Tuesday, June 2, 2020

कामरेड तारिक दा को जैसा मैंने देखा--एम एस भाटिया

कामरेड तारिक दा ने इस साजिश को बहुत पहले भांप लिया था 
लुधियाना: 2 जून 2020: (कामरेड एम एस भाटिया का विशेष पोस्ट कामरेड स्क्रीन में भी ):: गांव गांव में बिजली का की तारें, गांव गांव में टेलीफोन का नेटवर्क, घर घर तक बैंक की सुविधा और हर गांव के हर घर तक स्वास्थ्य लाभ की सुविधाएँ। इस सब को हर गांव के हर घर तक पहुंचना आसान नहीं था।  सरकारी कर्मचारियों ने बहुत ही मुश्किलें उठा कर इस काम को पूरा किया। इस सब के पूरा होते ही इस पर आंख लग गयी पूंजीपतियों की। वे सारे का सारा विकसित ढांचा अपनी मुट्ठी में करने के लिए अपना जाल बिछाने लगे। इसके साथ ही शुरू हो गया देश की नई गुलामी का सिलसिला। बहुत सी कंपनियां हमारी मालिक बन बैठी। 
देश के पब्लिक सेक्टर को निजी हाथों में सौंपने की तैयारियां वास्तव में बहुत पहले से ही शुरू हो गईं थीं और कामरेड तारकेश्वर दा जैसे लोग इस सारी साजिश को बहुत पहले से ही भांप गए थे। खतरे ही खतरे थे। अँधेरा ही अंधेरा था। हालात नाज़ुक रुख अख्तियार कर रहे थे। कामरेड तारिक दा ने देख लिया था इस खतरनाक अँधेरे भविष्य का भयावह दृश्य कि नौकरियां भी खतरे में आ जाएंगी और पूरे का पूरा पब्लिक सेक्टर भी। उनकी दूरदर्शी निगाहों ने यह सब बहुत पहले देख लिया था। सत्ता पर बैठे लोग किस तरफ जा रहे हैं इसकी भनक उन्हें लग गयी थी। पूंजीवाद की हवा आंधी की तरह चलने लगी थी। 
उस वक्त उन्होंने इस साजिश के खिलाफ ज़ोरदार आवाज़ बुलंद की। इस तरह का सारा विवरण और सभी घटनाएँ बता रहे हैं उन्हें बहुत ही नज़दीक से देखने वाले कामरेड एम एस भाटिया जो पत्रकार होने के साथ साथ सीपीआई की लुधियाना इकाई के वित्तीय सचिव भी हैं---पढिये कामरेड तारिक दा के सम्बन्ध में कामरेड भाटिया का विशेष पोस्ट कामरेड स्क्रीन में भी---




Sunday, May 31, 2020

वेब मीडिया में रोजगार की असीम संभावनाएं:जयदीप कर्णिक

माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय की तरफ से विशेष आयोजन
भोपाल: 31 मई 2020: (कार्तिका सिंह//मीडिया स्क्रीन ऑनलाइन)::
डिजिटल मीडिया या वेब मीडिया को लेकर बहुत सी भ्रांतियां पाई जा रही हैं। बहुत से लोग इसे मुख्या धारा का मीडिया ही नहीं समझते। बहुत से लोग यह कहते भी सुने जाते हैं कि वेब मीडिया को सरकार बंद करवाने वाली है। इस तरह के आधारहीन प्रचार पर विराम लगाते हुए एक विशेष सेमिनार में कहा गया है कि इस क्षेत्र में असीम सम्भवनाएं हैं। इस सेमिनार का आयोजन माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की तरफ से कराया गया। सेमिनार  में  कहा गया कि वेब मीडिया के क्षेत्र में रोजगार की असीम संभावनाएं हैं। इस क्षेत्र में युवा पत्रकार एक उद्यमी के रूप में अपना करियर बना सकते हैं। कोरोना संकट ने वेब मीडिया के महत्व को और अधिक प्रतिपादित कर दिया है। पत्रकारिता में अब ‘वर्क फ्रॉम होम’ की संस्कृति विकसित हो रही है। ये विचार देश के जाने-माने पत्रकार श्री जयदीप कर्णिक ने व्यक्त किया। 
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के आयोजन ‘हिन्दी पत्रकारिता सप्ताह’ के अंतर्गत उन्होंने ‘वेब मीडिया में उद्यमिता’ विषय पर अपना संबोधन दिया। इस मौके पर उन्होंने अनेक प्रश्नों के उत्तर भी दिए। वेब मीडिया में अपना करियर बनाने वाले युवाओं की जिज्ञासा का समाधान किया।
श्री कर्णिक ने कहा कि हमारे देश में परम्परागत मीडिया एवं टेलीविजन मीडिया एक महंगा उद्योग है जो विज्ञापन आधारित है। विज्ञापन कम मिलने पर परम्परागत मीडिया के सामने तमाम तरह की परेशानियां आने लगती हैं। पत्रकारों पर भी संकट रहता है। जबकि डिजिटल मीडिया में कोई भी व्यक्ति वेबसाइट बनाकर लैपटॉप या फिर मोबाइल से ही काम शुरू कर सकता है। इसमें लागत बहुत कम है। सबसे अच्छी बात यह है कि वह स्वयं ही रिपोर्टर, मालिक एवं सम्पादक होता है। कम पूँजी में वेव मीडिया में उद्यमी बन सकते हैं।
उन्होंने कहा कि आप सफल तभी होंगे जब आपकी वेबसाइट पर सामग्री गुणवत्तापूर्ण और विश्वसनीय होगी। वेबमीडिया के स्टार्टअप को चाहिए कि वे पर्यावरण, विज्ञान, आर्थिक, जनजातीय, गाँव जैसे विषयों पर काम करें। हिंदी भाषा में इन विषयों पर काम करने की खूब संभावनाएं हैं।
उन्होंने कहा कि उद्यमी बनने के लिए जोश, ऊर्जा और विषय का ज्ञान आवश्यक है। जब आप पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरेंगे तो सफलता निश्चित ही मिलेगी।


Tuesday, May 5, 2020

70 वर्षीय चाची को कंधे पर उठा कर पैदल चल पड़ा मज़दूर

 Tuesday: 5th May 2020 at 12:07 PM
 विकास और बुलंदी के दावों को झुठलाती मिड डे की स्टोरी हुयी वायरल 
सोशल मीडिया: 5 मई 2020: (फेसबुक पर बोद्धिसत्व)::
Bodhi Sattva ने एक सच्ची कहानी पोस्ट की। इसे जानमाने अख़बार मिड डे, मुम्बई से साभार लिया गया था। तस्वीर भी और विवरण भी। ह पोस्ट सोशल मीडिया पर बेहद लोकप्रिय हुई क्यूंकि इसमें आज का सच था वह भी बिना किसी सियासत और बिना किसी अन्य आडम्बर के। इसी पोस्ट को उनके कुछ अन्य नए पुराने मित्रों ने भी शेयर किया। किसी ने कुछ शब्द घटा दिए और किसी ने कुछ शब्द जोड़ दिए। इस सब के बावजूद इसका सच लोगों के दिलों को झंकझौरता रहा। कोरोना के शोर में दब रहे अन्य समस्यायों के दर्द जिस तरह नज़रंदाज़ किया जा रहा है उस तरह इस दर्द को न छुपाया जा सका न ही दबाया जा सका। सोशल मीडिया पर मिली लोकप्रियता ने इसे नज़रंदाज़ होने से भी बचा लिया। इसे शेयर करने वाले मित्रों ने पूछा:
इस प्यार को क्या नाम और मान दिया जाए? 
यही कह सकता हूं कि हर चाची को ऐसा भतीजा मिले। हर मां को ऐसा बेटा मिले!
ये विश्वनाथ शिंदे हैं। उम्र चालीस साल। मुम्बई में कंस्ट्रक्शन वर्कर हैं। 
वही मज़दूर। घर जा रहा मज़दूर।
उनकी गोद में उनकी चाची वचेलाबाई हैं। चाची 70 साल की हैं और उनका अब विश्वनाथ के अलावा कोई नहीं। विश्वनाथ अपनी चाची को नवी मुंबई से अकोला ले जा रहे हैं।
भतीजा चाची के लिए पिता हो गया है। चाची बेटी हो गई है। यह मनुष्यता की सबसे बड़ी उपलब्धि है। साथ और स्नेह का बंधन!
इस प्यार और मार्मिक अपनापे भरी कठिन यात्रा पर किसी सरकार की नज़र क्यों न पड़ी?
मीडिया का बहुत बड़ा हिस्सा ऐसी हकीकतों को जानबूझ कर नज़र अंदाज़ कर रहा है। मिड डे ने इसे जगह दी इसलिए मिड डे, मुम्बई को सलाम।  
*तस्वीर और जानकारी मिड-डे, मुम्बई से साभार

Friday, April 24, 2020

Media: जोड़तोड़-तिकड़म-जुगाड़ और चैनल

पर्दे के पीछे होते तिकड़मी खेलों की एक झलक 
सोशल मीडिया: 24 अप्रैल 2020: (मीडिया स्क्रीन Online)::
आज के दौर में जोड़तोड़, तिकड़म और जुगाड़ के बिना मीडिया चलाना नामुमकिन सा हो गया है। कुछ प्रभावशाली लोग चाहें तो नया चैनल भी चल सकता है और बुरा मान जाएँ तो चला चलाया चैनल बंद भी हो सकता है। इन तिकड़मों की एक झलक श्याम मीरा सिंह की नई पोस्ट में भी मिलती है। बस कुछ मिंट ही लगेंगे लेकिन पढ़िए ज़रूर और अंत तक पढिये। पर्दे के पीछे होते कई खेल नज़र आने लगेंगे।-रेक्टर कथूरिया 
अर्नब गोस्वामी और रिपब्लिक चैनल//श्याम मीरा सिंह 
6 मई 2017 के दिन पत्रकारिता के बाजार में एक नए मदारी की एंट्री होती है। मदारी अर्नब, दुकान का नाम 'रिपब्लिक'। आप रिपब्लिक टीवी के बारे में कुछ याद कीजिए-
*पहले दिन - लालू प्रसाद यादव और शहाबुद्दीन की बातचीत की स्टोरी ब्रेक की जाती है।
*दूसरे दिन - आम आदमी पार्टी के पूर्व विधायक कपिल मिश्रा को लांच किया जाता है जो आम आदमी पार्टी में स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन पर 2 करोड़ की घूसखोरी का सनसनीखेज आरोप लगाता है।
- तीसरे दिन शशि थरूर और सुनंदा पुष्कर के पुराने मामले को निकाला जाता है।
शशि थरूर के मामले में कुछ भी नया नहीं घटा था, लेकिन अर्नब इसे कई दिन तक अपने प्राइम टाइम की डिबेट में जगह देते हैं। इस बात को थोड़ा ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे को कुछ देर के लिए यहीं छोड़िए। उससे पहले एक मामला बताता हूँ। टीवीस्क्रीन पर नीचे ब्रेकिंग न्यूज में जो लिखकर आता है, पत्रकारिता की भाषा में उसे "टिकर" कहा जाता है। एक कर्मचारी केवल टिकर का काम देखने के लिए ही रखा जाता है ताकि जैसे ही कोई खबर ब्रेक हो तुरंत टीवी की हेडलाइन्स में उसे नीचे लिख दिया जाए।
ऐसे ही सितंबर महीने की बात है, माया कोडनानी मामले में अमित शाह गुजरात कोर्ट में पेशी के लिए पहुंचे। ऐसा माना जाता है कि दर्जनों मुस्लिमों की हत्या के मामले में अमित शाह की भूमिका भी थी। रिपब्लिक चैनल के टिकर कर्मचारी ने इस खबर को हेडलाइन पर लगा दिया। जैसे ही खबर टीवी पर लगी, निरंजन नारायणस्वामी ने तुरंत उस कर्मचारी को फटकार लगाते हुए कहा "Let's not touch This". निरंजन नारायणस्वामी रिपब्लिक चैनल की एडिटोरियल डेस्क के हेड थे। एडिटोरियल डेस्क से अर्थ होता है कि ऐसी समिति जो ये तय करे कि अमुक टीवी में किस तरह की खबरें चलेंगी, किस तरह की नहीं। ये पूरी खबर आपको caravan मैगज़ीन की डिटेल्ड स्टोरी "No Land's Man" में मिल जाएगी।
क्या आपने कभी सोचा? कि वो इंसान जो लालू प्रसाद यादव, केजरीवाल से लेकर शशि थरूर को तीन दिन के अंदर लाइन में लगा देता है वह अमित शाह का नाम आते ही शंट कैसे हो जाता है?
इस सवाल का जबाव आपको रिपब्लिक चैनल के जन्म लेने की कहानी में मिलेगा। राजीव चंद्रशेखर नाम से एक बड़े उद्योगपति हैं, आपने टीवी, फ्रिज बनाने की कम्पनी BPL का नाम सुना है? सुना ही होगा खैर, इसी कंपनी ने 1995 के दौर में मोबाइल बनाने का काम शुरू किया था। इस पूरे प्रोजेक्ट को बनाने वाले आदमी का नाम था राजीव चंद्रशेखर। बाद में राजीव चंद्रशेखर कर्नाटक से दो बार राज्यसभा सांसद बने हैं, लेकिन इंडिपेंडेंट। देश में भाजपा सरकार आने के बाद ही राजीव चन्द्रशेखर की कोशिश थी कि कैसे भी मोदी सरकार की कैबिनेट में जगह मिल जाए। चूंकि सांगठनिक रूप से चंद्रशेखर कुछ भी नहीं थे, कोई अनुभव नहीं था। इसलिए उन्होंने दिल्ली मीडिया में इन्वेस्टमेंट के लिए प्लान बनाया। इसके लिए उन्होंने न्यूजएक्स से लेकर एनडीटीवी तक में बात की। लेकिन बात नहीं बनी। उन्हीं दिनों अर्नब गोस्वामी ने टाइम्स नाउ से इस्तीफा दिया था। अर्नब अपने लिए इन्वेस्टर ढूंढ रहे थे। राजीव अपने लिए एक बाजीगर ढूंढ रहे थे। बस इसी मोड़ पर दोनों का मिलन होता है।
रिपब्लिक टीवी चैनल को AGR Outlier Media Private Limited कंपनी के अंतर्गत शुरू किया जाता है। इसमें 26 करोड़ रुपए अर्नब गोस्वामी और उनकी पत्नी सम्यब्रत रे गोस्वामी और 30 करोड़ रुपए अकेले राजीव चंद्रशेखर के होते हैं। ये 30 करोड़ रुपए राजीव ने "जुपिटर कैपिटल" नाम की एक कम्पनी के माध्यम से इन्वेस्ट किए। इस कम्पनी का नाम याद कर लीजिए। आगे का पूरा खेल समझने में यही नाम आपके काम आने वाला है।
साल 2016 में राजीव चंद्रशेखर को केरल में भाजपा गठबंधन (NDA) का उपाध्यक्ष बनाया गया। साल 2014 में भी चंद्रशेखर केरल की तिरुवनंतपुरम सीट से टिकट लेना चाहते थे। तब नहीं मिली तो उनकी नजर साल 2019 के चुनावों में तिरुवनंतपुरम से लोकसभा सीट लेने पर हो गई। ये वही सीट है जहां से शशि थरूर सांसद हैं।
अब समझ आया? अर्नब गोस्वामी ने अपने चैनल के तीसरे तीन ही शशि थरूर और उनकी पत्नी के एक पुराने मामले को ब्रेकिंग न्यूज क्यों बना दिया था? राजीव चंद्रशेखर को तिरुवनंतपुरम में मजबूत करने के लिए।
इसके अलावा याद होगा किस तरह अर्नब गोस्वामी ने एक संघ कार्यकर्ता की मौत के लिए सीपीआई वर्कर्स को जिम्मेदार ठहराते हुए ये पूरा झूठ दिनभर टीवी पर बेचा था कि सीपीआई कार्यकर्ता तिरुवनंतपुरम में आरएसएस कार्यकर्ताओं की हत्या करते हैं। इसके पीछे एक ही कारण था चंद्रशेखर के लिए तिरुवनंतपुरम के मैदान को साफ करना।
साल 2014 में चन्द्रशेखर को भाजपा ने संसद की डिफेंस स्टैंडिंग कमिटी का सदस्य बना दिया। इस कमिटी का काम सरकार द्वारा डिफेंस सेक्टर में की गई खरीद फरोख्त पर नजर रखना। साल 2016 की बात है। एक कम्पनी थी Axiscades Aerospace & Technologies नाम से। इसका शार्ट नाम है ACAT. साल 2016 में सरकार ने इसे 88 aircraft-recognition training systems सप्लाई करने का एक कॉन्ट्रैक्ट दिया। तब से लेकर ऐसे अनगिनत कॉन्ट्रैक्ट इस कम्पनी को दिए गए। क्या आप जानते हैं इस ACAT कम्पनी में किसका पैसा लगा हुआ है?
मैं बताता हूँ, साल 2015 तक इस कम्पनी में 75 प्रतिशत शेयर जुपिटर कैपिटल के थे। वही जुपिटर कैपिटल जिसके मालिक चंद्रशेखर हैं। देखिए ये कितना बड़ा घपला है कि सरकार जिस कम्पनी को कॉन्ट्रैक्ट दे रही थी उस कम्पनी का मालिक "डिफेंस स्टैंडिंग कमिटी" का मेम्बर था। ये कितना बड़ा "कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट" है? मतलब जिस आदमी को कॉन्ट्रैक्ट बांटने का जिम्मा सौंपा गया है वही कॉन्ट्रैक्ट ले ले रहा है। ये ऐसा भ्रस्टाचार है जो सीधे सीधे भ्रस्टाचार के रूप में नहीं पकड़ा जा सकता। इस पूरे मसले पर "द वायर" ने एक डिटेल्ड रिपोर्ट की थी, उस खबर के बाद ही राजीव चन्द्रशेखर ने द वायर पर डिफेमेशन का केस कर दिया था।
ऐसा बताया जाता है कि प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से राजीव चंद्रशेखर के पास 7500 करोड़ की संपत्ति है। राजीव के पास 120 करोड़ रुपए का एक प्रायवेट जेट भी है। और उसका खिलौना अर्नब आज इतने बड़े चैनल का मालिक बन चुका है। दोनों शान से रहते हैं। ऐश की जिंदगी जीते हैं। नई खबरों के अनुसार आज रिपब्लिक न्यूज चैनल में अर्नब गोस्वामी और उनकी पत्नी के शेयर सबसे अधिक हो गए हैं। इसलिए किस दिन टीवी पर कौन सा एजेंडा चलाना है उसका निर्णय फिलहाल वे खुद ले सकते हैं। अर्नब, केंद्र सरकार और उसके समर्थकों की ताकत से भलीभांति परिचित हैं, इसलिए इस समय उनकी भाषा किसी सरकारी भौंपू से भी निचले स्तर पर आ गिरी है।
चैनल के पिछले मालिक यानी राजीव और नए मालिक यानी अर्नब दोनों करोड़पति हैं, दोनों को सरकार से फायदा होता है, दोनों सरकार का फायदा करते हैं। दोनों लग्जीरियस लाइफ जीते हैं। लेकिन इससे आपको क्या मिला? अर्नब ने आपकी रोजी रोटी के कितने सवाल सरकार से पूछे? महामारी के कारण आपके रोजगार बन्द हैं, आपकी दुकाने बन्द हैं, आपके ठेले बन्द हैं। आपकी भूख, और रोटी के सवाल न पूछकर अर्नब अभी भी हिन्दू-मुसलमान में आपको उलझाए हुए है! आखिर क्यों? आप क्यों इस बात को नहीं समझते, आप सिर्फ यूज किए जा रहे हैं।
इस पूरे खेल को समझना उतना भी मुश्किल नहीं है। आप सच में इसे समझने के लिए गंभीर हैं तो आप आराम से समझ सकते हैं कि सरकार ने चंद्रशेखर को डिफेंस स्टैंडिंग कमिटी का सदस्य क्यों बनाया? और राजीव ने अर्नब के चैनल में पैसा क्यों लगाया।
अब समझ आया? जो आदमी पूरे दिन सोनिया, सोनिया, राहुल राहुल, लालू, लालू कर सकता है वह अमित शाह का नाम लिखने से पहले ही ये क्यों कह देता है कि "Let's not touch This"
 फेसबुक पर श्याम मीरा सिंह इ प्रोफाईल-वाल से साभार 

Monday, March 23, 2020

हो सकता है अब ज़्यादा दिनों तक अख़बार घरों में न आये

मुंबई, चंडीगढ़ और अन्य क्षेत्रों के हॉकरों में भी बेचैनी
मुंबई//चंडीगढ़//लुधियाना: 23 मार्च 2020: (मीडिया स्क्रीन ऑनलाइन)::
कोरोना का कहर टूटा तो पूरी दुनिया सतर्क हो गई।  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक आह्वान किया तो पूरा देश जनता कर्फ्यू के लिए तैयार हो गया। देश के हर वर्ग ने इसे सफल भी बनाया। उसके बाद 31 मार्च 2020 तक लॉकडाउन का एलान भी हुआ। लोकल डाउन जारी है। इस सारे संकट में जो वर्ग उपेक्षित से रह गए उनमें अख़बार को घर घर पहुंचने वाला हॉकर वर्ग भी शामिल है। अख़बार को सुबह सुबह हर घर और दफ्तर में पहुंचाने वाला हॉकर कोरोना से कैसे बचे? इस की चिंता किसी ने नहीं की। न सरकार ने, न अख़बारों के मालिकों ने और न ही समाज ने। रोज़ की खबरें पढ़ने के बाद कोरोना की मार का डर हॉकर और उसके परिवार को भी सता रहा है। वह कैसे बचे इससे उसे समझ नहीं आ रहा। एक मास्क और कम से कम एक सैनिटाईज़र की कीमत बाजार में जितनी कम से कम भी वसूली जा रही है उससे कहीं कम पैसे उसे उसके किसी एक ग्राहक के घर या दुकान से मिलते हैं वह भी महीना अख़बार देने के बाद। कितने मास्क और सैनिटाईज़र वह बाजार से खरीदे और अख़बार का पैसा कहाँ से पूरा करे? तंग आ कर उसने भी कहा हर ज़ोर ज़ुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है।
मुंबई में हॉकरों ने हड़ताल शुरू की तो सोमवार को बहुत से अख़बारों के प्रिंट एडिशन नहीं छपे। उन्होंने कहा कि  हमारे पाठक अब हमारे डिजिटल एडिशन में ही सारा पेपर पढ़ें। इसी तरह कल को बहुत  में छपने वाले साप्ताहिकों, पाक्षिक पत्रों और मासिक पत्रिकाओं की बारी भी आनेवाली है जो बहुत बड़ी संख्या में छपते और प्रसारित होते हैं। बहुत बड़े बड़े मीडिया हाऊस इन्हें चलाते हैं। किसी ने भी हॉकरों की की। 
चंडीगढ़, खरड़, मोहाली और अन्य क्षेत्रों में भी यही दर्द महसूस किया गया। चंडीगढ़ के हाकर वितरक संगठन के अध्यक्ष मदन शर्मा ने "जरूरी सूचना" शीर्षक से एक ब्यान व्हाट्सप्प पर जारी किया। उसमें उन्होंने कहा,"सभी प्रसार संस्थानों,,,वितरक साथियो एव एजेंट भाइयो को सूचित किया जाता है कि चंडीगढ़ वितरक संघ कोरोना महामारी के विकराल रूप लेने एवं चण्डीगढ़ प्रसाशन की लॉक डाउन की नोटिफिकेशन जारी होने हालांकि बन्द होने की श्रेणी में अखबार वितरण नही है फिर भी वितरक संघ अपने वितरक साथियो काम करने वाले हमारे सह वितरको,,एजेंटों,, प्रसार परिवार के हर साथियो की सुरक्षा एव कुशलता,,,उनकी भावनाओ के अनुरूप  कल से यानी 23/03/2020 से किसी भी प्रकार का अखबार वितरण संघ की अगली नोटिफिकेशन तक नही कर पायेगा,सभी संस्थानों से विनम्रतापूर्वक निवेदन है,की उक्त नोटिफिकेशन का सज्ञान लेते हुए कल से किसी भी प्रकार की वितरण सामग्री प्रकाशित ना करे,वितरक संघ आप सभी से सहयोग की अपेक्षा करता है। 
इसी मुद्दे को लेकर लुधियाना में भी मीटिंगों का सिलसिला जारी है। जब सोमवार को लोगों के घरों में "दैनिक भास्कर" अख़बार नहीं पहुंचा तो बहुत से घरों ने अपने अपने हाकर  फोन पर सम्पर्क किया। जवाब था आज भास्कर नहीं आया क्यूंकि  हॉकरों ने उसे उठाने से मना कर दिया। अन्य अखबारों से भी बात चल रही है। अब देखना है कि इस हड़ताल के दूरगामी प्रभाव क्या नज़र आते हैं। अगर समाज में संवेदनशीलता बची है तो उसे समाज का महत्वपूर्ण अंग बने हुए हॉकर वर्ग का ध्यान रखना ही होगा। सुबह सुबह जब हम सब सो रहे होते हैं तो होकर जाग रहा होता है तांकि हमें दिन भर की खबरों वाला अख़बार पहुंचा सके। क्या हमारा सब का कोई फ़र्ज़ नहीं उसके प्रति?

पंजाब स्क्रीन हिंदी में भी पढ़िए यही खबर
कर्फ्यू के दौरान छूट अब बुधवार 25 मार्च को ही मिलेगी

Read in Punjab Screen English also
Curfew Relaxation Starts From 25th March Wednesday

ਪੰਜਾਬ ਸਕਰੀਨ ਪੰਜਾਬੀ ਵਿੱਚ ਵੀ ਪੜ੍ਹੋ ਇਹੀ ਖਬਰ 
ਕਰਫਿਊ ਦੌਰਾਨ ਖੁੱਲ੍ਹ 25 ਮਾਰਚ (ਬੁੱਧਵਾਰ) ਤੋਂ ਹੀ ਮਿਲੇਗੀ


Sunday, March 8, 2020

देखते ही देखते सब के सामने खबर उड़ा ले जाती है बिंदु उप्पल

महिला पत्रकारों में निरतंर सक्रिय रहने वाली खोजी पत्रकार
लुधियाना: 8 मार्च 2020: (रेक्टर कथूरिया//मीडिया स्क्रीन Online)::
लोकप्रिय समाचारपत्र दैनिक जागरण से सबंधित जानीमानी सक्रिय पत्रकार बिंदु उप्पल से कब और कहां मुलाकात हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। हर पल पत्रकारिता की डियूटी निभाने वाली बिंदु कहीं भी मिल सकती है। किसी प्रेस कांफ्रेंस में भी,.. किसी संगीत आयोजन में भी, किसी खेल टूर्नामेंट में भी, दशहरे-दीपावली के मेले में भी और किसी यूनिवर्सिटी के विशेष आयोजन में भी। हर चीज़ को गहराई से देखती हुई और हर बात को बहुत ही ध्यान से देखती हुई। आपके देखते ही देखते कब काम की खबर उड़ा लेती है इसका पता अगले दिन की अख़बार पढ़ कर ही चलता है और साथ वाले पत्रकार सोचते ही रह जाते हैं हमारी नज़र से यह खबर क्यूं छुपी रह गयी? 
मुलाकात होगी तो बिंदु बहुत सी बातें भी करेगी। रिफ्रेशमेंट कहीं मिस न हो जाये इसका भी ख्याल रखेगी लेकिन आपको खबर की भनक नहीं लगने देगी। हाल ही में जब सी टी यूनिवर्सिटी के खेती मेले में भेंट हुई तो उस मुलाकात के दौरान भी मैंने यही पूछा सब के सामने कैसे काम की खबर अपने हाथ में छुपा लेती हो? कौन सा जादू है? मुस्करा कर बोली-बस अपनी अपनी नज़र और अपने अपने नज़रिये की बात है। 
खबरों के साथ इतनी अटैचमेंट होने के बावजूद कभी मानवता को नज़रअंदाज़ नहीं किया। मानवीय पहलू को हर वक़्त याद रखने वाली बिंदु मानवीय रिश्तों को बहुत महत्व देती है। शायद यही कारण है कि लुधियाना और जगराओं के बहुत से परिवार उसे अपना पारिवारिक सदस्य ही मानते हैं। दुःख की घड़ी हो या सुख का मौका ये 
िवार बिंदु को नहीं भूलते। 
उस दिन खेती मेले में बिंदु की बेटी भी साथ थी। मैंने थोड़ा गंभीर और थोड़ा मज़ाक में कहा क्या इसे अभी से पत्रकारिता सिखाना शुरू कर दिया? इसे अख़बार का पत्रकार बनाओगी या किसी चैनल का? जवाब में बोली की भी नहीं। इसे आईपीएस बनाना है। उस दिन उसने बताया कि में पुलिस फ़ोर्स के लिए उसके मन में कितना सम्मान है कितनी आस्था है। शायद और बातें भी होतीं लेकिन उस दिन इस खेती मेले में कोई नई इवेंट शुरू हो गयी थी और हम सब उसकी कवरेज में व्यस्त हो गए। कोशिश होगी कभी जल्द ही बिंदु उप्पल पर कुछ विस्तार से सके। --रेक्टर कथूरिया (मीडिया स्क्रीन Online)

Wednesday, February 12, 2020

आज का मीडिया किसके दम पर ऐसा कर जाता है

एक जरूरी बात बता रहे हैं श्याम मीरा सिंह 
दिल्ली की जनता को कोसने वाले
जानेमाने एंकर सुधीर चौधरी 
लेखक श्याम मीरा सिंह 
जी न्यूज का एंकर दिल्ली की पूरी जनता को नल्ला कह रहा है, क्योंकि उसके मालिक को जनता ने वोट नहीं किया। मीडिया के एक एंकर को ये ताकत कहां से मिलती है? नेता से?? नहीं... बिल्कुल नहीं, केवल नेता से नहीं मिलती, बल्कि बाकी देश की जनता जो दिल्ली में वोट नहीं कर सकती, उससे भी मिलती है। वह विशेष जनता, इस एंकर को अपने नायक की तरह देखती है। उन्हें पत्रकार नहीं चाहिए, उन्हें उनके अंदर के जहर के लिए एक कुशल प्रवक्ता चाहिए, जो सुधीर चौधरी अपने आप में है। सुधीर चौधरी वही कर रहा है, जो बाकी देश की जनता सुनना चाहती है। यही वो बैटल फील्ड है जो आप और हम हार चुके हैं। मीडिया की बराबरी हम नहीं कर सकते।  मीडिया के द्धारा तैयार उस "विशेष जनता" को समझाना आसान नहीं है। हम इतने कमजोर हैं कि समानांतर मीडिया खड़े करने की स्थिति में भी नहीं हैं। 
इसलिए ये वक्त, स्वमैथुन की मारी लेखनी के दम्भ और मठाधीशी को छोड़ने का वक्त है। मेरी, आपकी लिस्ट में ऐसे बहुत से लोग हैं जो बेहद प्रभावी लिखते हैं, अच्छा लिखते हैं। सबसे पहले इन सबका आपस में जुड़ना बेहद जरूरी है। फिलहाल इन्हें पढ़ने वाले बस पांच सौ से हजार के बीच में लोग होते हैं। ये संख्या बढ़ानी है, ताकि टीवी के ज़हर को सोशल मीडिया के माध्यम से हर रोज न्यूट्रलाइज़ किया जा सके। 
इसलिए हमें अपनी मठाधीशियां त्यागनी होगीं, अपनी आत्ममुग्धता थोड़ी ढीली करनी होगी, ताकि अन्य राइटर्स, स्टूडेंट्स, पोएट्स, एक्टिविस्ट, आर्टिस्ट को भी लोग, आपके-हमारे जरिए जान सकें। इत्तेफाक से मुझे यहां ऐसे अच्छे लोग मिलें हैं जिनकी मदद से मेरी पोस्ट लोगों तक पहुंच सकीं। मुझसे भी अच्छे बहुत से ऐसे नए नए लड़के-लड़कियां हैं जिनकी समझ व्यापक है, प्रगतिशील है। जिनका कंटेंट लोगों तक पहुंचना चाहिए। उन्हें प्रोत्साहित करने की जरूरत है, अपने से आगे करने का वक्त है। 

आज से मैं अपनी वॉल पर हर रोज किसी अन्य राइटर, पोएट, एक्टिविस्ट, खासकर नए स्टूडेंट्स की पोस्ट शेयर किया करूँगा जो अभी अभी सोशल मीडिया पर नए हैं ताकि उनकी पहुंच कुछ बढ़ सके। जिससे कि एक हद तक टीवी के प्रभाव को न्यूनतम किया जा सके.. टीवी के अलावा भी लोगों के पास अन्य विचार पहुंच सकें। 
आपकी प्रतिक्रिया क्या है? ---श्याम मीरा सिंह