में छपा है।पत्र का हिंदी अनुवाद:
सुनीता भास्कर 
तुम्हारी इस कारगुजारी से हर कोई स्तब्ध है। तुमने एक अनजान हिंदू कट्टरवादी संस्था से अदालत के बाहर समझौता कर लिया है और तुम वेंडी डॉनिगर की `द हिन्दू: एन ऑलटरनेटिव हिस्ट्री` को भारत के अपने किताबघरों से हटाकर इसकी लुगदी बनाने पर राजी हो गए हो। कोई शक नहीं कि प्रदर्शनकारी तुम्हारे दफ्तर के बाहर इकट्ठा होकर अपनी निराशा का इजहार करेंगे। 

कृपया हमें यह बताओ कि तुम इतना डर किस बात से गए? तुम भूल गए कि तुम कौन हो? तुम दुनिया के सबसे पुराने और सबसे शानदार प्रकाशकों में से हो। तुम प्रकाशन के व्यवसाय में बदल जाने से पहले और किताबों के मॉस्किटो रेपेलेंट और खुशबुदार साबुन जैसे बाज़ार के दूसरे खाक़ हो जाने वाले उत्पादनों जैसा हो जाने से पहले से (प्रकाशन में) मौज़ूद हो। तुमने इतिहास के कुछ महानतम लेखकों को प्रकाशित किया है। तुम उनके साथ खड़े रहे हो जैसा कि प्रकाशकों को रहना चाहिए। तुम अभिव्यक्ति की आजादी के लिए सबसे हिंसक और भयावह मुश्किलों के खिलाफ लड़ चुके हो। और अब जबकि न कोई फतवा था, न पाबंदी और न कोई अदालती हुक्म तो तुम न केवल गुफा में जा बैठे, तुमने एक अविश्वसनीय संस्था के साथ समझौते पर दस्तखत करके खुद को दीनतापूर्ण ढंग से नीचा दिखाया है। आखिर क्यों? कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए जरूरी हो सकने वाले सारे संसाधन तुम्हारे पास है। अगर तुम अपनी ज़मीन पर खड़े रह पाते तो तुम्हारे साथ प्रबुद्ध जनता की राय और सारे न सही पर तुम्हारे अधिकांश लेखकों का समर्थन भी होता। तुम्हें हमें बताना चाहिए कि आखिर हुआ क्या। आखिर वह क्या है, जिसने तुम्हें आतंकित किया? तुम्हें अपने लेखकों को कम से कम स्पष्टीकरण देना तो बनता ही है।
चुनाव में अभी भी कुछ महीने बाकी हैं। फासिस्ट् अभी दूर हैं, सिर्फ अभियान में मुब्तिला हैं। हां, ये भी खराब लग रहा है पर फिर भी वे अभी ताकत में नहीं हैं। अभी तक नहीं। और तुमने पहले ही दम तोड़ दिया।

हम इससे क्या समझें? क्या अब हमें सिर्फ हिन्दुत्व समर्थक किताबें लिखनी चाहिए। या `भारत` के किताबघरों से बाहर फेंक दिए जाने (जैसा कि तुम्हारा समझौता कहता है) और लुगदी बना दिए जाने का खतरा उठाएं? शायद पेंगुइन से छपने वाले लेखकों के लिए कुछ एडिटोरियल गाइडलाइन्स होंगी? क्या कोई नीतिगत बयान है?
साफ कहूं, मुझे यकीन नहीं होता, यह हुआ है। हमें बताओ कि यह प्रतिद्वंद्वी पब्लिशिंग हाउस का प्रोपेगंडा भर है। या अप्रैल फूल दिवस का मज़ाक था जो पहले ही लीक हो गया। कृपया, कुछ कहिए। हमें बताइए कि यह सच नहीं है।
अभी तक मैं से पेंगुइन छपने पर बहुत खुश होती थी। लेकिन अब?
तुमने जो किया है, हम सबके दिल पर लगा है।                       -अरुंधति रॉय

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ब्लूस्टार को जनरल शाहबेग का "महंगा बदला" बताया इण्डिया टुडे ने


Tuesday, February 11, 2014

भाषा के सवाल पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करती किताब-"भाषा का सच"

अपने हिंदी भाषी होने पर अफसोस आखिर क्यूँ ?
अगर लोकतंत्र में काबलियत की बजाये आंकड़ा तंत्र छाता जा रहा है, सियासत में सत्ता लोलुपता बढ़ रही है तो हालत मीडिया की भी अच्छी नहीं रही। अगर कोई वेश्या किसी मजबूरी के कारण अपना  जिस्म बेचती है तो हमारे आज के बहुत से कलमकार अपनी दिमागी और जिस्मानी मेहनत के साथ साथ अपनी सोच भी बेच रहे हैं--अपने ख्यालात भी बेच रहे हैं और जनता के सामने लगातार वही सच सामने ला रहे हैं जिसे उनके मालिक लोग देखना चाहते हैं। पेड न्यूज़ का सबसे अधिक दुष्प्रभाव पड़ने वाला है आम आदमी पर। सच को दबाने  बदलने की जितनी साज़िशें आज हो रही हैं पहले शायद कभी नहीं थीं। कुछ महीने पूर्व जब अनिल चमड़िया लुधियाना के एक गांव की सभा में आये थे तो उन्होंने बहुत सी सच्चाईयों से आम जनता को वाकिफ करवाया था। तब से एक उम्मीद बंधी थी कि सच की मशाल को थामने वाले अभी भी हैं। एक बार फिर यह विश्वास हुआ कि सच की आवाज़ फिर बुलंद होगी। चमक दमक के इस दौर में हकीकत अपने असली रूप में सबके सामने आकर रहेगी। "भाषा का सच" के बारे में जान कर यह उम्मीद और मज़बूत हुई। 
फेसबुक पर जारी हुईं अवनीश राय की पोस्टों के  मुताबिक "भाषा का सच" भाषा के सवाल पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करती किताब है। यह उन नीतियों को भी विस्तार से रखती है जिनसे मातृभाषाओं को धीरे-धीरे खत्म किया जा रहा है। मातृभाषा के खिलाफ और अंग्रेजी के पक्ष में फैलाई गई बहुत सी धारणाओं को भी यह किताब तमाम शोधों के माध्यम से दूर करती है। जाहिर है इंसाफ का सवाल भी इससे अलग नहीं है। यह किताब Media Studies Groupedia Studies Group ने प्रकाशित की है। इसके बारे में ज्यादा जानकारी भाषा का सच पर जाकर देखा जा सकता है।
हम अपने हिंदी भाषी होने पर अफसोस करते रहते है और अंग्रेजी सीखने के लिए दिन-रात लगे रहते है। यह भी जानने की कोशिश नहीं करते है कि जब तक हम अपनी ही भाषा को ठीक से नहीं समझेंगे, तब तक अन्य भाषाओं को कैसे समझ पाएंगे। अपनी भाषा के साथ अन्य भाषाओं को सीखने में भी आसानी होती है, यह बात विदेशों में भी मानी गई। और यूनेस्को के सर्वेक्षणों में यह बात साबित हुई है।
इससे कोई इँकार नहीं कर सकता कि सही समझ और बेहतर संचार के लिए मातृभाषा का बहुत महत्व है। इस किताब में इसी विषय को लेकर शोधपरक लेख सम्मिलित किए गए हैं। साथ ही इस विषय पर भी गंभीर चर्चा है कि किस तरह कुछ एक भाषाएं बाकी भाषाओं पर कब्जा कर रही हैं। यह किताब आपको विश्व पुस्तक मेले में Media Studies Group के स्टैंड पर मिलेगी।
हम अपने हिंदी भाषी होने पर अफसोस करते रहते है और अंग्रेजी सीखने के लिए दिन-रात लगे रहते है। यह भी जानने की कोशिश नहीं करते है कि जब तक हम अपनी ही भाषा को ठीक से नहीं समझेंगे, तब तक अन्य भाषाओं को कैसे समझ पाएंगे। अपनी भाषा के साथ अन्य भाषाओं को सीखने में भी आसानी होती है, यह बात विदेशों में भी मानी गई। और यूनेस्को के सर्वेक्षणों में यह बात साबित हुई है।

email- msgroup.india@gmail.com

9968771426
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ब्लूस्टार को जनरल शाहबेग का "महंगा बदला" बताया इण्डिया टुडे ने


Monday, February 10, 2014

ऐतराज़ उठने पर पेगुइन ने तत्काल प्रभाव से वापिस ली पुस्तक

Mon, Feb 10, 2014 at 8:46 PM 
शिक्षा बचाओ आन्दोलन को मिली सफलता 
नई दिल्ली: 10 फरवरी 2014: (राजीव गुप्ता//मीडिया स्क्रीन):
आज दिनांक 10 फरवरी 2014 को श्री दीनानाथ बत्रा तथा अन्य और पेगुइन पब्लिसर्स के मध्य में सिविल सूट नं. 360/2011 के मध्य अनुबंध हुआ है जिसमें:-
      पेगुइन बुक इंडिया प्राईवेट लिमिटेड ने तत्काल प्रभाव से हिन्दुत्व तथा वैकल्पिक इतिहास की पुस्तक को तत्काल वापस ले लिया है तथा उसके द्वारा अपने खर्च पर सम्पूर्ण पुस्तकें देश से एकत्रित करा ली जाएगी और उनको नष्ट कर दिया जाएगा.
·         यह पुस्तक पुनः से प्रकाशित नहीं होगी.
·         पुस्तक में हिन्दु देवी-देवताओं का अपमान, क्रान्तिकारियों तथा इतिहास को विकृत रूप से प्रस्तुत करने के परिणामस्वरूप यह मुकदमा अतिरिक्त जिला न्यायाधीश साकेत की अदालत में केस दर्ज किया गया था.

आपत्तिजनक अंश जैसे:-
      गांधी जी एक विचित्र व्यक्ति थे जो छोटी-छोटी लड़कियों के साथ सोते थे - पृष्ठ-625
     स्वामी विवेकानन्द ने लोगों को गोमांस भक्षण का सुझाव दिया- पृष्ठ-639
     लक्ष्मीबाई अंग्रेजों के प्रति निष्ठावान थी- पृष्ठ-586
     हिन्दुओं का कोई मूलग्रन्थ नहीं है- पृष्ठ-25
     सीता लक्ष्मण पर आरोप लगाती है कि लक्ष्मण की उनके प्रति कामभावना है - पृष्ठ-14

शिक्षा बचाओ आन्दोलन के मीडिया प्रभारी राजीव गुप्ता ने बताया कि पेगुइन बुक इंडिया प्राईवेट लिमिटेड की ओर से कहा गया कि हम सब धर्मों का सम्मान करते है. अतः वें इस पुस्तक को वापस ले रहे है. अब यह पुस्तक न आगे से छापी जाएगी और बची हुई पुस्तकों को बेचा नहीं जाएगा. यह अनुबंध श्री बलबंत राय बंसल ए.डी. जे कोर्ट नं. 615 के न्यायालय में प्रस्तुत किया गया. माननीय न्यायधीश ने इसे स्वीकृति प्रदान की. याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्रीमती मोनिका अरोड़ा उपस्थित रही.

ब्लूस्टार को जनरल शाहबेग का "महंगा बदला" बताया इण्डिया टुडे ने 

Saturday, February 8, 2014

ब्लूस्टार को जनरल शाहबेग का "महंगा बदला" बताया इण्डिया टुडे ने

संत भिंडरांवाले को बताया ग्रंथी और विद्रोही गुट का नेता 
लुधियाना: ब्लू स्टार आपरेशन में ब्रिटिश दखल की बात उठी तो सिख समाज के साथ साथ मीडिया में भी एक फिर तूफ़ान आ गया।  इसके साथ ही शुरू हुई सिख समाज के दर्द को भुनाने की एक और नयी कोशिश। क्यूंकि व्यापारी समाज के लिए हर बात  एक व्यापार  आंसुयों का व्यापर, जज़बात का व्यापार और खबरों का सिलसिला भी अब एक व्यापार बन गया है। कहा कुछ जाता है पर उसका छुपा मकसद कुछ और ही होता है।   बात को घुमा फिरा कर अर्थों का अनर्थ।  इण्डिया टुडे  (हिंदी)  नाज़ुक और संवेदनशील मामले को एक बार फिर सनसनी का आवरण औड़ाते हुए बहुत से नए तथ्य सामने लाने का दावा करता महसूस होता है।  इस आवरण स्टोरी में जहाँ कुछ काम की बातें भी हो सकती हैं वहीँ पत्रिका के इरादे छुपे नहीं रह सके। पत्रिका ने अपना पक्षपात एक बार फिर ज़ाहिर कर  दिया है। जहाँ पत्रिका ने गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी की ओर से स्थापित  दमदमी टकसाल के चौहदवें उत्तराधिकारी संत जरनैल सिंह भिंडरांवाले को एक "तेज़तर्रार ग्रंथी" बताया है वहीँ ब्लू स्टार ऑपरेशन को सही करार देने के प्रयास में यह भी कहा है कि उसके नेतृत्व में सिखों के एक विद्रोही गुट ने "जंग" छेड़  रखी थी और 1981 से 1984 तक 100 से अधिक आम नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों की जान ले ली थी। यह भी कहा कि भिंडरांवाला अपने हथियारबंद साथियों के घेरे में सिखों के सबसे पवित्र गुरुद्धारे में छिपा बैठा था। इस पत्रिका की इस आवरण कथा का चालाक लेखक यह नहीं बताता कि अगर समस्या केवल सवर्ण मंदिर में ही थी तो पंजाब के अन्य 36 गुरुद्धारों में सैनिक एक्शन क्यूँ किया गया?  क्या इतना बड़ा मीडिया हाऊस नहीं जानता कि सिखों के लिए वे अन्य गुरुद्धारे भी बहुत महत्वपूर्ण और पवित्र थे और रहेंगे।
आगे जाकर इण्डिया टुडे इंदिरा गांधी को बेहद संवेदनशील साबित करने के प्रयास में कहता है कि इंदिरा गांधी ने आपरेशन सनडाऊन की उस परियोजना को केवल इस लिए रद्द कर दिया था क्यूंकि उसमें अधिक नुक्सान होने का खतरा था। गौरतलब है कि इस योजना के अंतर्गत  हेलीकाप्टरों और स्पेशल ट्रेंड कमांडोज़ के ज़रिये होना था और  संत जरनैल सिंह भिंडरांवाले का अपहरण किया जाना था।
अपनी इस सारी "सच्ची कहानी" में पत्रिका ने यही प्रभाव देने का प्रयास किया कि जैसे वहाँ हमला करने गए सेनिक तो बेचारे सिखों का शिकार हो रहे थे। पत्रिका ने कहीं नहीं कहा कि इंदिरा गांधी ने इस एक्शन के लिए श्री गुरु अर्जुन देव जी के शहीदी पर्व का दिन क्यूँ चुना? वहाँ उस पावन दिवस पर माथा टेकने गए श्रद्धालुयों में बच्चे भी थे--महिलाएं भी और बज़ुरग भी---उनमें से किसी के  नहीं थे। सेना ने उन को भी निशान बनाया जिसकी हकीकत एक बार नहीं बहुत बार मीडिया में आ चुकी है। इसके बावजूद इण्डिया टुडे बताता है कि जब इंदिरा गांधी को खबर मिली कि बहुत बड़ी संख्या में सैनिक और असैनिक मरे गए हैं तो इंदिरा गांधी के मुँह से निकला"हे भगवान"। इसके साथ ही स्व्तंत्र भारत के इस इतने बड़े युद्ध के वास्तविक कारणों पर पर्दा डालने ले नापाक प्रयास में इण्डिया टुडे इसे जनरल शाहबेग सिंह का एक व्यक्तिगत बदला बताता है।  पत्रिका ने लिखा है-"सेना के नायक रह चुके शाबेग ने सेना से बहुत महंगा बदला लिया।"
फिर भी इस पत्रिका को बड़े पैमाने पर पढ़ा जाना चाहिए ख़ास तौर पर सिख सियासत और सिख इतिहास से जुड़े कलमकारों और पाठकों दोनों को।  तभी इस तरह साज़िशी कलमों का जवाब कलम से दिया जा सकेगा। आपके विचारों की इंतज़ार बनी रहेगी। चुनावी मौसम है इसलिए इस तरह के बहुत से नए मामले सामने आएंगे सनसनी के आवरण मेंलपेटे हुए तांकि आम लोगों को दाल रोटी का सच भूला रहे, क्रांति का सच भूला रहे--सियासतदानों के घोटालों का सच भूला रहे---और लोग उलझे रहे साम्प्रदायिक टकरावों में। इस तरह के मामले जनता का ध्यान असली सच से हटाने की साज़िश मात्र हैं। -रेकटर कथूरिया 
ब्लू स्टार को जनरल शाहबेग का महंगा बदला बताया इण्डिया टूडे ने